ममता का बड़ा दांव, पश्चिम बंगाल विधानसभा में पारित हुआ सारी और सरना धर्म को मान्यता देने का प्रस्ताव

Written by Navnish Kumar | Published on: February 20, 2023
"ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल विधानसभा में आदिवासियों के सारी और सरना धर्मों को मान्यता देने के प्रस्ताव को पारित कर दिया। आदिवासी इसके लिए लंबे समय से मांग कर रहे थे। टीएमसी के मंत्री व प्रमुख आदिवासी नेता बीरबाहा हांसदा ने सदन को संबोधित करते हुए बताया कि भारत हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और जैन धर्म कोड का है पर आदिवासियों के पास ऐसा कोई धर्म कोड नहीं है। यह भी तब, जब देश में आदिवासियों की आबादी करीब 8.6% है।"



तृणमूल कांग्रेस ने शुक्रवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा में आदिवासियों के सारी और सरना धर्मों को मान्यता देने के लिए एक प्रस्ताव लाया गया और उसे पारित किया गया। इस कदम को आदिवासी वोटों को लुभाने के उपाय के रूप में देखा जा रहा है। वहीं मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी ने ममता बनर्जी पर वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया है। भाजपा ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए दावा किया कि यह समुदाय के नेताओं के साथ उचित चर्चा के बिना लाया गया और इसका उद्देश्य पंचायत चुनावों से पहले आदिवासियों को लुभाना है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सारी और सरना धर्म को मान्यता देने की मांग का प्रस्ताव पेश करते हुए पुरुलिया बांदवान से टीएमसी विधायक राजीब लोचन सरीन ने कहा कि धार्मिक संहिता की मान्यता आदिवासियों की लंबे समय से चली आ रही मांग है जो प्रकृति के उपासक हैं।

उन्होंने कहा, “यह आदिवासियों की लंबे समय से चली आ रही मांग है कि इन धर्मों को मान्यता दी जाए। लेकिन केंद्र ने कुछ नहीं किया। वे (भाजपा) आदिवासियों के अधिकारों की हिमायत करने का दावा करते हैं, लेकिन उन्होंने आदिवासियों के धर्म को मान्यता देने के लिए कुछ नहीं किया।" उन्होंने कहा, “हमने अपना काम कर दिया है; अब देखना हैं कि केंद्र क्या करता है।” पंचायत चुनाव से ऐन पहले पश्चिम बंगाल विधानसभा में सारी और सरना धर्म कोड को मान्यता देने से संबंधित प्रस्ताव पारित कर, ममता बनर्जी ने बड़ा दांव खेला है वहीं उनकी सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश है कि उनकी पार्टी और सरकार आदिवासियों के साथ है।

टीएमसी मंत्री और प्रमुख आदिवासी नेता बीरबाहा हांसदा ने सदन को संबोधित करते हुए बताया कि भारत हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और जैन धर्म कोड का है पर आदिवासियों के पास ऐसा कोई धर्म कोड नहीं है। उन्होंने कहा कि देश में आदिवासियों की आबादी करीब 8.6% है।

बीरबाहा हांसदा ने कहा कि इतनी आबादी होने के बावजूद हमारे धर्म कोड को अब तक मान्यता नहीं दी गई थी। उन्होंने बताया कि सारी संताल समुदाय के लोग होते हैं, जबकि सरना मुंडा समुदाय के होते हैं। संविधान में सभी धर्मों के लोगों को अपने-अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है पर हम आदिवासियों को ये अधिकार नहीं मिल रहा है। आदिवासियों को हिंदू समझा जाता है। उन्होंने कहा, “यह आदिवासियों की लंबे समय से चली आ रही मांग है कि इन धर्मों को मान्यता दी जाए। लेकिन केंद्र ने कुछ नहीं किया। वे (बीजेपी) आदिवासियों के अधिकारों की हिमायत करने का दावा करते हैं लेकिन उन्होंने आदिवासियों के धर्म को मान्यता देने के लिए कुछ नहीं किया। हमने अपना काम कर दिया है, देखते हैं कि केंद्र अब क्या करता है।”

बीरबाहा हांसदा ने आगे कहा कि धर्म कोड नहीं होने से आने वाले दिनों में हमारे अस्तित्व को ख़तरा हो सकता है इसलिए आदिवासियों को भी उनका धर्म कोड मिलना चाहिए था। लेकिन राष्ट्रपति चुनाव के बाद केंद्र सरकार आदिवासियों को भूल गई है।

वहीं भाजपा के मुख्य सचेतक मनोज तिग्गा ने कहा कि लंबे समय से आदिवासी सारी और सरना धर्म कोड की मांग कर रहे हैं। ऐसे में इस मांग को पूरा करने से पहले गंभीरता के साथ विचार करना जरूरी है। आदिवासी धर्म को जानने वाले इतिहासकार, धर्मगुरु और आदिवासी समुदाय के विभिन्न वर्गों के साथ चर्चा जरूरी है। प्रस्ताव का विरोध करते हुए मनोज तिग्गा ने कहा कि प्रस्ताव समुदाय के नेताओं के साथ उचित चर्चा के बिना लाया गया है। उन्होंने कहा कि आदिवासियों में कई समुदाय हैं। यह प्रस्ताव बिना किसी से चर्चा किए लाया गया। इसे चुनावों, खासकर आगामी पंचायत चुनावों को ध्यान में रखकर लाया गया है।

उन्होंने कहा कि टीएमसी आदिवासियों का वोट पाने के लिए इस प्रस्ताव को विधानसभा में लेकर आई है। कहा कि अगर तृणमूल को आदिवासियों से इतना ही लगाव था तो वो राष्ट्रपति चुनाव में क्यों नहीं शामिल हुई। उधर, टीएमसी नेताओं के मुताबिक, इस कदम से पार्टी को पुरुलिया, बांकुरा, पश्चिम मेदिनीपुर जिलों और राज्य के उत्तरी हिस्से में आदिवासियों के बीच अपना आधार मजबूत करने में मदद मिलेगी।

क्या है सरना धर्म

भारत के झारखंड, ओडिसा और बंगाल में एक आदिवासी समुदाय है जो सरना धर्म को मानता है। यह एक अलग धर्म है। भारत में विभिन्न जनजातीय समूहों के बीच धार्मिक प्रथाओं में कुछ अंतर हैं, वे मूल रूप से प्रकृति पूजक हैं। सरना धर्म वाले आदिवासी समुदाय का कहना है कि पहले उन्हें जनगणना के दौरान अपने धर्म का उल्लेख करने का अवसर दिया जाता था, लेकिन आजादी के बाद उन्हें हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध आदि प्रमुख धर्मों में से एक को चुनने के लिए मजबूर किया गया। इन आदिवासियों ने इस प्रथा को बदलने की मांग लंबे समय से थी। उनका कहना है कि सरना धर्म को झारखंड मान्यता दी जाए। सरना धर्म को मानने वालों की सबसे अधिक संख्या पहले झारखंड में है। उसके बाद ओडिसा और बंगाल में है।

नहीं है जनसंख्या का आंकड़ा

पश्चिम बंगाल में अभी धर्म विशेष किसी जनसंख्या का पता नहीं चल पाया है। लेकिन आदिवासी क्षेत्रों से जुड़े इलाकों में सरना धर्म को मानने वालों की संख्या काफी है। सरना का अर्थ है शाल का पेड़। पड़ोसी राज्य झारखंड में आदिवासियों में सरना के तीन समूह हैं। यदि इसे आदिवासी धर्म कहा जाता है। पश्चिम बंगाल के पुरुलिया, बांकुरा, झाड़ग्राम, पश्चिम मेदिनीपुर और उत्तरी बंगाल के कुछ हिस्सों में आदिवासी सरना धर्म को मानने वाले हैं। इसलिए अब टीएमसी ने सरना धर्म को मान्यता देने के लिए प्रस्ताव लाने का फैसला किया है।

ममता ने किया था समर्थन 

एक दिन पहले गुरुवार को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गुरुवार को कहा था कि उन्होंने जनगणना में सारी और सरना को धार्मिक कोड के रूप में मान्यता देने के लिए केंद्र को पत्र लिखा है। पश्चिम मिदनापुर के एक कॉलेज मैदान में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में ममता ने कहा, “हम सारी और सरना (धार्मिक कोड के रूप में) की मान्यता के लिए आपकी मांग के साथ है और केंद्र सरकार को एक पत्र लिखा है। हम इन दोनों धर्मों को मान्यता देना चाहते हैं क्योंकि यह लोगों (आदिवासी) की भावना है। हम आपकी मांग का पूरा समर्थन करते हैं। साथ ही हमने कुर्मी समुदाय की एक विशेष मांग का समर्थन करते हुए भी एक पत्र लिखा है।” ममता बनर्जी बाद में दिन में पुरुलिया के हुतमुरा मैदान में भी इसी तरह की एक सभा में इन्ही बातों का उल्लेख करना नहीं भूलीं।

हालांकि, ममता ने अपने भाषण में कुर्मी समुदाय की मांग को स्पष्ट नहीं किया लेकिन ये पिछड़ा समुदाय लंबे समय से केंद्र से मांग कर रहा है कि आजादी के बाद “अज्ञात कारणों” से खो चुके अनुसूचित जनजति टैग को केंद्र उसे फिर से वापस करे। ममता का इन समुदायों की लंबे समय से चली आ रही मांगों को उठाना महत्वपूर्ण है क्योंकि वे पश्चिमी मिदनापुर, झारग्राम, बांकुरा और पुरुलिया के जंगल महल जिलों में हर चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। सूत्रों के अनुसार, ये समुदाय 4 जंगल महल जिलों की 40 विधानसभा सीटों के भाग्य का फैसला करते हैं। 

बंगाल में ग्रामीण चुनाव मई में होने है। 2018 के ग्रामीण चुनावों में, भाजपा ने 100 पंचायतों पर कब्जा किया था और 2019 में कुर्मी और आदिवासियों के वर्चस्व वाले क्षेत्र की छह लोकसभा सीटों में से पांच पर जीत हासिल की थी। लेकिन बीजेपी को 2021 के विधानसभा चुनाव में करारा झटका लगा था और पार्टी को 40 में से केवल 16 सीटों पर जीत मिली थी। तृणमूल नेताओं ने कहा कि भाजपा ने द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाकर आदिवासियों और कुर्मियों के बीच एक बड़ा अभियान शुरू किया था। पुरुलिया में एक तृणमूल नेता ने कहा, “इसीलिए दीदी ने आदिवासी और कुर्मी समुदायों की लंबे समय से चली आ रही मांगों का समर्थन करके सही समय पर सही बटन को छुआ है।” 

उधर, आदिवासी नेता और बांकुड़ा में भारत जकात मांझी परगना महल के सदस्य संगिरी हेम्ब्रम ने कहा, “हमने सुना है कि हमारे मुख्यमंत्री ने क्या कहा। यह एक अच्छा कदम है लेकिन हमें खुशी तभी होगी जब केंद्र आधिकारिक तौर पर मान्यता की घोषणा करेगा।” वहीं मुख्यमंत्री ममता के रुख पर प्रतिक्रिया देते हुए आदिवासी कुर्मी समाज के मुख्य सलाहकार अजीत महतो ने कहा, “हम खुश हैं… लेकिन चाहते हैं कि केंद्र हमारी मांग पूरी करे।”

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