नीमूचना और तिलाड़ी किसान आंदोलन: 20वीं सदी के ‘राजपूत राज्य’ की पुनर्व्याख्या

Written by Adityakrishna Singh Deora | Published on: June 6, 2026
मई 1925 में वर्तमान राजस्थान के अलवर राज्य के नीमूचना गाँव में प्रदर्शन कर रहे किसानों पर राज्य सेना ने गोली चला दी। पाँच वर्ष बाद, मई 1930 में, टिहरी गढ़वाल राज्य के रवाईँ क्षेत्र के तिलाड़ी सेरा में एक और नरसंहार हुआ। भौगोलिक स्थिति, पारिस्थितिकी और भाषा में भिन्न होने के बावजूद, दोनों आंदोलनों की जड़ें कराधान, वन अधिकारों, परंपरागत अधिकारों तथा औपनिवेशिक काल के उत्तरार्ध में देशी रियासतों की बदलती प्रकृति से उत्पन्न तनावों में थीं।


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हिंदुत्ववादी विमर्श ने हमारी ऐतिहासिक चेतना को राजाओं और वंशों की दुनिया में कैद कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप आधुनिक भारत के किसान और श्रमिक आंदोलनों की सार्वजनिक स्मृति धूमिल होती चली गई है।
तिलाड़ी सेरा उत्तराखंड के उत्तरकाशी ज़िले की बड़कोट तहसील में स्थित एक शांत और हरित ग्राम है। इसके विपरीत, नीमूचना राजस्थान के अलवर ज़िले की बानसूर तहसील का एक गाँव है। लगभग 550 किलोमीटर की दूरी से अलग ये दोनों गाँव भौगोलिक संरचना, जलवायु और आधुनिक विकास के पैटर्न के मामले में एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं। तिलाड़ी सेरा रवाईँ घाटी की हरी-भरी वादियों में लगभग 1220 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है, जबकि नीमूचना अलवर नगर के निकट एक अर्ध-शुष्क क्षेत्र में स्थित है। फिर भी, दोनों स्थानों का इतिहास आश्चर्यजनक समानताएँ प्रस्तुत करता है।

मई 1925 में वर्तमान राजस्थान के अलवर राज्य के नीमूचना गाँव में प्रदर्शन कर रहे किसानों पर राज्य सेना ने गोली चला दी। पाँच वर्ष बाद, मई 1930 में, टिहरी गढ़वाल राज्य के रवाईँ क्षेत्र के तिलाड़ी सेरा में एक और नरसंहार हुआ। भौगोलिक स्थिति, पारिस्थितिकी और भाषा में भिन्न होने के बावजूद, दोनों आंदोलनों की जड़ें कराधान, वन अधिकारों, परंपरागत अधिकारों तथा औपनिवेशिक काल के उत्तरार्ध में देशी रियासतों की बदलती प्रकृति से उत्पन्न तनावों में थीं।
दोनों आंदोलन उन रियासतों में उभरे जिन्हें औपनिवेशिक प्रशासकों ने ‘राजपूत राज्य’ की संज्ञा दी थी और बाद की इतिहास-लेखन परंपरा ने भी उसी रूप में देखना जारी रखा। किंतु दोनों ही मामलों में आंदोलनकारी किसान  मुख्यतः राजपूत थे, जो उन्हीं राज्यों की नीतियों का विरोध कर रहे थे।

अलवर राज्य का नीमूचना आंदोलन

राजस्थान में राजपूत सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था ने एक साथ या क्रमशः तीनों अवस्थाओं का अनुभव किया— एक कुलाधारित गणतंत्रीय संरचना, सामंती राज्य और साम्राज्यवादी सत्ता।
इतिहासकार प्रोफेसर शैल मायराम के अनुसार, राजपूत सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था की सबसे मूल इकाई ‘सहभाजित भाईचारा’ (coparcenary bhaichara) थी, जिसका प्रतिनिधित्व एक खांप (उपवंश) द्वारा किया जाता था और जिसका नेतृत्व एक प्रमुख करता था। (Against History, Against State, पृ. 202)

अलवर राज्य की स्थापना 1775 में कछवाहा वंश की नरूका खांप द्वारा की गई थी। किंतु 1925 के नीमूचना किसान आंदोलन के समय अलवर का शासक और आंदोलनकारी किसान दोनों ही कछवाहा कुल से संबंधित थे।
यह संघर्ष राजस्थान के इतिहास में कोई अपवाद नहीं था। इतिहासकार आर. डब्ल्यू. स्टर्न ने उल्लेख किया है कि 20वीं सदी के प्रारम्भ में जयपुर राज्य ने सीकर के शेखावतों को दबाने तथा उनके प्रमुख राव राजा हरदयाल सिंह को गिरफ्तार करने के लिए सैन्य बल का उपयोग किया था। इस कदम का शेखावतों ने, जो स्वयं कछवाहाओं की एक उपशाखा थे, सशस्त्र प्रतिरोध किया।

Essays on Rajputana में लॉयड रुडोल्फ और सुज़ैन रुडोल्फ लिखते हैं कि तथाकथित ‘राजपूत राज्यों’ के सामने दोहरी चुनौती थी। पहली, उन राजपूत सरदारों और  राजपूत किसानों  की राजनीतिक शक्ति को सीमित करना जिन्होंने इन राज्यों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, किंतु जिन्हें बाद में केंद्रीकृत सत्ता के लिए चुनौती के रूप में देखा जाने लगा। दूसरी, राजा के नेतृत्व में चलने वाली केंद्रीकृत राज्य व्यवस्था को सुदृढ़ करना, जिस पर शिक्षित ब्राह्मण नौकरशाही तथा महाजन वर्ग— विशेषकर बनिया और खत्री अभिजात्य— का बढ़ता प्रभाव था। किसानों और कुलाधारित कृषि संरचनाओं को नियंत्रित करने के प्रयासों ने बार-बार राज्य पुलिस और कृषक समुदायों के बीच टकराव उत्पन्न किए, यहाँ तक कि कई छोटी रियासतों को दमन के लिए औपनिवेशिक हस्तक्षेप का सहारा लेना पड़ा।

अलवर के संदर्भ में इतिहासकार राजेश कुमार लिखते हैं:“1923-24 में अलवर की तीसरी भू-राजस्व व्यवस्था को पंडित एन. एल. टिक्कू द्वारा संशोधित किया गया, जिससे कुल वार्षिक लगान माँग बढ़कर 29,39,112 रुपये हो गई। इस नई व्यवस्था में भूमि राजस्व में 50 प्रतिशत की वृद्धि की गई तथा राजपूत कृषकों को कोई रियायत नहीं दी गई। इसके बजाय उनके बिस्वेदारी अधिकार समाप्त कर दिए गए।”

(Proceedings of the Indian History Congress, खंड 73, 2012, पृ. 794-798)

अक्टूबर 1924 में किसानों ने भूमि कर की बढ़ी हुई दरों को वापस लेने की माँग को लेकर आंदोलन शुरू किया। 1925 की शुरुआत तक बानसूर, थानागाजी, नीमूचना और बामनवास के बिस्वेदार बड़ी संख्या में संगठित होने लगे। नीमूचना के गोविंद सिंह और माधो सिंह के नेतृत्व में उन्होंने अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा से संपर्क किया तथा अपनी शिकायतों को “पुकार” नामक पुस्तिका में प्रकाशित किया।
उनकी प्रमुख माँगों में पुरानी कर दरों की बहाली, बंजर भूमि की नीलामी पर रोक, अलवर-बानसूर मार्ग पर लगाए गए अवरोधों को हटाना, बेगार प्रथा की समाप्ति तथा फसलों को नष्ट करने वाले जंगली पशुओं को मारने की अनुमति शामिल थी।

इसके जवाब में अलवर सरकार ने बिस्वेदारों के अनाज भंडार जब्त करने शुरू कर दिए, जिससे पूरे क्षेत्र के राजपूत कृषकों में भारी रोष फैल गया। इनमें से अनेक किसान प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व सैनिक थे और संभावित संघर्ष की आशंका में हथियार एकत्र करने लगे। उन्होंने नीमूचना में संगठित होना शुरू किया।

14 मई 1925 को नीमूचना को राज्य सेना ने चारों ओर से घेर लिया। सरकारी आँकड़ों के अनुसार 156 किसान मारे गए, जबकि गैर-सरकारी अनुमान इससे कहीं अधिक संख्या बताते हैं। इस घटना के बाद फैले जनाक्रोश ने ब्रिटिश सरकार को अलवर के महाराजा को निर्वासन के लिए बाध्य करने का अवसर दिया, यद्यपि मंत्री एन. एल. टिक्कू की जवाबदेही किस हद तक तय हुई, यह आज भी स्पष्ट नहीं है।

टिहरी गढ़वाल राज्य का तिलाड़ी आंदोलन

उत्तराखंड का क्षेत्र— गढ़वाल और कुमाऊँ— लगभग तेरह शताब्दियों तक तीन प्रमुख राजवंशों के अधीन रहा। इनमें कत्युरी वंश, जो खस मूल का माना जाता है और जिसने आठवीं शताब्दी में पूरे क्षेत्र को एकीकृत किया; गढ़वाल में उसके बाद स्थापित पंवार वंश; तथा कुमाऊँ में उभरा चंद वंश शामिल थे।

राजस्थान के विपरीत, गढ़वाल और कुमाऊँ दोनों राज्यों का निर्माण अनेक पहाड़ी गढ़ों, स्थानीय सरदारियों और कुलाधारित राजनीतिक इकाइयों के क्रमिक एकीकरण से हुआ था।
गोरखा आक्रमण और एंग्लो-गोरखा युद्ध के बाद कुमाऊँ को स्थायी रूप से ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया, जबकि गढ़वाल को ब्रिटिश गढ़वाल और छोटे टिहरी गढ़वाल में विभाजित कर दिया गया। टिहरी गढ़वाल पर पंवार वंश का शासन बना रहा।

राजा कीर्ति शाह की मृत्यु के बाद उनके अल्पवयस्क पुत्र नरेंद्र शाह गद्दी पर बैठे। 1920 के दशक के उत्तरार्ध तक नरेंद्र शाह प्रशासनिक कार्यों से लगभग पूरी तरह दूर होकर यूरोप में रहने लगे थे और शासन की बागडोर उनके दीवान चक्रधर जुयाल के हाथों में आ गई थी।

अनुभवहीन और अनुपस्थित शासक के नाम पर कार्य करते हुए जुयाल प्रशासन ने एक नई राजधानी के निर्माण की महत्वाकांक्षी योजना शुरू की। साथ ही, हिमालयी क्षेत्र में रेलवे विस्तार के कारण ब्रिटिश दबाव भी बढ़ रहा था।
इन परियोजनाओं के वित्तपोषण और संसाधनों पर राज्य नियंत्रण बढ़ाने के लिए रवाईँ क्षेत्र में कई अलोकप्रिय नीतियाँ लागू की गईं। इनमें भेड़-बकरियों पर प्रति पशु एक रुपये का चराई कर, चराई अधिकारों, चारे और ईंधन लकड़ी के संग्रह पर प्रतिबंध, तथा स्थानीय वन-आधारित त्योहारों और परंपरागत अनुष्ठानों पर रोक शामिल थी।

इन नीतियों ने स्थानीय समुदायों की आजीविका और पारंपरिक अधिकारों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया, जिससे टिहरी राज्य के प्रति व्यापक असंतोष पैदा हुआ।

निष्कर्ष

नीमूचना और तिलाड़ी के इतिहास देशी रियासतों की सरल व्याख्याओं को चुनौती देते हैं। वे दिखाते हैं कि औपनिवेशिक काल के उत्तरार्ध में उभरती हुई रियासती राजधानियों के अभिजात वर्ग— राजपरिवार, नौकरशाही अभिजात्य और समृद्ध व्यापारी वर्ग— तथा ग्रामीण कृषक समुदायों, चाहे वे भूमिधर हों या भूमिहीन, के बीच गहरे अंतर्विरोध मौजूद थे।

ये आंदोलन ‘राजपूत राज्य’ जैसी औपनिवेशिक अवधारणाओं की बुनियादी वैधता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। वे बड़े पैमाने पर अशिक्षित राजपूत कृषकों के बढ़ते अलगाव और ब्राह्मण-खत्री नौकरशाही अभिजात्य तथा बनिया पूँजीपति वर्ग के बढ़ते प्रभुत्व को भी उजागर करते हैं।

कराधान, वन अधिकार, परंपरागत अधिकारों और प्रशासनिक केंद्रीकरण से जुड़े प्रश्नों ने बार-बार उन शासक व्यवस्थाओं और उन्हीं समुदायों के बीच संघर्ष पैदा किया, जिनके नाम पर उनकी राजनीतिक वैधता स्थापित की जाती थी।
इन आंदोलनों को पुनः स्मरण करना केवल क्षेत्रीय इतिहास के लिए ही नहीं, बल्कि औपनिवेशिक भारत के उत्तरार्ध में सत्ता की बदलती प्रकृति को समझने के लिए भी आवश्यक है। वे हमें याद दिलाते हैं कि देशी रियासतों की राजनीति को केवल राजवंशों या सांप्रदायिक दृष्टिकोणों के माध्यम से नहीं समझा जा सकता। राजदरबारों और मंत्रिमंडलों की औपचारिक सत्ता के पीछे भूमि, संसाधनों, प्रशासन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर जटिल संघर्ष मौजूद थे— ऐसे संघर्ष, जो आज भी भारतीय इतिहास की मुख्यधारा की स्मृति में पर्याप्त स्थान नहीं पा सके हैं।

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