एक अनूठी पहल के तौर पर हाल ही में आयोजित ‘कर्नाटक मुस्लिम कन्वेंशन’ कर्नाटक के मुस्लिम समुदाय के भीतर महीनों चली चर्चाओं का परिणाम है। यह पहल खुद को टकराव के बजाय संवैधानिक दायित्व और लोकतांत्रिक जवाबदेही के निर्वहन के प्रयास के रूप में प्रस्तुत करती है।

Image: ALLEN EGENUSE J / The Hindu
कर्नाटक मुस्लिम कन्वेंशन 16 मई, 2026 को बेंगलुरु के टाउन हॉल में आयोजित किया गया था। इस कन्वेंशन का आयोजन ‘फेडरेशन ऑफ कर्नाटक स्टेट मुस्लिम ऑर्गेनाइजेशन्स’ द्वारा किया गया था। इस कार्यक्रम में पूरे राज्य से लगभग 41 मुस्लिम संगठनों ने हिस्सा लिया। आयोजकों ने जोर देकर कहा कि इस कन्वेंशन में किसी भी राजनीतिक नेता की प्रत्यक्ष राजनीतिक भागीदारी या समर्थन नहीं था, और इसकी योजना पिछले लगभग आठ महीनों से बनाई जा रही थी।
कार्यक्रम की शुरुआत सुहैल अहमद मारूर के औपचारिक संबोधन से हुई, जिन्होंने उपस्थित लोगों के साथ संविधान की प्रस्तावना भी पढ़ी। इसके बाद यासीन मालपे ने कहा कि कर्नाटक के मुसलमानों ने (2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की आबादी का लगभग 13%) 2023 के जनादेश में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने कहा कि समुदाय के भीतर मतदाताओं की भागीदारी सुनिश्चित कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) को सत्ता से बाहर करने में मुस्लिम समुदाय की बड़ी भूमिका रही। अब, मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाला यह कन्वेंशन केवल आश्वासनों नहीं, बल्कि किए गए वादों पर स्पष्ट जवाब चाहता है।
कन्वेंशन की रिपोर्ट, जो औपचारिक रूप से मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, मंत्रियों और विधायकों/विधान पार्षदों को सौंपी गई, में यह भी कहा गया कि यह रिपोर्ट विपक्ष के नेता Rahul Gandhi तक भी पहुंचाई जाएगी। यह कन्वेंशन खुद को टकराव नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी और लोकतांत्रिक जवाबदेही निभाने के प्रयास के रूप में प्रस्तुत करता है।

इस कन्वेंशन का उद्देश्य था:
● 2023 के विधानसभा चुनावों के दौरान और उसके बाद कांग्रेस द्वारा मुसलमानों और अल्पसंख्यकों से किए गए प्रमुख वादों की समीक्षा करना।
● उठाए गए कदमों को स्वीकार करना, लेकिन उनके क्रियान्वयन में रह गई कमियों और लंबित कार्यों को उजागर करना।
● जिन वादों को अभी तक पूरा नहीं किया गया है, उनके लिए समयबद्ध और विश्वसनीय रोडमैप की मांग करना।
● 10 मांगों के माध्यम से कांग्रेस पार्टी को उसके वादों की याद दिलाना और उन पर अमल की मांग करना।
10 प्रमुख वादे / मुद्दे
1. सांप्रदायिक नफरत फैलाने वाले संगठनों के खिलाफ कार्रवाई
● चुनावी घोषणापत्र का वादा: सांप्रदायिक नफरत फैलाने वाले व्यक्तियों और संगठनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई।
● उठाई गई चिंताएं: इस वादे के बावजूद, RSS और उससे जुड़े संगठनों द्वारा बड़े पैमाने पर सार्वजनिक कार्यक्रम, जुलूस और रैलियां आयोजित किए जाने का आरोप लगाया गया, जिनमें मस्जिदों के पास जैसे संवेदनशील इलाके भी शामिल हैं। दूसरी ओर, नागरिक समाज और छात्र समूहों को शांतिपूर्ण सभाओं की अनुमति लेने में अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जिससे प्रशासनिक पक्षपात की धारणा बनती है।
● मांग: आदतन नफरत फैलाने वालों, फेक न्यूज नेटवर्क, मोरल पुलिसिंग, गौ-रक्षा के नाम पर हिंसा, आर्थिक बहिष्कार और संगठित धमकियों के खिलाफ लगातार और स्पष्ट कार्रवाई की जाए।
2. हिजाब पर सरकारी आदेश – आश्वासन बनाम औपचारिक वापसी
● पृष्ठभूमि: 5 फरवरी, 2022 के हिजाब संबंधी सरकारी आदेश को मुस्लिम लड़कियों के लिए अलगाव के सबसे पीड़ादायक प्रतीकों में से एक बताया गया। दिसंबर 2023 में मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि सरकार इस आदेश को वापस लेगी।
● प्रभाव: मानवाधिकार समूहों की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया कि इस नीति के कारण शिक्षा, गरिमा, निजता, अभिव्यक्ति और भेदभाव-रहित व्यवहार के अधिकार प्रभावित हुए। रिपोर्ट के अनुसार, 16–18 वर्ष की 1,010 मुस्लिम लड़कियों ने कॉलेज छोड़ दिया, जिसका एक कारण हिजाब नीति भी थी।
● मई 2026 में यह आदेश वापस ले लिया गया, जिससे स्कूलों और कॉलेजों में हिजाब सहित अन्य धार्मिक प्रतीकों को पहनने की अनुमति मिल गई।
● सवाल: सम्मेलन ने इस फैसले का स्वागत किया, लेकिन यह सवाल भी उठाया कि सरकार को आदेश वापस लेने में लगभग तीन साल क्यों लगे।
3. पशु वध कानून – रद्द करने का वादा बनाम “कोई प्रस्ताव नहीं”
● कानून: कर्नाटक पशु वध रोकथाम और संरक्षण अधिनियम, 2020।
● रिपोर्ट में किसानों, व्यापारियों, कसाइयों, ट्रांसपोर्टरों, चमड़ा उद्योग और मुस्लिम मांस व्यापारियों पर इस कानून के प्रभाव का जिक्र किया गया।
● कांग्रेस ने इस कानून का विरोध किया था और वादा किया था कि BJP शासनकाल के “अन्यायपूर्ण और जन-विरोधी” कानूनों को एक वर्ष के भीतर रद्द किया जाएगा।
● हालांकि, जुलाई 2023 में पशुपालन मंत्री ने कहा कि इस कानून को रद्द करने का कोई प्रस्ताव नहीं है।
● मांग: 2020 के अधिनियम की समीक्षा कर उसे रद्द या संशोधित किया जाए।
4. मुसलमानों/श्रेणी 2B के लिए 4% आरक्षण की बहाली
● मुद्दा: पिछली BJP सरकार ने मुसलमानों (श्रेणी 2B) के लिए 4% OBC आरक्षण समाप्त कर उसे वोक्कालिगा और लिंगायत समुदायों में बांट दिया था।
● 2023 में कांग्रेस नेताओं ने वादा किया था कि सरकार बनते ही पहली कैबिनेट बैठक में यह आरक्षण बहाल किया जाएगा।
● चिंता: यह महत्वपूर्ण वादा अब तक अधूरा है।
● मांग: श्रेणी 2B के लिए 4% आरक्षण को पूर्ण रूप से बहाल किया जाए।
5. धर्म-परिवर्तन विरोधी कानून को रद्द करना
● कानून: कर्नाटक धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का संरक्षण अधिनियम, 2022।
● जून 2023 में कैबिनेट ने इसे रद्द करने का फैसला किया था, लेकिन संबंधित विधेयक कभी पारित नहीं हो पाया।
● रिपोर्ट ने इसे “अधूरा वादा” बताया।
● मांग: विधेयक लाकर कानून को औपचारिक रूप से समाप्त किया जाए।
6. अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए 10,000 करोड़ रुपये की वार्षिक प्रतिबद्धता
● घोषणापत्र का वादा: अल्पसंख्यकों के लिए 10,000 करोड़ रुपये का वार्षिक बजट।
● वर्तमान स्थिति: रिपोर्ट के अनुसार, 2026–27 में केवल 4,762 करोड़ रुपये आवंटित किए गए, जो वादे की गई राशि के आधे से भी कम हैं।
● सकारात्मक कदमों में मौलाना आजाद मॉडल और उर्दू स्कूलों को अपग्रेड करना शामिल है।
● मांग: शिक्षा, आजीविका, छात्रवृत्ति और बुनियादी ढांचे पर ध्यान देते हुए 10,000 करोड़ रुपये के पूर्ण वार्षिक आवंटन की दिशा में बढ़ा जाए।
7. वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा और प्रशासन
● रिपोर्ट में वक्फ प्रशासन में “प्रणालीगत विफलताओं” का जिक्र किया गया, जिनमें अतिक्रमण, अवैध बिक्री, कम कीमत पर पट्टे और कमजोर कानूनी कार्रवाई शामिल हैं।
● ‘UMEED’ डिजिटलीकरण जैसी पहलों को सकारात्मक, लेकिन सीमित कदम बताया गया।
● मांग: वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा, मुकदमों की क्षमता और प्रशासनिक मजबूती को बढ़ाया जाए।
8. आरक्षण की अधिकतम सीमा, जाति सर्वे और सामाजिक न्याय
● रिपोर्ट ने मुस्लिम मुद्दों को व्यापक सामाजिक न्याय के ढांचे से जोड़ा।
● जाति सर्वे का डेटा सार्वजनिक करने और 50% आरक्षण सीमा पर पुनर्विचार की मांग की गई।
● मांग: सामाजिक वास्तविकताओं के अनुसार आरक्षण नीति में सुधार के लिए कानूनी रास्ते खोजे जाएं।
9. शिक्षा – प्रगति, लेकिन अधूरी संरचना
● रिपोर्ट में मौलाना आजाद मॉडल स्कूल, हॉस्टल और छात्रवृत्तियों जैसे कदमों को सकारात्मक बताया गया।
● लेकिन यह भी कहा गया कि अल्पसंख्यक शिक्षा अभी भी बिखरी हुई योजनाओं तक सीमित है।
● मांग: स्कूल से रोजगार तक एक समग्र शिक्षा और मानव संसाधन रणनीति बनाई जाए।
10. स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और मतदान अधिकार
● रिपोर्ट ने वोटर रोल के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक मुद्दा बताया।
● चिंता: बिना पर्याप्त निगरानी के मुस्लिम-बहुल इलाकों में मतदाताओं के नाम हटाए जा सकते हैं।
● मांग: पारदर्शिता, शिकायत निवारण और समयबद्ध सुधार सुनिश्चित किए जाएं।
कन्वेंशन और रिपोर्ट ने अपनी मांगों को स्पष्ट समयसीमा, कानूनी कार्रवाई और बजटीय प्रतिबद्धताओं के साथ पेश किया।
आज इस कन्वेंशन का स्वर टकरावपूर्ण नहीं था। यह संवैधानिक था — एक ऐसा समुदाय, जो सरकार को याद दिला रहा था कि वोट केवल जनादेश नहीं, बल्कि जवाबदेही भी तय करते हैं।
अब सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस जवाब देगी या नहीं। सवाल यह है कि क्या 2028 तक मुस्लिम समुदाय इन्हीं दस जवाबों का इंतजार कर रहा होगा — और उनके साथ नए वादे भी जुड़ चुके होंगे।
क्योंकि अगर यही पैटर्न जारी रहा, तो “स्वीकार्य” नेताओं की अगली पीढ़ी पहले से ही तैयार की जा रही है।
और उसके बाद की पीढ़ी की तैयारी भी शायद चुपचाप जारी है।
(लेखक न्यूज़हैम्स्टर (NH) के एडिटर-इन-चीफ हैं। यह पोर्टल मुख्य रूप से बेंगलुरु और कर्नाटक से जुड़ी खबरों को कवर करता है।)
अस्वीकृति: यहाँ व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं, और यह अनिवार्य रूप से सबरंग इंडिया के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।
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कार्यक्रम की शुरुआत सुहैल अहमद मारूर के औपचारिक संबोधन से हुई, जिन्होंने उपस्थित लोगों के साथ संविधान की प्रस्तावना भी पढ़ी। इसके बाद यासीन मालपे ने कहा कि कर्नाटक के मुसलमानों ने (2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की आबादी का लगभग 13%) 2023 के जनादेश में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने कहा कि समुदाय के भीतर मतदाताओं की भागीदारी सुनिश्चित कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) को सत्ता से बाहर करने में मुस्लिम समुदाय की बड़ी भूमिका रही। अब, मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाला यह कन्वेंशन केवल आश्वासनों नहीं, बल्कि किए गए वादों पर स्पष्ट जवाब चाहता है।
कन्वेंशन की रिपोर्ट, जो औपचारिक रूप से मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, मंत्रियों और विधायकों/विधान पार्षदों को सौंपी गई, में यह भी कहा गया कि यह रिपोर्ट विपक्ष के नेता Rahul Gandhi तक भी पहुंचाई जाएगी। यह कन्वेंशन खुद को टकराव नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी और लोकतांत्रिक जवाबदेही निभाने के प्रयास के रूप में प्रस्तुत करता है।

इस कन्वेंशन का उद्देश्य था:
● 2023 के विधानसभा चुनावों के दौरान और उसके बाद कांग्रेस द्वारा मुसलमानों और अल्पसंख्यकों से किए गए प्रमुख वादों की समीक्षा करना।
● उठाए गए कदमों को स्वीकार करना, लेकिन उनके क्रियान्वयन में रह गई कमियों और लंबित कार्यों को उजागर करना।
● जिन वादों को अभी तक पूरा नहीं किया गया है, उनके लिए समयबद्ध और विश्वसनीय रोडमैप की मांग करना।
● 10 मांगों के माध्यम से कांग्रेस पार्टी को उसके वादों की याद दिलाना और उन पर अमल की मांग करना।
10 प्रमुख वादे / मुद्दे
1. सांप्रदायिक नफरत फैलाने वाले संगठनों के खिलाफ कार्रवाई
● चुनावी घोषणापत्र का वादा: सांप्रदायिक नफरत फैलाने वाले व्यक्तियों और संगठनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई।
● उठाई गई चिंताएं: इस वादे के बावजूद, RSS और उससे जुड़े संगठनों द्वारा बड़े पैमाने पर सार्वजनिक कार्यक्रम, जुलूस और रैलियां आयोजित किए जाने का आरोप लगाया गया, जिनमें मस्जिदों के पास जैसे संवेदनशील इलाके भी शामिल हैं। दूसरी ओर, नागरिक समाज और छात्र समूहों को शांतिपूर्ण सभाओं की अनुमति लेने में अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जिससे प्रशासनिक पक्षपात की धारणा बनती है।
● मांग: आदतन नफरत फैलाने वालों, फेक न्यूज नेटवर्क, मोरल पुलिसिंग, गौ-रक्षा के नाम पर हिंसा, आर्थिक बहिष्कार और संगठित धमकियों के खिलाफ लगातार और स्पष्ट कार्रवाई की जाए।
2. हिजाब पर सरकारी आदेश – आश्वासन बनाम औपचारिक वापसी
● पृष्ठभूमि: 5 फरवरी, 2022 के हिजाब संबंधी सरकारी आदेश को मुस्लिम लड़कियों के लिए अलगाव के सबसे पीड़ादायक प्रतीकों में से एक बताया गया। दिसंबर 2023 में मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि सरकार इस आदेश को वापस लेगी।
● प्रभाव: मानवाधिकार समूहों की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया कि इस नीति के कारण शिक्षा, गरिमा, निजता, अभिव्यक्ति और भेदभाव-रहित व्यवहार के अधिकार प्रभावित हुए। रिपोर्ट के अनुसार, 16–18 वर्ष की 1,010 मुस्लिम लड़कियों ने कॉलेज छोड़ दिया, जिसका एक कारण हिजाब नीति भी थी।
● मई 2026 में यह आदेश वापस ले लिया गया, जिससे स्कूलों और कॉलेजों में हिजाब सहित अन्य धार्मिक प्रतीकों को पहनने की अनुमति मिल गई।
● सवाल: सम्मेलन ने इस फैसले का स्वागत किया, लेकिन यह सवाल भी उठाया कि सरकार को आदेश वापस लेने में लगभग तीन साल क्यों लगे।
3. पशु वध कानून – रद्द करने का वादा बनाम “कोई प्रस्ताव नहीं”
● कानून: कर्नाटक पशु वध रोकथाम और संरक्षण अधिनियम, 2020।
● रिपोर्ट में किसानों, व्यापारियों, कसाइयों, ट्रांसपोर्टरों, चमड़ा उद्योग और मुस्लिम मांस व्यापारियों पर इस कानून के प्रभाव का जिक्र किया गया।
● कांग्रेस ने इस कानून का विरोध किया था और वादा किया था कि BJP शासनकाल के “अन्यायपूर्ण और जन-विरोधी” कानूनों को एक वर्ष के भीतर रद्द किया जाएगा।
● हालांकि, जुलाई 2023 में पशुपालन मंत्री ने कहा कि इस कानून को रद्द करने का कोई प्रस्ताव नहीं है।
● मांग: 2020 के अधिनियम की समीक्षा कर उसे रद्द या संशोधित किया जाए।
4. मुसलमानों/श्रेणी 2B के लिए 4% आरक्षण की बहाली
● मुद्दा: पिछली BJP सरकार ने मुसलमानों (श्रेणी 2B) के लिए 4% OBC आरक्षण समाप्त कर उसे वोक्कालिगा और लिंगायत समुदायों में बांट दिया था।
● 2023 में कांग्रेस नेताओं ने वादा किया था कि सरकार बनते ही पहली कैबिनेट बैठक में यह आरक्षण बहाल किया जाएगा।
● चिंता: यह महत्वपूर्ण वादा अब तक अधूरा है।
● मांग: श्रेणी 2B के लिए 4% आरक्षण को पूर्ण रूप से बहाल किया जाए।
5. धर्म-परिवर्तन विरोधी कानून को रद्द करना
● कानून: कर्नाटक धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का संरक्षण अधिनियम, 2022।
● जून 2023 में कैबिनेट ने इसे रद्द करने का फैसला किया था, लेकिन संबंधित विधेयक कभी पारित नहीं हो पाया।
● रिपोर्ट ने इसे “अधूरा वादा” बताया।
● मांग: विधेयक लाकर कानून को औपचारिक रूप से समाप्त किया जाए।
6. अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए 10,000 करोड़ रुपये की वार्षिक प्रतिबद्धता
● घोषणापत्र का वादा: अल्पसंख्यकों के लिए 10,000 करोड़ रुपये का वार्षिक बजट।
● वर्तमान स्थिति: रिपोर्ट के अनुसार, 2026–27 में केवल 4,762 करोड़ रुपये आवंटित किए गए, जो वादे की गई राशि के आधे से भी कम हैं।
● सकारात्मक कदमों में मौलाना आजाद मॉडल और उर्दू स्कूलों को अपग्रेड करना शामिल है।
● मांग: शिक्षा, आजीविका, छात्रवृत्ति और बुनियादी ढांचे पर ध्यान देते हुए 10,000 करोड़ रुपये के पूर्ण वार्षिक आवंटन की दिशा में बढ़ा जाए।
7. वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा और प्रशासन
● रिपोर्ट में वक्फ प्रशासन में “प्रणालीगत विफलताओं” का जिक्र किया गया, जिनमें अतिक्रमण, अवैध बिक्री, कम कीमत पर पट्टे और कमजोर कानूनी कार्रवाई शामिल हैं।
● ‘UMEED’ डिजिटलीकरण जैसी पहलों को सकारात्मक, लेकिन सीमित कदम बताया गया।
● मांग: वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा, मुकदमों की क्षमता और प्रशासनिक मजबूती को बढ़ाया जाए।
8. आरक्षण की अधिकतम सीमा, जाति सर्वे और सामाजिक न्याय
● रिपोर्ट ने मुस्लिम मुद्दों को व्यापक सामाजिक न्याय के ढांचे से जोड़ा।
● जाति सर्वे का डेटा सार्वजनिक करने और 50% आरक्षण सीमा पर पुनर्विचार की मांग की गई।
● मांग: सामाजिक वास्तविकताओं के अनुसार आरक्षण नीति में सुधार के लिए कानूनी रास्ते खोजे जाएं।
9. शिक्षा – प्रगति, लेकिन अधूरी संरचना
● रिपोर्ट में मौलाना आजाद मॉडल स्कूल, हॉस्टल और छात्रवृत्तियों जैसे कदमों को सकारात्मक बताया गया।
● लेकिन यह भी कहा गया कि अल्पसंख्यक शिक्षा अभी भी बिखरी हुई योजनाओं तक सीमित है।
● मांग: स्कूल से रोजगार तक एक समग्र शिक्षा और मानव संसाधन रणनीति बनाई जाए।
10. स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और मतदान अधिकार
● रिपोर्ट ने वोटर रोल के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक मुद्दा बताया।
● चिंता: बिना पर्याप्त निगरानी के मुस्लिम-बहुल इलाकों में मतदाताओं के नाम हटाए जा सकते हैं।
● मांग: पारदर्शिता, शिकायत निवारण और समयबद्ध सुधार सुनिश्चित किए जाएं।
कन्वेंशन और रिपोर्ट ने अपनी मांगों को स्पष्ट समयसीमा, कानूनी कार्रवाई और बजटीय प्रतिबद्धताओं के साथ पेश किया।
आज इस कन्वेंशन का स्वर टकरावपूर्ण नहीं था। यह संवैधानिक था — एक ऐसा समुदाय, जो सरकार को याद दिला रहा था कि वोट केवल जनादेश नहीं, बल्कि जवाबदेही भी तय करते हैं।
अब सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस जवाब देगी या नहीं। सवाल यह है कि क्या 2028 तक मुस्लिम समुदाय इन्हीं दस जवाबों का इंतजार कर रहा होगा — और उनके साथ नए वादे भी जुड़ चुके होंगे।
क्योंकि अगर यही पैटर्न जारी रहा, तो “स्वीकार्य” नेताओं की अगली पीढ़ी पहले से ही तैयार की जा रही है।
और उसके बाद की पीढ़ी की तैयारी भी शायद चुपचाप जारी है।
(लेखक न्यूज़हैम्स्टर (NH) के एडिटर-इन-चीफ हैं। यह पोर्टल मुख्य रूप से बेंगलुरु और कर्नाटक से जुड़ी खबरों को कवर करता है।)
अस्वीकृति: यहाँ व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं, और यह अनिवार्य रूप से सबरंग इंडिया के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।
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