खबरों के आगे-पीछे: तब ट्रेनों को हरी झंडी प्रधानमंत्री नहीं दिखाते थे!

Written by अनिल जैन | Published on: November 7, 2022
एक समय था जब देश के किसी भी शहर से नई ट्रेन शुरू होती थी तो रेल मंत्री या रेल राज्यमंत्री उसे रवाना करते थे। कई बार ऐसा भी होता था कि कोई मंत्री नहीं जाता था और संबंधित क्षेत्र के सांसद ही ट्रेन को हरी झंडी दिखा कर रवाना कर देते थे। अब तो प्रधानमंत्री खुद ही हर जगह ट्रेनों को हरी झंडी दिखाने जाते हैं और आमतौर पर ऐसे मौकों पर रेल मंत्री या रेल राज्यमंत्री कहीं दिखाई भी नहीं देते।



एक समय था जब देश के किसी भी शहर से नई ट्रेन शुरू होती थी तो रेल मंत्री या रेल राज्यमंत्री उसे रवाना करते थे। कई बार ऐसा भी होता था कि कोई मंत्री नहीं जाता था और संबंधित क्षेत्र के सांसद ही ट्रेन को हरी झंडी दिखा कर रवाना कर देते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं होता है। अब तो प्रधानमंत्री खुद ही हर जगह ट्रेनों को हरी झंडी दिखाने जाते हैं और आमतौर पर ऐसे मौकों पर रेल मंत्री या रेल राज्यमंत्री कहीं दिखाई भी नहीं देते। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मोरबी में हुए पुल हादसे के एक दिन बाद 31 अक्टूबर को अहमदाबाद में दो नई रेल लाइन की शुरुआत की। इतनी बड़ी दर्दनाक घटना के बावजूद यह कार्यक्रम हुआ और इसके बाद 3 नवंबर को चुनाव आयोग ने वहां के चुनाव की तारीखें घोषित कीं। इससे पहले 13 अक्टूबर को प्रधानमंत्री मोदी ने हिमाचल प्रदेश के उना और दिल्ली के बीच चलने वाली वंदे भारत ट्रेन को हरी झंडी दिखाई थी। प्रधानमंत्री द्वारा इस ट्रेन को रवाना करने के एक दिन बाद ही 15 अक्टूबर को चुनाव आयोग ने हिमाचल प्रदेश में चुनाव की घोषणा की थी। इससे पहले 30 सितंबर को प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात से मुंबई के बीच चलने वाली वंदे भारत ट्रेन को हरी झंडी दिखा कर रवाना किया था। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले कई नई ट्रेनें शुरू हुईं। राजधानी, शताब्दी या जन शताब्दी को छोड़ दे तो पिछले 20 साल में ही संपर्क क्रांति, संपूर्ण क्रांति, गरीब रथ जैसी कई नई ट्रेनें चलीं लेकिन किसी को हरी झंडी दिखाने न तो अटल बिहारी वाजपेयी गए थे और न ही मनमोहन सिंह गए।

सुब्रमण्यम स्वामी को हरेन पंड्या हो जाने का डर

भाजपा के पूर्व सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी सुरक्षा को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। उनका कहना है कि सरकार उनकी सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था नहीं कर रही है। सोशल मीडिया में इसे लेकर दिलचस्प चर्चा हुई। किसी ने स्वामी के हाई कोर्ट जाने और सुरक्षा व्यवस्था मांगे जाने पर सवाल उठाया तो उस पर जवाब देते हुए स्वामी ने लिखा- मैं हरेन पंड्या हो जाना नहीं चाहता हूं। उल्लेखनीय है कि हरेन पंड्या गुजरात में गृह मंत्री थे और गुजरात में 2002 की भीषण सांप्रदायिक हिंसा के थोड़े दिन बाद उनकी हत्या हो गई थी। तब नरेंद्र मोदी राज्य के मुख्यमंत्री थे। सुरक्षा मामलों के जानकार पत्रकार जोसी जोसेफ ने अपनी किताब 'द साइलेंट कू’ में लिखा है कि सांप्रदायिक हिंसा की जांच के लिए एक सिटीजन कमेटी बनी थी, जिसके अध्यक्ष जस्टिस वी कृष्णा अय्यर थे। जब अय्यर कमेटी गुजरात पहुंची थी तो खबर आई थी कि एक पूर्व मंत्री ने कमेटी के लोगों से मुलाकात की। राज्य के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसका पता लगाया। मालूम हुआ कि कमेटी से मिलने वाले पूर्व मंत्री हरेन पंड्या थे। इसके कुछ दिनों बाद ही उनकी गोली मार कर हत्या कर दी गई। उनकी हत्या में कथित तौर पर शामिल रहे शूटर सोहराबुद्दीन शेख और तुलसीराम प्रजापति बाद में एक पुलिस मुठभेड़ में मारे गए। उस मुठभेड़ को लेकर भी अनेक सवाल उठे। बहरहाल, राष्ट्रीय सुरक्षा और अर्थव्यवस्था से संबंधित केंद्र सरकार की नीतियो पर लगातार सवाल उठा रहे सुब्रह्मण्यम स्वामी का अपने मामले में हरेन पंड्या का रेफरेंस देना मामूली बात नहीं है।

दक्षिण के तीन राज्यों में अकेले लड़ेगी कांग्रेस

कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा का एक बड़ा संकेत यह है कि दक्षिण भारत के तीन राज्यों में पार्टी अकेले चुनाव लड़ेगी। दक्षिण भारत के पांच राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में से तीन जगह पहले से कांग्रेस का गठबंधन है। तमिलनाडु और केंद्र शासित पुड्डुचेरी में उसका डीएमके से गठबंधन है और अगले चुनाव में भी दोनो पार्टियां साथ रहेंगी। इसी तरह केरल में दशकों से कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट है। इसलिए इन तीन प्रदेशों मे यथास्थिति रहेगी, लेकिन आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में कांग्रेस अकेले लड़ेगी। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की यात्रा इस समय तेलंगाना में चल रही है और सोमवार को रंगारेड्डी जिले में राहुल गांधी ने एक प्रेस कांफ्रेन्स में दो टूक अंदाज में कहा कि तेलंगाना मे सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति, जिसका नाम अब भारत राष्ट्र समिति हो गया है, के साथ कांग्रेस का कोई संबंध नहीं है। कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश से अलग तेलंगाना राज्य का गठन कराया और कायदे से उसे इसका फायदा मिलना चाहिए था लेकिन अलग राज्य बनने के बाद हुए दोनों चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत खराब रहा। इस बार कांग्रेस उम्मीद कर रही है कि उसका प्रदर्शन सुधरेगा। कांग्रेस को पता है कि के. चंद्रशेखर राव की पार्टी के साथ तालमेल करके कांग्रेस नहीं बच पाएगी, उससे लड़ कर ही कांग्रेस को बचाया जा सकता है।

आज़म खान पर इतनी जल्दी क्यों?

उत्तर प्रदेश में सरकार ही नहीं, विधानसभा अध्यक्ष भी कानून-कायदों और अदालत को ठेंगे पर रखते हैं। समाजवादी पार्टी के संस्थापकों में से एक और हर चुनाव जीतने वाले नेता आजम खान को हेट स्पीच का दोषी ठहरा कर सजा का ऐलान किया गया और 24 घंटे में उनको अयोग्य घोषित करके उनकी विधानसभा सीट खाली होने की अधिसूचना जारी कर दी गई। इस बात का भी इंतजार नहीं किया गया कि वे फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट जा सकते हैं और हाई कोर्ट सजा पर रोक भी लगा सकता है। जाहिर है कि या तो स्पीकर को पता है कि हाई कोर्ट में क्या होना है या कुछ भी हो उसकी परवाह उनको नहीं है। आजम खान के मामले में यह जल्दबाजी हैरान करने वाली है। यह संभवत: पहला मामला है, जब हेट स्पीच मामले में किसी को सजा हुई है और वह भी इतनी सख्त। पिछले दिनों भाजपा के एक सांसद ने एक पूरे समुदाय के संपूर्ण बहिष्कार की अपील कर डाली थी लेकिन उनके खिलाफ हेट स्पीच का मुकदमा भी दर्ज नही हुआ, जबकि आजम खान ने सिर्फ कलेक्टर पर भाजपा से मिले होने का आरोप लगाया था। सवाल यह भी है कि खतौली के भाजपा विधायक विक्रम सैनी का क्या हुआ, जिनको 11 अक्टूबर को दो साल की सजा सुनाई गई थी? जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत किसी को दो साल या उससे ज्यादा की सजा होती है तो उसकी सदस्यता खत्म हो जाती है। लेकिन विक्रम सैनी की सीट अभी तक खाली घोषित नहीं की गई है।

उपचुनावों में भाजपा का परिवारवाद

हिमाचल प्रदेश के चुनाव में भाजपा ने वंशवाद और परिवारवाद को मुद्दा बनाया है। गृह मंत्री अमित शाह दिवंगत वीरभद्र सिंह और उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह के बहाने कांग्रेस को राजा और रानी की पार्टी तो सोनिया और राहुल गांधी के बहाने कांग्रेस को मां-बेटे की पार्टी बता रहे हैं। हालांकि खुद भाजपा ने अनेक नेताओं के बेटे और पत्नी को चुनाव में उतारा है। यही नहीं, गुरुवार को छह राज्यों की जिन सात विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए, उनमें से छह सीटों पर लड़ रही भाजपा ने पांच पर नेताओं के बेटे या पत्नी को टिकट दिया। एक सीट पर उसने कांग्रेस से दलबदल करके आए पूर्व विधायक को उतारा है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में गोला गोकर्णनाथ सीट पर उपचुनाव हुआ है। भाजपा ने अपने दिवंगत विधायक के बेटे अमन गिरी को चुनाव लड़ाया। बिहार में कामा सीट पर भाजपा ने जदयू छोड़ कर अपनी पार्टी में आए नलिनी रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह की पत्नी सोनम देवी को टिकट दिया। बिहार की ही गोपालगंज सीट भाजपा ने दिवंगत विधायक की पत्नी कुसुम देवी को चुनाव में उतारा। ओडिशा की धामनगर सीट पर भाजपा ने अपने दिवंगत विधायक के बेटे सूर्यवंशी सूरज को टिकट दिया। हरियाणा की आदमपुर सीट पर भाजपा ने कांग्रेस से दलबदल करके आए कुलदीप बिश्नोई के बेटे भव्य बिश्नोई को टिकट दिया। तेलंगाना की मुनुगोडे सीट पर भाजपा ने कांग्रेस से दलबदल करने वाले विधायक राजगोपाल रेड्डी को टिकट दिया। महाराष्ट्र की अंधेरी सीट पर भाजपा ने आखिरी वक्त में अपना उम्मीदवार हटा लिया। हालांकि वहां भी भाजपा ने पहले दिवंगत विधायक की पत्नी रुतुजा लटके को अपनी पार्टी में लाकर टिकट देने का प्रयास किया था। सो, छह सीटों पर लड़ रही भाजपा ने चार पर नेताओं के बेटे व पत्नी को टिकट दिया, एक सीट पर दलबदलू नेता के बेटे को टिकट दिया और एक सीट पर दलबदल करने वाले विधायक को टिकट दिया। यह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी का हाल है!

ममता बनर्जी की राजनीति का बदला हुआ अंदाज

पिछले कुछ समय से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का राजनीति करने का अंदाज बहुत कुछ बदला हुआ सा है। अपने सूबे के पिछले राज्यपाल जगदीप धनखड़ के साथ उनका जैसा अनुभव रहा उसे देखते हुए उन्होंने राज्य के कार्यकारी राज्यपाल ला गणेश के साथ सौहार्द्रपूर्ण संबंध बनाना शुरू कर दिया है। वैसे गणेश भी पूर्णकालिक राज्यपाल नहीं होने की वजह से पश्चिम बंगाल में ज्यादा सक्रिय नहीं है। उनको मणिपुर और पश्चिम बंगाल दोनों साथ-साथ देखने हैं। सो, जुलाई में उनके कार्यकारी राज्यपाल बनने के बाद सरकार और राजभवन के बीच सद्भाव दिख रहा है। यह सद्भाव इतना है कि ममता बनर्जी, जो केंद्र सरकार के कार्यक्रमों के लिए दिल्ली आने से भी परहेज करती हैं, वे राज्यपाल गणेश के बड़े भाई के जन्मदिन के कार्यक्रम में शामिल होने चेन्नई चली गईं। सवाल है कि इससे वे क्या मैसेज देना चाहती हैं? क्या कार्यकारी राज्यपाल के साथ अच्छे संबंध रखने से उनकी पार्टी के नेताओं को केंद्रीय एजेंसियों से राहत मिल जाएगी? या यह किसी सौदेबाजी का हिस्सा है, जिसके आरोप पिछले कुछ दिनों से लग रहे हैं? ममता बनर्जी ने पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी तारीफ की थी और इन दिनों उन्होंने विपक्षी पार्टियों से भी दूरी बना रखी है। सो, ऐसा लग रहा है कि वे अपने राज्य में हिंदू मतदाताओं को पूरी तरह से अपने खिलाफ होने से रोकने की राजनीति कर रही हैं और साथ ही केंद्रीय जांच एजेंसियों से कुछ राहत हासिल करने के प्रयास भी कर रही हैं।

गुजरात में पटेल समुदाय फिर राजनीति की धुरी

गुजरात में दो दशक पहले केशुभाई पटेल को हटा कर नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद पटेलों का राजनीतिक दबदबा कम हुआ था। परंतु अब फिर राज्य की राजनीति पटेल समुदाय के इर्द-गिर्द घूम रही है। राज्य में 13 फीसदी आबादी के साथ पटेल सबसे बड़ा जातीय समुदाय है। इसके साथ ही आर्थिक व सामाजिक वर्चस्व की वजह से भी इसका राजनीतिक असर ज्यादा है। इसीलिए इस बार भाजपा और आम आदमी पार्टी दोनों पटेल समुदाय को साधने में जुटी हैं। इसकी शुरुआत भाजपा ने की, जब विजय रुपानी को हटा कर भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बनाया। हालांकि वे बहुत जाने-माने पटेल नेता नहीं हैं लेकिन समुदाय को इससे फर्क नहीं पड़ता। भूपेंद्र पटेल के मुख्यमंत्री बनने के बाद भाजपा ने कांग्रेस की राजनीति कर रहे पाटीदार आरक्षण आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल को अपने पाले में लिया। अब एक दूसरे बड़े पटेल नेता और खोडलधाम ट्रस्ट के प्रमुख नरेश पटेल की मुलाकात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई है और वे भी भाजपा का समर्थन करेंगे। उधर आम आदमी पार्टी पटेल समुदाय के ही गोपाल इटालिया को अपना मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाने जा रही है। इस बीच पाटीदार आरक्षण के लिए अभियान चलाने वाले संगठन पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के नेता रहे अल्पेश कथीरिया और धार्मिक मालवीय आम आदमी पार्टी में शामिल हो गए हैं। भाजपा और आम आदमी पार्टी में चल रही खींचतान को देखते हुए कांग्रेस ने अपने को इससे दूर रखा है।

साभार- न्यूजक्लिक

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