पुलिस वैन में कैद, हिरासत में पिटाई, पत्रकारों पर हमले: मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शनों पर दिल्ली की कार्रवाई की संयुक्त राष्ट्र ने की निंदा

Written by sabrang india | Published on: October 13, 2026
प्रदर्शनकारियों ने हिरासत में हिंसा का आरोप लगाया है, पत्रकारों को प्रेस क्रेडेंशियल होने के बावजूद हिरासत में लिया जा रहा है, और दिल्ली भर में हजारों लोगों को गिरफ्तार किए जाने के बावजूद वकीलों को बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र और एमनेस्टी इंटरनेशनल शांतिपूर्ण सभा पर प्रतिबंधों की निंदा करते हैं।

   

10 और 11 अक्टूबर को राजधानी में जारी विरोध प्रदर्शनों के दौरान, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों को बड़े पैमाने पर हिरासत में लिया गया, उन पर हिरासत में मारपीट के आरोप लगे, संचार पर रोक लगाई गई और पिंजरे जैसे डिब्बों वाली पुलिस गाड़ियों का इस्तेमाल किया गया। प्रदर्शनों की कवरेज कर रहे पत्रकारों को भी हिरासत में लिया गया और उन पर मारपीट के आरोप लगे, जबकि हिरासत में लिए गए लोगों से मिलने की कोशिश कर रहे वकीलों को लौटा दिया गया। इस कार्रवाई की संयुक्त राष्ट्र, एमनेस्टी इंटरनेशनल, पत्रकार संगठनों और नागरिक स्वतंत्रता समूहों ने आलोचना की है।

छात्र संगठनों, वामपंथी दलों, वकीलों के समूहों, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और अन्य समूहों के नेतृत्व में हो रहे ये विरोध प्रदर्शन, चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) में अनियमितताओं के आरोपों पर केंद्रित हैं। प्रदर्शनकारी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और संशोधन प्रक्रिया को वापस लेने की मांग कर रहे हैं, आलोचकों का कहना है कि इस प्रक्रिया के कारण लाखों मतदाता सूची से बाहर हो गए हैं। चुनाव आयोग ने किसी भी तरह की गड़बड़ी से इनकार किया है।

कई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 10 अक्टूबर को दिल्ली में हजारों लोगों को हिरासत में लिया गया। हालांकि अनुमान अलग-अलग थे, लेकिन रिपोर्टों में यह संख्या लगभग 7,000 बताई गई। पुलिस की कार्रवाई रविवार, 11 अक्टूबर को भी जारी रही, जब छात्र और युवा संगठनों ने सार्वजनिक परिवहन और प्रदर्शनकारियों, पत्रकारों व वकीलों के अधिकारों पर लगी पाबंदियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट के दखल के बावजूद फिर से प्रदर्शन करने की कोशिश की।


Image: Salman Ali/PTI

जेल जैसी बसें, मारपीट के आरोप और हिरासत में नाबालिग

'द वायर' द्वारा प्रकाशित रिपोर्टों में रविवार के विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिरासत में लिए गए लोगों (जिनमें नाबालिग भी शामिल थे) के साथ शारीरिक हिंसा के आरोपों का डिटेल दिया गया है। कनॉट प्लेस और जंतर-मंतर से उठाए गए कम से कम 50 लोगों को छावला पुलिस स्टेशन ले जाया गया और वहां से मध्य दिल्ली से लगभग 40 किलोमीटर दूर पांडवाला खुर्द के एक कम्युनिटी सेंटर में ले जाया गया।

हिरासत में लिए गए लोगों में शामिल 30 वर्षीय वकील अर्जुन उन्नीकृष्णन ने 'द वायर' को बताया कि हिरासत में लिए गए लोगों को एक सुनसान सड़क पर कतारों में बिठाया गया, जिसके बाद पुलिसकर्मियों ने उन लोगों की पहचान करना शुरू किया जिन्होंने विरोध प्रदर्शन के वीडियो रिकॉर्ड किए थे या तस्वीरें ली थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने फोन जब्त कर लिए, पासवर्ड मांगे और जिन लोगों ने अपने डिवाइस का एक्सेस देने से इनकार किया, उनके साथ मारपीट की। उन्नीकृष्णन ने बताया कि हिरासत में लिए गए लोगों को एक पुलिसकर्मी से दूसरे पुलिसकर्मी को सौंपा जा रहा था, उन्हें थप्पड़ मारे जा रहे थे और पीटा जा रहा था, यहां तक कि उनके प्राइवेट पार्ट्स पर भी चोट पहुंचाई जा रही थी। उन्होंने कहा कि इस कथित हिंसा का शिकार होने वालों में नाबालिग भी शामिल थे।

नाम न बताने की शर्त पर 'द वायर' से बात करने वाले एक छात्र ने भी आरोप लगाया कि पुलिस की गाड़ी के अंदर हिरासत में लिए गए लोगों को थप्पड़ मारे गए और पीटा गया। छात्र ने गाड़ियों को जेल जैसा बताया, जिनमें रेलिंग और बंद कंपार्टमेंट थे, जिससे अंदर मौजूद लोग हमलों से बच नहीं पा रहे थे। हिरासत में लिए गए लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों ने उनके फोन देखे, प्रदर्शनों की तस्वीरें और वीडियो डिलीट कर दिए और फोन जब्त करने के बाद उन्हें वापस नहीं किया।

आखिरकार हिरासत में लिए गए लोगों को पांडवलान खुर्द के कम्युनिटी सेंटर ले जाया गया, जहां उन्होंने बताया कि उन्हें न तो खाना-पानी दिया गया और न ही वे वकीलों से संपर्क कर पाए या उन्हें तुरंत मेडिकल मदद मिल पाई। उसी शाम सेंटर पहुंचे वकीलों ने आरोप लगाया कि वकीलों और पत्रकारों के पहुंचने के बारे में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद पुलिसकर्मियों ने शुरू में उन्हें अंदर नहीं जाने दिया।

फहाद एम. खान, जो अपने साथी गौरव साइकिलवाला के साथ सेंटर गए थे, ने 'द वायर' को बताया कि अंदर जाने के लिए उन्हें पुलिस कंट्रोल रूम की गाड़ी बुलानी पड़ी। खबरों के मुताबिक, हिरासत में लिए गए लोगों में से एक का हाथ टूट गया था। वकीलों ने कहा कि वे गैर-कानूनी हिरासत, मारपीट, फोन जब्त करने और मेडिकल जांच न होने के आरोपों के साथ शिकायतें तैयार कर रहे थे।

'हिंदुस्तान टाइम्स' ने भी प्रदर्शनकारियों के बयान छापे, जिन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने उन्हें थप्पड़ मारे, उनके प्राइवेट पार्ट्स पर चोट पहुंचाई और उन्हें सेंट्रल दिल्ली से 30-40 किलोमीटर दूर ले गई। ये आरोप तब सामने आए जब पुलिस स्टेडियम और दूसरी जगहों का इस्तेमाल अस्थायी हिरासत केंद्रों के तौर पर कर रही थी।



डिटेंशन वैन के अंदर अरण्य सिंह राठौर के साथ कथित मारपीट

दिशा स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन के सदस्य अरण्य सिंह राठौर के साथ 11 अक्टूबर को हिरासत के दौरान कथित तौर पर मारपीट की गई। 'द वायर' में छपी खबरों के मुताबिक, राठौर का गला पकड़कर पुलिस की गाड़ी के अंदर पीटा गया; साथ में हिरासत में लिए गए लोगों का आरोप था कि गाड़ी की लाइट बंद करने के बाद पुलिसकर्मियों ने प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाया।

खबरों के मुताबिक, उनके दोस्तों और वकीलों को उन्हें ढूंढने में काफी मशक्कत करनी पड़ी और वे कनॉट प्लेस पुलिस स्टेशन में उनसे तुरंत मिल भी नहीं पाए। 'द वायर' की रिपोर्ट के अनुसार, बाद में उन्हें मेडिकल-लीगल जांच के लिए लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज ले जाया गया और रात 2 बजे के कुछ देर बाद रिहा कर दिया गया। संगठन के सदस्यों ने यह भी आरोप लगाया कि हिरासत में लिए गए लोगों से उनके फोन ले लिए गए और पुलिसकर्मियों ने गाड़ियों के अंदर मीडिया कवरेज न होने को लेकर उनका मजाक उड़ाया।

'द वायर' की रिपोर्ट में यह आरोप भी शामिल था कि महिला प्रदर्शनकारियों को हिरासत वाली गाड़ियों के अंदर पिंजरे जैसे हिस्सों में बंद करके रखा गया था। AISA की अध्यक्ष नेहा बोरा ने सवाल उठाया कि क्या प्रदर्शनकारियों के तय हिरासत केंद्रों तक पहुंचने से पहले ही बसों का इस्तेमाल अस्थायी जेलों के तौर पर किया जा रहा था।



स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) ने अलग से आरोप लगाया कि उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष आदर्श एम. साजी, दिल्ली राज्य सचिव सूरज इलामोन और अन्य छात्र कार्यकर्ताओं के साथ पुलिस की गाड़ियों के अंदर मारपीट की गई। छात्र संगठनों द्वारा जारी तस्वीरों और बयानों में हिरासत में लिए गए लोगों को चोटें आई हुई दिखाई दीं।

प्रेस कार्ड होने के बावजूद पत्रकारों को हिरासत में लिया गया; पत्रकारों के साथ बदसलूकी का आरोप

प्रदर्शनों को कवर कर रहे पत्रकारों को शनिवार और रविवार दोनों दिन पुलिस की कार्रवाई का सामना करना पड़ा। मीडिया संगठनों ने पत्रकारों को हिरासत में लेने, उनके साथ मारपीट करने और रिपोर्टिंग का सामान जब्त करने की खबरें दीं। 'हिंदुस्तान टाइम्स' के अनुसार, 11 अक्टूबर को प्रदर्शनों को कवर करते समय कम से कम 12 पत्रकारों को हिरासत में लिया गया। हिरासत में लिए गए लोगों में 'द इंडियन एक्सप्रेस', 'द हिंदू' और अन्य अखबारों के पत्रकार शामिल थे।



'द इंडियन एक्सप्रेस' के हिंदी संस्करण के तीन पत्रकारों - शाश्वत, सिया और विजय कुमार - को अपने प्रेस पहचान पत्र दिखाने के बावजूद कनॉट प्लेस में हिरासत में ले लिया गया। अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्हें लगभग 12 किलोमीटर दूर छत्रसाल स्टेडियम ले जाया गया और करीब 45 मिनट बाद रिहा कर दिया गया।

'पीक टीवी' के पत्रकारों वेदांत अग्रवाल और सारा खान ने भी आरोप लगाया कि जब वे प्रदर्शनकारियों की हिरासत की रिपोर्टिंग कर रहे थे, तो पुलिसकर्मियों ने उन्हें घसीटा। खान ने 'द हिंदू' को बताया कि जब उन्होंने पुलिस की कार्रवाई को रिकॉर्ड करने की कोशिश की, तो एक पुरुष पुलिस अधिकारी ने उनकी गर्दन पकड़ी और उन्हें महिला सुरक्षाकर्मियों की ओर धकेल दिया।

पत्रकार श्याम मीरा सिंह को भी वीडियो फुटेज में प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग करते समय बदसलूकी का शिकार होते और हिरासत वाली बस में धकेले जाते देखा गया। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' की रिपोर्ट के अनुसार, पत्रकारों के साथ मारपीट की गई, उन्हें पुलिस की गाड़ियों में धकेला गया और पहचान-पत्र होने के बावजूद हिरासत में ले लिया गया।

'कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स' (CPJ) ने पुष्टि की कि 'न्यूजलॉन्ड्री' के रिपोर्टर अश्विन कुमार सिंह, आस्था सव्यसाची और अनमोल प्रीतम, तथा 'स्क्रॉल' के रिपोर्टर आयुष तिवारी को हिरासत में लिया गया था। संगठन ने दिल्ली पुलिस से हिरासत में लिए गए पत्रकारों और मीडिया कर्मियों को रिहा करने, उनके डिवाइस वापस करने, शारीरिक दुर्व्यवहार के आरोपों की जांच करने और प्रेस को बिना किसी रुकावट के रिपोर्टिंग करने देने की मांग की। 'न्यूजलॉन्ड्री' ने यह भी बताया कि पुलिस ने उसके पत्रकारों के आधिकारिक फोन जब्त कर लिए।

'डिजीपब न्यूज इंडिया फाउंडेशन' ने पत्रकारों, डिजिटल क्रिएटर्स और नागरिकों को हिरासत में लिए जाने की निंदा की। संगठन ने रिपोर्टिंग के डिवाइस जब्त करने और पहचान-पत्र दिखाने वाले पत्रकारों को हिरासत में लेने की घटना को डराने-धमकाने और प्रेस की आजादी पर हमला बताया। संगठन ने हिरासत में लिए गए पत्रकारों की रिहाई, जब्त किए गए डिवाइस वापस करने और कथित दुर्व्यवहार के लिए जिम्मेदारी तय करने की मांग की।



'नेशनल अलायंस ऑफ जर्नलिस्ट्स' ने भी इस कार्रवाई की निंदा की और 'दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स', 'इंडियन विमेंस प्रेस कॉर्प्स' और 'प्रेस क्लब ऑफ इंडिया' के साथ एकजुटता व्यक्त की। इससे पहले, 'एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया' ने विरोध प्रदर्शनों को कवर कर रही महिला पत्रकारों के साथ कथित यौन उत्पीड़न पर गहरी चिंता जताई थी। 10 अक्टूबर को जारी एक बयान में गिल्ड ने चिंता व्यक्त की कि दिल्ली पुलिस ने अभी तक इन गंभीर आरोपों पर कोई संज्ञान नहीं लिया है।

सुप्रीम कोर्ट के बाहर वकील हिरासत में, वरिष्ठ वकील को कथित तौर पर चलती बस में धकेला गया

वोटर लिस्ट में संशोधन का विरोध करने की कोशिश कर रहे वकीलों को भी हिरासत में लिया गया, जिनमें सुप्रीम कोर्ट परिसर के पास से उठाए गए वकील भी शामिल थे। 'इंडिया टुडे' की रिपोर्ट के अनुसार, 10 अक्टूबर को लगभग 50-60 वकीलों को हिरासत में लिया गया, जिनमें वरिष्ठ और महिला वकील भी शामिल थे। बाद में, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा तत्काल मदद की गुहार लगाने पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के हस्तक्षेप के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, वकीलों को सुप्रीम कोर्ट के पास हिरासत में लेने के बाद यमुना स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स ले जाया गया। उनके हिरासत में लिए जाने के बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश ने उनकी रिहाई सुनिश्चित करने के लिए अधिकारियों से संपर्क किया।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने वकीलों की हिरासत और कथित तौर पर बल के अत्यधिक प्रयोग की निंदा की। वरिष्ठ वकील शादान फरासत ने कथित तौर पर कहा कि कार्रवाई के दौरान पुलिसकर्मियों ने उनकी शर्ट फाड़ दी और उन्हें चलती बस में फेंक दिया। वकीलों की हिरासत इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में प्रदर्शनों पर लगाई गई पाबंदियों और यह सुनिश्चित करने की जरूरत पर सुनवाई हुई कि कानूनी पेशेवर बिना किसी बाधा के अपने कर्तव्यों का पालन कर सकें।

छत्रसाल स्टेडियम और यमुना स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स हिरासत स्थलों में शामिल

पुलिस ने अलग-अलग जगहों से हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों को स्टेडियमों और अन्य जगहों पर पहुंचाया, जिनका इस्तेमाल अस्थायी हिरासत केंद्रों के तौर पर किया जा रहा था। इंडियन एक्सप्रेस ने 10 अक्टूबर को रिपोर्ट दी कि प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर पहुंचने से पहले ही पकड़ लिया गया और स्टेडियमों व अस्थायी हिरासत स्थलों पर ले जाया गया। वकीलों को हिरासत में रखने के लिए इस्तेमाल की गई जगहों में यमुना स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स शामिल था, जबकि अगले दिन हिरासत में लिए गए पत्रकारों को छोड़ने के लिए छत्रसाल स्टेडियम का इस्तेमाल किया गया।

इसके बाद 'द वायर' ने रिपोर्ट दी कि कनॉट प्लेस और जंतर-मंतर से हिरासत में लिए गए लोगों को पांडवाला खुर्द ले जाया गया, जहां उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें बंद गेट के पीछे रखा गया और समय पर वकीलों व चिकित्सा सहायता तक पहुंच नहीं दी गई।

'द वायर' की 12 अक्टूबर की एक अलग रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 10 अक्टूबर को आठ हिरासत केंद्रों के 500 मीटर के दायरे में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद करने का आदेश दिया था। इस आदेश में छत्रसाल स्टेडियम, बवाना में राजीव गांधी स्टेडियम, यमुना स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, जसोला स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, दौलतपुर में एक सामुदायिक केंद्र, पांडवाला खुर्द में एक और सामुदायिक केंद्र, निजामपुर में जंगली राम स्टेडियम और नांगलोई में सूरजमल स्टेडियम शामिल थे। टेलीकम्युनिकेशन्स एक्ट, 2023 और टेलीकम्युनिकेशन्स (सेवाओं का अस्थायी निलंबन) नियम, 2024 के तहत 10 अक्टूबर को आधी रात से रात 10 बजे तक सेवाएं रोकने का आदेश दिया गया था। इस आदेश में सार्वजनिक सुरक्षा, सार्वजनिक आपातकाल को रोकने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने का हवाला दिया गया था।

इसके अलावा, प्रस्तावित विरोध स्थल के पास जनपथ-कर्तव्य पथ क्रॉसिंग के चार किलोमीटर के दायरे में मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को 24 घंटे के लिए अलग से बंद कर दिया गया था।

दक्षिणपंथी समूह के सदस्यों ने प्रदर्शनकारियों पर हिंसा और हमला किया

प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की व्यापक कार्रवाई के बीच, 10 अक्टूबर को दक्षिणपंथी लोगों द्वारा युवा प्रदर्शनकारियों पर खुलेआम हमला करने के वीडियो भी सामने आए। 'द वायर' के अनुसार, फुटेज में दक्षिणपंथी संगठन 'हिंदू रक्षा दल' के सदस्य बताए जा रहे चार लोगों को एक पुरुष प्रदर्शनकारी पर हमला करते और एक महिला को जमीन पर गिराकर उस पर हमला करते देखा गया। यह घटना मध्य दिल्ली के DDU मार्ग पर हुई।

'इंडियन एक्सप्रेस' और NDTV ने खबर दी कि दिल्ली पुलिस ने 11 अक्टूबर को हमले के सिलसिले में चार लोगों को गिरफ्तार किया। इन लोगों पर विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्रों के साथ मारपीट करने और महिलाओं को धक्का देने व पीटने का आरोप था। हिंदू रक्षा दल के अध्यक्ष भूपेंद्र, जिन्हें पिंकी चौधरी के नाम से भी जाना जाता है, ने सार्वजनिक रूप से माना कि आरोपी उनके संगठन के सदस्य हैं और उनकी रक्षा करने का वादा किया। हमले के वीडियो सामने आने के बाद उनके ये बयान आए।

फुटेज ने घटनास्थल पर मौजूद पुलिसकर्मियों के व्यवहार पर भी सवाल खड़े कर दिए। यह हमला SIR प्रक्रिया पर जवाबदेही की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ व्यापक कार्रवाई के दौरान हुआ। जहां मध्य दिल्ली में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया जा रहा था, वहीं दक्षिणपंथी संगठन के सदस्यों द्वारा कथित हमले के वीडियो ने लोगों में नाराजगी का एक नया दौर शुरू कर दिया।

संयुक्त राष्ट्र ने 'मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए' प्रदर्शनकारियों को रिहा करने की मांग की

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय (OHCHR) ने 10 अक्टूबर को दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों से पहले और उनके दौरान प्रदर्शनकारियों, विरोध प्रदर्शन के नेताओं, नागरिक समाज के सदस्यों, वकीलों और पत्रकारों को बड़ी संख्या में हिरासत में लिए जाने की खबरों पर चिंता व्यक्त की। संयुक्त राष्ट्र ने अपने बयान में अधिकारियों से कहा कि वे शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने के अधिकार का पूरा सम्मान और पालन सुनिश्चित करें। साथ ही, संगठन ने उन लोगों को रिहा करने की भी अपील की जिन्हें उसने मनमाने ढंग से हिरासत में लिया हुआ बताया। यह बयान ऐसे समय में आया है जब हजारों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया जा रहा था, और पत्रकारों व वकीलों ने बताया कि उन्हें अपना पेशेवर काम करने से रोका जा रहा था।
 


केंद्रीय विदेश मंत्रालय ने 11 अक्टूबर को UN के दखल को खारिज कर दिया और उसकी टिप्पणियों को सार्वजनिक रुख में "बहुत ज्यादा पक्षपात" का उदाहरण बताया। मंत्रालय का कहना था कि भारत की कानून लागू करने वाली एजेंसियों ने कानून के मुताबिक काम किया और नागरिक अदालतों के जरिए अपनी शिकायत का समाधान पा सकते हैं।

MEA ने UN के मानवाधिकार कार्यालय पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप भी लगाया और उसकी टिप्पणियों को भारत के आंतरिक मामलों में गैर-जरूरी दखल बताया। UN में भारत के स्थायी मिशन ने भी इन चिंताओं को बेबुनियाद बताया था और OHCHR से अपने अधिकार क्षेत्र का निष्पक्ष रूप से इस्तेमाल करने को कहा था।

यह घटनाक्रम तब हुआ जब UN ने अधिकारियों से शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने के अधिकार का सम्मान करने को कहा, क्योंकि पत्रकारों, वकीलों और सिविल सोसाइटी के सदस्यों समेत कई लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबरें आ रही थीं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने विरोध प्रदर्शन पर लगी पाबंदियों की निंदा की

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने 10 अक्टूबर के प्रदर्शन से पहले ही चिंता जताई थी और 9 अक्टूबर को चेतावनी दी थी कि दिल्ली में लगाई गई पाबंदियां जरूरत से ज्यादा थीं और शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने के अधिकार के लिए खतरा थीं। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के बोर्ड के चेयरमैन आकार पटेल ने कहा कि प्रदर्शनकारियों को बिना डराए-धमकाए, मनमाने ढंग से हिरासत में लिए बिना या उनकी आजादी पर कड़ी पाबंदियां लगाए बिना सत्ता में बैठे लोगों से जवाबदेही मांगने का हक होना चाहिए।




एमनेस्टी ने तय प्रदर्शन के लिए इजाजत न मिलने, दिल्ली में आने-जाने पर पाबंदियों, सीमाओं को सील करने, पब्लिक ट्रांसपोर्ट को रोकने की योजना और विरोध स्थल के पास इंटरनेट बंद करने का जिक्र किया। उसने उस समय की रिपोर्टों के आधार पर एक्टिविस्टों को एहतियातन हिरासत में लेने और 30,000 से ज्यादा सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की ओर भी इशारा किया।

संगठन ने अधिकारियों से मनमानी पाबंदियां हटाने, संयम बरतने और शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने के अधिकार की रक्षा करने को कहा। उसने इस बात पर भी जोर दिया कि सुरक्षा उपायों का मकसद लोगों को उनके अधिकारों का इस्तेमाल करने के लिए सजा देने के बजाय जनता की सुरक्षा करना होना चाहिए।

2 अक्टूबर को एक पहले के बयान में, एमनेस्टी ने दिल्ली और मुंबई में विरोध प्रदर्शनों के दौरान लगाए गए कर्फ्यू आदेशों, हिरासत में लेने की कार्रवाई और इंटरनेट व पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर पाबंदियों की निंदा की थी। उसने फिर से कहा कि विरोध करने का अधिकार संविधान और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के तहत सुरक्षित है।

सख्त कार्रवाई के बीच सुप्रीम कोर्ट का दखल

9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के दखल और 11 अक्टूबर को हुई आगे की सुनवाई के बावजूद पुलिस की कार्रवाई जारी रही। 9 अक्टूबर को कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह दिल्ली के लिए ट्रेन सेवाएं पूरी तरह से बंद न करे और न ही दिल्ली मेट्रो स्टेशन बंद करे। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि कार्रवाई उचित होनी चाहिए और यात्रियों को बेवजह परेशानी नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने सरकार से शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए किसी वैकल्पिक जगह पर विचार करने को भी कहा।

बाद की सुनवाई में, कोर्ट ने पाबंदियों से जुड़ी अवमानना याचिका पर नोटिस जारी किया और यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि पत्रकारों, वकीलों और अन्य पेशेवरों को अपना काम करने में कोई रुकावट न आए। कोर्ट के निर्देशों में गैर-कानूनी हिरासत, इंटरनेट सुविधा और बैरिकेड्स की समीक्षा जैसे मुद्दे भी शामिल थे।

ये घटनाक्रम ऐसी खबरों के बीच सामने आए कि प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया जा रहा था, दूर-दराज की जगहों पर ले जाया जा रहा था और उन्हें वकीलों से मिलने नहीं दिया जा रहा था। जब कोर्ट प्रदर्शनों पर लगाई गई पाबंदियों पर विचार कर रहा था, तभी हिरासत में लेने वाली गाड़ियों के अंदर मारपीट के आरोप भी सामने आए।

'इंडियन एक्सप्रेस' ने खबर दी कि कोर्ट का दखल बड़े पैमाने पर लोगों को हिरासत में लेने और सार्वजनिक परिवहन सुविधाएं बंद होने को लेकर जताई गई चिंताओं के बाद आया। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' ने भी शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने, सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल और पत्रकारों व वकीलों के अपने काम करने की आजादी से जुड़े कोर्ट के निर्देशों की खबर दी।

पुलिस का कहना था कि हिरासत में लेने की कार्रवाई के दौरान प्रदर्शनकारियों ने सहयोग नहीं किया और उन्हें हटाने के लिए कभी-कभी बल प्रयोग करना पड़ा। हालांकि, हिरासत में लिए गए लोगों और उनके वकीलों की तरफ से मारपीट, फोन जब्त करने, कानूनी मदद न मिलने और नाबालिगों के साथ बुरा बर्ताव करने के आरोप लगातार सामने आते रहे।

दिल्ली से बाहर भी फैली सख्त कार्रवाई

पाबंदियां और हिरासत में लेने की कार्रवाई सिर्फ राष्ट्रीय राजधानी तक ही सीमित नहीं थी। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने बताया कि दिल्ली जाते समय एक्टिविस्ट और छात्र संघ के सदस्यों को रोका गया, नजरबंद किया गया या शहर के बाहर हिरासत में लिया गया।

नागरिक आजादी के लिए काम करने वाले संगठन 'पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़' (PUCL) के मुताबिक, पुणे से आ रहे छात्रों को 8 अक्टूबर की रात इटारसी में गोवा एक्सप्रेस से उतार दिया गया। खबरों के मुताबिक, भोपाल और ग्वालियर में भी कुछ छात्रों को हिरासत में लिया गया, जबकि कई राज्यों में एक्टिविस्ट और छात्र नेताओं को पुलिस की कार्रवाई का सामना करना पड़ा।

PUCL ने गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और चंडीगढ़ में लोगों को हिरासत में लेने और उन पर पाबंदियां लगाने की भी रिपोर्ट दी। संगठन का आरोप है कि अहमदाबाद में सादे कपड़ों में क्राइम ब्रांच के कर्मचारियों ने छात्रों और प्रोफेसरों से मुलाकात की और उनसे यह लिखित वादा लिया कि वे विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा नहीं लेंगे।

विस्तृत रिपोर्ट यहां और यहां पढ़ी जा सकती हैं।

'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार, यह कार्रवाई राजनीतिक नेताओं, कार्यकर्ताओं और प्रदर्शनकारियों तक भी पहुंची, जिन्हें ट्रांसपोर्ट हब और विरोध प्रदर्शन की तय जगह तक जाने वाले रास्तों पर रोका गया।

मुंबई में, 10 अक्टूबर को एकजुटता प्रदर्शनों के दौरान लगभग 700 लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबर है, जिनमें अगस्त क्रांति मैदान और हुतात्मा चौक पर प्रदर्शन कर रहे लोग भी शामिल थे। हिरासत में लिए गए लोगों में महात्मा गांधी के परपोते तुषार गांधी और अन्य कार्यकर्ता शामिल थे।

इसके बाद PUCL ने हिरासत में लेने की कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों (जिनमें युवा, वकील और महिलाएं शामिल थीं) के खिलाफ बल प्रयोग के आरोपों की निंदा की। संगठन ने अभी भी हिरासत में रखे गए लोगों को रिहा करने, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामले वापस लेने और हिरासत में कथित हिंसा की स्वतंत्र जांच की मांग की।

संगठन ने कार्रवाई के दौरान फेशियल रिकग्निशन सिस्टम, ड्रोन और बॉडी कैमरों के इस्तेमाल पर भी चिंता जताई और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की बड़े पैमाने पर निगरानी बंद करने की मांग की।

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