ग़रीबी के आंकड़ों से खिलवाड़ : मोदी सरकार की नीतियों को सही ठहराने की कोशिश

Written by मुकेश असीम | Published on: April 14, 2023
हाल के सालों में आए लगभग सभी सर्वेक्षण बताते हैं कि ऊपर की 10% आबादी के पास ही देश की कुल संपत्ति में से 80% से अधिक संपदा इकट्ठा हो गई है। जबकि निचले 50-60% के पास कोई संपत्ति (उत्पादन के साधन) नहीं हैं, वे क़र्ज़ के बोझ में दबे हैं।


प्रतीकात्मक तस्वीर। PTI
भारत में गरीबी के स्तर पर पुरानी बहस हाल में फिर उठ खडी हुई है। वजह है अन्य सभी अध्ययनों व रिपोर्टों के विपरीत नरेंद्र मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों द्वारा गरीबी में भारी कमी के दावे। हाल में नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने दावा किया है कि अप्रैल-जून 2020 के सख्त लॉकडाउन में गरीबी में थोड़ी सी वृद्धि जरूर हुई थी, मगर उसके पहले और उसके बाद से गरीबी में तेजी से कमी आई है। इसके पूर्व आईएमएफ व विश्व बैंक से संबंधित अर्थशास्त्रियों के ऐसे दावे प्रकाशित हुए थे। एक दावा आईएमएफ के सुरजीत भल्ला, पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद विरमानी व करन भसीन का था। भल्ला 20 साल से कहते चले आ रहे हैं कि गरीबी के आकलन वास्तविकता से ऊंचे हैं और भारत में इतनी गरीबी है ही नहीं। उनका कहना है कि 2004 में 31.9% रही गरीबी 2019 में ही लगभग समाप्त हो चुकी थी (मात्र 0.8%)। आय पर कोविड लॉकडाउन का दुष्प्रभाव भी सरकार ने मुफ्त अनाज बांट कर समाप्त कर दिया। अतः इससे भी गरीबी बढ़ी नहीं। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के अर्थशास्त्री सौम्यकान्ति घोष भी ऐसी ही रिपोर्ट जारी कर चुके हैं।

1960 के दशक से भारत में गरीबी स्तर को लेकर कई विशेषज्ञ कमेटियां बनीं, सर्वेक्षण हुए, बहुत से विद्वत्तापूर्ण विश्लेषण व रिपोर्ट भी प्रकाशित हुए। मगर गरीबी का पैमाना व इसकी तादाद विवाद का विषय बना रहा। पूंजीपतियों के थिंक टैंक व सरकार के करीबी विद्वान कहते रहे हैं कि तीव्र विकास से गरीबी में भारी कमी आई है। लेकिन जीवन की वास्तविकताओं पर आधारित तथ्य सामने लाते हुए इस पर सवाल उठाए जाते रहे हैं। पिछले कुछ सालों में संगठित-असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, मेहनतकश किसानों व सभी छोटे काम-धंधे करने वालों के जीवन में भारी आर्थिक संकट है, नौकरियों में कटौती हुई है, प्रवासी मजदूरों को काम के अभाव में वापस गांव लौटना पड़ा है, मजदूरी घटी है, बेरोजगारी व महंगाई तेजी से बढ़ी है, भूख सूचकांक में भारत नीचे की ओर लुढ़क रहा है। फिर भी इन ‘विद्वत्तापूर्ण’ अध्ययनों में गरीबी में भारी कमी के दावे किये गए हैं। इसने बहस को फिर से गर्म कर दिया है।

भारत में गरीबी संबंधित आधिकारिक अध्ययनों का मुख्य आधार नेशनल सैंपल सर्वे द्वारा किये गए उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण (सीईएस) रहे हैं। पर इसके अंतिम आंकड़े 2011-12 के ही हैं। 2017-18 के आंकड़ों को सरकार ने खुद ही गलत कहकर रद्द कर दिया क्योंकि ये गरीबी की जो तस्वीर पेश कर रहे थे, वह सरकार को नापसंद थी। 2011-12 के पश्चात आंकड़ों के अभाव में गरीबी के स्तर पर नए अध्ययन भी रुक से गए थे, हालांकि नोटबंदी व कोविड के दौर में मजदूरों-किसानों व अन्य छोटे काम-धंधे करने वालों के जीवन में आर्थिक विपदा व उनकी आय में कमी की खबरें आतीं रही हैं। कोविड के बाद तो 23 करोड़ से अधिक व्यक्तियों तक के गरीबी में धकेल दिए जाने का अनुमान लगाया जा चुका है। कोविड के बाद से K-आकार आर्थिक ‘वृद्धि’ की चर्चा भी होती रही है अर्थात पहले से अमीर और ऊपर की ओर जा रहे हैं तथा गरीब और भी नीचे की ओर।

पर श्रीमान भल्ला, आदि भारत में गरीबी की समाप्ति के इस आश्चर्यजनक निष्कर्ष पर आखिर पहुंचे कैसे? भल्ला के मुताबिक सीईएस के खर्च आंकड़े सैम्पल सर्वे आधारित होने से वास्तविकता से नीचे होते हैं। अतः वे गरीबी की मात्रा अधिक दिखाते हैं। इसकी जगह राष्ट्रीय आय या सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) गणना के निजी उपभोक्ता खर्च को गरीबी की गणना का आधार बनाना चाहिए। अध्ययन बताते हैं कि दुनिया भर में ही राष्ट्रीय आय गणना के व्यय आंकड़े उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण से अधिक पाए जाते हैं। भारत में तो यह अंतर बहुत ही ज्यादा है। 2004-05 में यह अंतर दो गुने का था तो 2017-18 के अनाधिकारिक आंकड़ों के अनुसार जीडीपी आंकड़ों में उपभोक्ता खर्च सैंपल सर्वे की तुलना में तीन गुना था। अर्थात जीडीपी आंकड़ों के अनुसार आय सैंपल सर्वे से तीन गुना थी। इस आधार पर श्रीमान भल्ला को अगर देश में कोई गरीबी रेखा से नीचे नहीं मिला तो आश्चर्य की क्या बात है? यह तो जांचा-परखा वैज्ञानिक सत्य है कि अगर कोई व्यक्ति अपनी पसंद के आंकड़ों को ही निष्कर्ष का आधार बनाए तो उससे उसकी पसंद की बात को सिद्ध किया जा सकता है!

सवाल है कि सकल घरेलू उत्पादन या जीडीपी के आंकड़े सैंपल सर्वे की तुलना में अधिक आय क्यों दिखाते हैं? सर्वविदित है कि 2015 में जीडीपी गणना की जो नई पद्धति अपनाई गई उस पर देश-विदेश के बहुत से अर्थशास्त्रियों द्वारा पहले ही प्रश्न उठाए जा चुके हैं। उनके विस्तार में जाए बगैर बस एक मुख्य बात का जिक्र करते हैं। राष्ट्रीय आय या जीडीपी असल में देश भर में कुल आर्थिक गतिविधि पर आधारित है ही नहीं। इसमें औपचारिक क्षेत्र या कंपनी के तौर पर पंजीकृत व्यवसायों को ही आधार बनाया गया है। जितनी कंपनियां सरकारी डेटाबेस में आर्थिक गतिविधि की रिपोर्ट देती हैं उनके आंकड़ों को ही पूरी अर्थव्यवस्था के पैमाने पर विस्तारित कर जीडीपी गणना की जाती है। लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था का लगभग आधा हिस्सा आज भी अनौपचारिक क्षेत्र में है। इसके लिए कोई आधिकारिक आंकडा उपलब्ध नहीं होता। यह भी सुविदित है कि नोटबंदी, जीसटी व लॉकडाउन में अनौपचारिक क्षेत्र की स्थिति लगातार कमजोर हुई है जबकि बड़े इजारेदार कॉर्पोरेट पूंजीपतियों के मुनाफे में वृद्धि हुई है। ऐसे में कॉर्पोरेट आय को ही पूरे देश की आय की गणना का आधार बनाने से श्रीमान भल्ला जैसे नतीजे निकाले ही जा सकते हैं। मगर जब सर्वेक्षणकर्ता सैंपल परिवारों में जाते हैं तो असली खर्च व आय कम मिलते हैं।

रॉय एवं वेड लिखित विश्व बैंक शोधपत्र के अनुसार, “पिछले दशक में भारत में गरीबी घटी है, पर उतनी नहीं जितनी पहले सोचा गया था।” 1993 में गरीबी 47.6%, 2004 में 39.9% तथा 2011 में 22.5% थी (सभी सीईएस पर आधारित)। 2019 में यह घटकर 10.2% रह गई। इनके अध्ययन का आधार सीएमआईई का कंज्‍यूमर पिरैमिड हाउसहोल्ड सर्वे (सीपीएचएस) है जिसके बारे में पहले ही कई विशेषज्ञ (प्रो ज्यां द्रीज व अनमोल सोमांची के लेख) बता चुके हैं कि इसके आंकडों में अति-गरीबों को उपयुक्त जगह नहीं मिलती, क्योंकि सर्वेक्षणकर्ता मुख्य सड़कों से अंदर नहीं जाते, जहां वास्तविक गरीब लोग रहते हैं। इस सर्वेक्षण के लिए भुगतान करने वाली कंपनियां इसका इस्तेमाल ग्राहकों की आय व संख्या का अनुमान लगा कर बिक्री की रणनीति बनाने हेतु करती हैं। अति-गरीब उनके ग्राहक न होने से उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं। यह भी गौरतलब है कि विश्व बैंक की ही एक और रिपोर्ट ‘पावर्टी एंड शेयर्ड प्रास्पेरिटी 2022’ के अनुसार 2020 में कोविड दौरान 7 करोड़ और लोग अत्यंत गरीबी में पहुंच गए। इसमें से 80% या 5.6 करोड़ सिर्फ भारत के हैं।

इन अध्ययनों की इस दौरान के अन्य सर्वेक्षणों के आंकडों से तुलना करें तो इनकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठते हैं। प्यू, प्राइस, ऑक्सफैम, आदि एजेंसियों व खुद विश्व बैंक के 2021 के सर्वे बताते हैं कि कोविड महामारी के दौरान आय में असमानता बढ़ी है और 84% परिवारों की आय घटी है। 2016 में नोटबंदी के पहले काम की उम्र वालों में रोजगार दर 46% थी, अब वह घटकर 40% से नीचे है। सभी सर्वेक्षण कहते हैं कि 2012 के बाद ग्रामीण व शहरी दोनों इलाकों में नियमित व दिहाड़ी दोनों प्रकार के श्रमिकों की मजदूरी घटी है या स्थिर रही है। 2017-18 से 2019-20 की अवधि में स्वरोजगार के 52%, दिहाड़ी मजदूरों के 30% तथा नियमित मजदूरों के 21% की दैनिक आय 200 रुपये से कम थी। इनमें से क्रमशः 16, 36 व 19% की आय 200 से 300 रुपये रोजाना थी। इस दौरान महंगाई तेजी से बढ़ी है जिसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव सबसे अधिक गरीबों पर ही पड़ता है। खुद श्रीमान भल्ला 5 किलो मुफ़्त राशन के महत्व को स्वीकारते हैं। निम्न सारणी में ऐसे ही एक सर्वेक्षण के नतीजे हैं जो बताते हैं कि 2016 से 2021 में आबादी के किस हिस्से की आय कितनी बढ़ी-घटी है।

यह सारणी सारी तस्वीर को साफ कर देती है। सही है कि खरबपतियों-अरबपतियों की तादाद बढ़ी है, लग्जरी घर/फ्लैट खूब बिक रहे हैं, हवाई यात्री बढ़े हैं, शेयर बाजार ऊंचाई पर हैं, बड़ी महंगी एसयूवी गाड़ियां खूब बिक रही हैं, मॉल्स में भीड़ है। पर उतना ही सही यह भी है कि बेरोजगारी रिकार्ड तोड़ रही है, शहरों व गांवों दोनों में वास्तविक मजदूरी दर (महंगाई से तुलना करने पर) गिरी है, करोड़ों लोग गरीबी में धकेल दिए गए हैं, उनके लिए हर वक्त का खाना जुटाना मुमकिन नहीं है, भूख सूचकांक में भारत लगातार नीचे जा रहा है, कुपोषण बढ़ा है, दोपहिया गाड़ियों की बिक्री 2018 के मुकाबले 40% गिर गई है।

जाहिर है कि गरीबी के ये तमाम अध्ययन, आंकड़े और विश्लेषण सामाजिक वास्तविकता की नुमाइंदगी नहीं करते। इनमें आंकड़ों की बाजीगरी ही अधिक है। ऐसे अध्ययनों का मकसद वर्तमान सरकार की नीतियों का सही ठहराना ही अधिक है। हमारे समाज की शोषित-पीड़ित गरीब मेहनतकश जनता के जीवन में सुधार या गिरावट, कि‍स दिशा में परिवर्तन हो रहा है, ये आंकड़े उसे बताने में पूरी तरह व्यर्थ हैं।

असल में तो रोजाना व्यय सीमा जैसे 29 या 35 रुपये, 74 रुपये, 150 रुपये, आदि या कुछ वस्तुओं के मालिकाने के आधार पर गरीबी को तय करना ही अतार्किक है। ऐसे विचार किया जाए तो आज के अधिकांश लोगों के मुकाबले अकबर या चन्द्रगुप्त को गरीब सिद्ध किया जा सकता है - उनके पास वह बहुत कुछ नहीं था जो आज के जीवन की सामान्य वस्‍तुएं हैं! वास्तव में गरीबी का अध्ययन करना है तो देखना चाहिए कि आज की सामाजिक संपदा में विभिन्न तबकों की हिस्सेदारी या उपभोग कितना है। जिनके पास आज उपलब्ध सामाजिक संसाधनों के उपभोग में समुचित हिस्सा नहीं है वे भी तो गरीब हैं। जो पर्याप्त संतुलित भोजन नहीं कर सकते, बेघर हैं, न्यूनतम शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकते, समान स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं प्राप्त नहीं कर सकते, उन्हें गरीब मानना चाहिए। 29, 35, 74, 150 रुपये आदि रोजाना खर्च की क्षमता को गरीबी का पैमाना बनाना बुनियादी रूप से ही गलत है। पैमाना बनाना ही है, तब सरकार के वेतन आयोग ने परिवार चलाने हेतु जरूरी पोषण, निवास, वस्त्र, शिक्षा, दवा, मनोरंजन, आदि की जितनी जरूरत निर्धारित की है और जिसके आधार पर सरकारी कर्मचारी का न्यूनतम जीवन योग्य वेतन तय किया गया है, उससे कम आय को ही गरीबी का आधार मानना तार्किक है क्योंकि खुद सरकारी तर्क से वह मानवीय जीवन की न्यूनतम आवश्यकता है। जो इस न्यूनतम मानवीय आवश्यकता से वंचित है, वह गरीब है।

स्वतंत्रता पश्चात इतिहास देखें तो 1950 के बाद जब तक भारतीय पूंजीवाद कुछ हद तक अपना विस्तार कर रहा था, तो आय व संपदा के केंद्रीकरण व असमानता में कुछ हद तक कमी आई थी। इसका लाभ शिक्षा, नौकरियों व कृषि-व्यापार में विस्तार के जरिए आम जनता के कुछ हिस्सों तक भी पहुंचा था। पूंजीवादी विस्तार का यह काल 1980 का दशक आते पूरा हो गया और भारतीय पूंजीवाद ने नवउदारवादी आर्थिक नीतियां अपना लीं। ये नीतियां पूंजीपति वर्ग द्वारा मजदूर वर्ग के खिलाफ छेड़ा गया युद्ध हैं। इनमें मजदूर संगठनों को कमजोर करने, मजदूरी घटाने, काम के घंटे बढ़ाने, सुरक्षा उपायों को दरकिनार करने व छंटनी (हायर व फायर) को सुगम बनाने वाली नीतियां हैं; सार्वजनिक संसाधनों व उद्योगों का निजीकरण है; पूंजीपतियों की बिक्री से लेकर उनके घाटे तक को पूरा करने की जिम्मेदारी पूंजीवादी राज्य संभाल लेता है; शिक्षा, स्वास्थ्य, निवास, यातायात, जैसी सेवाओं की सार्वजनिक व्यवस्था पर खर्च घटा महंगा कर दिया जाता है। तब से आय, पूंजी, संपदा, संसाधनों का कुछ इजारेदार कॉर्पोरेट पूंजीपतियों के हाथ में तेजी से संकेंद्रण हुआ है और सभी संसाधन एक-एक कर कॉर्पोरेट पूंजी के हाथ में सौंपे जा रहे हैं। आम जनता के लिए जो सार्वजनिक सेवाएं-सुविधाएं पहले उपलब्ध थीं, उनका तेजी से व्यवसायीकरण कर शुल्कों में भारी वृद्धि की गई है और वे अधिकांश आम लोगों की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं।

इसका नतीजा है कि हाल के सालों में आए लगभग सभी सर्वेक्षण बताते हैं कि ऊपर की 10% आबादी के पास ही देश की कुल संपत्ति में से 80% से अधिक संपदा इकट्ठा हो गई है, जबकि निचले 50-60% के पास कोई संपत्ति (उत्पादन के साधन) नहीं हैं। वे कर्ज के बोझ में दबे हैं और हर दिन अपनी मेहनत बेच कर किसी तरह जिंदा रहते हैं। यह अवसर भी निरंतर बढ़ते आर्थिक संकट और बेरोजगारी की वजह से कम होते जा रहे हैं। ऐसे में गरीबी कम होने के आंकड़े एक क्रूर मजाक हैं।

(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं। विचार व्यक्तिगत है)

Courtesy: Newsclick

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