कर्नाटक: हक्की-पिक्की, इरुलिगा आदिवासियों को बन्नेरघट्टा में मिले भूमि अधिकार, खुशी का माहौल

Written by Navnish Kumar | Published on: August 25, 2023
हक्की पिक्की, इरुलिगा आदिवासियों में बन्नेरघट्टा में भूमि अधिकार मिलने से खुशी का माहौल है। खानाबदोश हक्की पिक्की जनजाति और जंगल में रहने वाली इरुलिगा जनजातियों के लोगों को 1962 में 350 एकड़ जमीन दी गई थी। 



डेक्कन हेराल्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक के हक्की पिक्की और इरुलिगा आदिवासी समुदायों के करीब 114 लोगों को 60 साल की लंबी लड़ाई के बाद बन्नेरघट्टा नेशनल पार्क (BNP) के किनारे भूमि के स्वामित्व पत्र (मालिकाना हक) प्राप्त हुए हैं।

1962 में, खानाबदोश हक्की पिक्की जनजाति और जंगल में रहने वाली इरुलिगा जनजातियों के लोगों को बन्नेरघट्टा नेशनल पार्क (BNP) के पास रागीहल्ली राज्य वन से अधिसूचित 350 एकड़ जमीन दी गई थी।

हालांकि, जहां लालफीताशाही ने भूमि अधिकारों को सुरक्षित करने की उनकी कोशिशों को पलीता लगाने का काम किया, अड़चनें पैदा कीं तो वहीं, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते, उनकी पीड़ा और संघर्ष को लगभग भुला दिया गया। लेकिन अब पिछले हफ्ते, बेंगलुरु ग्रामीण सांसद डीके सुरेश ने उन्हें भूमि के स्वामित्व विलेख और राजस्व दस्तावेज वितरित किए। इसे "(स्वामित्व पत्र मिलने को) न केवल जंगलों के भीतर, बल्कि राजस्व भूमि पर भी विस्थापित वननिवासी परिवारों के लिए आजीविका पक्की (सुनिश्चित) करने की दिशा में एक सकारात्मक मॉडल के तौर पर देखा जा रहा है। इसके बगैर, वह एक तरफ भू-माफिया तो दूसरी तरह बेलगाम शहरीकरण को लेकर असुरक्षित महसूस कर रहे थे।" हक्की पिक्की और इरुलिगा ट्राइबल सोसाइटी के बयान में कहा गया है।

सोसायटी फॉर इनफॉर्मल एजुकेशन एंड डेवलपमेंट स्टडीज (SIEDS) और पर्यावरण सहायता समूह, जिसने सोसायटी का समर्थन किया, ने कहा कि गजट अधिसूचना के बावजूद, आदिवासियों का पुनर्वास कागज पर ही रह गया था।

उन्होंने कहा कि वन संरक्षण के इस (किलेनुमा) मॉडल ने पारंपरिक वन-निवासी समुदायों को अत्यधिक पीड़ा (कष्ट) पहुंचाई है। किलेनुमा मॉडल मतलब वन विभाग, जंगल को अपने किले (एक छत्र राज यानी एकाधिकार) के तौर पर देखता आया है। उन्होंने 2006 के वन अधिकार अधिनियम (FRA) की एक ऐतिहासिक कानून के रूप में सराहना की, जिसने जनजातियों और वन निवासियों के साथ सदियों से होते आ रहे ऐतिहासिक अन्याय से निजात दिलाने का काम किया है। बयान में कहा गया है, ''भूमि को नो-डेवलपमेंट जोन घोषित करने के बाद उन्हें सौंपा गया है ताकि इस क्षेत्र में रियल स्टेट माफिया को घुसने से रोका जा सके।''

कौन है हक्की-पिक्की आदिवासी, कितनी है आबादी 

हक्की पिक्की' कर्नाटक के प्रमुख आदिवासी समुदायों में से एक है। कन्नड़ में 'हक्की' शब्द का इस्तेमाल 'पक्षी' और 'पिक्की' का इस्तेमाल 'पकड़ने' के लिए किया जाता है। यानी इस समुदाय का पारंपरिक व्यवसाय 'पक्षी पकड़ने' के रूप में जाना जाता है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, हक्की पिक्की समुदाय की कर्नाटक में आबादी 11892 थी।
 
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के SPPEL (लुप्तप्राय भाषाओं के संरक्षण और संरक्षण के लिए योजना) के मुताबिक, हक्की पिक्की' कर्नाटक के प्रमुख आदिवासी समुदायों में से एक है। कन्नड़ में 'हक्की' शब्द का इस्तेमाल 'पक्षी' और 'पिक्की' का इस्तेमाल 'पकड़ने' के लिए किया जाता है। यानी इस समुदाय का पारंपरिक व्यवसाय 'पक्षी पकड़ने' के रूप में जाना जाता है। 2001 की जनगणना के मुताबिक, उत्तर भारत से विस्थापित हक्की पिक्की समुदाय की कर्नाटक में आबादी लगभग 8414  है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, इनकी आबादी 11892 थी। 1970 के दशक में पक्षियों के शिकार के उनके व्यापार पर प्रतिबंध लगने के बाद, हक्की पिक्की आदिवासियों का पुनर्वास किया गया।

इसके बाद इस समुदाय के लोगों ने खेतों में काम करने और साइकिल पर शहरों के चारों ओर घूमकर चाकुओं, कैंचियों को तेज करने जैसे काम करना शुरू कर दिया। इसके अलावा इस समुदाय के लोग जड़ी बूटियां भी बेचते हैं। हक्की-पिक्की को मातृसत्तात्मक कहा जाता है।

हक्की-पिक्की आदिवासी समुदाय कर्नाटक में मुख्य तौर पर शिमोगा, दावणगेरे और मैसूर में रहते हैं। द्रविड़ भाषाओं से घिरे होने और दक्षिणी भारत में रहने के बावजूद, इस समुदाय के लोग इंडो आर्यन भाषा बोलते हैं। उनकी मातृभाषा को 'वागरी' नाम दिया गया। ये लोग घर पर 'वागरी' भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जबकि दैनिक कामकाज के दौरान कन्नड़ भाषा बोलते हैं। यूनेस्को ने हक्की पिक्की को लुप्तप्राय भाषाओं में से एक बताया है।

कर्नाटक में हक्की पिक्की समुदाय अपनी स्वदेशी दवाओं के लिए भी जाने जाते हैं। घने जंगलों में रहने वाली यह जनजाति पेड़- पौधे और जड़ी-बूटियों पर आधारित इलाज करते हैं। समुदाय के लोगों के पास जड़ी-बूटी संबंधी चिकित्सा का अच्छा ज्ञान है, इनकी कई अफ्रीकी देशों में मांग है। यही वजह है कि समुदाय के सदस्य पिछले कई सालों से अफ्रीकी देशों में जाते रहते हैं।

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