ECI के हलफनामे में दावा- SIR के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए, लेकिन दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों पर सवाल बरकरार

Written by sabrang india | Published on: October 29, 2026
चुनाव आयोग का कहना है कि SIR के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे और फॉर्म 6 में कोई बदलाव नहीं किया गया था। लेकिन, आयोग के हलफनामे में यह नहीं बताया गया है कि अहम कदम उठाए जाने के बाद दो चुनाव आयुक्तों ने आपत्तियां क्यों दर्ज कराईं। साथ ही, इसमें ECINet, गोवा में मतदाताओं के नाम हटाए जाने और पश्चिम बंगाल में दायर अपीलों से जुड़ी चिंताओं का भी पूरा जवाब नहीं दिया गया है।



भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) से जुड़े सभी अहम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। आयोग ने इन आरोपों को खारिज कर दिया है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार ने अन्य दो निर्वाचन आयुक्तों - सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी - की सहमति के बिना काम किया।

यह बयान राकेश कुमार सिंह द्वारा दायर एक याचिका के जवाब में ECI द्वारा दाखिल हलफनामे (काउंटर-एफिडेविट) का हिस्सा है। इस याचिका में CEC के कामकाज और आयोग के कुछ फैसलों की वैधता को चुनौती दी गई है। उप निर्वाचन आयुक्त भानु प्रकाश येतुरु द्वारा दाखिल इस हलफनामे में कहा गया है कि 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को जारी SIR आदेश सर्वसम्मति से लिए गए थे। इन पर तीनों सदस्यों की मंजूरी थी।

आयोग ने याचिकाकर्ता द्वारा एक अखबार की रिपोर्ट पर भरोसा करने पर सवाल उठाया है। आयोग का तर्क है कि याचिकाकर्ता ने इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की। आयोग ने यह भी कहा है कि उसने न तो कोई आंतरिक नोट या फाइल मीडिया को जारी की है और न ही ऐसा करने की अनुमति दी है।

हालांकि, 27 अक्टूबर को 'द इंडियन एक्सप्रेस' की जांच में जो चिंताएं उठाई गई हैं, वे केवल इस बात तक सीमित नहीं हैं कि आयोग ने अपने फैसलों को औपचारिक रूप से मंजूरी दी थी या नहीं। रिपोर्ट में संधू और जोशी द्वारा 10 महीनों के दौरान दर्ज किए गए 14 नोटों का जिक्र है। इनमें से कई नोट उन कार्यों, प्रणालियों या प्रक्रियाओं से जुड़े हैं, जो इन दोनों आयुक्तों को सूचित किए बिना ही शुरू कर दिए गए थे या लागू कर दिए गए थे।



हलफनामे में बताया गया है कि ECI के अनुसार फैसले किस तरह लिए जाने चाहिए। लेकिन इसमें इस बात का पूरा स्पष्टीकरण नहीं है कि दोनों आयुक्तों ने बार-बार यह क्यों दर्ज किया कि उन्हें महत्वपूर्ण घटनाओं के बारे में तब पता चला, जब वे पहले ही घटित हो चुकी थीं।

परामर्श को लेकर जताई गई चिंताओं का ECI के स्पष्टीकरण से समाधान नहीं होता।

आयोग का तर्क है कि फाइल प्रोसेसिंग के दौरान अलग-अलग आयुक्तों द्वारा दर्ज किए गए नोट, सवाल, सुझाव और टिप्पणियां अपने आप में ECI के 'फैसले' नहीं माने जा सकते।

आयोग का कहना है कि फाइलें आमतौर पर CEC तक पहुंचने से पहले एक निर्वाचन आयुक्त से दूसरे निर्वाचन आयुक्त के पास जाती हैं। यह हलफनामा 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' की धारा 18 पर आधारित है। इसमें कहा गया है कि जहां तक संभव हो, निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाने चाहिए, और जहां सर्वसम्मति संभव न हो, वहां बहुमत से निर्णय लिए जाने चाहिए।

लेकिन इन टिप्पणियों (नोट्स) के समय को लेकर विवाद बना हुआ है। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्त अक्सर अपनी चिंताएं तब दर्ज कराते थे, जब कोई निर्णय लागू हो चुका होता था या कोई आधिकारिक कार्रवाई पहले ही की जा चुकी होती थी।

इसलिए, सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अंतिम आदेशों पर आयोग की मंजूरी थी या नहीं। बल्कि सवाल यह है कि क्या निर्णय लागू करने से पहले तीनों सदस्यों को पूरी जानकारी दी गई थी और क्या वे इस प्रक्रिया में शामिल थे? हलफनामे में उन घटनाओं के बारे में कोई विस्तृत स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है, जहां संधू और जोशी ने कहा था कि उन्हें इस प्रक्रिया से बाहर रखा गया था।

ECI का कहना है कि फॉर्म 6 में कोई संशोधन नहीं किया गया था, लेकिन फिर यह ऑनलाइन घोषणा (डिक्लेरेशन) किसने जोड़ी?

फॉर्म 6 को लेकर चल रहा विवाद, आयोग के कानूनी स्पष्टीकरण और इन बदलावों को लागू करने के तरीके पर उठने वाले सवालों के बीच के अंतर को दिखाता है।

नागरिक मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए फॉर्म 6 का इस्तेमाल करते हैं। मई में, जोशी ने दर्ज किया था कि 'रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960' में संशोधन किए बिना इस फॉर्म को नहीं बदला जा सकता। संधू ने भी इस बात का समर्थन किया। इन आपत्तियों के बावजूद, जुलाई में फॉर्म 6 के ऑनलाइन संस्करण में बदलाव किया गया। इसमें एक ऐसी घोषणा (डिक्लेरेशन) जोड़ी गई, जिसके तहत आवेदकों को खुद को, अपने माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी को पिछली विस्तृत मतदाता सूचियों से जोड़ने वाली जानकारी देनी थी।

'द इंडियन एक्सप्रेस' के अनुसार, संधू को इस बदलाव के बारे में एक अखबार की रिपोर्ट से पता चला। अगस्त में, उन्होंने ऑनलाइन फॉर्म में जोड़ी गई इस घोषणा को "अनधिकृत/अवैध" बताया।

ECI ने अब कहा है कि यह घोषणा SIR (एसआईआर) के लिए लाया गया एक अलग दस्तावेज था, और इसे कानूनी रूप से निर्धारित फॉर्म में कोई संशोधन नहीं माना जा सकता। आयोग का यह भी कहना है कि 1960 के नियमों के तहत निर्धारित फॉर्म में केवल केंद्र सरकार ही संशोधन कर सकती है।

साथ ही, हलफनामे में यह माना गया है कि ऑनलाइन आवेदन प्लेटफॉर्म पर जिस तरह से यह घोषणा दिखाई गई, उससे ऐसा लग सकता है कि फॉर्म 6 में संशोधन किया गया है। इसमें आगे यह भी कहा गया है कि अधिकारियों द्वारा उठाए गए कुछ कदमों को सुधारने की आवश्यकता थी।

21 अक्टूबर को, आयोग के इलेक्टोरल रोल (मतदाता सूची) डिवीजन ने ऑनलाइन आवेदन को दो हिस्सों में बांटने का फैसला किया यानी फॉर्म 6 और SIR घोषणापत्र। इससे ऑनलाइन प्रक्रिया भी फिजिकल (कागजी) आवेदनों वाली प्रक्रिया के अनुरूप हो गई है।

यह बदलाव इन दोनों दस्तावेजों को पेश करने के तरीके से जुड़ा है। लेकिन हलफनामे में यह नहीं बताया गया है कि जुलाई में फॉर्म 6 में इस घोषणापत्र को शामिल करने की मंजूरी किसने दी थी, और न ही यह स्पष्ट किया गया है कि दो आयुक्तों (कमिश्नरों) द्वारा आपत्ति जताए जाने के बाद भी इसे क्यों लागू किया गया। इसमें कहा गया है कि फॉर्म 6 के ऑनलाइन पेज पर यह घोषणापत्र जोड़ा गया था, लेकिन इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी का नाम नहीं बताया गया है।

ECINet: आधिकारिक अधिकार EROs के पास हैं, लेकिन सॉफ्टवेयर को लेकर पुरानी चिंताएं अभी भी बरकरार हैं

ECI ने मतदाता सूची से जुड़े कामों के लिए इस्तेमाल होने वाले प्लेटफॉर्म 'ECINet' का बचाव करते हुए कहा है कि इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) ही कानूनी रूप से अधिकृत अधिकारी बना हुआ है। हलफनामे के अनुसार, संबंधित ERO के आदेश के बिना मतदाता सूची में किसी का नाम जोड़ा, हटाया या उसमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता है।

आयोग ने यह भी बताया है कि इस प्लेटफॉर्म की कार्यप्रणाली तय नियमों के अनुरूप है या नहीं, इसकी जांच के लिए IIT मद्रास और IISc बेंगलुरु के सदस्यों वाली एक विशेषज्ञ समिति बनाई गई है। इसमें नई सूचना प्रौद्योगिकी (IT) प्रणालियों (मॉड्यूल्स) को मंजूरी देने से पहले उनकी गहन जांच करने की व्यवस्था का भी जिक्र है।

हालांकि, हलफनामे में बताए गए ये उपाय काफी हद तक उस प्रस्ताव से मिलते-जुलते हैं, जिसे जोशी ने 29 मई को रखा था। उन्होंने मतदाता सूची डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकृत (सेंट्रलाइज्ड) होने पर चिंता जताई थी और सुझाव दिया था कि किसी बाहरी विशेषज्ञ से इसकी जांच कराई जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि केवल अधिकृत कानूनी अधिकारी ही इसमें बदलाव कर सकें। जुलाई में संधू ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया था।

14 अगस्त को, संधू ने दर्ज किया कि उन्हें नहीं पता कि उन दो नोटों (प्रस्तावों) का क्या हुआ। हलफनामे में समिति को लेकर आयोग के फैसलों की तारीखें 26 और 30 सितंबर बताई गई हैं, लेकिन इसमें पहले दिए गए उस प्रस्ताव का कोई जिक्र नहीं है।

आयुक्तों द्वारा जताई गई अन्य चिंताएं भी अभी तक अनसुलझी हैं। अप्रैल में, संधू ने बताया था कि IT डिवीजन ने आयोग को बताए बिना ही कई मॉड्यूल और पोर्टल तैयार कर लिए हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें इनके बारे में मीडिया के जरिए पता चला। अगस्त में, उन्होंने फील्ड अधिकारियों की शिकायतें दर्ज कीं, जिनका कहना था कि यह सिस्टम उन्हें कानून के तहत जरूरी काम करने की अनुमति नहीं देता है। हलफनामे में यह भरोसा दिलाया गया है कि ERO कानूनी रूप से जिम्मेदार बने हुए हैं, लेकिन इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि क्या सॉफ्टवेयर ने अधिकारियों को उनके वैधानिक कर्तव्यों का पालन करने में सक्षम बनाया था, जब ये चिंताएं उठाई गई थीं।

गोवा में नाम हटाना: बाद में आए आवेदनों से यह पता नहीं चलता कि अधिकारी इन नामों को हटाने के फैसले को क्यों नहीं पलट सके।

हलफनामे में उन 97 मतदाताओं का जिक्र है जिनके नाम गोवा की अंतिम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे। इसमें कहा गया है कि इनमें से 88 मतदाताओं ने बाद में 'फॉर्म 6' के जरिए अपना नाम फिर से जुड़वाने के लिए आवेदन किया है।

लेकिन इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि सॉफ्टवेयर ने पहले ऐसा क्यों नहीं होने दिया, जिससे गोवा के इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) नाम हटाने के फैसलों को पलट सकें।

फरवरी में सात दिनों के भीतर राज्य के चुनाव कार्यालय ने आठ बार अनुरोध किया कि सिस्टम में नाम हटाने के फैसलों को पलटने की अनुमति दी जाए। एक डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर ने भी यह दर्ज किया था कि "IT सिस्टम जरूरी कार्रवाई को नहीं रोक सकता।"

हलफनामे में यह नहीं बताया गया है कि सॉफ्टवेयर ने जरूरी कार्रवाई को क्यों रोका, या उस समय इन अनुरोधों पर क्या कार्रवाई की गई। यह तथ्य कि 88 मतदाताओं ने बाद में फिर से आवेदन किया, इस सवाल का जवाब नहीं देता कि पहले लिए गए फैसलों को सिस्टम के जरिए लागू क्यों नहीं किया जा सका।

पश्चिम बंगाल में अपीलें: इन अपीलों को दायर करने की अनुमति किसने दी, और इतने सारे मामलों को कैसे संभाला गया?

हलफनामे में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल में मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में वापस जोड़ने के आदेशों के खिलाफ अपीलें, राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के कार्यालय के अधिकारियों द्वारा दायर की गई थीं। इसमें कहा गया है कि इन मामलों को चुनाव आयोग के सामने नहीं लाया गया था, और तर्क दिया गया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत अधिकारियों को ये अपीलें दायर करने का अधिकार था।

इन अपीलों को कैसे संभाला गया और इनके बारे में किसे पता था?

7 अगस्त को, इन अपीलों के बारे में एक अखबार की रिपोर्ट आने के बाद, जोशी के कार्यालय ने राज्य के प्रभारी अधिकारी से वस्तुस्थिति (factual position) के बारे में जानकारी मांगी। पांच दिन बाद, संधू ने उसी अधिकारी से पांच सवाल पूछे। उनके नोट में दर्ज था कि जोशी ने उन्हें बताया था कि उनके पास इस बारे में कोई जानकारी नहीं है।

हलफनामे में उन अधिकारियों की पहचान बताई गई है जिन्होंने अपीलें दायर की थीं। इसमें कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत उन्हें ऐसा करने का अधिकार था। लेकिन, यह स्पष्टीकरण संधू के उस नोट से मेल नहीं खाता, जिसमें दर्ज है कि पश्चिम बंगाल की CEO ने कहा था कि उन्हें इस मामले की पूरी जानकारी नहीं है।

हलफनामे में अब CEO कार्यालय के 22 अक्टूबर के एक पत्र का हवाला दिया गया है, जिससे यह साबित होता है कि अपीलें उसी कार्यालय के अधिकारियों ने दायर की थीं। हालांकि, इसमें यह नहीं बताया गया है कि पहले दिए गए बयान और बाद में दिए गए इस स्पष्टीकरण के बीच इतना अंतर क्यों है।

अभी भी कई सवाल अनुत्तरित हैं। हलफनामे में यह नहीं बताया गया है कि लगभग एक जैसे आधारों पर लाखों अपीलें कैसे दायर हो गईं, क्या मामलों की अलग-अलग जांच की गई थी, या फिर आयोग को सूचित किए बिना इतने बड़े पैमाने पर यह प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ गई? CEO के उस पुराने बयान को देखते हुए- जो संधू ने दर्ज किया था- कि उनके पास मामले की पूरी जानकारी नहीं थी, पूरी स्थिति अभी भी स्पष्ट नहीं है।

जुलाई का प्रशासनिक आदेश: ECI का कहना है कि इसे लागू नहीं किया गया था

एक और मुद्दा जुलाई में जारी किए गए एक आदेश से जुड़ा है। यह आदेश एक वरिष्ठ अधिकारी ने जारी किया था, जिन्हें आयोग के प्रशासन का अस्थायी प्रभार दिया गया था। इस आदेश के जरिए ECI अधिकारियों के बीच काम का बंटवारा किया गया था।

जोशी ने कैबिनेट सचिव को लिखा कि जब उन्होंने प्रशासन विभाग से फाइल मांगी, तो उन्हें वह फाइल नहीं दी गई। ECI का कहना है कि संधू और जोशी द्वारा संयुक्त निर्देश जारी किए जाने के बाद, इस आदेश को कभी लागू ही नहीं किया गया। आयोग ने यह भी कहा कि दोनों आयुक्तों के पत्र इसी आदेश से संबंधित थे।

हालांकि, हलफनामे में यह नहीं बताया गया है कि आयोग की जानकारी के बिना यह आदेश क्यों जारी किया गया, आयोग के किसी सदस्य को फाइल क्यों नहीं दी गई, या फिर आदेश जारी करने वाले अधिकारी के साथ क्या हुआ। आयोग ने यह तो स्पष्ट कर दिया कि आदेश को अंततः लागू नहीं किया गया, लेकिन यह नहीं बताया कि इसे किस परिस्थिति में जारी किया गया था और फाइल क्यों रोकी गई थी।

ECI ने आंतरिक फाइलों के सार्वजनिक होने पर सवाल उठाए हैं

आयोग ने कहा है कि उसने किसी भी आंतरिक नोट या फाइल को किसी समाचार एजेंसी को जारी नहीं किया, और न ही ऐसा करने की अनुमति दी। इससे यह सवाल उठता है कि ये दस्तावेज मीडिया तक कैसे पहुंचे- हालांकि, इन दस्तावेजों में उठाए गए मुद्दों का कोई जवाब नहीं दिया गया है।

हलफनामे में उस याचिका का भी विरोध किया गया है, जिसमें ज्ञानेश कुमार को CEC के रूप में काम करने से रोकने की मांग की गई थी। संविधान के अनुच्छेद 324(5) का हवाला देते हुए, ECI का कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को केवल उसी तरीके से और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाया जाता है। इसने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) की विश्वसनीयता पर पहले उठाए गए सवालों और सुप्रीम कोर्ट द्वारा उन पर की गई पिछली सुनवाई का भी जिक्र किया है।

आयोग ने अपने हलफनामे को एक 'संक्षिप्त जवाब' बताया है, जिसे बीच में आए दशहरा की छुट्टियों के कारण दाखिल किया गया है। साथ ही, आयोग ने भविष्य में एक विस्तृत, बिंदुवार जवाब दाखिल करने का अधिकार भी अपने पास सुरक्षित रखा है।

सुप्रीम कोर्ट आयोग के स्पष्टीकरण की जांच करेगा

ECI के हलफनामे में तीन मुख्य मुद्दों पर आयोग का पक्ष रखा गया है: SIR से जुड़े फैसलों में सर्वसम्मति, फॉर्म 6 के साथ दिए जाने वाले घोषणा-पत्र की कानूनी स्थिति, और मतदाता सूची (इलेक्टोरल रोल) में बदलाव को लेकर ERO (इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर) के अधिकार। इसमें कुछ सुधारात्मक उपायों का भी जिक्र है, जैसे ऑनलाइन फॉर्म 6 को SIR घोषणा-पत्र से अलग करना और ECINet की जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन करना।

लेकिन, संधू और जोशी द्वारा उठाए गए कई विशिष्ट सवालों के जवाब अभी भी नहीं मिले हैं। इनमें ऑनलाइन घोषणा-पत्र को लागू करने का तरीका, गोवा में सॉफ्टवेयर की खराबी के कारण कार्रवाई न हो पाना, पश्चिम बंगाल में अपीलों का निपटारा, जुलाई में जारी प्रशासनिक आदेश, और ऐसी कई घटनाएं शामिल हैं, जिनमें आयुक्तों ने कहा कि उन्हें घटनाक्रमों के बारे में सूचित ही नहीं किया गया था।

हलफनामे में यह दावा किया गया है कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि निर्णय लेने की प्रक्रिया सही ढंग से काम कर रही थी या नहीं। साथ ही, बताए गए सुधारात्मक उपाय भी यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं करते कि पहले ये समस्याएं कैसे पैदा हुईं।

5 अक्टूबर को, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी करते हुए, एकतरफा अंतरिम आदेश (ex-parte interim order) के जरिए ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने या निलंबित करने से इनकार कर दिया। पीठ ने कहा कि वह इन फैसलों की जांच करेगी और अगर ये कानून के अनुरूप नहीं पाए गए, तो उचित कार्रवाई की जाएगी।

अब कोर्ट की जांच से यह तय होगा कि क्या आयोग के स्पष्टीकरण, SIR प्रक्रिया के दौरान परामर्श (consultation), सूचना तक पहुंच और फैसलों को लागू करने से जुड़ी चिंताओं का संतोषजनक समाधान करते हैं या नहीं।

ECI का विवादित हलफनामा यहां पढ़ा जा सकता है।



Related

यूपी में जाली हस्ताक्षर से 26 मतदाताओं के नाम हटाने का आरोप, आठ महीने बाद FIR दर्ज

EXCLUSIVE – SIR: मताधिकार से वंचित होने वाले भारतीय मतदाताओं की संख्या 13.60 करोड़ नहीं, बल्कि 16 करोड़ है?

बाकी ख़बरें