“सुरक्षा के नाम पर लाया गया यह संशोधन, पहचान को खुद तय करने से हटाकर सरकार की मंजूरी तक ले आता है, जिससे लोगों को बाहर किए जाने, सरकारी दखल बढ़ने और संविधान में तय की गई गरिमा के कमजोर पड़ने का डर पैदा होता है।”

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ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 हाल में सबसे ज्यादा विवादित विधायी घटनाक्रमों में से एक बनकर उभरा है। ऐसा न केवल अपने मुख्य प्रावधानों के कारण हुआ है बल्कि जिस तरीके से इसे पारित किया गया, उसके कारण भी हुआ है। 'द हिंदू' के अनुसार, यह विधेयक 13 मार्च, 2026 को लोकसभा में पेश किया गया, 24 मार्च को पारित हुआ और ठीक अगले ही दिन राज्यसभा द्वारा ध्वनि मत से मंजूर कर लिया गया। इस तरह, एक ऐसी विधायी प्रक्रिया, जिसमें आमतौर पर काफी सोच-विचार और चर्चा होती है, उसे महज़ कुछ ही दिनों में पूरा कर लिया गया। इस प्रक्रिया की यह तेजी ही अब आलोचना का मुख्य केंद्र बन गई है।
सभी दलों के विपक्षी सांसदों ने बार-बार यह मांग की कि इस विधेयक को किसी स्थायी या प्रवर समिति (Select Committee) के पास भेजा जाए, ताकि हितधारकों- जिनमें ट्रांसजेंडर व्यक्ति, कानूनी विशेषज्ञ और नागरिक समाज संगठन शामिल हैं- के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया जा सके। इन मांगों को बिना किसी ठोस तर्क के खारिज कर दिया गया। नागरिक समाज समूहों ने बाद में यह बात उठाई कि इस विधेयक को 'कार्य-सूची की अनुपूरक सूची' (Supplementary List of Business) के माध्यम से पेश किया गया था, जिससे संसदीय जांच-पड़ताल के लिए उपलब्ध समय काफी सीमित हो गया। राष्ट्रपति को लिखे अपने संयुक्त पत्र में, 'ऑल-इंडिया फेमिनिस्ट अलायंस' (ALIFA) और 'नेशनल अलायंस फॉर जस्टिस, अकाउंटेबिलिटी एंड राइट्स' (NAJAR) ने इस पूरी प्रक्रिया को "अनुचित और अकारण जल्दबाजी" वाला बताया। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार ने न केवल संसदीय परंपराओं की अनदेखी की है, बल्कि 'पूर्व-विधायी परामर्श नीति, 2014' (Pre-Legislative Consultation Policy, 2014) का भी उल्लंघन किया है।


यह विधेयक अब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी का इंतजार कर रहा है। इसी बीच, कानूनी विद्वान, कार्यकर्ता और आम नागरिक राष्ट्रपति से यह आग्रह कर रहे हैं कि वे संविधान के अनुच्छेद 111 के तहत प्राप्त अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए इस विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दें।
मुख्य कानूनी बदलाव: खुद की पहचान से लेकर सरकारी मान्यता तक
इस संशोधन के मूल में एक ऐसा मौलिक बदलाव शामिल है, जो भारतीय कानून में 'लैंगिक पहचान' (Gender Identity) की अवधारणा को ही बदल देता है। 'ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019' की नींव उस संवैधानिक आधार पर रखी गई थी, जो 'NALSA बनाम भारत संघ' (NALSA v. Union of India) मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित किया गया था। उस फैसले में, सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना था कि अपनी लैंगिक पहचान स्वयं निर्धारित करने का अधिकार, किसी भी व्यक्ति की गरिमा, स्वायत्तता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक अभिन्न अंग है। इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया था कि किसी व्यक्ति की लैंगिक पहचान, किसी भी प्रकार की चिकित्सीय प्रक्रियाओं या बाहरी सत्यापन पर निर्भर नहीं होती; बल्कि यह व्यक्ति के अपने अंतर्मन में महसूस की गई 'स्वयं की भावना' पर आधारित होती है।
वर्ष 2026 का यह संशोधन, उस मूल ढांचे से पूरी तरह से अलग हटकर है। "खुद की लैंगिक पहचान" (self-perceived gender identity) के प्रावधान को हटाकर, यह अधिकारों पर आधारित दृष्टिकोण की जगह एक प्रमाणन व्यवस्था ले आता है। इस व्यवस्था के तहत, जो लोग ट्रांसजेंडर के रूप में पहचान चाहते हैं, उन्हें एक नामित मेडिकल बोर्ड द्वारा जांच से गुजरना होगा। इस बोर्ड की सिफारिश की जांच फिर एक जिला मजिस्ट्रेट द्वारा की जाती है, जो अंततः यह तय करता है कि पहचान का प्रमाण पत्र जारी किया जाए या नहीं।
हालांकि सरकार ने इस व्यवस्था का बचाव करते हुए इसे प्रशासनिक स्पष्टता और कल्याणकारी लाभ की लक्षित डिलीवरी के लिए जरूरी बताया है, लेकिन हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, कई लोगों का तर्क है कि यह प्रभावी रूप से राज्य को पहचान को प्रमाणित करने की स्थिति में ला देता है। यह बदलाव केवल प्रक्रियात्मक नहीं है बल्कि यह कानून के दार्शनिक आधार को बदल देता है, यानी पहचान से विनियमन की ओर बढ़ता है। चिंता की बात यह है कि पहचान, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वायत्तता के एक पहलू के रूप में माना था, अब उसे ऐसी चीज के रूप में फिर से परिभाषित किया जा रहा है जिसे सत्यापित, मापा और अनुमोदित किया जाना चाहिए।
ट्रांसजेंडर पहचान को फिर से परिभाषित करना: शामिल करना, बाहर करना और कानूनी तौर पर मिटा देना
यह संशोधन "ट्रांसजेंडर व्यक्ति" की एक संकीर्ण परिभाषा भी पेश करता है, जिसके कानून के तहत किसे मान्यता मिलेगी, इस पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ते हैं। इसमें इंटरसेक्स विभिन्नताओं या यौन विशेषताओं में जन्मजात अंतर वाले व्यक्तियों के साथ-साथ हिजड़ा, किन्नर, अरावनी और जोगता जैसे कुछ मान्यता प्राप्त सामाजिक-सांस्कृतिक समुदायों से संबंधित व्यक्तियों को शामिल किया गया है। हालांकि, यह स्पष्ट रूप से उन व्यक्तियों को बाहर करता है जिनकी पहचान पूरी तरह से खुद की पहचान पर आधारित है।
इस परिभाषा में किए गए बदलाव की काफी आलोचना हुई है, क्योंकि इसे लोगों को बाहर रखने वाला माना गया है। कार्यकर्ताओं और विद्वानों का तर्क है कि इससे ट्रांसजेंडर समुदाय के बड़े वर्गों के मिट जाने का खतरा है, जिसमें ट्रांस पुरुष, नॉन-बाइनरी इंडिविजुअल और वे लोग शामिल हैं जो पारंपरिक सामुदायिक संरचनाओं से संबंधित नहीं हैं। मीडिया रिपोर्टों ने बताया है कि यह संशोधन प्रभावी रूप से मान्यता को उन लोगों तक सीमित कर देता है जो या तो जैविक संकेतक प्रदर्शित कर सकते हैं या विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों के साथ तालमेल बिठा सकते हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया।
इसके असर सिर्फ़ प्रतीकात्मक नहीं हैं। कानूनी मान्यता ही अधिकारों, कल्याणकारी योजनाओं और सुरक्षा तक पहुंचने का दरवाजा है। परिभाषा को सीमित करके, यह कानून कई व्यक्तियों को उन लाभ के लिए अयोग्य बना सकता है, जिनके वे 2019 के ढांचे के तहत पहले हकदार थे। इससे यह डर पैदा हो गया है कि यह संशोधन ट्रांसजेंडर समुदाय के भीतर एक ऊंच-नीच का क्रम बना सकता है, जिसमें कुछ पहचानों को विशेषाधिकार दिया जाएगा, जबकि दूसरों को बाहर कर दिया जाएगा।
दंडात्मक प्रावधान और अपराधीकरण का सवाल
संशोधन का एक और महत्वपूर्ण पहलू नए दंडात्मक प्रावधानों की शुरुआत है, जिसमें किसी को ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए "उकसाने" या "मजबूर करने" से जुड़े अपराध शामिल हैं। सरकार ने इन प्रावधानों को आवश्यक सुरक्षा उपायों के रूप में सही ठहराया है, विशेष रूप से नाबालिगों को जबरदस्ती और शोषण से बचाने के लिए। इसने इस बात पर भी जोर दिया है कि यह कानून अपराधों की गंभीरता को दर्शाने के लिए अलग-अलग स्तर के दंडों की शुरुआत करता है।
हालांकि, इन प्रावधानों की भाषा अस्पष्ट और संभावित रूप से बहुत व्यापक है, क्योंकि ऐसे खंड अनजाने में उन सहायता प्रणालियों को अपराधी बना सकते हैं, जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से ट्रांसजेंडर समुदायों को सहारा दिया है- जिनमें परिवार, चुने हुए रिश्तेदार और नागरिक समाज संगठन शामिल हैं। चिंता इस बात की है कि ट्रांसजेंडर पहचान को उकसाने या जबरदस्ती के संदर्भ में पेश करके, यह कानून इस विचार को मजबूत करने का जोखिम उठाता है कि ऐसी पहचानें खुद से पैदा नहीं होतीं, बल्कि बाहर से थोपी जाती हैं।
यह चिंता विशेष रूप से ऐसे सामाजिक संदर्भ में ज्यादा गहरी है, जहां ट्रांसजेंडर व्यक्ति अक्सर अपने गुजारे और सहारे के लिए अनौपचारिक नेटवर्क पर निर्भर रहते हैं। डर यह है कि ये नेटवर्क कानूनी जांच के दायरे में आ सकते हैं, जिससे पहले से ही कमजोर इस समुदाय का और भी ज्यादा हाशिए पर जाना तय हो सकता है।
सरकार का पक्ष: कल्याण, स्पष्टता और नियंत्रण
केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र कुमार ने लगातार इस विधेयक का बचाव करते हुए इसे ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए न्याय और सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक आवश्यक कदम बताया है। सरकार के अनुसार, इन संशोधनों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कल्याणकारी लाभ उन लोगों तक पहुंचें, जिन्हें वास्तव में उनकी जरूरत है और स्पष्ट मानदंडों की कमी के कारण उनका दुरुपयोग न हो। जैविक और सत्यापित किए जा सकने वाले संकेतों पर जोर देने को, व्यवस्था में प्रशासनिक स्पष्टता लाने के एक तरीके के रूप में पेश किया गया है।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, सत्ताधारी दल के कई सांसदों ने संसदीय बहसों के दौरान इसी तर्क को दोहराया और इस संभावना पर चिंता जताई कि कुछ व्यक्ति लाभ पाने के लिए झूठी ट्रांसजेंडर पहचान का दावा कर सकते हैं। सरकार ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के कल्याण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के प्रमाण के तौर पर अपनी व्यापक पहलों- जैसे जागरूकता कार्यक्रम, रोजगार मेले और हेल्पलाइन- का भी जिक्र किया है।
फिर भी, ये तर्क केंद्रीय संवैधानिक मुद्दे का समाधान करने में विफल रहते हैं कि क्या राज्य पहचान की मान्यता को ऐसी सत्यापन प्रक्रियाओं पर निर्भर कर सकता है, जो स्वायत्तता और गरिमा को कमजोर करती हैं?
विरोध और संवैधानिक चुनौती: अधिकार, गरिमा और न्यायिक मिसाल
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 पर संसदीय बहस में विपक्षी दलों की ओर से एक असामान्य रूप से एकजुट और जबर्दस्त प्रतिक्रिया देखने को मिली, उन्होंने अपनी आपत्तियों को केवल राजनीतिक नजरिए से ही नहीं, बल्कि एक संवैधानिक सिद्धांत के मामले के तौर पर पेश किया। द हिंदू के अनुसार, कांग्रेस, DMK, AITC, SP, RJD, AAP, CPI(M), BJD और अन्य दलों सहित सभी पार्टियों के सांसदों ने लगातार यह तर्क दिया कि यह विधेयक पिछले एक दशक में स्थापित अधिकार-आधारित ढांचे से एक मौलिक भटकाव है और इसमें समानता, गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मूल गारंटियों का उल्लंघन होने का जोखिम है।
इस आलोचना के केंद्र में 'खुद की पहचान के अधिकार' को हटाना है, यानी एक ऐसा सिद्धांत जिसे सुप्रीम कोर्ट ने NALSA बनाम भारत संघ मामले में मजबूती से मान्यता दी थी। विपक्षी सांसदों ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि यह फैसला केवल घोषणात्मक नहीं, बल्कि परिवर्तनकारी था- इसने लैंगिक पहचान को स्वायत्तता के दायरे में रखा और यह माना कि व्यक्तियों को बिना किसी चिकित्सीय या नौकरशाही सत्यापन के अपनी लैंगिक पहचान खुद ही निर्धारित करने का अधिकार है। उन्होंने तर्क दिया कि इस ढांचे को चिकित्सीय प्रमाणन और प्रशासनिक मंजूरी की प्रणाली से बदलकर, यह संशोधन प्रभावी रूप से एक स्थापित संवैधानिक स्थिति को उलट देता है।
हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, DMK सांसद तिरुचि शिवा ने इस चिंता को विशेष रूप से कड़े शब्दों में व्यक्त किया, उन्होंने राज्यसभा में चेतावनी दी कि भले ही यह विधेयक संसद से पारित हो जाए, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 का उल्लंघन करने के कारण सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसे संभवतः रद्द कर दिया जाएगा। उनका यह हस्तक्षेप एक व्यापक आशंका को दर्शाता है कि यह संशोधन न केवल विवादास्पद है, बल्कि संवैधानिक रूप से भी कमजोर है। विपक्ष में कई लोगों के लिए, यह मुद्दा नीतिगत असहमति का नहीं, बल्कि उन क्षेत्रों में विधायी अतिक्रमण का है जो पहले से ही न्यायिक व्याख्या द्वारा संरक्षित हैं।
इस संवैधानिक ढांचे की गूंज कई सांसदों की बातों में सुनाई दी, जिन्होंने अनुच्छेद 14 और 15 के तहत समानता और गैर-भेदभाव को लेकर चिंताएं जताईं। उन्होंने तर्क दिया कि "ट्रांसजेंडर व्यक्ति" की परिभाषा को सीमित करके और उन लोगों को बाहर करके जो अपनी पहचान अपनी खुद की समझ के आधार पर करते हैं, यह कानून समुदाय के भीतर ही एक मनमानी श्रेणी बना देता है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ऐसी श्रेणी, जिसका सुरक्षा के घोषित उद्देश्य से कोई स्पष्ट और तर्कसंगत संबंध नहीं है, अनुच्छेद 14 के तहत 'उचित वर्गीकरण' की कसौटी पर खरी नहीं उतर सकती। इसके अलावा, पहचान को मेडिकल मानदंडों से जोड़कर, यह कानून उन व्यक्तियों के साथ भेदभाव का जोखिम पैदा करता है जो ऐसी प्रक्रियाओं से गुजर नहीं सकते या गुजरना नहीं चाहते. इस तरह यह परोक्ष रूप से लैंगिक अभिव्यक्ति के कुछ रूपों को दंडित करता है।


अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा से जुड़ी चिंताएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, संदीप पाठक और प्रियंका चतुर्वेदी जैसे सांसदों ने इस तर्क पर सवाल उठाया कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को- सिसजेंडर (cisgender) पुरुषों और महिलाओं के विपरीत- अपनी पहचान की मान्यता के लिए मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होने की आवश्यकता क्यों है। उन्होंने तर्क दिया कि यह भेदभावपूर्ण व्यवहार न केवल समानता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है, बल्कि व्यक्ति के अस्तित्व के सबसे निजी पहलुओं में भी दखल देता है। इस दृष्टिकोण से, लैंगिक पहचान कोई ऐसा तथ्य नहीं है जिसकी पुष्टि की जाए, बल्कि यह एक ऐसा अनुभव है जिसका सम्मान किया जाना चाहिए। इस प्रकार, प्रमाणन की आवश्यकता पहचान के एक अत्यंत निजी पहलू को एक प्रशासनिक बाधा में बदल देती है, जिससे गरिमा, स्वायत्तता और शारीरिक अखंडता को लेकर चिंताएं पैदा होती हैं।
इस बहस में निजता के अधिकार का भी जिक्र हुआ, विशेष रूप से के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के संदर्भ में। विपक्षी सांसदों ने तर्क दिया कि मेडिकल जांच की प्रक्रिया और राज्य के अधिकारियों को संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी का संभावित खुलासा, निजता में एक अनुचित दखल हो सकता है। डेटा सुरक्षा, गोपनीयता और उद्देश्य की सीमा के संबंध में स्पष्ट सुरक्षा उपायों का अभाव इन चिंताओं को और भी गहरा कर देता है। एक ऐसे संवैधानिक ढांचे में जो निजता को गरिमा और स्वायत्तता का एक आंतरिक हिस्सा मानता है, ऐसे प्रावधानों को कड़ी न्यायिक जांच का सामना करना पड़ सकता है।

विपक्ष की आलोचना का एक और पहलू संशोधन द्वारा पेश किए गए दंडात्मक प्रावधानों पर केंद्रित था। सांसदों ने ट्रांसजेंडर पहचान के संबंध में "प्रलोभन" या "प्रभाव" जैसे अपराधों को परिभाषित करने के लिए इस्तेमाल की गई अस्पष्ट और व्यापक भाषा को लेकर चिंताएं जताईं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ऐसी आशंका है कि इन प्रावधानों का दुरुपयोग उन परिवारों, सामुदायिक नेटवर्क, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और नागरिक समाज संगठनों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है जो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का समर्थन करते हैं। इससे व्यापकता और अस्पष्टता का एक क्लासिक संवैधानिक मुद्दा उठता है - क्या कोई कानून, किसी वैध चिंता को दूर करने की कोशिश में, अपने दायरे को इतना व्यापक कर देता है कि वह संरक्षित आचरण को भी अपने दायरे में ले लेता है और वैध गतिविधि पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।
बहस के दौरान एक मजबूत शिकायत निवारण तंत्र की कमी को भी उजागर किया गया। सांसदों ने इस बात की ओर इशारा किया कि मौजूदा 2019 के कानून के तहत ट्रांसजेंडर सर्टिफिकेशन के लिए हजारों आवेदन पहले ही खारिज किए जा चुके हैं और इन आवेदनों को खारिज करने के आधार या अपील के रास्तों के बारे में बहुत कम स्पष्टता है। हिंदुस्तान टाइम्स ने इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया है। मेडिकल बोर्ड और जिला अधिकारियों की भूमिका को मजबूत करके, लेकिन साथ ही जवाबदेही और पारदर्शिता को न बढ़ाकर, यह संशोधन मनमानी को संस्थागत रूप देने का जोखिम पैदा करता है। यह चिंता सीधे तौर पर राज्य की मनमानी कार्रवाई के खिलाफ संवैधानिक गारंटी से जुड़ी है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 14 के तहत शामिल माना है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि विपक्षी नेताओं ने भी इस बिल को विधायी और कार्यकारी कार्रवाई के एक व्यापक पैटर्न के संदर्भ में देखा। कुछ सांसदों ने तर्क दिया कि यह संशोधन मौलिक अधिकारों के ऊपर प्रशासनिक सुविधा को प्राथमिकता देने की बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाता है और हाशिए पर पड़े समुदायों को अधिकारों के धारक मानने के बजाय, उन्हें केवल नियमों के अधीन मानने की प्रवृत्ति को दिखाता है (द हिंदू)। यह आलोचना केवल ट्रांसजेंडर के संदर्भ तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अधिकारों पर आधारित शासन व्यवस्था के कमजोर पड़ने को लेकर एक व्यापक संवैधानिक चिंता को भी जाहिर करती है।
संसद के बाहर, राजनीतिक नेताओं ने सार्वजनिक बयानों में इन चिंताओं को और मजबूती से उठाया। कांग्रेस सांसद और विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस बिल को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के संवैधानिक अधिकारों और पहचान पर एक "बेशर्मी भरा हमला" बताया, उन्होंने तर्क दिया कि यह बिल व्यक्तियों से अपनी पहचान खुद तय करने की क्षमता छीन लेता है और उन्हें अमानवीय जांच-पड़ताल के अधीन कर देता है। इस तरह के हस्तक्षेप यह संकेत देते हैं कि इस बिल की संवैधानिक आलोचना केवल विधायी बहस तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह अधिकारों और शासन व्यवस्था पर चल रही एक व्यापक राजनीतिक चर्चा का भी हिस्सा है।

कई लोगों ने इस बिल के प्रति अपनी असहमति जताने के लिए सोशल मीडिया का भी सहारा लिया।





आखिरकार, विपक्ष के रुख से एक सुसंगत संवैधानिक तर्क उभरता है, कि यह संशोधन समानता, गरिमा, स्वायत्तता और निजता के उन सिद्धांतों को कमजोर करता है, जो भारत के मौलिक अधिकारों के ढांचे का मूल हैं। NALSA बनाम भारत संघ मामले में स्थापित न्यायशास्त्र से हटकर और K.S. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ मामले में मान्यता प्राप्त निजता सुरक्षाओं के संभावित टकराव के कारण, यह कानून एक अपरिहार्य न्यायिक टकराव की जमीन तैयार करता है।
संस्थागत असहमति: इस्तीफे और न्यायिक चिंता
संसदीय विरोध और सड़क-स्तर के प्रदर्शनों से परे, ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 से जुड़े विवाद का सबसे उल्लेखनीय पहलू स्वयं संस्थागत ढांचों के भीतर से उभरती असहमति रही है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल वैचारिक असहमति को ही नहीं, बल्कि उन निकायों के भीतर विश्वास के टूटने को भी दर्शाता है, जिन्हें विशेष रूप से ट्रांसजेंडर अधिकारों का प्रतिनिधित्व करने, उन पर सलाह देने और उनकी रक्षा करने के लिए बनाया गया था।

इस संस्थागत बेचैनी का एक विशेष रूप से स्पष्ट उदाहरण राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति परिषद (NCTP) के दो सदस्यों- ऋतुपर्णा नियोग और कल्कि सुब्रमण्यम- के इस्तीफे के रूप में सामने आया, जो संसद में बिल पारित होने के तुरंत बाद दिए गए थे। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया। NCTP, जो 2019 के अधिनियम के तहत गठित एक वैधानिक निकाय है, को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को प्रभावित करने वाली नीतियों पर सरकार को सलाह देने और यह सुनिश्चित करने का कार्य सौंपा गया है कि समुदाय की चिंताओं का शासन प्रक्रियाओं के भीतर सार्थक रूप से प्रतिनिधित्व हो। इसलिए, ये इस्तीफे केवल विरोध के प्रतीकात्मक कार्य नहीं हैं, वे इस बारे में गहरे सवाल उठाते हैं कि क्या कानून में निर्मित परामर्श तंत्र वास्तव में काम कर रहे हैं या नहीं।

अपने इस्तीफा पत्रों में, दोनों सदस्यों ने पद छोड़ने के मुख्य कारण के रूप में परामर्श के अभाव का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया। ऋतुपर्णा नियोग ने कहा कि "समुदाय की आवाज" के रूप में मंत्रालय के साथ जुड़ने के प्रयास अनसुने रह गए, जिससे यह संकेत मिलता है कि संवाद के संस्थागत माध्यमों को प्रभावी ढंग से दरकिनार कर दिया गया था। कल्कि सुब्रमण्यम ने इससे भी आगे बढ़कर कहा कि ऐसी स्थिति में परिषद में उनकी निरंतर उपस्थिति असहनीय है, जहां समुदाय की "सामूहिक आवाज" को खामोश कर दिया गया हो। उनका इस्तीफा एक मौलिक विरोधाभास को रेखांकित करता है: एक ऐसा निकाय जिसे ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करने के लिए डिजाइन किया गया था, उससे न तो परामर्श किया गया और न ही उसे उस कानून को आकार देने में सार्थक रूप से शामिल किया गया, जो सीधे तौर पर उनकी कानूनी स्थिति को बदलता है। इन इस्तीफों को NCTP सदस्यों द्वारा बिल पास होने से पहले सरकार के साथ बातचीत करने की पिछली कोशिशों के संदर्भ में भी समझा जाना चाहिए। रिपोर्टों से पता चलता है कि समुदाय के प्रतिनिधियों ने मंत्रालय के अधिकारियों के साथ बैठकों में जोर देकर कहा था कि खुद की पहचान- जिसे सुप्रीम कोर्ट ने मान्यता दी है- लिंग पहचान का आधार बनी रहनी चाहिए। उन्होंने "ट्रांसजेंडर व्यक्ति" की प्रस्तावित परिभाषा, मेडिकल बोर्डों की शुरुआत और संभावित रूप से दखल देने वाली सत्यापन प्रक्रियाओं के बारे में भी चिंताएं उठाईं। इन हस्तक्षेपों के बावजूद, ऐसा लगता है कि अंतिम कानून में इनमें से किसी भी सुझाव को शामिल नहीं किया गया है, जिससे यह धारणा और मजबूत होती है कि परामर्श केवल प्रक्रियात्मक था, न कि वास्तविक। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया।
सरकारी ढांचे के अंदर से हो रहे इस विरोध के साथ-साथ, न्यायपालिका की तरफ से भी एक बड़ी चिंता सामने आई है- खास तौर पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई एक सलाहकार समिति से, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस आशा मेनन कर रही हैं। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रांसजेंडर अधिकारों के कार्यान्वयन की जांच करने और सुधारों की सिफारिश करने के लिए गठित किए गए इस समिति ने कथित तौर पर सरकार को पत्र लिखकर बिल वापस लेने का आग्रह किया। इसका हस्तक्षेप विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि यह मौजूदा संवैधानिक सिद्धांतों के साथ कानून की अनुकूलता का एक अर्ध-न्यायिक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है।
समिति की चिंताएं वास्तविक और संरचनात्मक दोनों हैं। इसके मूल में लिंग पहचान की कानूनी मान्यता के आधार के रूप में खुद की पहचान को हटाना है। समिति ने टिप्पणी की कि पहचान को जैविक विशेषताओं या चिकित्सा प्रक्रियाओं से जोड़कर, यह संशोधन उन व्यक्तियों को बाहर करने का जोखिम उठाता है जो खुद को ट्रांसजेंडर के रूप में पहचानते हैं लेकिन इन मानदंडों को पूरा नहीं करते हैं। इसके परिणामस्वरूप, पहचान दस्तावेजों, कल्याणकारी योजनाओं और कानूनी सुरक्षा तक पहुंच सीमित हो सकती है जिससे समुदाय के कुछ वर्ग कानून की नजर में प्रभावी रूप से अदृश्य हो सकते हैं (बार एंड बेंच)।
समिति की गोपनीयता से जुड़ी चिंताएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। संशोधन की यह शर्त कि लिंग-पुष्टि प्रक्रियाओं (gender-affirming procedures) का विवरण जिला अधिकारियों के साथ साझा किया जा सकता है, गोपनीयता और शारीरिक स्वायत्तता के बारे में गंभीर सवाल खड़े करती है। एक ऐसे कानूनी परिदृश्य में, जिसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा गोपनीयता को एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने से आकार मिला है, ऐसे प्रावधानों को संभावित रूप से दखल देने वाला और बिना स्पष्ट औचित्य के माना जाता है। 'बार एंड बेंच' के अनुसार, समिति ने कथित तौर पर यह टिप्पणी की कि ऐसे डेटा संग्रह का उद्देश्य अस्पष्ट बना हुआ है, जिससे निगरानी और दुरुपयोग के बारे में आशंकाएं और बढ़ गई हैं।
सलाहकार निकाय ने नए दंडात्मक प्रावधानों को लागू करने की आवश्यकता पर भी सवाल उठाया, यह बताते हुए कि संशोधन में उल्लिखित कई अपराध पहले से ही मौजूदा आपराधिक कानूनों के अंतर्गत आते हैं। यह विधायी दोहराव और इस संभावना के बारे में एक व्यापक चिंता पैदा करता है कि नए प्रावधानों का इस्तेमाल ऐसे तरीकों से किया जा सकता है जो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों या उनके सहायता नेटवर्क को असमान रूप से प्रभावित करते हैं। इन दोहरावों को उजागर करके, समिति परोक्ष रूप से इस तर्क को चुनौती देती है कि कानूनी कमियों को भरने के लिए संशोधन की आवश्यकता है।
शायद समिति के हस्तक्षेप का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसकी परोक्ष संवैधानिक चेतावनी है। खुद की पहचान (self-identification) को हटाने की बात को उठाते हुए, समिति NALSA बनाम भारत संघ मामले में निर्धारित सिद्धांतों के साथ संभावित टकराव की ओर ध्यान आकर्षित करती है; इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह पुष्टि की थी कि लिंग पहचान व्यक्तिगत स्वायत्तता और स्व-निर्धारण का विषय है। इससे इस बात की संभावना पैदा होती है कि यह संशोधन, एक बार लागू होने के बाद, स्थापित संवैधानिक न्यायशास्त्र का उल्लंघन करने के लिए न्यायिक जांच का सामना कर सकता है।
नागरिक समाज और समुदाय की आवाज: कानून और वास्तविक जीवन का मेल
यदि संसद में 'ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026' पर औपचारिक बहस दिखी, तो नागरिक समाज और समुदाय की प्रतिक्रियाओं में ही इस कानून के गहरे निहितार्थ स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। पूरे देश में, विभिन्न प्रकार के समूहों- जैसे ट्रांसजेंडर समूह, क्वीयर अधिकार समूह, नारीवादी गठबंधन, अभिभावकों के नेटवर्क, कानूनी पैरोकार और स्वतंत्र कार्यकर्ता- ने एक बहुआयामी आलोचना प्रस्तुत की है, यह आलोचना केवल सैद्धांतिक मतभेदों तक सीमित न रहकर, वास्तविक जीवन के अनुभवों, संरचनात्मक बहिष्कार और रोजमर्रा की असुरक्षाओं को प्रमुखता से सामने रखती है।
सबसे सुसंगठित हस्तक्षेपों में से कुछ 'ऑल-इंडिया फेमिनिस्ट अलायंस' (ALIFA) और 'नेशनल अलायंस फॉर जस्टिस, अकाउंटेबिलिटी एंड राइट्स' (NAJAR) जैसे गठबंधनों की ओर से आए हैं, इन गठबंधनों ने औपचारिक रूप से राष्ट्रपति को पत्र लिखकर विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस भेजने का आग्रह किया है। उनकी आलोचना का दायरा केवल संशोधनों के मूल विषय तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह कानून बनाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाता है। उनका तर्क है कि यह बिल बिना किसी सार्थक परामर्श के, 'प्री-लेजिस्लेटिव कंसल्टेशन पॉलिसी, 2014' का उल्लंघन करते हुए जल्दबाजी में पास किया गया, और वे इसके पास होने को "अनुचित और बेवजह की जल्दबाजी" से भरा बताते हैं। मूल रूप से, उनकी चिंताएं 'खुद की पहचान' (self-identification) को हटाने, मेडिकल सर्टिफिकेशन को अनिवार्य करने, और अस्पष्ट दंडात्मक प्रावधानों को लागू करने पर केंद्रित हैं- उनका तर्क है कि ये सभी कदम अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मिले संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करते हैं।
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इन संस्थागत हस्तक्षेपों के समानांतर, परिवारों और सहायता समूहों (support networks) से भी व्यक्तिगत प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। 'स्वीकार' (Sweekar) नामक समूह- जिसमें LGBTQIA+ समुदाय के लोगों के माता-पिता शामिल हैं- ने इस संशोधन को देखभाल और वास्तविक जीवन के अनुभवों के नजरिए से देखा है। उनकी सार्वजनिक अपील इस बात पर जोर देती है कि कैसे यह कानून पहचान को जांच-पड़ताल का विषय बना देता है और लोगों को मेडिकल बोर्डों तथा प्रशासनिक अधिकारियों के सामने अपने लिंग को "साबित" करने के लिए मजबूर करता है। उन परिवारों के लिए, जिन्होंने सामाजिक कलंक का सामना करते हुए भी अपने बच्चों का साथ देने के लिए संघर्ष किया है, यह नई शर्त एक तरह के 'सरकार द्वारा पैदा किया गया शक' (state-imposed doubt) जैसी महसूस होती है- एक ऐसा शक जो, स्वीकार्यता और अपनेपन की उन नाजुक प्रक्रियाओं को खत्म कर देने का जोखिम पैदा करता है, जिन्हें उन्होंने बड़ी मुश्किल से स्थापित किया था।
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नागरिक समाज (civil society) की प्रतिक्रियाओं में बार-बार उठने वाली एक चिंता, पहुंच (access) और असमानता का मुद्दा है। कार्यकर्ताओं ने यह बात उठाई है कि मेडिकल जांच (verification) की शर्त यह मानकर चलती है कि लोगों के पास स्वास्थ्य सेवाओं, आर्थिक संसाधनों और सरकारी प्रशासनिक व्यवस्थाओं तक पहुंच उपलब्ध है- लेकिन ये ऐसी स्थितियां हैं जो वर्ग, जाति और भौगोलिक आधार पर लोगों के बीच असमान रूप से बंटी हुई हैं। कई ट्रांसजेंडर लोगों के लिए- विशेषकर जो ग्रामीण इलाकों या आर्थिक रूप से पिछड़े परिवेश में रहते हैं- किसी मेडिकल बोर्ड और जिला प्रशासन की प्रक्रियाओं से गुजर पाना व्यावहारिक रूप से असंभव हो सकता है। इस लिहाज़ से, यह कानून लोगों को मुख्यधारा से बाहर करने (exclusion) का जोखिम पैदा करता है- और ऐसा यह किसी स्पष्ट इनकार के जरिए नहीं, बल्कि ऐसी प्रक्रियागत बाधाओं के जरिए करता है, जो पहचान की मान्यता को ही लोगों की पहुंच से बाहर कर देती हैं।
आलोचना का एक और मुख्य पहलू इस बात से जुड़ा है कि यह कानून मौजूदा सामुदायिक सहायता ढांचों पर क्या असर डालेगा। भारत में ट्रांसजेंडर समुदाय ऐतिहासिक रूप से, व्यवस्थागत बहिष्कार का सामना करते हुए अपनी गुजर-बसर के लिए देखभाल के नेटवर्क- जैसे गुरु-चेला प्रणाली, साथियों के समूह और NGO की मदद- पर निर्भर रहे हैं। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, "प्रलोभन" या "प्रभाव" से जुड़े दंडात्मक प्रावधानों को शामिल किए जाने से यह डर पैदा हो गया है कि यदि इन प्रावधानों की व्याख्या व्यापक रूप से की गई, तो इन्हीं नेटवर्क को अपराध की श्रेणी में डाला जा सकता है। कार्यकर्ताओं का तर्क है कि यह कानून, पहचान को नियंत्रित करने की कोशिश में, उन अनौपचारिक लेकिन जरूरी व्यवस्थाओं को अस्थिर करने का जोखिम उठाता है जो ट्रांसजेंडर लोगों के जीवन को सहारा देती हैं।
विरोध और जन-प्रतिरोध: संसद से लेकर सड़कों तक, देश भर में अस्वीकृति
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 का पारित होना केवल संसदीय बहस तक ही सीमित नहीं रहा है बल्कि इसने पूरे देश में विरोध की एक व्यापक, बेहद भावुक और निरंतर चलने वाली लहर पैदा कर दी है। संगठित मार्च से लेकर स्वतःस्फूर्त जमावड़ों तक, औपचारिक इस्तीफ़ों से लेकर असहमति की सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों तक, ट्रांसजेंडर समुदाय और उनके समर्थकों की प्रतिक्रिया न केवल इस कानून के प्रति असहमति को दर्शाती है, बल्कि इसमें गहरे विश्वासघात की भावना भी झलकती है।
सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहने वाले विरोध प्रदर्शनों में से एक मुंबई में हुआ, जहां 200 से ज्यादा लोग आजाद मैदान में एक शांतिपूर्ण लेकिन जोश भरे प्रदर्शन के लिए जमा हुए। 'द हिंदू' ने इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया। इस विरोध प्रदर्शन की खासियत सिर्फ नारे और तख्तियां ही नहीं थीं, बल्कि इसमें सांस्कृतिक विरोध का एक अनोखा तरीका भी अपनाया गया। प्रदर्शनकारियों ने एक मशहूर बॉलीवुड गाने- "बिल तो कच्चा है जी"- का एक नया रूप गाकर, व्यंग्य को राजनीतिक आलोचना का एक हथियार बना दिया। अमका नाका ट्रांस बिल’ (हमें ट्रांस बिल नहीं चाहिए) और ‘हम अपना हक मांगते हैं, ना किसी से भीख मांगते हैं’ जैसे नारों ने एक स्पष्ट मांग को सामने रखा कि- हमें शर्तों वाली मदद नहीं, बल्कि अपने अधिकारों की पहचान चाहिए। इस जमावड़े में ट्रांसजेंडर लोग, उनके परिवार और उनके समर्थक एक साथ आए; कई लोगों ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे समाज में जहां कलंक अभी भी रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करता है, वहां परिवार का साथ बहुत जरूरी है। कई वक्ताओं ने चेतावनी दी कि यह बिल डर को और बढ़ा सकता है और लोगों को समाज से और भी ज्यादा अलग-थलग कर सकता है।



ट्रांसजेंडर लोगों, कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर इस विवादित बिल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।



कोलकाता में भी विरोध प्रदर्शन हुए।

तिरुवनंतपुरम में, विरोध प्रदर्शनों ने ज्यादा आक्रामक रूप ले लिया; प्रदर्शनकारी पलायम से लोक भवन तक मार्च करते हुए गए और उन्होंने सार्वजनिक रूप से बिल की प्रतियां जलाईं। द हिंदू ने इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया। 'क्वीर-ट्रांस-इंटरसेक्स राइट्स जॉइंट एक्शन कमेटी केरलम' के बैनर तले आयोजित इस विरोध प्रदर्शन में, इस संशोधन को स्पष्ट रूप से संवैधानिक गारंटियों का उल्लंघन और 2014 में मान्यता प्राप्त अधिकारों को पलटने वाला कदम बताया गया। प्रदर्शनकारियों ने इस बात पर जोर दिया कि बिल की परिभाषा किस तरह क्षेत्रीय विविधता को दर्शाने में नाकाम रहती है, उन्होंने कहा कि 'हिजड़ा' या 'अरवानी' जैसी पहचानें केरल में रहने वाले ट्रांसजेंडर लोगों की असल जिंदगी को पूरी तरह से बयां नहीं करतीं। इसके साथ ही, कानूनी चिंताओं को भी जोरदार तरीके से उठाया गया, प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि बिल के अस्पष्ट दंडात्मक प्रावधानों का इस्तेमाल समुदाय के नेटवर्क, सहायता समूहों और यहां तक कि उन परिवारों के खिलाफ भी एक हथियार के तौर पर किया जा सकता है, जो ट्रांसजेंडर लोगों को उनके बदलाव (transition) और गुजारा करने में मदद करते हैं।

हैदराबाद के धरना चौक पर हुए विरोध प्रदर्शनों में भी इसी तरह की चिंताएं सामने आईं, प्रदर्शनकारियों ने "हमारा शरीर – हमारे अधिकार" जैसे नारे लगाए। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि लैंगिक पहचान एक बेहद ही निजी और अनुभव पर आधारित सच्चाई है, जिसे कोई बाहरी सत्ता या संस्था तय नहीं कर सकती। कार्यकर्ताओं ने बताया कि मेडिकल सर्टिफिकेट की अनिवार्यता से लोगों की गरिमा और स्वायत्तता को ठेस पहुंचती है और साथ ही इससे निगरानी और नियंत्रण के नए तरीके भी सामने आते हैं।
इन बड़े शहरी केंद्रों के अलावा, विरोध प्रदर्शनों का दायरा अब और भी ज्यादा फैल गया है और ये अलग-अलग जगहों पर (विकेंद्रित रूप में) भी हो रहे हैं। समुदाय के सदस्यों ने जिला-स्तर पर लामबंदी की घोषणा की है, जिसकी शुरुआत एर्नाकुलम और कोझिकोड में प्रदर्शनों से हुई है। यह इस बात का संकेत है कि विरोध कम होने के बजाय और तेज होने की संभावना है। ये विरोध प्रदर्शन सिर्फ बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि वे छोटे शहरों और क्षेत्रीय नेटवर्क में भी फैल रहे हैं, जो पूरे देश में फैली चिंताओं की व्यापकता को दर्शाते हैं।
विरोध के इन अलग-अलग स्थलों से एक ऐसा पैटर्न उभरता है जो सिर्फ कुछ खास प्रावधानों के विरोध से कहीं आगे की बात है। एक आम धारणा यह है कि यह कानून बिना किसी की बात सुने थोपा गया है, कि यह बिना सहमति के पहचान को फिर से परिभाषित करता है और यह लोगों की असल जिंदगी को ऐसी श्रेणियों में बदल देता है जो सरकारी नियंत्रण के अधीन हैं। ये विरोध प्रदर्शन एक ऐसे समुदाय को सामने लाते हैं जो बिखरा हुआ नहीं, बल्कि आपस में गहराई से जुड़ा हुआ है- जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्ति, इंटरसेक्स व्यक्ति, नॉन-बाइनरी इंडिविजुअल, उनके परिवार और उनके समर्थक जाति, वर्ग और क्षेत्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर एक साथ खड़े हैं।

गहरे स्तर पर देखें तो, ये लामबंदियां एक 'नैरेटिव' पर चल रहे संघर्ष को दर्शाती हैं। जहां एक ओर सरकार इस बिल को सुरक्षा और प्रशासनिक स्पष्टता के एक उपाय के तौर पर पेश करती है, वहीं दूसरी ओर प्रदर्शनकारी इसे पहचान मिटाने, निगरानी रखने और पीछे की ओर ले जाने वाले कदम के रूप में देखते हैं। इस लिहाज से, सड़कें अब संवैधानिक बहस का ही एक विस्तार बन गई हैं- जहां गरिमा, स्वायत्तता और पहचान से जुड़े सवालों पर सिर्फ किताबी या अमूर्त शब्दों में बहस नहीं होती, बल्कि उन्हें असल जिंदगी में जिया जाता है, उनके लिए आवाज उठाई जाती है और उनके लिए संघर्ष किया जाता है।
बड़ा संवैधानिक सवाल: पहचान कौन तय करता है?
अपने मूल रूप में, 'ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक, 2026' से जुड़ा विवाद व्यक्ति और सरकार के बीच के रिश्ते के बारे में है। यह एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है कि क्या पहचान को किसी सत्यापन (वेरिफिकेशन) के अधीन रखा जा सकता है, या फिर उसे किसी व्यक्ति के अस्तित्व का एक स्वाभाविक और अंतर्निहित हिस्सा मानकर ही स्वीकार किया जाना चाहिए?
सुप्रीम कोर्ट ने 'NALSA बनाम भारत संघ' मामले में इस सवाल का जवाब देते हुए पहचान को 'व्यक्तिगत स्वायत्तता' के दायरे में रखा था। हालांकि, 2026 का संशोधन एक बिल्कुल अलग दिशा में आगे बढ़ता है, जिसमें सत्यापन, वर्गीकरण और सरकारी नियंत्रण पर ज्यादा जोर दिया गया है।
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ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 हाल में सबसे ज्यादा विवादित विधायी घटनाक्रमों में से एक बनकर उभरा है। ऐसा न केवल अपने मुख्य प्रावधानों के कारण हुआ है बल्कि जिस तरीके से इसे पारित किया गया, उसके कारण भी हुआ है। 'द हिंदू' के अनुसार, यह विधेयक 13 मार्च, 2026 को लोकसभा में पेश किया गया, 24 मार्च को पारित हुआ और ठीक अगले ही दिन राज्यसभा द्वारा ध्वनि मत से मंजूर कर लिया गया। इस तरह, एक ऐसी विधायी प्रक्रिया, जिसमें आमतौर पर काफी सोच-विचार और चर्चा होती है, उसे महज़ कुछ ही दिनों में पूरा कर लिया गया। इस प्रक्रिया की यह तेजी ही अब आलोचना का मुख्य केंद्र बन गई है।
सभी दलों के विपक्षी सांसदों ने बार-बार यह मांग की कि इस विधेयक को किसी स्थायी या प्रवर समिति (Select Committee) के पास भेजा जाए, ताकि हितधारकों- जिनमें ट्रांसजेंडर व्यक्ति, कानूनी विशेषज्ञ और नागरिक समाज संगठन शामिल हैं- के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया जा सके। इन मांगों को बिना किसी ठोस तर्क के खारिज कर दिया गया। नागरिक समाज समूहों ने बाद में यह बात उठाई कि इस विधेयक को 'कार्य-सूची की अनुपूरक सूची' (Supplementary List of Business) के माध्यम से पेश किया गया था, जिससे संसदीय जांच-पड़ताल के लिए उपलब्ध समय काफी सीमित हो गया। राष्ट्रपति को लिखे अपने संयुक्त पत्र में, 'ऑल-इंडिया फेमिनिस्ट अलायंस' (ALIFA) और 'नेशनल अलायंस फॉर जस्टिस, अकाउंटेबिलिटी एंड राइट्स' (NAJAR) ने इस पूरी प्रक्रिया को "अनुचित और अकारण जल्दबाजी" वाला बताया। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार ने न केवल संसदीय परंपराओं की अनदेखी की है, बल्कि 'पूर्व-विधायी परामर्श नीति, 2014' (Pre-Legislative Consultation Policy, 2014) का भी उल्लंघन किया है।


यह विधेयक अब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी का इंतजार कर रहा है। इसी बीच, कानूनी विद्वान, कार्यकर्ता और आम नागरिक राष्ट्रपति से यह आग्रह कर रहे हैं कि वे संविधान के अनुच्छेद 111 के तहत प्राप्त अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए इस विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दें।
मुख्य कानूनी बदलाव: खुद की पहचान से लेकर सरकारी मान्यता तक
इस संशोधन के मूल में एक ऐसा मौलिक बदलाव शामिल है, जो भारतीय कानून में 'लैंगिक पहचान' (Gender Identity) की अवधारणा को ही बदल देता है। 'ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019' की नींव उस संवैधानिक आधार पर रखी गई थी, जो 'NALSA बनाम भारत संघ' (NALSA v. Union of India) मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित किया गया था। उस फैसले में, सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना था कि अपनी लैंगिक पहचान स्वयं निर्धारित करने का अधिकार, किसी भी व्यक्ति की गरिमा, स्वायत्तता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक अभिन्न अंग है। इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया था कि किसी व्यक्ति की लैंगिक पहचान, किसी भी प्रकार की चिकित्सीय प्रक्रियाओं या बाहरी सत्यापन पर निर्भर नहीं होती; बल्कि यह व्यक्ति के अपने अंतर्मन में महसूस की गई 'स्वयं की भावना' पर आधारित होती है।
वर्ष 2026 का यह संशोधन, उस मूल ढांचे से पूरी तरह से अलग हटकर है। "खुद की लैंगिक पहचान" (self-perceived gender identity) के प्रावधान को हटाकर, यह अधिकारों पर आधारित दृष्टिकोण की जगह एक प्रमाणन व्यवस्था ले आता है। इस व्यवस्था के तहत, जो लोग ट्रांसजेंडर के रूप में पहचान चाहते हैं, उन्हें एक नामित मेडिकल बोर्ड द्वारा जांच से गुजरना होगा। इस बोर्ड की सिफारिश की जांच फिर एक जिला मजिस्ट्रेट द्वारा की जाती है, जो अंततः यह तय करता है कि पहचान का प्रमाण पत्र जारी किया जाए या नहीं।
हालांकि सरकार ने इस व्यवस्था का बचाव करते हुए इसे प्रशासनिक स्पष्टता और कल्याणकारी लाभ की लक्षित डिलीवरी के लिए जरूरी बताया है, लेकिन हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, कई लोगों का तर्क है कि यह प्रभावी रूप से राज्य को पहचान को प्रमाणित करने की स्थिति में ला देता है। यह बदलाव केवल प्रक्रियात्मक नहीं है बल्कि यह कानून के दार्शनिक आधार को बदल देता है, यानी पहचान से विनियमन की ओर बढ़ता है। चिंता की बात यह है कि पहचान, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वायत्तता के एक पहलू के रूप में माना था, अब उसे ऐसी चीज के रूप में फिर से परिभाषित किया जा रहा है जिसे सत्यापित, मापा और अनुमोदित किया जाना चाहिए।
ट्रांसजेंडर पहचान को फिर से परिभाषित करना: शामिल करना, बाहर करना और कानूनी तौर पर मिटा देना
यह संशोधन "ट्रांसजेंडर व्यक्ति" की एक संकीर्ण परिभाषा भी पेश करता है, जिसके कानून के तहत किसे मान्यता मिलेगी, इस पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ते हैं। इसमें इंटरसेक्स विभिन्नताओं या यौन विशेषताओं में जन्मजात अंतर वाले व्यक्तियों के साथ-साथ हिजड़ा, किन्नर, अरावनी और जोगता जैसे कुछ मान्यता प्राप्त सामाजिक-सांस्कृतिक समुदायों से संबंधित व्यक्तियों को शामिल किया गया है। हालांकि, यह स्पष्ट रूप से उन व्यक्तियों को बाहर करता है जिनकी पहचान पूरी तरह से खुद की पहचान पर आधारित है।
इस परिभाषा में किए गए बदलाव की काफी आलोचना हुई है, क्योंकि इसे लोगों को बाहर रखने वाला माना गया है। कार्यकर्ताओं और विद्वानों का तर्क है कि इससे ट्रांसजेंडर समुदाय के बड़े वर्गों के मिट जाने का खतरा है, जिसमें ट्रांस पुरुष, नॉन-बाइनरी इंडिविजुअल और वे लोग शामिल हैं जो पारंपरिक सामुदायिक संरचनाओं से संबंधित नहीं हैं। मीडिया रिपोर्टों ने बताया है कि यह संशोधन प्रभावी रूप से मान्यता को उन लोगों तक सीमित कर देता है जो या तो जैविक संकेतक प्रदर्शित कर सकते हैं या विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों के साथ तालमेल बिठा सकते हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया।
इसके असर सिर्फ़ प्रतीकात्मक नहीं हैं। कानूनी मान्यता ही अधिकारों, कल्याणकारी योजनाओं और सुरक्षा तक पहुंचने का दरवाजा है। परिभाषा को सीमित करके, यह कानून कई व्यक्तियों को उन लाभ के लिए अयोग्य बना सकता है, जिनके वे 2019 के ढांचे के तहत पहले हकदार थे। इससे यह डर पैदा हो गया है कि यह संशोधन ट्रांसजेंडर समुदाय के भीतर एक ऊंच-नीच का क्रम बना सकता है, जिसमें कुछ पहचानों को विशेषाधिकार दिया जाएगा, जबकि दूसरों को बाहर कर दिया जाएगा।
दंडात्मक प्रावधान और अपराधीकरण का सवाल
संशोधन का एक और महत्वपूर्ण पहलू नए दंडात्मक प्रावधानों की शुरुआत है, जिसमें किसी को ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए "उकसाने" या "मजबूर करने" से जुड़े अपराध शामिल हैं। सरकार ने इन प्रावधानों को आवश्यक सुरक्षा उपायों के रूप में सही ठहराया है, विशेष रूप से नाबालिगों को जबरदस्ती और शोषण से बचाने के लिए। इसने इस बात पर भी जोर दिया है कि यह कानून अपराधों की गंभीरता को दर्शाने के लिए अलग-अलग स्तर के दंडों की शुरुआत करता है।
हालांकि, इन प्रावधानों की भाषा अस्पष्ट और संभावित रूप से बहुत व्यापक है, क्योंकि ऐसे खंड अनजाने में उन सहायता प्रणालियों को अपराधी बना सकते हैं, जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से ट्रांसजेंडर समुदायों को सहारा दिया है- जिनमें परिवार, चुने हुए रिश्तेदार और नागरिक समाज संगठन शामिल हैं। चिंता इस बात की है कि ट्रांसजेंडर पहचान को उकसाने या जबरदस्ती के संदर्भ में पेश करके, यह कानून इस विचार को मजबूत करने का जोखिम उठाता है कि ऐसी पहचानें खुद से पैदा नहीं होतीं, बल्कि बाहर से थोपी जाती हैं।
यह चिंता विशेष रूप से ऐसे सामाजिक संदर्भ में ज्यादा गहरी है, जहां ट्रांसजेंडर व्यक्ति अक्सर अपने गुजारे और सहारे के लिए अनौपचारिक नेटवर्क पर निर्भर रहते हैं। डर यह है कि ये नेटवर्क कानूनी जांच के दायरे में आ सकते हैं, जिससे पहले से ही कमजोर इस समुदाय का और भी ज्यादा हाशिए पर जाना तय हो सकता है।
सरकार का पक्ष: कल्याण, स्पष्टता और नियंत्रण
केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र कुमार ने लगातार इस विधेयक का बचाव करते हुए इसे ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए न्याय और सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक आवश्यक कदम बताया है। सरकार के अनुसार, इन संशोधनों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कल्याणकारी लाभ उन लोगों तक पहुंचें, जिन्हें वास्तव में उनकी जरूरत है और स्पष्ट मानदंडों की कमी के कारण उनका दुरुपयोग न हो। जैविक और सत्यापित किए जा सकने वाले संकेतों पर जोर देने को, व्यवस्था में प्रशासनिक स्पष्टता लाने के एक तरीके के रूप में पेश किया गया है।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, सत्ताधारी दल के कई सांसदों ने संसदीय बहसों के दौरान इसी तर्क को दोहराया और इस संभावना पर चिंता जताई कि कुछ व्यक्ति लाभ पाने के लिए झूठी ट्रांसजेंडर पहचान का दावा कर सकते हैं। सरकार ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के कल्याण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के प्रमाण के तौर पर अपनी व्यापक पहलों- जैसे जागरूकता कार्यक्रम, रोजगार मेले और हेल्पलाइन- का भी जिक्र किया है।
फिर भी, ये तर्क केंद्रीय संवैधानिक मुद्दे का समाधान करने में विफल रहते हैं कि क्या राज्य पहचान की मान्यता को ऐसी सत्यापन प्रक्रियाओं पर निर्भर कर सकता है, जो स्वायत्तता और गरिमा को कमजोर करती हैं?
विरोध और संवैधानिक चुनौती: अधिकार, गरिमा और न्यायिक मिसाल
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 पर संसदीय बहस में विपक्षी दलों की ओर से एक असामान्य रूप से एकजुट और जबर्दस्त प्रतिक्रिया देखने को मिली, उन्होंने अपनी आपत्तियों को केवल राजनीतिक नजरिए से ही नहीं, बल्कि एक संवैधानिक सिद्धांत के मामले के तौर पर पेश किया। द हिंदू के अनुसार, कांग्रेस, DMK, AITC, SP, RJD, AAP, CPI(M), BJD और अन्य दलों सहित सभी पार्टियों के सांसदों ने लगातार यह तर्क दिया कि यह विधेयक पिछले एक दशक में स्थापित अधिकार-आधारित ढांचे से एक मौलिक भटकाव है और इसमें समानता, गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मूल गारंटियों का उल्लंघन होने का जोखिम है।
इस आलोचना के केंद्र में 'खुद की पहचान के अधिकार' को हटाना है, यानी एक ऐसा सिद्धांत जिसे सुप्रीम कोर्ट ने NALSA बनाम भारत संघ मामले में मजबूती से मान्यता दी थी। विपक्षी सांसदों ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि यह फैसला केवल घोषणात्मक नहीं, बल्कि परिवर्तनकारी था- इसने लैंगिक पहचान को स्वायत्तता के दायरे में रखा और यह माना कि व्यक्तियों को बिना किसी चिकित्सीय या नौकरशाही सत्यापन के अपनी लैंगिक पहचान खुद ही निर्धारित करने का अधिकार है। उन्होंने तर्क दिया कि इस ढांचे को चिकित्सीय प्रमाणन और प्रशासनिक मंजूरी की प्रणाली से बदलकर, यह संशोधन प्रभावी रूप से एक स्थापित संवैधानिक स्थिति को उलट देता है।
हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, DMK सांसद तिरुचि शिवा ने इस चिंता को विशेष रूप से कड़े शब्दों में व्यक्त किया, उन्होंने राज्यसभा में चेतावनी दी कि भले ही यह विधेयक संसद से पारित हो जाए, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 का उल्लंघन करने के कारण सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसे संभवतः रद्द कर दिया जाएगा। उनका यह हस्तक्षेप एक व्यापक आशंका को दर्शाता है कि यह संशोधन न केवल विवादास्पद है, बल्कि संवैधानिक रूप से भी कमजोर है। विपक्ष में कई लोगों के लिए, यह मुद्दा नीतिगत असहमति का नहीं, बल्कि उन क्षेत्रों में विधायी अतिक्रमण का है जो पहले से ही न्यायिक व्याख्या द्वारा संरक्षित हैं।
इस संवैधानिक ढांचे की गूंज कई सांसदों की बातों में सुनाई दी, जिन्होंने अनुच्छेद 14 और 15 के तहत समानता और गैर-भेदभाव को लेकर चिंताएं जताईं। उन्होंने तर्क दिया कि "ट्रांसजेंडर व्यक्ति" की परिभाषा को सीमित करके और उन लोगों को बाहर करके जो अपनी पहचान अपनी खुद की समझ के आधार पर करते हैं, यह कानून समुदाय के भीतर ही एक मनमानी श्रेणी बना देता है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ऐसी श्रेणी, जिसका सुरक्षा के घोषित उद्देश्य से कोई स्पष्ट और तर्कसंगत संबंध नहीं है, अनुच्छेद 14 के तहत 'उचित वर्गीकरण' की कसौटी पर खरी नहीं उतर सकती। इसके अलावा, पहचान को मेडिकल मानदंडों से जोड़कर, यह कानून उन व्यक्तियों के साथ भेदभाव का जोखिम पैदा करता है जो ऐसी प्रक्रियाओं से गुजर नहीं सकते या गुजरना नहीं चाहते. इस तरह यह परोक्ष रूप से लैंगिक अभिव्यक्ति के कुछ रूपों को दंडित करता है।


अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा से जुड़ी चिंताएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, संदीप पाठक और प्रियंका चतुर्वेदी जैसे सांसदों ने इस तर्क पर सवाल उठाया कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को- सिसजेंडर (cisgender) पुरुषों और महिलाओं के विपरीत- अपनी पहचान की मान्यता के लिए मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होने की आवश्यकता क्यों है। उन्होंने तर्क दिया कि यह भेदभावपूर्ण व्यवहार न केवल समानता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है, बल्कि व्यक्ति के अस्तित्व के सबसे निजी पहलुओं में भी दखल देता है। इस दृष्टिकोण से, लैंगिक पहचान कोई ऐसा तथ्य नहीं है जिसकी पुष्टि की जाए, बल्कि यह एक ऐसा अनुभव है जिसका सम्मान किया जाना चाहिए। इस प्रकार, प्रमाणन की आवश्यकता पहचान के एक अत्यंत निजी पहलू को एक प्रशासनिक बाधा में बदल देती है, जिससे गरिमा, स्वायत्तता और शारीरिक अखंडता को लेकर चिंताएं पैदा होती हैं।
इस बहस में निजता के अधिकार का भी जिक्र हुआ, विशेष रूप से के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के संदर्भ में। विपक्षी सांसदों ने तर्क दिया कि मेडिकल जांच की प्रक्रिया और राज्य के अधिकारियों को संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी का संभावित खुलासा, निजता में एक अनुचित दखल हो सकता है। डेटा सुरक्षा, गोपनीयता और उद्देश्य की सीमा के संबंध में स्पष्ट सुरक्षा उपायों का अभाव इन चिंताओं को और भी गहरा कर देता है। एक ऐसे संवैधानिक ढांचे में जो निजता को गरिमा और स्वायत्तता का एक आंतरिक हिस्सा मानता है, ऐसे प्रावधानों को कड़ी न्यायिक जांच का सामना करना पड़ सकता है।

विपक्ष की आलोचना का एक और पहलू संशोधन द्वारा पेश किए गए दंडात्मक प्रावधानों पर केंद्रित था। सांसदों ने ट्रांसजेंडर पहचान के संबंध में "प्रलोभन" या "प्रभाव" जैसे अपराधों को परिभाषित करने के लिए इस्तेमाल की गई अस्पष्ट और व्यापक भाषा को लेकर चिंताएं जताईं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ऐसी आशंका है कि इन प्रावधानों का दुरुपयोग उन परिवारों, सामुदायिक नेटवर्क, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और नागरिक समाज संगठनों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है जो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का समर्थन करते हैं। इससे व्यापकता और अस्पष्टता का एक क्लासिक संवैधानिक मुद्दा उठता है - क्या कोई कानून, किसी वैध चिंता को दूर करने की कोशिश में, अपने दायरे को इतना व्यापक कर देता है कि वह संरक्षित आचरण को भी अपने दायरे में ले लेता है और वैध गतिविधि पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।
बहस के दौरान एक मजबूत शिकायत निवारण तंत्र की कमी को भी उजागर किया गया। सांसदों ने इस बात की ओर इशारा किया कि मौजूदा 2019 के कानून के तहत ट्रांसजेंडर सर्टिफिकेशन के लिए हजारों आवेदन पहले ही खारिज किए जा चुके हैं और इन आवेदनों को खारिज करने के आधार या अपील के रास्तों के बारे में बहुत कम स्पष्टता है। हिंदुस्तान टाइम्स ने इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया है। मेडिकल बोर्ड और जिला अधिकारियों की भूमिका को मजबूत करके, लेकिन साथ ही जवाबदेही और पारदर्शिता को न बढ़ाकर, यह संशोधन मनमानी को संस्थागत रूप देने का जोखिम पैदा करता है। यह चिंता सीधे तौर पर राज्य की मनमानी कार्रवाई के खिलाफ संवैधानिक गारंटी से जुड़ी है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 14 के तहत शामिल माना है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि विपक्षी नेताओं ने भी इस बिल को विधायी और कार्यकारी कार्रवाई के एक व्यापक पैटर्न के संदर्भ में देखा। कुछ सांसदों ने तर्क दिया कि यह संशोधन मौलिक अधिकारों के ऊपर प्रशासनिक सुविधा को प्राथमिकता देने की बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाता है और हाशिए पर पड़े समुदायों को अधिकारों के धारक मानने के बजाय, उन्हें केवल नियमों के अधीन मानने की प्रवृत्ति को दिखाता है (द हिंदू)। यह आलोचना केवल ट्रांसजेंडर के संदर्भ तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अधिकारों पर आधारित शासन व्यवस्था के कमजोर पड़ने को लेकर एक व्यापक संवैधानिक चिंता को भी जाहिर करती है।
संसद के बाहर, राजनीतिक नेताओं ने सार्वजनिक बयानों में इन चिंताओं को और मजबूती से उठाया। कांग्रेस सांसद और विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस बिल को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के संवैधानिक अधिकारों और पहचान पर एक "बेशर्मी भरा हमला" बताया, उन्होंने तर्क दिया कि यह बिल व्यक्तियों से अपनी पहचान खुद तय करने की क्षमता छीन लेता है और उन्हें अमानवीय जांच-पड़ताल के अधीन कर देता है। इस तरह के हस्तक्षेप यह संकेत देते हैं कि इस बिल की संवैधानिक आलोचना केवल विधायी बहस तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह अधिकारों और शासन व्यवस्था पर चल रही एक व्यापक राजनीतिक चर्चा का भी हिस्सा है।

कई लोगों ने इस बिल के प्रति अपनी असहमति जताने के लिए सोशल मीडिया का भी सहारा लिया।





आखिरकार, विपक्ष के रुख से एक सुसंगत संवैधानिक तर्क उभरता है, कि यह संशोधन समानता, गरिमा, स्वायत्तता और निजता के उन सिद्धांतों को कमजोर करता है, जो भारत के मौलिक अधिकारों के ढांचे का मूल हैं। NALSA बनाम भारत संघ मामले में स्थापित न्यायशास्त्र से हटकर और K.S. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ मामले में मान्यता प्राप्त निजता सुरक्षाओं के संभावित टकराव के कारण, यह कानून एक अपरिहार्य न्यायिक टकराव की जमीन तैयार करता है।
संस्थागत असहमति: इस्तीफे और न्यायिक चिंता
संसदीय विरोध और सड़क-स्तर के प्रदर्शनों से परे, ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 से जुड़े विवाद का सबसे उल्लेखनीय पहलू स्वयं संस्थागत ढांचों के भीतर से उभरती असहमति रही है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल वैचारिक असहमति को ही नहीं, बल्कि उन निकायों के भीतर विश्वास के टूटने को भी दर्शाता है, जिन्हें विशेष रूप से ट्रांसजेंडर अधिकारों का प्रतिनिधित्व करने, उन पर सलाह देने और उनकी रक्षा करने के लिए बनाया गया था।

इस संस्थागत बेचैनी का एक विशेष रूप से स्पष्ट उदाहरण राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति परिषद (NCTP) के दो सदस्यों- ऋतुपर्णा नियोग और कल्कि सुब्रमण्यम- के इस्तीफे के रूप में सामने आया, जो संसद में बिल पारित होने के तुरंत बाद दिए गए थे। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया। NCTP, जो 2019 के अधिनियम के तहत गठित एक वैधानिक निकाय है, को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को प्रभावित करने वाली नीतियों पर सरकार को सलाह देने और यह सुनिश्चित करने का कार्य सौंपा गया है कि समुदाय की चिंताओं का शासन प्रक्रियाओं के भीतर सार्थक रूप से प्रतिनिधित्व हो। इसलिए, ये इस्तीफे केवल विरोध के प्रतीकात्मक कार्य नहीं हैं, वे इस बारे में गहरे सवाल उठाते हैं कि क्या कानून में निर्मित परामर्श तंत्र वास्तव में काम कर रहे हैं या नहीं।

अपने इस्तीफा पत्रों में, दोनों सदस्यों ने पद छोड़ने के मुख्य कारण के रूप में परामर्श के अभाव का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया। ऋतुपर्णा नियोग ने कहा कि "समुदाय की आवाज" के रूप में मंत्रालय के साथ जुड़ने के प्रयास अनसुने रह गए, जिससे यह संकेत मिलता है कि संवाद के संस्थागत माध्यमों को प्रभावी ढंग से दरकिनार कर दिया गया था। कल्कि सुब्रमण्यम ने इससे भी आगे बढ़कर कहा कि ऐसी स्थिति में परिषद में उनकी निरंतर उपस्थिति असहनीय है, जहां समुदाय की "सामूहिक आवाज" को खामोश कर दिया गया हो। उनका इस्तीफा एक मौलिक विरोधाभास को रेखांकित करता है: एक ऐसा निकाय जिसे ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करने के लिए डिजाइन किया गया था, उससे न तो परामर्श किया गया और न ही उसे उस कानून को आकार देने में सार्थक रूप से शामिल किया गया, जो सीधे तौर पर उनकी कानूनी स्थिति को बदलता है। इन इस्तीफों को NCTP सदस्यों द्वारा बिल पास होने से पहले सरकार के साथ बातचीत करने की पिछली कोशिशों के संदर्भ में भी समझा जाना चाहिए। रिपोर्टों से पता चलता है कि समुदाय के प्रतिनिधियों ने मंत्रालय के अधिकारियों के साथ बैठकों में जोर देकर कहा था कि खुद की पहचान- जिसे सुप्रीम कोर्ट ने मान्यता दी है- लिंग पहचान का आधार बनी रहनी चाहिए। उन्होंने "ट्रांसजेंडर व्यक्ति" की प्रस्तावित परिभाषा, मेडिकल बोर्डों की शुरुआत और संभावित रूप से दखल देने वाली सत्यापन प्रक्रियाओं के बारे में भी चिंताएं उठाईं। इन हस्तक्षेपों के बावजूद, ऐसा लगता है कि अंतिम कानून में इनमें से किसी भी सुझाव को शामिल नहीं किया गया है, जिससे यह धारणा और मजबूत होती है कि परामर्श केवल प्रक्रियात्मक था, न कि वास्तविक। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया।
सरकारी ढांचे के अंदर से हो रहे इस विरोध के साथ-साथ, न्यायपालिका की तरफ से भी एक बड़ी चिंता सामने आई है- खास तौर पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई एक सलाहकार समिति से, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस आशा मेनन कर रही हैं। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रांसजेंडर अधिकारों के कार्यान्वयन की जांच करने और सुधारों की सिफारिश करने के लिए गठित किए गए इस समिति ने कथित तौर पर सरकार को पत्र लिखकर बिल वापस लेने का आग्रह किया। इसका हस्तक्षेप विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि यह मौजूदा संवैधानिक सिद्धांतों के साथ कानून की अनुकूलता का एक अर्ध-न्यायिक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है।
समिति की चिंताएं वास्तविक और संरचनात्मक दोनों हैं। इसके मूल में लिंग पहचान की कानूनी मान्यता के आधार के रूप में खुद की पहचान को हटाना है। समिति ने टिप्पणी की कि पहचान को जैविक विशेषताओं या चिकित्सा प्रक्रियाओं से जोड़कर, यह संशोधन उन व्यक्तियों को बाहर करने का जोखिम उठाता है जो खुद को ट्रांसजेंडर के रूप में पहचानते हैं लेकिन इन मानदंडों को पूरा नहीं करते हैं। इसके परिणामस्वरूप, पहचान दस्तावेजों, कल्याणकारी योजनाओं और कानूनी सुरक्षा तक पहुंच सीमित हो सकती है जिससे समुदाय के कुछ वर्ग कानून की नजर में प्रभावी रूप से अदृश्य हो सकते हैं (बार एंड बेंच)।
समिति की गोपनीयता से जुड़ी चिंताएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। संशोधन की यह शर्त कि लिंग-पुष्टि प्रक्रियाओं (gender-affirming procedures) का विवरण जिला अधिकारियों के साथ साझा किया जा सकता है, गोपनीयता और शारीरिक स्वायत्तता के बारे में गंभीर सवाल खड़े करती है। एक ऐसे कानूनी परिदृश्य में, जिसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा गोपनीयता को एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने से आकार मिला है, ऐसे प्रावधानों को संभावित रूप से दखल देने वाला और बिना स्पष्ट औचित्य के माना जाता है। 'बार एंड बेंच' के अनुसार, समिति ने कथित तौर पर यह टिप्पणी की कि ऐसे डेटा संग्रह का उद्देश्य अस्पष्ट बना हुआ है, जिससे निगरानी और दुरुपयोग के बारे में आशंकाएं और बढ़ गई हैं।
सलाहकार निकाय ने नए दंडात्मक प्रावधानों को लागू करने की आवश्यकता पर भी सवाल उठाया, यह बताते हुए कि संशोधन में उल्लिखित कई अपराध पहले से ही मौजूदा आपराधिक कानूनों के अंतर्गत आते हैं। यह विधायी दोहराव और इस संभावना के बारे में एक व्यापक चिंता पैदा करता है कि नए प्रावधानों का इस्तेमाल ऐसे तरीकों से किया जा सकता है जो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों या उनके सहायता नेटवर्क को असमान रूप से प्रभावित करते हैं। इन दोहरावों को उजागर करके, समिति परोक्ष रूप से इस तर्क को चुनौती देती है कि कानूनी कमियों को भरने के लिए संशोधन की आवश्यकता है।
शायद समिति के हस्तक्षेप का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसकी परोक्ष संवैधानिक चेतावनी है। खुद की पहचान (self-identification) को हटाने की बात को उठाते हुए, समिति NALSA बनाम भारत संघ मामले में निर्धारित सिद्धांतों के साथ संभावित टकराव की ओर ध्यान आकर्षित करती है; इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह पुष्टि की थी कि लिंग पहचान व्यक्तिगत स्वायत्तता और स्व-निर्धारण का विषय है। इससे इस बात की संभावना पैदा होती है कि यह संशोधन, एक बार लागू होने के बाद, स्थापित संवैधानिक न्यायशास्त्र का उल्लंघन करने के लिए न्यायिक जांच का सामना कर सकता है।
नागरिक समाज और समुदाय की आवाज: कानून और वास्तविक जीवन का मेल
यदि संसद में 'ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026' पर औपचारिक बहस दिखी, तो नागरिक समाज और समुदाय की प्रतिक्रियाओं में ही इस कानून के गहरे निहितार्थ स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। पूरे देश में, विभिन्न प्रकार के समूहों- जैसे ट्रांसजेंडर समूह, क्वीयर अधिकार समूह, नारीवादी गठबंधन, अभिभावकों के नेटवर्क, कानूनी पैरोकार और स्वतंत्र कार्यकर्ता- ने एक बहुआयामी आलोचना प्रस्तुत की है, यह आलोचना केवल सैद्धांतिक मतभेदों तक सीमित न रहकर, वास्तविक जीवन के अनुभवों, संरचनात्मक बहिष्कार और रोजमर्रा की असुरक्षाओं को प्रमुखता से सामने रखती है।
सबसे सुसंगठित हस्तक्षेपों में से कुछ 'ऑल-इंडिया फेमिनिस्ट अलायंस' (ALIFA) और 'नेशनल अलायंस फॉर जस्टिस, अकाउंटेबिलिटी एंड राइट्स' (NAJAR) जैसे गठबंधनों की ओर से आए हैं, इन गठबंधनों ने औपचारिक रूप से राष्ट्रपति को पत्र लिखकर विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस भेजने का आग्रह किया है। उनकी आलोचना का दायरा केवल संशोधनों के मूल विषय तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह कानून बनाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाता है। उनका तर्क है कि यह बिल बिना किसी सार्थक परामर्श के, 'प्री-लेजिस्लेटिव कंसल्टेशन पॉलिसी, 2014' का उल्लंघन करते हुए जल्दबाजी में पास किया गया, और वे इसके पास होने को "अनुचित और बेवजह की जल्दबाजी" से भरा बताते हैं। मूल रूप से, उनकी चिंताएं 'खुद की पहचान' (self-identification) को हटाने, मेडिकल सर्टिफिकेशन को अनिवार्य करने, और अस्पष्ट दंडात्मक प्रावधानों को लागू करने पर केंद्रित हैं- उनका तर्क है कि ये सभी कदम अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मिले संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करते हैं।
यह बयान यहां पढ़ा जा सकता है।
इन संस्थागत हस्तक्षेपों के समानांतर, परिवारों और सहायता समूहों (support networks) से भी व्यक्तिगत प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। 'स्वीकार' (Sweekar) नामक समूह- जिसमें LGBTQIA+ समुदाय के लोगों के माता-पिता शामिल हैं- ने इस संशोधन को देखभाल और वास्तविक जीवन के अनुभवों के नजरिए से देखा है। उनकी सार्वजनिक अपील इस बात पर जोर देती है कि कैसे यह कानून पहचान को जांच-पड़ताल का विषय बना देता है और लोगों को मेडिकल बोर्डों तथा प्रशासनिक अधिकारियों के सामने अपने लिंग को "साबित" करने के लिए मजबूर करता है। उन परिवारों के लिए, जिन्होंने सामाजिक कलंक का सामना करते हुए भी अपने बच्चों का साथ देने के लिए संघर्ष किया है, यह नई शर्त एक तरह के 'सरकार द्वारा पैदा किया गया शक' (state-imposed doubt) जैसी महसूस होती है- एक ऐसा शक जो, स्वीकार्यता और अपनेपन की उन नाजुक प्रक्रियाओं को खत्म कर देने का जोखिम पैदा करता है, जिन्हें उन्होंने बड़ी मुश्किल से स्थापित किया था।
यह बयान यहां पढ़ा जा सकता है।
नागरिक समाज (civil society) की प्रतिक्रियाओं में बार-बार उठने वाली एक चिंता, पहुंच (access) और असमानता का मुद्दा है। कार्यकर्ताओं ने यह बात उठाई है कि मेडिकल जांच (verification) की शर्त यह मानकर चलती है कि लोगों के पास स्वास्थ्य सेवाओं, आर्थिक संसाधनों और सरकारी प्रशासनिक व्यवस्थाओं तक पहुंच उपलब्ध है- लेकिन ये ऐसी स्थितियां हैं जो वर्ग, जाति और भौगोलिक आधार पर लोगों के बीच असमान रूप से बंटी हुई हैं। कई ट्रांसजेंडर लोगों के लिए- विशेषकर जो ग्रामीण इलाकों या आर्थिक रूप से पिछड़े परिवेश में रहते हैं- किसी मेडिकल बोर्ड और जिला प्रशासन की प्रक्रियाओं से गुजर पाना व्यावहारिक रूप से असंभव हो सकता है। इस लिहाज़ से, यह कानून लोगों को मुख्यधारा से बाहर करने (exclusion) का जोखिम पैदा करता है- और ऐसा यह किसी स्पष्ट इनकार के जरिए नहीं, बल्कि ऐसी प्रक्रियागत बाधाओं के जरिए करता है, जो पहचान की मान्यता को ही लोगों की पहुंच से बाहर कर देती हैं।
आलोचना का एक और मुख्य पहलू इस बात से जुड़ा है कि यह कानून मौजूदा सामुदायिक सहायता ढांचों पर क्या असर डालेगा। भारत में ट्रांसजेंडर समुदाय ऐतिहासिक रूप से, व्यवस्थागत बहिष्कार का सामना करते हुए अपनी गुजर-बसर के लिए देखभाल के नेटवर्क- जैसे गुरु-चेला प्रणाली, साथियों के समूह और NGO की मदद- पर निर्भर रहे हैं। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, "प्रलोभन" या "प्रभाव" से जुड़े दंडात्मक प्रावधानों को शामिल किए जाने से यह डर पैदा हो गया है कि यदि इन प्रावधानों की व्याख्या व्यापक रूप से की गई, तो इन्हीं नेटवर्क को अपराध की श्रेणी में डाला जा सकता है। कार्यकर्ताओं का तर्क है कि यह कानून, पहचान को नियंत्रित करने की कोशिश में, उन अनौपचारिक लेकिन जरूरी व्यवस्थाओं को अस्थिर करने का जोखिम उठाता है जो ट्रांसजेंडर लोगों के जीवन को सहारा देती हैं।
विरोध और जन-प्रतिरोध: संसद से लेकर सड़कों तक, देश भर में अस्वीकृति
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 का पारित होना केवल संसदीय बहस तक ही सीमित नहीं रहा है बल्कि इसने पूरे देश में विरोध की एक व्यापक, बेहद भावुक और निरंतर चलने वाली लहर पैदा कर दी है। संगठित मार्च से लेकर स्वतःस्फूर्त जमावड़ों तक, औपचारिक इस्तीफ़ों से लेकर असहमति की सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों तक, ट्रांसजेंडर समुदाय और उनके समर्थकों की प्रतिक्रिया न केवल इस कानून के प्रति असहमति को दर्शाती है, बल्कि इसमें गहरे विश्वासघात की भावना भी झलकती है।
सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहने वाले विरोध प्रदर्शनों में से एक मुंबई में हुआ, जहां 200 से ज्यादा लोग आजाद मैदान में एक शांतिपूर्ण लेकिन जोश भरे प्रदर्शन के लिए जमा हुए। 'द हिंदू' ने इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया। इस विरोध प्रदर्शन की खासियत सिर्फ नारे और तख्तियां ही नहीं थीं, बल्कि इसमें सांस्कृतिक विरोध का एक अनोखा तरीका भी अपनाया गया। प्रदर्शनकारियों ने एक मशहूर बॉलीवुड गाने- "बिल तो कच्चा है जी"- का एक नया रूप गाकर, व्यंग्य को राजनीतिक आलोचना का एक हथियार बना दिया। अमका नाका ट्रांस बिल’ (हमें ट्रांस बिल नहीं चाहिए) और ‘हम अपना हक मांगते हैं, ना किसी से भीख मांगते हैं’ जैसे नारों ने एक स्पष्ट मांग को सामने रखा कि- हमें शर्तों वाली मदद नहीं, बल्कि अपने अधिकारों की पहचान चाहिए। इस जमावड़े में ट्रांसजेंडर लोग, उनके परिवार और उनके समर्थक एक साथ आए; कई लोगों ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे समाज में जहां कलंक अभी भी रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करता है, वहां परिवार का साथ बहुत जरूरी है। कई वक्ताओं ने चेतावनी दी कि यह बिल डर को और बढ़ा सकता है और लोगों को समाज से और भी ज्यादा अलग-थलग कर सकता है।



ट्रांसजेंडर लोगों, कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर इस विवादित बिल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।



कोलकाता में भी विरोध प्रदर्शन हुए।

तिरुवनंतपुरम में, विरोध प्रदर्शनों ने ज्यादा आक्रामक रूप ले लिया; प्रदर्शनकारी पलायम से लोक भवन तक मार्च करते हुए गए और उन्होंने सार्वजनिक रूप से बिल की प्रतियां जलाईं। द हिंदू ने इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया। 'क्वीर-ट्रांस-इंटरसेक्स राइट्स जॉइंट एक्शन कमेटी केरलम' के बैनर तले आयोजित इस विरोध प्रदर्शन में, इस संशोधन को स्पष्ट रूप से संवैधानिक गारंटियों का उल्लंघन और 2014 में मान्यता प्राप्त अधिकारों को पलटने वाला कदम बताया गया। प्रदर्शनकारियों ने इस बात पर जोर दिया कि बिल की परिभाषा किस तरह क्षेत्रीय विविधता को दर्शाने में नाकाम रहती है, उन्होंने कहा कि 'हिजड़ा' या 'अरवानी' जैसी पहचानें केरल में रहने वाले ट्रांसजेंडर लोगों की असल जिंदगी को पूरी तरह से बयां नहीं करतीं। इसके साथ ही, कानूनी चिंताओं को भी जोरदार तरीके से उठाया गया, प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि बिल के अस्पष्ट दंडात्मक प्रावधानों का इस्तेमाल समुदाय के नेटवर्क, सहायता समूहों और यहां तक कि उन परिवारों के खिलाफ भी एक हथियार के तौर पर किया जा सकता है, जो ट्रांसजेंडर लोगों को उनके बदलाव (transition) और गुजारा करने में मदद करते हैं।

हैदराबाद के धरना चौक पर हुए विरोध प्रदर्शनों में भी इसी तरह की चिंताएं सामने आईं, प्रदर्शनकारियों ने "हमारा शरीर – हमारे अधिकार" जैसे नारे लगाए। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि लैंगिक पहचान एक बेहद ही निजी और अनुभव पर आधारित सच्चाई है, जिसे कोई बाहरी सत्ता या संस्था तय नहीं कर सकती। कार्यकर्ताओं ने बताया कि मेडिकल सर्टिफिकेट की अनिवार्यता से लोगों की गरिमा और स्वायत्तता को ठेस पहुंचती है और साथ ही इससे निगरानी और नियंत्रण के नए तरीके भी सामने आते हैं।
इन बड़े शहरी केंद्रों के अलावा, विरोध प्रदर्शनों का दायरा अब और भी ज्यादा फैल गया है और ये अलग-अलग जगहों पर (विकेंद्रित रूप में) भी हो रहे हैं। समुदाय के सदस्यों ने जिला-स्तर पर लामबंदी की घोषणा की है, जिसकी शुरुआत एर्नाकुलम और कोझिकोड में प्रदर्शनों से हुई है। यह इस बात का संकेत है कि विरोध कम होने के बजाय और तेज होने की संभावना है। ये विरोध प्रदर्शन सिर्फ बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि वे छोटे शहरों और क्षेत्रीय नेटवर्क में भी फैल रहे हैं, जो पूरे देश में फैली चिंताओं की व्यापकता को दर्शाते हैं।
विरोध के इन अलग-अलग स्थलों से एक ऐसा पैटर्न उभरता है जो सिर्फ कुछ खास प्रावधानों के विरोध से कहीं आगे की बात है। एक आम धारणा यह है कि यह कानून बिना किसी की बात सुने थोपा गया है, कि यह बिना सहमति के पहचान को फिर से परिभाषित करता है और यह लोगों की असल जिंदगी को ऐसी श्रेणियों में बदल देता है जो सरकारी नियंत्रण के अधीन हैं। ये विरोध प्रदर्शन एक ऐसे समुदाय को सामने लाते हैं जो बिखरा हुआ नहीं, बल्कि आपस में गहराई से जुड़ा हुआ है- जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्ति, इंटरसेक्स व्यक्ति, नॉन-बाइनरी इंडिविजुअल, उनके परिवार और उनके समर्थक जाति, वर्ग और क्षेत्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर एक साथ खड़े हैं।

गहरे स्तर पर देखें तो, ये लामबंदियां एक 'नैरेटिव' पर चल रहे संघर्ष को दर्शाती हैं। जहां एक ओर सरकार इस बिल को सुरक्षा और प्रशासनिक स्पष्टता के एक उपाय के तौर पर पेश करती है, वहीं दूसरी ओर प्रदर्शनकारी इसे पहचान मिटाने, निगरानी रखने और पीछे की ओर ले जाने वाले कदम के रूप में देखते हैं। इस लिहाज से, सड़कें अब संवैधानिक बहस का ही एक विस्तार बन गई हैं- जहां गरिमा, स्वायत्तता और पहचान से जुड़े सवालों पर सिर्फ किताबी या अमूर्त शब्दों में बहस नहीं होती, बल्कि उन्हें असल जिंदगी में जिया जाता है, उनके लिए आवाज उठाई जाती है और उनके लिए संघर्ष किया जाता है।
बड़ा संवैधानिक सवाल: पहचान कौन तय करता है?
अपने मूल रूप में, 'ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक, 2026' से जुड़ा विवाद व्यक्ति और सरकार के बीच के रिश्ते के बारे में है। यह एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है कि क्या पहचान को किसी सत्यापन (वेरिफिकेशन) के अधीन रखा जा सकता है, या फिर उसे किसी व्यक्ति के अस्तित्व का एक स्वाभाविक और अंतर्निहित हिस्सा मानकर ही स्वीकार किया जाना चाहिए?
सुप्रीम कोर्ट ने 'NALSA बनाम भारत संघ' मामले में इस सवाल का जवाब देते हुए पहचान को 'व्यक्तिगत स्वायत्तता' के दायरे में रखा था। हालांकि, 2026 का संशोधन एक बिल्कुल अलग दिशा में आगे बढ़ता है, जिसमें सत्यापन, वर्गीकरण और सरकारी नियंत्रण पर ज्यादा जोर दिया गया है।
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