तीसरा चरणः उत्तर प्रदेश के ‘यादव लैंड’ में गड़बड़ाया बीजेपी का गुणा-गणित, सपा का कड़ा इम्तिहान

Written by विजय विनीत | Published on: May 6, 2024
उत्तर प्रदेश में लोकसभा के तीसरे चरण की दस सीटों के लिए होने वाले चुनाव में भाजपा का गुणा-गणित गड़बड़ाता नजर आ रहा है। इन सीटों के लिए सात मई को वोट डाले जाएंगे। यादव और मुस्लिम वोटरों की बहुलता वाली मैनपुरी, कन्नौज, फिरोजाबाद और बदायूं सीटों के अलावा संभल, हाथरस, आगरा, फतेहपुर सीकरी, फिरोजाबाद, एटा, आंवला और बरेली में इस बार बीजेपी के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। भाजपा को भरोसा था कि राम नहीं चलेंगे, तो मोदी की गारंटी चलेगी। हिन्दुत्व लहर पैदा करने में उसे कामयाबी मिलती नहीं दिख रही है। सभी दस सीटों पर बीजेपी की न पहले जैसी साख है और न कोई लहर।



लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण में जिन सीटों पर चुनाव होने जा रहा है वहां यादव-मुस्लिम वोटर सर्वाधिक हैं। इसे 'यादव लैंड' के नाम से जाना जाता है। मैनपुरी, कन्नौज, फिरोजाबाद और बदायूं में इस बार बीजेपी की राह आसान नहीं होने जा रही है। ये वो सीटें हैं जहां सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव और उनके परिवार के लोग चुनाव लड़ रहे हैं। संभल, हाथरस, आगरा, फतेहपुर सीकरी, फिरोजाबाद, एटा, आंवला और बरेली में बीजेपी के कैंडीडेट इस बार इंडिया गठबंधन के प्रत्याशियों से घिरे हुए दिख रहे हैं।

तीसरे चरण में जिन दस सीटों पर चुनाव होने जा रहा है उसमें साल 2019 के चुनाव में सपा सिर्फ दो सीटें ही जीत पाई थी। संभल में उसे 14.8 फीसदी और मैनपुरी में 9.7 फीसदी वोटों की बढ़त मिली थी। बाकी सभी आठ सीटें सीटें बीजेपी के कब्जे में रहीं। फतेहपुर सीकरी में बीजेपी ने सपा को 47 फीसदी वोटों के अंतर से चुनाव हरा दिया था।
 
बदायू में फिर कांटे की टक्कर
 
लोकसभा की बदायूं सीट पर इस बार कांटे की टक्कर होने जा रही है। समाजवादी पार्टी ने इस सीट पर पहले धर्मेंद्र यादव को टिकट दिया, फिर शिवपाल यादव के नाम की घोषणा की गई। बाद में शिवपाल के बेटे आदित्य यादव को प्रत्याशी बनाया गया। दूसरी ओर, बीजेपी ने मौजूदा सांसद संघमित्रा मौर्या का टिकट काटकर दुर्विजय शाक्य को मैदान में उतारा है। बसपा ने मुस्लिम खान को टिकट दिया है। पिछले पांच सालों में यहां बीजेपी का वोट 15 फीसदी बढ़ा है। साल 2014 में सपा के धर्मेंद्र यादव और बीजेपी के वागीश पाठक के बीच मुकाबला हुआ था। 48.5 फीसदी वोट पाकर धर्मेंद्र सांसद चुने गए थे। वागीश को सिर्फ 32.3 फीसदी वोट मिले थे। साल 2019 के चुनाव में 47.3 फीसदी वोट लेकर संघमित्रा मौर्य ने धर्मेंद्र यादव को 1.7 फीसदी वोटों के अंतर से हरा दिया था।

वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह ने बदायूं का दौरा करने के बाद कहा कि इस बार बीजेपी के लिए चुनौतियां कड़ी हैं। वह कहते हैं, ‘यहां मुद्दों पर कम, चेहरों पर चुनाव लड़ा जा रहा है। पिछले एक दशक में बीजेपी सरकार ने बदायूं के विकास के लिए कोई ठोस काम नहीं किया। यहां न तो कायदे का रेलवे स्टेशन है और न ही विकास की कोई मुकम्मल योजना। बदायूं में जाम नासूर की तरह है, जिसका इलाज बीजेपी सरकार के पास नहीं है। बदायूं की थर्मल पावर इंडस्ट्री में ज्यादातर बाहरी श्रमिक हैं। इस जिले के दर्जनों गांव हर साल बाढ़ में डूब जाते हैं, जिन्हें बचाने के लिए बीजेपी सरकार ने आज तक विकास का कोई मॉडल नहीं बनाया है। बदायूं सीट पर इस बार भी कांटे की टक्कर देखी जा रही है।’
 
आंवला में कांटे की टक्कर
 
बदायूं जिले की दो और बरेली की तीन विधानसभा सीटों को मिलाकर बनी है आंवला सीट। इस बार भाजपा ने अपने मौजूदा सांसद धर्मेंद्र कश्यप को फिर टिकट दिया है। समाजवादी पार्टी ने नीरज मौर्य को मैदान में उतारा है। बसपा ने सपा छोड़कर आए आंवला के नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष सैयद आबिद अली को मैदान में उतारकर बीजेपी की राह आसान बनाने की कोशिश की है, लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है।

बरेली-आंवला मार्ग पर खेतों में लगे बाड़ इस बात को तस्दीक करते हैं कि यहां छुट्टे पशुओं की समस्याएं सबसे बड़ा मुद्दा हैं। यूपी के पशुपालन मंत्री धर्मपाल सिंह यहीं से हैं और किसान परेशान हैं। यहां भी तिकोनी लड़ाई दिख रही है, लेकिन मुख्य मुकाबला सपा और बीजेपी के बीच है। नीरज की पिछड़ों और दलितों में अच्छी पैठ है। इनके मैदान में आने से बीजेपी के धर्मेंद्र कश्यप की मुश्किलें बढ़ी हैं। यहां सपा और बीजेपी में कांटे की टक्कर है।
  
बरेली में मुद्दे बेअसर
 

बरेली लोकसभा सीट पर इंडिया गठबंधन ने पूर्व सांसद प्रवीन सिंह ऐरन को मैदान में उतारा है। इनकी बीजेपी के छत्रपाल सिंह गंगवार से टक्कर हो रही है। बसपा ने छोटेलाल गंगवार को मैदान में उतारकर बीजेपी प्रत्याशी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। बरेली सीट बीजेपी की गढ़ मानी जाती रही है, लेकिन पूर्व मंत्री संतोष गंगवार का टिकट कटने से सत्तारूढ़ दल की राह कठिन नजर आ रही है।

बरेली सीट पर साल 2014 में संतोष कुमार गंगवार 50.9 फीसदी वोट लेकर चुनाव जीते थे। सपा प्रत्याशी आयशा इस्लाम को 27.3 फीसदी वोट पर संतोष करना पड़ा था। साल 2019 में फिर संतोष कुमार गंगवार 52.9 फीसदी वोट लेकर चुनाव जीते। इनका मुकाबला सपा के भगवत सरण गंगवार से हुआ और उन्हें 37.3 फीसदी वोटों पर संतोष करना पड़ा। यहां न किसी पार्टी की लहर है और न ही कोई खास मुद्दा असर दिखा रहा है। स्मार्ट सिटी होने के बावजूद भी बरेली के कई इलाकों में पीने का साफ पानी नहीं है। ग्राउंड वाटर भी साफ नहीं है। कई जगहों पर लोग बोतल बंद पानी पीते हैं। शुरू में यहां गंगवार समुदाय के लोग दो फाड़ दिख रहे थे, लेकिन पीएम के रोड शो के बाद बीजेपी यहां मजबूत स्थिति में दिख रही है। बरेली में दलित समुदाय का रुझान भी प्रत्याशियों के हार-जीत पर निर्भर करेगा।
 
एटा में उलझे हैं समीकरण
 
एटा लोकसभा सीट पर दिलचस्प मुकाबला हो रहा है। बीजेपी ने मौजूदा सांसद राजवीर सिंह को मैदान में उतारा है। राजवीर पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के बेटे हैं। सपा ने समुदाय के देवेश शाक्य पर बाजी लगाई है। देवेश औरैया से दो बार जिला पंचायत सदस्य रह चुके हैं। कांग्रेस छोड़कर बसपा में आए अधिवक्ता मोहम्मद इरफान को दलित और मुस्लिम वोटरों पर भरोसा है। इस सीट पर सर्वाधिक वोटर लोधी समाज के हैं तो शाक्य समुदाय के लोग भी कम नहीं हैं। बीजेपी पहले सवर्ण, लोधी और शाक्य वोटरों दम पर चुनाव जीतती रही है, लेकिन इस बार समीकरण उलझे हुए हैं।

पिछले पांच सालों में एटा सीट पर सपा का वोट करीब 12.7 फीसदी बढ़ा है। साल 2014 के चुनाव में राजवीर सिंह को 51.3 फीसदी वोट मिले थे, जबकि कुंवर देवेंद्र सिंह यादव को सिर्फ 29.6 फीसदी वोटों पर संतोष करना पड़ा था। साल 2019 के चुनाव में फिर उन्हीं दोनों प्रत्याशियों के बीच मुकाबला हुआ तो बीजेपी 54.6 फीसदी पर पहुंच गई और सपा को 42.3 फीसदी वोट मिले। बीजेपी के लिए ऐटा सुरक्षित सीट मानी जाती है। बीजेपी ने यहां धारा-370 और राम मंदिर के मुद्दे पर जंग जीतना चाहती है, जबकि सपा ने महंगाई और बेरोजगारी को मुद्दा बनाया है। सपा ने यहां से शाक्य प्रत्याशी मैदान में उतारा है। इसके चलते बीजेपी के वोटर बंटते नजर आ रहे हैं। इसके बावजूद यहां बीजेपी मजबूत स्थिति में है।
 
मैनपुरी में सपा मजबूत

 
मैनपुरी लोकसभा सीट समाजवादी पार्टी का गढ़ मानी जाती रही है। कई दशकों से इस सीट पर सपा जीतती रही है। इस बार सपा मुखिया अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव मैदान में हैं। बसपा ने गुलशन कुमार शाक्य को मैदान में उतारा है। बीजेपी ने योगी सरकार के मंत्री जयवीर सिंह को मैदान में उतारकर सपा को टक्कर देने की कोशिश की है। मंत्री जयवीर मैनपुरी सदर सीट से विधायक हैं।

मैनपुरी में करीब चार लाख यादव समुदाय के वोटर हैं। मोदी लहर में भी भाजपा यह सीट नहीं जीत पाई थी। भाजपा ने यादव परिवार को चुनावी भंवर में फंसाने के लिए अपने मंत्री को मैनपुरी में उतारा है।

साल 2014 में हुए चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह को 59.6 फीसदी वोट मिले थे, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी शत्रुघ्न चौहान को सिर्फ 23.1 फीसदी वोट पर संतोष करना पड़ा था। साल 2019 के चुनाव में मुलायम सिंह यादव फिर मैदान में उतरे। इस चुनाव में उन्हें 53.8 फीसदी और बीजेपी के प्रेम सिंह शाक्य को 44.1 फीसदी वोट मिले थे। मैनपुरी के चुनाव में मुद्दे तो ढेरों उठते हैं, लेकिन मतदान नजतीक आते ही लोग जातिगत खेमेबंदी में फंस जाते हैं। मैनपुरी में फिलहाल बेरोजगारी और महंगाई सबसे बड़ा मुद्दा है। बीजेपी के लिए मैनपुरी में समाजवादी पार्टी का खूंटा उखाड़ पाना आसान नहीं है।
 
फिरोजाबाद सीट: यादवों का गढ़

 
फिरोजाबाद लोकसभा सीट यादवों का मजबूत गढ़ मानी जाती रही है। इसके बावजूद साल 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा बीजेपी के चंद्रसेन जादौन से चुनाव हार गई थी। सपा ने इस सीट पर रामगोपाल के पुत्र अक्षय यादव को मैदान में उतारा है, जबकि बीजेपी ने चंद्रसेन जादौन का टिकट काटकर विश्वदीप सिंह पर बाजी लगाई है। बसपा ने यहां चौधरी बशीर को टिकट दिया है।

बीजेपी सांसद चंद्रसेन जादव को लेकर वोटरों में खासी नाराजगी रही है, जिसके चलते बीजेपी को अपना प्रत्याशी बदलना पड़ा है। फिरोजाबाद में छुट्टा पशुओं की समस्या सबसे बड़ा मुद्दा है। यहां भी विकास और रोजगार के बजाय जातीय आधार पर वोट डाले जाते रहे हैं। बीजेपी इस चुनाव को हिन्दुत्व के ट्रैप पर ले जाने की कोशिश कर रही है, लेकिन सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का खास असर नहीं दिख रहा है। फिरोजाबाद में जातीय समीकरणों के हिसाब से सपा मजबूत स्थिति में नजर आ रही है।
  
आगरा लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित है। बीजेपी ने यहां केंद्रीय राज्य मंत्री और मौजूदा सांसद एसपी सिंह बघेल को मैदान में उतारा है। बसपा ने पूजा अमरोही को टिकट दिया है। सपा ने कारोबारी सुरेश चंद कर्दम को टिकट दिया है। साल 2019 के चुनाव में बीजेपी के एसपी बघेल ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी बसपा के मनोज कुमार सोनी को 18.5 फीसदी वोटों के अंतर के चुनाव हराया था। साल 2014 में बीजेपी के रमाशंकर कठेरिया चुनाव जीते थे। उस समय भी इनका मुकाबला बसपा के नारायण सिंह सुमन से हुआ था। इंटरनेशनल एयरपोर्ट और हाईकोर्ट की बेंच यहां चुनावी मुद्दा है। यहां इस बार भी बीजेपी फंसी नजर आ रही है। हालांकि मुकाबला कांटे का  है।   
 
संभल में बीजेपी को कड़ी चुनौती
 
संभल लोकसभा सीट पिछली दफा सपा के कब्जे में रही। वरिष्ठ नेता सांसद डॉ. शफीकुर्रहमान बर्क के निधन के बाद सपा ने उनके पोते जियाउर्रहमान बर्क को टिकट दिया है। बर्क कुंदरकी के विधायक हैं। बीजेपी ने परमेश्वर लाल सैनी और बसपा ने पूर्व विधायक सौलत अली को मैदान में उतारा है। बीजेपी सपा को पटखनी देने के लिए जोर-आजमाइश कर रही है। संभल का सियासी सीन यह है कि यहां सबसे बड़ी आबादी मुस्लिमों की है। दूसरे स्थान पर दलित, तीसरे पर सैनी के बाद जाटव व राजपूत बराबर-बराबर हैं।

संभल में आधी से ज्यादा आबादी मुसलमानों की है। सपा-बसपा के उम्मीदवार मुस्लिम हैं। इनके वोट बंट गए तो बीजेपी की राह आसान हो सकती है। मुसलमान अगर गोलबंद होकर इंडिया गठबंधन के साथ रहते हैं तो सपा को हरा पाना आसान नहीं होगा। संभल इलाके में मेंथा की खेती होती है। हैंडीक्राफ्ट और चांदी का वर्क भी बनता है। इसके बावजूद यहां कोई बड़ा इंडस्ट्रियल एरिया विकसित नहीं हो सका है। यहां मुकाबला काफी रोचक है। सपा और भाजपा दोनों की परीक्षा कठिन दिख रही है। आखिर में बाजी किसके हाथ लगेगी, यह कहा नहीं जा सकता है।
 
हाथरस में मुकाबला रोचक
 
हाथरस लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है। बीजेपी ने इस सीट पर मौजूदा सांसद राजवीर सिंह दिलेर का टिकट काटकर अलीगढ़ की खैर सीट के विधायक अनूप वाल्मीकि को मैदान में उतारा है। कुछ दिन पहले ही राजवीर की हार्ट अटैक से मौत हो गई थी। बसपा ने इंजीनियर हेमबाबू धनगर को टिकट दिया है तो समाजवादी पार्टी ने जसवीर वाल्मीकि को अपना उम्मीदवार बनाया है। इस सीट पर मुख्य मुकाबले में शामिल सभी दलों के चुनाव जीतने की चुनौती है। हाथरस में मुकाबला काफी रोचक नजर आ रहा है। पिछले पांच सालों में बीजेपी ने अपना वोटबैंक 7.6 फीसदी बढ़ा दिया है। बीजेपी यहां दो बार से चुनाव जीत रही है। यह बीजेपी की सुरक्षित सीट मानी जाती रही है। इस बार भी बीजेपी मजबूत स्थिति  में नजर आ रही है।
 
सीकरी में बीजेपी प्रत्याशी का विरोध
 
फतेहपुर सीकरी में बीजेपी अंदरूनी लड़ाई से जूझ रही है। पिछले दो चुनाव से बीजेपी यहां से चुनाव जीत रही थी। इस बार बीजेपी के वरिष्ठ नेता राजकुमार चाहर के विरोध का फायदा कांग्रेस प्रत्याशी रामनाथ सिंह को मिल रहा है। साल 2019 में चुनाव जीतने के बाद राजकुमार चाहर लंदन चले गए थे। जनता से उनके सरोकार खत्म हो गए थे। बीजेपी सांसद को लेकर लोगों में गुस्सा है और इस चुनाव में पार्टी को नुकसान हो सकता है।

बीजेपी ने सीकरी सीट बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। बीजेपी के सभी कद्दावर नेताओं की सभा हो चुकी है। प्रियंका रोड शो भी हो चुका है। दरअसल, यहां बीजेपी विधायक चौधरी बाबूलाल के बेटे रामेश्वर चौधरी निर्दल प्रत्याशी के रूप में मैदान में हैं। इससे बीजेपी को काफी नुकसान होता दिख रहा है।
 
कितना असर डालेंगे मुद्दे
 
तीसरे चरण में लोकसभा की दस सीटों पर होने वाले चुनाव पर नजर डालें तो ज्यादार मुद्दे गौण हो चुके हैं। आगरा, हाथरस और फिरोजाबाद में कुछ लोगों रुझान हिन्दुत्व की तरफ है तो बेरोजगारी व महंगाई का मुद्दा भी चुनाव पर असर डालता दिख रहा है।

आंवला, बदायूं और संभल सीटों पर छुट्टा पशुओं की समस्या ज्यादा है। बरेली, एटा और मैनपुरी में अग्निवीर भर्ती, पेपर लीक और रोजगार का मुद्दा चुनाव पर असर डाल सकता है। बरेली, आंवला, बदायूं, संभल, मैनपुरी, फिरोजाबाद, आगरा, हाथरस, एटा, फतेहपुर सीकरी में राम मंदिर से लोग खुश हैं, लेकिन वोट जातीय आधार पर ही डाले जाएंगे। इन इलाकों में नौजवान बेरोजगारी और पुलिस के पेपर लीक होने मुद्दा उठाते हैं।

सियासी समीकरणों पर गौर किया जाए तो मैनपुरी, कन्नौज, फिरोजाबाद और बदायूं में बीजेपी की नैया डूबती नजर आ रही है। फतेहपुर सीकरी में भी बीजेपी की स्थिति डंवाडोल है। उसकी आगरा सीट भी फंसी है। बरेली में कांग्रेस मुख्य मुकाबले में है और मुस्लिम समुदाय के कद्दावर नेता सलीम शेरवानी उनके पक्ष में वोट मांग रहे हैं। सपा ने अब सलीम शेरवानी को मना लिया है। आंवला में भी इंडिया गठबंधन के प्रत्याशी नीरज मौर्य काफी मजूबत हैं। यहां बीजेपी प्रत्याशी की मौत हो चुकी है। अगर बीजेपी चुनाव जीतती है तो यहां दोबारा चुनाव हो सकता है।

(लेखक विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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