वाराणसी के हथकरघा बुनकरों का संकट: 10 साल में भारी कमी, 5 हजार से 900 पर पहुंची संख्या

Written by sabrang india | Published on: August 7, 2026
"भाड़े बढ़ने से लागत बढ़ गई है और सामान भी महंगा हो गया है। नक्खीघाट के बुनकर मनोज जायसवाल बताते हैं कि हथकरघा पर साड़ियों के अलावा दुपट्टे, स्टोल, ड्रेस मटेरियल, सिल्क कुर्ता-पायजामा फैब्रिक, होम फर्निशिंग और सजावटी वस्त्र आदि बनाए जाते हैं। अब इनमें से 90 प्रतिशत सामान पावरलूम पर बनते हैं।"


फोटो साभार: अमर उजाला

वाराणसी जिले के हथकरघा बुनकरों के सामने उनके उत्पादों के लिए बाजार की कमी बड़ी चुनौती बन गई है। बाजार न मिलने के कारण बीते दस वर्षों में हथकरघा बुनकरों की संख्या 5,000 से घटकर महज 900 रह गई है। लोहता, बजरडीहा, सरैया, शैलपुत्री, सुजाबाद और रामनगर समेत कई इलाकों में अब गिने-चुने बुनकर ही बचे हैं। ये बुनकर भी आर्थिक तंगी के बीच किसी तरह अपने परिवार का गुजर-बसर कर रहे हैं।

अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, बुनकर दस्तकार मंच के प्रदेश अध्यक्ष इदरीस अंसारी का कहना है कि भाड़े बढ़ने से लागत बढ़ गई है और सामान भी महंगा हो गया है। नक्खीघाट के बुनकर मनोज जायसवाल बताते हैं कि हथकरघा पर साड़ियों के अलावा दुपट्टे, स्टोल, ड्रेस मटेरियल, सिल्क कुर्ता-पायजामा फैब्रिक, होम फर्निशिंग और सजावटी वस्त्र आदि बनाए जाते हैं। अब इनमें से 90 प्रतिशत सामान पावरलूम पर बनते हैं।

इसकी वजह से भी हथकरघा बुनकरों की संख्या कम हो रही है। मदनपुरा के बुनकर वाजिद अंसारी बताते हैं कि हथकरघा के लिए जरूरी कच्चा माल दूसरे राज्यों और विदेशों से मंगाना पड़ता है, जिससे साड़ियों की लागत बढ़ जाती है। वाराणसी में सिंथेटिक धागा मुख्य रूप से सूरत से मंगाया जाता है, जबकि ताना-बाना कर्नाटक और चीन से आता है। कच्चे माल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर तैयार साड़ियों की कीमत पर पड़ता है, जिससे बाजार में उन्हें प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो जाता है।

बजरडीहा के बुनकर आलम अंसारी बताते हैं कि वर्ष 2016 में ताना-बाना करीब 3,000 से 4,000 रुपये प्रति किलोग्राम मिलता था, लेकिन अब इसकी कीमत बढ़कर 8,000 से 10,000 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है। एक सामान्य डिजाइन की साड़ी तैयार करने में करीब 250 से 300 ग्राम ताना-बाना इस्तेमाल होता है। इससे साड़ी की लागत लगभग 12,000 रुपये तक पहुंच जाती है और थोक विक्रेताओं को यह करीब 15,000 रुपये में मिलती है।

वहीं, इसी तरह के डिजाइन वाली गुजरात की साड़ी बाजार में महज 4,000 से 5,000 रुपये में आसानी से उपलब्ध हो जाती है। कीमत में इस बड़े अंतर के कारण वाराणसी की हथकरघा साड़ियों को बाजार में प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो रहा है। बुनकरों का कहना है कि यही वजह हथकरघा कारोबार में लगातार आ रही गिरावट के प्रमुख कारणों में से एक है।

रिपोर्ट के अनुसार, बुनकर नेता इदरीस अंसारी ने बताया कि 20 साल बाद बुनकरों की मांग को सरकार धरातल पर लेकर आई है। रमना में संत कबीर टेक्सटाइल पार्क पर काम चल रहा है। इससे बुनकरों की स्थिति सुधरने की उम्मीद है।

बुनकर सेवा केंद्र के सहायक ऋषिकेश मनोहर देसाई कहते हैं, “बुनकरों के उत्पाद के लिए देशभर में मेले और एग्जिबिशन के माध्यम से उन्हें बाजार उपलब्ध कराया जा रहा है। ओरिजिनल धागों पर राष्ट्रीय हथकरघा विकास निगम की ओर से बुनकरों को 15% तक सब्सिडी दी जा रही है। जिन भी बुनकरों की समस्याएं हैं, वे अपनी शिकायत लिखित में दर्ज कराएं। समाधान होगा।”

हथकरघा दिवस पर शुक्रवार को राष्ट्रपति भवन के सांस्कृतिक केंद्र (आरबीसीसी) में आयोजित समारोह में वाराणसी के टेक्सटाइल डिजाइनर पद्मश्री श्रीभास चंद्र सुपकार काशी का प्रतिनिधित्व करेंगे। विकास आयुक्त (हथकरघा), वस्त्र मंत्रालय की ओर से उन्हें आमंत्रण भेजा गया है। पद्मश्री श्रीभास चंद्र सुपकार ने बताया कि इस समारोह में शामिल होना काशी के लिए गौरव की बात है।

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