अधिकारियों को बिना 15 दिन का अनिवार्य ‘कारण बताओ नोटिस’ दिए रिहायशी घरों को गिराने की अनुमति नहीं है। यह नोटिस रजिस्टर्ड डाक से भेजा जाना चाहिए और जिस संपत्ति को गिराया जाना है, उस पर चस्पा किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस में इसका उल्लेख है।

फोटो साभार : द वायर
सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोज़र कार्रवाई को “कानून और इंसानियत के खिलाफ” बताया था, लेकिन इसके बावजूद जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने मंगलवार (19 मई) को अतिक्रमण हटाने का अभियान चलाया, जिसके बाद जम्मू में कई आदिवासी परिवार बेघर हो गए।
द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, घरों को गिराने की यह कार्रवाई जम्मू की बहू विधानसभा सीट से BJP के वरिष्ठ नेता और विधायक विक्रम रंधावा के उस बयान के कुछ ही दिन बाद हुई, जिसमें उन्होंने जम्मू में कश्मीरियों और “एक खास समुदाय” (गुर्जरों) के घरों को गिराने की धमकी दी थी। उनका आरोप था कि ये घर कथित अतिक्रमित जमीन पर बने हैं।
खुद रंधावा पर भी जम्मू की मंडल तहसील के चक गणेशू गांव में आठ कनाल जमीन (खसरा नंबर 211) पर अतिक्रमण कर स्टोन क्रशर प्लांट लगाने का आरोप है। हालांकि, उन्होंने इस आरोप से इनकार करते हुए कहा है कि मामला फिलहाल अदालत में विचाराधीन है।
इस मामले को आगे बढ़ाते हुए, जम्मू-कश्मीर के वन मंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता जावेद अहमद राणा ने घरों को गिराने की इस कार्रवाई के लिए BJP के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने इसे जम्मू-कश्मीर के लोगों को सांप्रदायिक आधार पर बांटने की “पूर्व-नियोजित साजिश” बताया।
प्रभावित परिवारों से मिलने के बाद राणा ने पत्रकारों से कहा, “मैंने पहली बार ऐसा नंगा नाच देखा है। यह दुख की बात है कि हमारे लोकतांत्रिक देश में कुछ लोग जम्मू-कश्मीर में सांप्रदायिक सौहार्द को तोड़ना चाहते हैं। केंद्र सरकार की नीति ही ‘बांटो और राज करो’ की है। इस काम के लिए जो भी लोग जिम्मेदार हैं, उन्हें सजा मिलनी चाहिए।”
रिपोर्ट्स के मुताबिक, मंगलवार तड़के पुलिस और अर्धसैनिक बलों की एक बड़ी टुकड़ी बुलडोज़र मशीनों के साथ जम्मू के सिधरा इलाके में आदिवासी गुर्जर समुदाय के मुस्लिम परिवारों की एक बस्ती में पहुंची और इलाके को चारों ओर से घेर लिया।
पिछले सप्ताह जम्मू में गुर्जर समुदाय ने रंधावा के बयानों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था। रंधावा ने दावा किया था कि जम्मू-कश्मीर की शीतकालीन राजधानी जम्मू में 95% जमीन पर कथित तौर पर कश्मीरियों और “एक खास समुदाय” ने अतिक्रमण कर रखा है। जिस इलाके में मंगलवार को तोड़फोड़ की कार्रवाई की गई, वह जम्मू की निचली शिवालिक रेंज के रायका वन क्षेत्र का हिस्सा है।
अधिकारियों ने दावा किया कि इस इलाके में सरकारी जमीन पर कथित तौर पर गैर-कानूनी तरीके से लगभग 20-30 इमारतें बनाई गई थीं, जिनमें कुछ रिहायशी मकान भी शामिल थे। कार्रवाई के दौरान इन्हें गिरा दिया गया और 60 कनाल जमीन खाली कराई गई।
हालांकि, J&K के मंत्री राणा और स्थानीय लोगों ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि प्रभावित परिवार लगभग पांच दशकों से इस इलाके में रह रहे थे।
स्थानीय लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि अधिकारियों ने उनके घरों को गिराने से पहले जरूरी दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया, जिसके कारण वे बेघर हो गए।
सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार, अधिकारियों को रिहायशी घरों को गिराने की अनुमति तब तक नहीं होती, जब तक वे 15 दिन पहले अनिवार्य ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी न करें। यह नोटिस रजिस्टर्ड डाक से भेजा जाना चाहिए और उस संपत्ति पर चस्पा किया जाना चाहिए जिसे तोड़ने के लिए चिन्हित किया गया है।
तोड़फोड़ वाली जगह से मिली तस्वीरों में मलबे के ढेर दिखाई दे रहे हैं, जहां कभी घर हुआ करते थे। वहीं, सदमे में डूबे निवासी अपने कुछ बचे हुए सामान की रखवाली करते दिखाई दिए, जिन्हें वे मंगलवार सुबह बुलडोज़र चलने से पहले बचा सके थे।
एक पीड़ित महिला, जिसका घर तोड़ दिया गया, ने रिपोर्टर से कहा, “मेरी बेटी की शादी जल्द होने वाली है। उसका दहेज का सामान घर के अंदर रखा था। मैं उस समय इबादत कर रही थी। उन्होंने सारा सामान फाड़ दिया और सोफे व अलमारी समेत सब कुछ तोड़ दिया। हम कोई बाहरी लोग नहीं हैं। हम यहां कई दशकों से रह रहे हैं। अब हम कहां जाएंगे?”
जब प्रशासन के इस आरोप के बारे में पूछा गया कि सरकारी जमीन पर कई नए घर बना लिए गए हैं, तो एक अन्य प्रभावित महिला निवासी ने स्वीकार किया कि 1947 में इस इलाके में केवल तीन घर थे।
उन्होंने कहा, “1947 के बाद पूरी दुनिया बदल गई है। क्या इन तीन परिवारों को आगे नहीं बढ़ना चाहिए था? हमारे पास पानी और बिजली के वैध कनेक्शन हैं, लेकिन हमारे घर गिराने से पहले हमें कोई नोटिस तक नहीं दिया गया। यह पूरी तरह गलत है।”
एक रिपोर्ट में एक अज्ञात अधिकारी के हवाले से दावा किया गया कि इस इलाके में “पहले कुछ ही इमारतें थीं, लेकिन अब बड़ी संख्या में अवैध निर्माण हो चुके हैं और नए निर्माण अभी भी जारी हैं।”
यह तोड़फोड़ अभियान आने वाले दिनों में सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस और विपक्षी BJP के बीच राजनीतिक टकराव का मुद्दा बन सकता है और मुस्लिम-बहुल कश्मीर तथा हिंदू-बहुल जम्मू क्षेत्र के बीच की खाई को और गहरा कर सकता है।
इस बीच, J&K RTI मूवमेंट — जो आदिवासी समूहों और नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं का एक गठबंधन है — ने इस तोड़फोड़ अभियान को “मानवीय गरिमा, संवैधानिक अधिकारों और वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत वादा किए गए न्याय की भावना पर हमला” करार दिया है।
गठबंधन की ओर से जारी बयान में कहा गया, “इन परिवारों को बिना किसी हमदर्दी, पुनर्वास या उचित कानूनी प्रक्रिया के बेदखल कर दिया गया। ऐसी खबरें हैं कि घरों को गिराने से पहले पवित्र कुरान और घर का बुनियादी सामान तक नहीं बचाया जा सका। ये खबरें इस अभियान की चौंकाने वाली संवेदनहीनता और अमानवीयता को उजागर करती हैं।”
गठबंधन ने इस तोड़फोड़ अभियान की न्यायिक जांच और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की मांग की है। साथ ही, अधिकारियों से SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत FIR दर्ज करने का आग्रह भी किया गया है।
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फोटो साभार : द वायर
सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोज़र कार्रवाई को “कानून और इंसानियत के खिलाफ” बताया था, लेकिन इसके बावजूद जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने मंगलवार (19 मई) को अतिक्रमण हटाने का अभियान चलाया, जिसके बाद जम्मू में कई आदिवासी परिवार बेघर हो गए।
द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, घरों को गिराने की यह कार्रवाई जम्मू की बहू विधानसभा सीट से BJP के वरिष्ठ नेता और विधायक विक्रम रंधावा के उस बयान के कुछ ही दिन बाद हुई, जिसमें उन्होंने जम्मू में कश्मीरियों और “एक खास समुदाय” (गुर्जरों) के घरों को गिराने की धमकी दी थी। उनका आरोप था कि ये घर कथित अतिक्रमित जमीन पर बने हैं।
खुद रंधावा पर भी जम्मू की मंडल तहसील के चक गणेशू गांव में आठ कनाल जमीन (खसरा नंबर 211) पर अतिक्रमण कर स्टोन क्रशर प्लांट लगाने का आरोप है। हालांकि, उन्होंने इस आरोप से इनकार करते हुए कहा है कि मामला फिलहाल अदालत में विचाराधीन है।
इस मामले को आगे बढ़ाते हुए, जम्मू-कश्मीर के वन मंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता जावेद अहमद राणा ने घरों को गिराने की इस कार्रवाई के लिए BJP के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने इसे जम्मू-कश्मीर के लोगों को सांप्रदायिक आधार पर बांटने की “पूर्व-नियोजित साजिश” बताया।
प्रभावित परिवारों से मिलने के बाद राणा ने पत्रकारों से कहा, “मैंने पहली बार ऐसा नंगा नाच देखा है। यह दुख की बात है कि हमारे लोकतांत्रिक देश में कुछ लोग जम्मू-कश्मीर में सांप्रदायिक सौहार्द को तोड़ना चाहते हैं। केंद्र सरकार की नीति ही ‘बांटो और राज करो’ की है। इस काम के लिए जो भी लोग जिम्मेदार हैं, उन्हें सजा मिलनी चाहिए।”
रिपोर्ट्स के मुताबिक, मंगलवार तड़के पुलिस और अर्धसैनिक बलों की एक बड़ी टुकड़ी बुलडोज़र मशीनों के साथ जम्मू के सिधरा इलाके में आदिवासी गुर्जर समुदाय के मुस्लिम परिवारों की एक बस्ती में पहुंची और इलाके को चारों ओर से घेर लिया।
पिछले सप्ताह जम्मू में गुर्जर समुदाय ने रंधावा के बयानों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था। रंधावा ने दावा किया था कि जम्मू-कश्मीर की शीतकालीन राजधानी जम्मू में 95% जमीन पर कथित तौर पर कश्मीरियों और “एक खास समुदाय” ने अतिक्रमण कर रखा है। जिस इलाके में मंगलवार को तोड़फोड़ की कार्रवाई की गई, वह जम्मू की निचली शिवालिक रेंज के रायका वन क्षेत्र का हिस्सा है।
अधिकारियों ने दावा किया कि इस इलाके में सरकारी जमीन पर कथित तौर पर गैर-कानूनी तरीके से लगभग 20-30 इमारतें बनाई गई थीं, जिनमें कुछ रिहायशी मकान भी शामिल थे। कार्रवाई के दौरान इन्हें गिरा दिया गया और 60 कनाल जमीन खाली कराई गई।
हालांकि, J&K के मंत्री राणा और स्थानीय लोगों ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि प्रभावित परिवार लगभग पांच दशकों से इस इलाके में रह रहे थे।
स्थानीय लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि अधिकारियों ने उनके घरों को गिराने से पहले जरूरी दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया, जिसके कारण वे बेघर हो गए।
सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार, अधिकारियों को रिहायशी घरों को गिराने की अनुमति तब तक नहीं होती, जब तक वे 15 दिन पहले अनिवार्य ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी न करें। यह नोटिस रजिस्टर्ड डाक से भेजा जाना चाहिए और उस संपत्ति पर चस्पा किया जाना चाहिए जिसे तोड़ने के लिए चिन्हित किया गया है।
तोड़फोड़ वाली जगह से मिली तस्वीरों में मलबे के ढेर दिखाई दे रहे हैं, जहां कभी घर हुआ करते थे। वहीं, सदमे में डूबे निवासी अपने कुछ बचे हुए सामान की रखवाली करते दिखाई दिए, जिन्हें वे मंगलवार सुबह बुलडोज़र चलने से पहले बचा सके थे।
एक पीड़ित महिला, जिसका घर तोड़ दिया गया, ने रिपोर्टर से कहा, “मेरी बेटी की शादी जल्द होने वाली है। उसका दहेज का सामान घर के अंदर रखा था। मैं उस समय इबादत कर रही थी। उन्होंने सारा सामान फाड़ दिया और सोफे व अलमारी समेत सब कुछ तोड़ दिया। हम कोई बाहरी लोग नहीं हैं। हम यहां कई दशकों से रह रहे हैं। अब हम कहां जाएंगे?”
जब प्रशासन के इस आरोप के बारे में पूछा गया कि सरकारी जमीन पर कई नए घर बना लिए गए हैं, तो एक अन्य प्रभावित महिला निवासी ने स्वीकार किया कि 1947 में इस इलाके में केवल तीन घर थे।
उन्होंने कहा, “1947 के बाद पूरी दुनिया बदल गई है। क्या इन तीन परिवारों को आगे नहीं बढ़ना चाहिए था? हमारे पास पानी और बिजली के वैध कनेक्शन हैं, लेकिन हमारे घर गिराने से पहले हमें कोई नोटिस तक नहीं दिया गया। यह पूरी तरह गलत है।”
एक रिपोर्ट में एक अज्ञात अधिकारी के हवाले से दावा किया गया कि इस इलाके में “पहले कुछ ही इमारतें थीं, लेकिन अब बड़ी संख्या में अवैध निर्माण हो चुके हैं और नए निर्माण अभी भी जारी हैं।”
यह तोड़फोड़ अभियान आने वाले दिनों में सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस और विपक्षी BJP के बीच राजनीतिक टकराव का मुद्दा बन सकता है और मुस्लिम-बहुल कश्मीर तथा हिंदू-बहुल जम्मू क्षेत्र के बीच की खाई को और गहरा कर सकता है।
इस बीच, J&K RTI मूवमेंट — जो आदिवासी समूहों और नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं का एक गठबंधन है — ने इस तोड़फोड़ अभियान को “मानवीय गरिमा, संवैधानिक अधिकारों और वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत वादा किए गए न्याय की भावना पर हमला” करार दिया है।
गठबंधन की ओर से जारी बयान में कहा गया, “इन परिवारों को बिना किसी हमदर्दी, पुनर्वास या उचित कानूनी प्रक्रिया के बेदखल कर दिया गया। ऐसी खबरें हैं कि घरों को गिराने से पहले पवित्र कुरान और घर का बुनियादी सामान तक नहीं बचाया जा सका। ये खबरें इस अभियान की चौंकाने वाली संवेदनहीनता और अमानवीयता को उजागर करती हैं।”
गठबंधन ने इस तोड़फोड़ अभियान की न्यायिक जांच और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की मांग की है। साथ ही, अधिकारियों से SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत FIR दर्ज करने का आग्रह भी किया गया है।
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