सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) को निर्देश दिया कि SIR के दौरान मिले उन विदेशी नागरिकों का विवरण सौंपा जाए, जिनके पास वोटर ID थे। हमने इस संबंध में एक RTI दायर की। ECI ने 12 राज्यों से जुड़ी जानकारी देने से इनकार कर दिया। बिहार के जवाब से पता चलता है कि वहां कोई भी विदेशी नागरिक नहीं मिला।

फोटो साभार : सोशल मीडिया एक्स
भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा मतदाता सूची में किए गए बदलावों के खिलाफ राजधानी में विरोध-प्रदर्शन हो रहे थे। इस दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी पर आरोप लगाया कि वे निर्वाचन आयोग पर दुर्भावना का आरोप लगाने की आड़ में घुसपैठियों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं।
रिपोर्टर्स कलेक्टिव की रिपोर्ट के अनुसार, मंगलवार को एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, "मैं राहुल गांधी जी से कहना चाहता हूं कि देश को घुसपैठियों को बचाने की आपकी योजना के बारे में अच्छी तरह पता है और अब भारत की जनता आपकी इस चाल में फंसने वाली नहीं है।"
अमित शाह ने तुरंत यह दावा किया कि ECI द्वारा हटाई गई 13.39 करोड़ मतदाताओं की सूची में ऐसे घुसपैठिये शामिल थे, जिन्हें कांग्रेस नेता बचाने की कोशिश कर रहे थे।
लेकिन ECI के सॉफ्टवेयर की हमारी जांच और 'सूचना का अधिकार' (RTI) कानून के तहत दायर हमारी अर्जियों पर आयोग के जवाबों से पता चलता है कि ECI के पास इन 13.39 करोड़ हटाए गए मतदाताओं में से किसी को भी 'विदेशी' के रूप में चिह्नित करने का कोई सिस्टम या प्रक्रिया नहीं थी।
उनके सॉफ्टवेयर में अलग-अलग राज्यों के अधिकारियों के लिए लोगों की पहचान कर उन्हें 'विदेशी' के तौर पर मार्क करने का कोई विकल्प ही नहीं था।
नतीजतन, ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं मिला। बिहार में 100 से अधिक इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (EROs) ने हमारी RTI अर्जी का जवाब देते हुए इस बात की पुष्टि की।
बिहार पहला राज्य था जहां जून 2025 से SIR (मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण) प्रक्रिया शुरू हुई। इसी चरण में ECI ने जोर देकर कहा था कि 'घुसपैठियों' की पहचान करना SIR के मुख्य उद्देश्यों में से एक है।
जब सुप्रीम कोर्ट में पहली बार SIR को चुनौती दी गई, तो ECI ने मतदाता सूची में किए जा रहे इस बड़े बदलाव के पीछे यही उद्देश्य बताया। सुप्रीम कोर्ट ने आयोग की बात पर भरोसा करते हुए SIR को बरकरार रखा, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि जिन लोगों को 'नागरिक न होने' के आधार पर सूची से हटाया गया है, उनके मामलों को 'नागरिकता अधिनियम, 1955' के तहत सक्षम प्राधिकारी (competent authority) को भेजा जाना चाहिए। यहां सक्षम प्राधिकारी का मतलब अमित शाह के नेतृत्व वाला केंद्रीय गृह मंत्रालय है। कोर्ट ने ECI को इसके लिए चार हफ्ते का समय दिया था।
यह सार्वजनिक रूप से पता नहीं है कि ECI ने ऐसी कोई सूची गृह मंत्रालय को सौंपी है या नहीं। यह समय-सीमा खत्म होने के तुरंत बाद, 'द कलेक्टिव' ने चुनाव आयोग (ECI) के पास एक RTI आवेदन दायर किया। इसमें पूछा गया कि क्या ECI ने अदालत के निर्देशों का पालन किया है और इन मामलों की जानकारी केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के साथ साझा की है। उस समय तक, ECI 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR (विशेष मतदाता पुनरीक्षण) का काम पूरा कर चुका था। हमने विशेष रूप से उन संदिग्ध विदेशी नागरिकों के बारे में और जानकारी मांगी, जिनके बारे में ECI ने बिहार और पश्चिम बंगाल के संदर्भ में MHA को सूचित किया था।
हमारे आवेदन का जवाब देने के बजाय, आयोग ने हमारे सवालों को केवल एक राज्य - बिहार - को भेज दिया। उनका कहना था कि हमारे सवालों का जवाब देने के लिए पटना के चुनाव अधिकारी सबसे उपयुक्त होंगे। हमें राज्य के विधानसभा क्षेत्रों से जवाब मिले; इनमें अनुपस्थित, कहीं और चले गए, मृत या अन्य कारणों से हटाए गए मतदाताओं की स्पष्ट संख्या तो दी गई थी, लेकिन इनमें किसी भी ऐसे व्यक्ति का जिक्र नहीं था जो भारतीय नागरिक न हो।
उत्तर प्रदेश में SIR को लेकर हमारी जांच से आखिरकार इस रहस्य से पर्दा उठ गया। ECI उन मतदाताओं के बारे में जनता या MHA को बताने से क्यों कतरा रहा था, जो भारतीय नागरिक नहीं थे?
इसका जवाब बहुत सीधा है। ECI ने अपना सिस्टम कभी इस तरह से बनाया ही नहीं था कि वह विदेशियों की पहचान कर सके।
बिना दर्ज किए गए घुसपैठिए
जब ECI ने जुलाई 2025 में बिहार में गणना का काम पूरा किया - जो SIR प्रक्रिया से गुजरने वाला पहला राज्य था - तो उसने दावा किया कि घर-घर जाकर किए गए सत्यापन के दौरान उसे बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक मिले हैं।
लेकिन जब सितंबर में हटाए गए मतदाताओं के आधिकारिक आंकड़े जारी करने का समय आया, तो उन्होंने केवल उन मतदाताओं के नाम बताए जो अनुपस्थित थे, कहीं और चले गए थे या जिनकी मृत्यु हो चुकी थी, इसमें किसी भी विदेशी नागरिक का नाम शामिल नहीं था।
बिहार के कई निर्वाचन क्षेत्रों में हमारी RTI याचिकाओं का भी यही हश्र हुआ, विधानसभा चुनाव अधिकारियों के पास गैर-नागरिकों के मिलने का कोई रिकॉर्ड नहीं था।
12 राज्यों में SIR के दूसरे चरण के दौरान, आंतरिक नियमों में यह स्पष्ट कर दिया गया था कि बूथ अधिकारियों को अब गैर-भारतीय नागरिकों की पहचान करने या उनकी रिपोर्ट देने की आवश्यकता नहीं है। आयोग ने निर्देश दिया कि जो मतदाता अपने गणना फॉर्म (enumeration forms) वापस नहीं करेंगे, उन्हें हटा दिया जाएगा। लेकिन आयोग ने अपने मैदानी कर्मचारियों, यानी बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLO) को मतदाताओं को हटाने के लिए चार विशिष्ट आधार दिए: अनुपस्थित, कहीं और चले जाना, डुप्लिकेट होना, या मृत्यु हो जाना।
SIR के दूसरे चरण में, चुनाव आयोग (ECI) ने एक एल्गोरिदम का इस्तेमाल किया, जिसे कथित घुसपैठियों की पहचान करने के लिए डिजाइन किया गया था। इसके निशाने पर वे मतदाता थे जो 2002-2004 की मतदाता सूची में अपना या अपने पूर्वजों का नाम नहीं ढूंढ पाए। ऐसे 'अनमैप्ड' (बिना रिकॉर्ड वाले) मतदाताओं को SIR सुनवाई के लिए बुलाया गया, और यदि वे आयोग द्वारा मांगे गए दस्तावेज पेश नहीं कर पाए, तो उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए।
यह एल्गोरिदम पश्चिम बंगाल में चुनाव होने से कई महीने पहले लागू किया गया था। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान, गृह मंत्री अमित शाह ने दोहराया कि अगर राज्य में BJP सत्ता में आती है, तो वे 'घुसपैठियों' की पहचान करेंगे, उन्हें सूची से हटाएंगे और देश से बाहर निकाल देंगे।
हमने पश्चिम बंगाल में इन SIR सुनवाइयों को देखा; यह वह राज्य है जहां अब तक SIR सुनवाइयों के जरिए सबसे बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। हमने चुनाव अधिकारियों के उस सॉफ्टवेयर, 'ERONET' की जांच की, जिसका इस्तेमाल मतदाताओं के नाम हटाने के लिए किया जा रहा था। हमने पाया कि इसमें मतदाताओं को 'गैर-भारतीय' के रूप में चिह्नित करने का कोई विकल्प ही नहीं था।
उत्तर प्रदेश में अपनी जांच के दौरान, हमें पता चला कि SIR सुनवाई के दौरान किसी मतदाता को हटाने का फैसला लेने के बाद, चुनाव अधिकारियों को 'फॉर्म 7' (मतदाता का नाम हटाने के लिए कानूनी रूप से अनिवार्य फॉर्म) तैयार करना होता है। हालांकि, ये फॉर्म अपने आप (ऑटो-जनरेट) बन जाते थे और इन पर चुनाव अधिकारी के हस्ताक्षर पहले से ही मौजूद होते थे। इस तरह, उत्तर प्रदेश में SIR सुनवाइयों के दौरान हटाए गए लगभग 86,000 मतदाताओं के मामले में, उन्हें हटाने का कोई कारण दर्ज नहीं किया गया है। SIR में ऐसे लोगों की पहचान करने और उन्हें मतदाता सूची से हटाने की कोई प्रक्रिया नहीं थी जो नागरिक नहीं थे। लेकिन मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का लोगों पर, खासकर पश्चिम बंगाल में, गंभीर असर पड़ा। पश्चिम बंगाल में जीत के तुरंत बाद, राज्य के भाजपा नेताओं ने उन लोगों के लिए कल्याणकारी लाभ बंद कर दिए, जिनके नाम SIR से हटा दिए गए थे। इससे कुछ दिन पहले, सुवेंदु अधिकारी ने वादा किया था कि "किसी भी मृत व्यक्ति, अवैध घुसपैठिए या गैर-भारतीय व्यक्ति को राज्य के नागरिकों के लिए मिलने वाले लाभों का फायदा नहीं उठाने दिया जाएगा।"
इस बीच, विपक्षी नेता ECI को लगातार घेर रहे हैं और इन कथित घुसपैठियों के बारे में जानकारी सार्वजनिक करने की मांग कर रहे हैं। इन्हीं घुसपैठियों की पहचान करने के नाम पर ही SIR की शुरुआत की गई थी। अब हमें पता चला है कि ECI ने कभी ऐसे लोगों को खोजने का प्रयास ही नहीं किया था।
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फोटो साभार : सोशल मीडिया एक्स
भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा मतदाता सूची में किए गए बदलावों के खिलाफ राजधानी में विरोध-प्रदर्शन हो रहे थे। इस दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी पर आरोप लगाया कि वे निर्वाचन आयोग पर दुर्भावना का आरोप लगाने की आड़ में घुसपैठियों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं।
रिपोर्टर्स कलेक्टिव की रिपोर्ट के अनुसार, मंगलवार को एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, "मैं राहुल गांधी जी से कहना चाहता हूं कि देश को घुसपैठियों को बचाने की आपकी योजना के बारे में अच्छी तरह पता है और अब भारत की जनता आपकी इस चाल में फंसने वाली नहीं है।"
अमित शाह ने तुरंत यह दावा किया कि ECI द्वारा हटाई गई 13.39 करोड़ मतदाताओं की सूची में ऐसे घुसपैठिये शामिल थे, जिन्हें कांग्रेस नेता बचाने की कोशिश कर रहे थे।
लेकिन ECI के सॉफ्टवेयर की हमारी जांच और 'सूचना का अधिकार' (RTI) कानून के तहत दायर हमारी अर्जियों पर आयोग के जवाबों से पता चलता है कि ECI के पास इन 13.39 करोड़ हटाए गए मतदाताओं में से किसी को भी 'विदेशी' के रूप में चिह्नित करने का कोई सिस्टम या प्रक्रिया नहीं थी।
उनके सॉफ्टवेयर में अलग-अलग राज्यों के अधिकारियों के लिए लोगों की पहचान कर उन्हें 'विदेशी' के तौर पर मार्क करने का कोई विकल्प ही नहीं था।
नतीजतन, ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं मिला। बिहार में 100 से अधिक इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (EROs) ने हमारी RTI अर्जी का जवाब देते हुए इस बात की पुष्टि की।
बिहार पहला राज्य था जहां जून 2025 से SIR (मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण) प्रक्रिया शुरू हुई। इसी चरण में ECI ने जोर देकर कहा था कि 'घुसपैठियों' की पहचान करना SIR के मुख्य उद्देश्यों में से एक है।
जब सुप्रीम कोर्ट में पहली बार SIR को चुनौती दी गई, तो ECI ने मतदाता सूची में किए जा रहे इस बड़े बदलाव के पीछे यही उद्देश्य बताया। सुप्रीम कोर्ट ने आयोग की बात पर भरोसा करते हुए SIR को बरकरार रखा, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि जिन लोगों को 'नागरिक न होने' के आधार पर सूची से हटाया गया है, उनके मामलों को 'नागरिकता अधिनियम, 1955' के तहत सक्षम प्राधिकारी (competent authority) को भेजा जाना चाहिए। यहां सक्षम प्राधिकारी का मतलब अमित शाह के नेतृत्व वाला केंद्रीय गृह मंत्रालय है। कोर्ट ने ECI को इसके लिए चार हफ्ते का समय दिया था।
यह सार्वजनिक रूप से पता नहीं है कि ECI ने ऐसी कोई सूची गृह मंत्रालय को सौंपी है या नहीं। यह समय-सीमा खत्म होने के तुरंत बाद, 'द कलेक्टिव' ने चुनाव आयोग (ECI) के पास एक RTI आवेदन दायर किया। इसमें पूछा गया कि क्या ECI ने अदालत के निर्देशों का पालन किया है और इन मामलों की जानकारी केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के साथ साझा की है। उस समय तक, ECI 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR (विशेष मतदाता पुनरीक्षण) का काम पूरा कर चुका था। हमने विशेष रूप से उन संदिग्ध विदेशी नागरिकों के बारे में और जानकारी मांगी, जिनके बारे में ECI ने बिहार और पश्चिम बंगाल के संदर्भ में MHA को सूचित किया था।
हमारे आवेदन का जवाब देने के बजाय, आयोग ने हमारे सवालों को केवल एक राज्य - बिहार - को भेज दिया। उनका कहना था कि हमारे सवालों का जवाब देने के लिए पटना के चुनाव अधिकारी सबसे उपयुक्त होंगे। हमें राज्य के विधानसभा क्षेत्रों से जवाब मिले; इनमें अनुपस्थित, कहीं और चले गए, मृत या अन्य कारणों से हटाए गए मतदाताओं की स्पष्ट संख्या तो दी गई थी, लेकिन इनमें किसी भी ऐसे व्यक्ति का जिक्र नहीं था जो भारतीय नागरिक न हो।
उत्तर प्रदेश में SIR को लेकर हमारी जांच से आखिरकार इस रहस्य से पर्दा उठ गया। ECI उन मतदाताओं के बारे में जनता या MHA को बताने से क्यों कतरा रहा था, जो भारतीय नागरिक नहीं थे?
इसका जवाब बहुत सीधा है। ECI ने अपना सिस्टम कभी इस तरह से बनाया ही नहीं था कि वह विदेशियों की पहचान कर सके।
बिना दर्ज किए गए घुसपैठिए
जब ECI ने जुलाई 2025 में बिहार में गणना का काम पूरा किया - जो SIR प्रक्रिया से गुजरने वाला पहला राज्य था - तो उसने दावा किया कि घर-घर जाकर किए गए सत्यापन के दौरान उसे बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक मिले हैं।
लेकिन जब सितंबर में हटाए गए मतदाताओं के आधिकारिक आंकड़े जारी करने का समय आया, तो उन्होंने केवल उन मतदाताओं के नाम बताए जो अनुपस्थित थे, कहीं और चले गए थे या जिनकी मृत्यु हो चुकी थी, इसमें किसी भी विदेशी नागरिक का नाम शामिल नहीं था।
बिहार के कई निर्वाचन क्षेत्रों में हमारी RTI याचिकाओं का भी यही हश्र हुआ, विधानसभा चुनाव अधिकारियों के पास गैर-नागरिकों के मिलने का कोई रिकॉर्ड नहीं था।
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SIR के दूसरे चरण में, चुनाव आयोग (ECI) ने एक एल्गोरिदम का इस्तेमाल किया, जिसे कथित घुसपैठियों की पहचान करने के लिए डिजाइन किया गया था। इसके निशाने पर वे मतदाता थे जो 2002-2004 की मतदाता सूची में अपना या अपने पूर्वजों का नाम नहीं ढूंढ पाए। ऐसे 'अनमैप्ड' (बिना रिकॉर्ड वाले) मतदाताओं को SIR सुनवाई के लिए बुलाया गया, और यदि वे आयोग द्वारा मांगे गए दस्तावेज पेश नहीं कर पाए, तो उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए।
यह एल्गोरिदम पश्चिम बंगाल में चुनाव होने से कई महीने पहले लागू किया गया था। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान, गृह मंत्री अमित शाह ने दोहराया कि अगर राज्य में BJP सत्ता में आती है, तो वे 'घुसपैठियों' की पहचान करेंगे, उन्हें सूची से हटाएंगे और देश से बाहर निकाल देंगे।
हमने पश्चिम बंगाल में इन SIR सुनवाइयों को देखा; यह वह राज्य है जहां अब तक SIR सुनवाइयों के जरिए सबसे बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। हमने चुनाव अधिकारियों के उस सॉफ्टवेयर, 'ERONET' की जांच की, जिसका इस्तेमाल मतदाताओं के नाम हटाने के लिए किया जा रहा था। हमने पाया कि इसमें मतदाताओं को 'गैर-भारतीय' के रूप में चिह्नित करने का कोई विकल्प ही नहीं था।
उत्तर प्रदेश में अपनी जांच के दौरान, हमें पता चला कि SIR सुनवाई के दौरान किसी मतदाता को हटाने का फैसला लेने के बाद, चुनाव अधिकारियों को 'फॉर्म 7' (मतदाता का नाम हटाने के लिए कानूनी रूप से अनिवार्य फॉर्म) तैयार करना होता है। हालांकि, ये फॉर्म अपने आप (ऑटो-जनरेट) बन जाते थे और इन पर चुनाव अधिकारी के हस्ताक्षर पहले से ही मौजूद होते थे। इस तरह, उत्तर प्रदेश में SIR सुनवाइयों के दौरान हटाए गए लगभग 86,000 मतदाताओं के मामले में, उन्हें हटाने का कोई कारण दर्ज नहीं किया गया है। SIR में ऐसे लोगों की पहचान करने और उन्हें मतदाता सूची से हटाने की कोई प्रक्रिया नहीं थी जो नागरिक नहीं थे। लेकिन मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का लोगों पर, खासकर पश्चिम बंगाल में, गंभीर असर पड़ा। पश्चिम बंगाल में जीत के तुरंत बाद, राज्य के भाजपा नेताओं ने उन लोगों के लिए कल्याणकारी लाभ बंद कर दिए, जिनके नाम SIR से हटा दिए गए थे। इससे कुछ दिन पहले, सुवेंदु अधिकारी ने वादा किया था कि "किसी भी मृत व्यक्ति, अवैध घुसपैठिए या गैर-भारतीय व्यक्ति को राज्य के नागरिकों के लिए मिलने वाले लाभों का फायदा नहीं उठाने दिया जाएगा।"
इस बीच, विपक्षी नेता ECI को लगातार घेर रहे हैं और इन कथित घुसपैठियों के बारे में जानकारी सार्वजनिक करने की मांग कर रहे हैं। इन्हीं घुसपैठियों की पहचान करने के नाम पर ही SIR की शुरुआत की गई थी। अब हमें पता चला है कि ECI ने कभी ऐसे लोगों को खोजने का प्रयास ही नहीं किया था।
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