सीबीएसई मामला: क्या ओएसएम टेंडर प्रक्रिया और ‘ड्राई रन’ में सामने आई खामियों को किया गया नजरअंदाज?

Written by sabrang india | Published on: June 4, 2026
सीबीएसई के ओएसएम सिस्टम को लेकर जारी विवाद के बीच बोर्ड के शीर्ष पदाधिकारियों में बदलाव किया गया है। मंगलवार को सीबीएसई के चेयरमैन राहुल सिंह और सचिव हिमांशु गुप्ता का तबादला कर दिया गया।


साभार : द न्यू इंडियन एक्सप्रेस

सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) का ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) सिस्टम पहले से ही तकनीकी खामियों, सुरक्षा संबंधी चिंताओं और मूल्यांकन प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर सवालों के घेरे में रहा है। अब यह प्रणाली एक नए विवाद के कारण चर्चा में है। मामला बोर्ड के मूल ‘रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल’ (आरएफपी) दस्तावेज में स्कैनर की तकनीकी विशिष्टताओं (स्पेसिफिकेशन्स) में किए गए बदलावों से जुड़ा है।

आरएफपी एक औपचारिक दस्तावेज होता है, जिसके माध्यम से किसी परियोजना, उत्पाद या सेवा के लिए योग्य कंपनियों और विक्रेताओं से विस्तृत प्रस्ताव तथा निविदाएं आमंत्रित की जाती हैं। स्कैनर से संबंधित मानकों में कथित संशोधनों को लेकर अब प्रक्रिया की पारदर्शिता और निविदा शर्तों पर नए सवाल उठ रहे हैं।

इस संबंध में कांग्रेस के राज्यसभा सांसद और शिक्षा पर संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष दिग्विजय सिंह ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट में बताया कि ओएसएम सिस्टम के लिए मूल आरएफपी दस्तावेज में रोबोटिक स्कैनर्स का प्रावधान था। ये ऐसे स्वचालित सिस्टम होते हैं, जो बड़ी मात्रा में दस्तावेजों के डिजिटलीकरण के लिए ऑप्टिकल स्कैनिंग को रोबोटिक आर्म के साथ जोड़ते हैं और इसमें मानवीय हस्तक्षेप की आवश्यकता बहुत कम होती है।

अपनी पोस्ट में दिग्विजय सिंह ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को टैग करते हुए सवाल उठाया कि क्या किसी विशेष वेंडर को लाभ पहुंचाने के लिए दस्तावेज में बदलाव कर साधारण स्कैनर्स को शामिल किया गया था।

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, आईटी मंत्रालय ने संसदीय स्थायी समिति को दिए एक नोट में पुष्टि की है कि सीबीएसई 12वीं कक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं के डिजिटल मूल्यांकन के लिए वेंडर ‘कोएम्प्ट एडुटेक’ द्वारा विकसित ओएसएम पोर्टल का उपयोग करता है। वहीं, सीबीएसई से संबंधित 10 डोमेन को होस्ट करने वाले इस इंफ्रास्ट्रक्चर को अमेजन वेब सर्विसेज (एडब्ल्यूएस) इंडिया का सहयोग प्राप्त है।

उल्लेखनीय है कि यह आरोप उस विवाद को नया आयाम देता है, जो इस बात को लेकर चल रहा है कि बोर्ड ने सिस्टम के लाइव होने से पहले दी गई शुरुआती चेतावनियों को नजरअंदाज कर दिया था।

द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की साइबर सुरक्षा एजेंसी CERT-In (इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम) ने मूल्यांकन प्लेटफॉर्म में गंभीर कमियों की पहचान की थी। एजेंसी ने पहले फरवरी में और फिर मई में तीन बार इस संबंध में आगाह किया था। सुरक्षा ऑडिट के बाद एजेंसी ने इसके एक पोर्टल को उपयोग के लिए अनुपयुक्त भी घोषित किया था।

कमियों की पुष्टि के बाद CERT-In ने बोर्ड और एडब्ल्यूएस दोनों को अलर्ट जारी किया था। दोनों संस्थाओं ने दावा किया कि संबंधित खामियों को दूर कर दिया गया है। इस बीच, बोर्ड ने भी कहा कि जिन समस्याओं की ओर ध्यान दिलाया गया था, उन्हें हल करने के लिए आवश्यक कदम उठाए गए हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षा मंत्रालय की एक रिपोर्ट में गुणवत्ता संबंधी चिंताओं को भी रेखांकित किया गया था। रिपोर्ट में पाया गया कि 9 मई के आसपास स्कैन की गई 13,583 उत्तर पुस्तिकाएं “असंतोषजनक” थीं, जिसके कारण उन्हें पढ़ने और उनका मूल्यांकन करने में कठिनाई हो रही थी।

इस बीच, मंगलवार 2 जून को 18 वर्षीय सार्थक सिद्धांत ने शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल मामलों की संसदीय स्थायी समिति के समक्ष बोर्ड की खरीद प्रक्रिया से जुड़े अपने निष्कर्ष प्रस्तुत किए। उन्होंने समिति को सात पृष्ठों का एक नोट सौंपा, जिसमें ओएसएम टेंडर प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों का उल्लेख किया गया था। नोट में ऐसे नियमों और शर्तों की ओर भी इशारा किया गया था, जिनके बारे में उनका दावा था कि उन्हें किसी विशेष वेंडर को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से तैयार किया गया था।

समिति के कुछ सदस्यों ने इस विषय पर उनकी गहरी समझ और जानकारी की सराहना की। उनका मानना था कि इस क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता और अनुभव का लाभ मंत्रालय को नीतिगत तथा तकनीकी स्तर पर मिल सकता है।

दिलचस्प बात यह है कि इस प्रणाली की कुछ प्रमुख कमियों को सबसे पहले छात्रों और युवा तकनीकी विशेषज्ञों ने ही उजागर किया। सार्थक के अलावा, 19 वर्षीय एथिकल हैकर निसर्ग अधिकारी ने 31 मई को एक्स पर एक पोस्ट में दावा किया था कि वह पोर्टल के माध्यम से छात्रों की स्कैन की गई उत्तर पुस्तिकाओं तक पहुंच बना सकते हैं। अपने दावे के समर्थन में उन्होंने एक स्क्रीनशॉट भी साझा किया था। बाद में बोर्ड ने इन खामियों के अस्तित्व को स्वीकार किया।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, इस सिस्टम को लागू करने से पहले सीबीएसई ने वेंडर के सिक्योरिटी ऑडिट सर्टिफिकेट का स्वतंत्र सत्यापन नहीं कराया था।

ज्ञात हो कि उत्तर पुस्तिकाओं के मेल न खाने और मूल्यांकन प्रक्रिया में कथित विसंगतियों को लेकर बढ़ती शिकायतों के बीच दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई है। याचिका में ओएसएम प्लेटफॉर्म की तकनीकी खामियों, मूल्यांकन प्रक्रिया में सामने आई अनियमितताओं और शिकायत निवारण तंत्र में कथित कमियों की न्यायिक जांच कराने की मांग की गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, 12वीं कक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन से कई महीने पहले ही इस प्लेटफॉर्म की कमियों की ओर बोर्ड का ध्यान आकर्षित किया गया था। जनवरी 2026 में सीबीएसई ने दिल्ली में तीन दिवसीय ओएसएम पायलट परीक्षण आयोजित किया था। इसमें पांच स्कूलों के प्रधानाचार्य, मुख्य परीक्षक और विषय विशेषज्ञ शामिल हुए थे। इन संस्थानों में केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय और प्रमुख निजी स्कूल शामिल थे।

इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद दो औपचारिक रिपोर्टें प्रस्तुत की गईं, जिनमें सिस्टम में पाई गई अनेक तकनीकी और परिचालन संबंधी खामियों का विस्तार से उल्लेख किया गया था।

रिपोर्टों में जिन समस्याओं की ओर विशेष रूप से ध्यान दिलाया गया था, उनमें अतिरिक्त मुख्य परीक्षकों द्वारा बढ़ाए गए अंकों का सिस्टम में कटौती के रूप में दिखाई देना, स्क्रीन पर प्रदर्शित अंकों का आधिकारिक अंकन योजना (मार्किंग स्कीम) से मेल न खाना, बहु-भाग वाले प्रश्नों में केवल एक उप-भाग के अंकों की गणना होना, सिस्टम द्वारा उन स्थानों पर भी भिन्नात्मक अंक (फ्रैक्शनल मार्क्स) देने के लिए बाध्य करना जहां इसकी अनुमति नहीं थी, मूल्यांकन प्रगति का स्वतः सुरक्षित न होना, ‘अनडू’ फ़ंक्शन के उपयोग पर प्लेटफॉर्म का फ्रीज़ हो जाना और खाली या अनुत्तरित प्रश्नों के लिए भी अंक देने की अनुमति शामिल थीं।

दोनों रिपोर्टों में ओएसएम सिस्टम के पूर्ण कार्यान्वयन को कम-से-कम एक वर्ष के लिए टालने की सिफारिश की गई थी। रिपोर्टों में कहा गया था कि प्रणाली को व्यापक स्तर पर लागू करने से पहले अतिरिक्त परीक्षण, तकनीकी मूल्यांकन और पायलट अभ्यास किए जाने चाहिए।

रिपोर्ट के अनुसार, दूसरी रिपोर्ट में 36 से अधिक तकनीकी और परिचालन संबंधी चिंताओं को रेखांकित किया गया था। इसमें यह भी कहा गया था कि बोर्ड की गवर्निंग बॉडी ने सुझाव दिया था कि ओएसएम को क्षेत्रीय कार्यालयों में पायलट प्रोजेक्ट पूरे होने के बाद ही लागू किया जाए, जो जून 2025 तक संभव हो सकता था। हालांकि, जनवरी में किया गया ड्राई रन केवल पांच स्कूलों तक ही सीमित रहा।

इन रिपोर्टों के जवाब में सीबीएसई ने कहा था कि सिस्टम में पाई गई तकनीकी गड़बड़ियों को दूर कर दिया गया है। हालांकि, पिछले कई सप्ताहों से ओएसएम प्लेटफॉर्म को लेकर जारी विवाद और लगातार सामने आ रही शिकायतों के कारण इस दावे पर भी सवाल उठ रहे हैं।

सुरक्षा में सेंध की जानकारी सार्वजनिक होने के बाद सीबीएसई के चेयरमैन राहुल सिंह और बोर्ड के सचिव हिमांशु गुप्ता का तबादला कर दिया गया है।

ओएसएम सिस्टम के लिए सेवाओं की खरीद प्रक्रिया की जांच के उद्देश्य से एक समिति गठित की गई है। समिति को अपनी जांच पूरी कर एक महीने के भीतर कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) को रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है।

इसके साथ ही छात्रों को पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन करने हेतु 6 जून तक का समय दिया गया है। हालांकि, स्कैनर के स्पेसिफिकेशन में बदलाव को लेकर अब तक कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।

उल्लेखनीय है कि सीबीएसई के नए ओएसएम सिस्टम पर छात्र, अभिभावक और विपक्षी दल सभी सवाल उठा रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि जिस प्रणाली को मूल्यांकन प्रक्रिया को अधिक सटीक और तेज बनाने के उद्देश्य से लागू किया गया था, वही अब गंभीर सवालों के घेरे में है। 12वीं कक्षा के कई छात्रों ने धुंधली स्कैन की गई उत्तर पुस्तिकाओं, पोर्टल क्रैश होने और यहां तक कि उत्तर पुस्तिकाओं के आपस में बदल जाने जैसी शिकायतें दर्ज कराई हैं।

सीबीएसई के 26 मई 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, परीक्षा में शामिल 17,68,968 छात्रों में से 4,04,319 छात्रों ने अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैन कॉपी प्राप्त करने के लिए आवेदन किया। यह संख्या कुल परीक्षार्थियों का लगभग 23 प्रतिशत है।

कुछ दिन पहले लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने सीबीएसई द्वारा ओएसएम कॉन्ट्रैक्ट देश की सबसे बड़ी आईटी सेवा कंपनी ‘टीसीएस’ के बजाय ‘कोएम्प्ट एडुटेक’ को दिए जाने पर सवाल उठाए थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस मामले पर चुप्पी यह दर्शाती है कि उन्हें केवल अपनी सरकार बचाने की चिंता है, लाखों छात्रों के भविष्य की नहीं।

ज्ञात हो कि हाल के वर्षों में नीट पेपर लीक विवाद के बाद ओएसएम गड़बड़ी का मामला केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्रालय के सामने एक नई चुनौती के रूप में उभरा है। छात्र संगठनों, विपक्षी दलों और नागरिक समाज के विभिन्न समूहों ने भी इस मुद्दे को लेकर चिंता और नाराजगी व्यक्त की है।

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