उत्तर प्रदेश: आजमगढ़ में दलित युवक सनी की मौत-आत्महत्या या पुलिस की हैवानियत?-ग्राउंड रिपोर्ट

Written by विजय विनीत | Published on: April 4, 2025
नेताओं के सवाल और मीडिया ट्रायल से परेशान सनी की मां कुसुम देवी की हालत अचानक बिगड़ जाती है। आनन-फानन में डॉक्टर बुलाए जाते हैं और हाथ में ड्रिप लगा दी जाती है। आसपास बैठी औरतें रोने लगती हैं। सनी के पिता हरिकांत जैसवार भी गहरे सदमे में हैं।


थाना पर लोगों का जमावड़ा

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के उमर पट्टी गांव की दलित बस्ती में हरिकांत जैसवार के घर पर मीडिया और नेताओं का जमावड़ा है। एक टीवी चैनल का एंकर कैमरा की ओर देखते हुए कहता है, "सनी जैसवार की पुलिस हिरासत में मौत पर सेक्युलर लोग शांत हैं।"

हरिकांत के घर के अंदर पुराने मकान के एक छोटे कमरे में रिश्तेदार बैठे हैं। सनी की चाची सुनीता देवी मीडिया से बात कर रही हैं। पास में बैठी सनी की नाबालिग और विकलांग बहन शालू गुमसुम है। वह आंखों में आंसू भरकर कहती है, "आसपास के लोग मेरे भाई के बारे में बहुत गलत-गलत बातें कर रहे हैं। आप इनसे कहिए कि ऐसी बातें ना करें। वह ऐसा लड़का नहीं था कि पुलिस उसकी जान ले ले। अपनी पढ़ाई के अलावा उसे किसी और बात से मतलब नहीं था।"

नेताओं के सवाल और मीडिया ट्रायल से परेशान सनी की मां कुसुम देवी की हालत अचानक बिगड़ जाती है। आनन-फानन में डॉक्टर बुलाए जाते हैं और हाथ में ड्रिप लगा दी जाती है। आसपास बैठी औरतें रोने लगती हैं। सनी के पिता हरिकांत जैसवार भी गहरे सदमे में हैं।

हरिकांत कहते हैं, "हमारा बेटा निर्दोष था। झूठी शिकायत पर पुलिस आई और उसे उठा ले गई। 29 मार्च 2025को पुलिस ने मेरे बेटे को गिरफ्तार किया और 30 मार्च की रात उसे थर्ड डिग्री दी। उसे इतना मारा कि मेरे इकलौते बेटे की जान चली गई। बाद में शौचालय में सुसाइड करने की झूठी कहानी गढ़ दी। गौर करने की बात यह है कि मेरा बेटा टी-शर्ट और जींस पहनकर गया था, लेकिन पुलिस ने डेड बॉडी लौटाई तो वह लोअर में था।"

दलित युवक सनी की फाइल फोटो 

हरिकांत का दर्द छलकता है, "हम अनुसूचित जाति से हैं और पुलिस हमें गाजर-मूली समझकर काट देती है। सनी की मौत के लिए पूरा तरवां थाना जिम्मेदार है। पुलिस के आला अधिकारी अपने मातहतों को बचाने में जुटे हैं। डॉक्टरों ने फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार कर दी है। हम अपने बेटे को जलाना चाहते थे, लेकिन पुलिस ने जबरन शव को दफना दिया। हमें मजिस्ट्रेटी जांच नहीं, न्यायिक जांच चाहिए। कब्र से मेरे बेटे का शव निकाला जाए और डॉक्टरों के पूरे पैनल के साथ कैमरे के सामने दोबारा पोस्टमार्टम कराया जाए।"

मेहनती छात्र को निगल गई पुलिस

23 वर्षीय सनी जैसवार बीए की पढ़ाई कर रहा था और साथ ही नौकरी की तैयारी भी। वह बनारस में बीएचयू के पास एक कमरा लेकर रहता था। जिस लड़की पर छेड़खानी का आरोप लगाया गया, वह भी उमर पट्टी की ही रहने वाली थी। सनी और लड़की के घर के बीच महज 400 मीटर की दूरी थी।

हरिकांत जैसवार बताते हैं, "दोनों परिवार एक ही गांव के थे। इसलिए हम नहीं चाहते थे कि वे आपस में मिलें। लड़की खुद हमारे बेटे के पीछे पड़ी थी। हमने सनी का सिम बदलवा दिया, तब भी लड़की उसे परेशान करती रही। इसके बाद पंचायत बुलाई गई, जिसमें पुलिस भी मौजूद थी। लड़की के पिता ने अपनी बेटी की गलती मानी और वादा किया कि वह सनी को अब परेशान नहीं करेगी। मगर 20 दिन बाद लड़की के पिता ने थाने में झूठी शिकायत दर्ज करा दी।"

"29 मार्च को पुलिस आई और हमारे बेटे को पूछताछ के नाम पर उठा ले गई। उसे हथकड़ी लगाकर लाकअप में रखा गया। 31 मार्च की सुबह हमें पुलिस की झूठी कहानी सुनने को मिली कि सनी ने शौचालय में आत्महत्या कर ली। गौर करने की बात यह है कि नाड़े से क्या 72 किलो का इंसान बिना खूंटी के फांसी लगा सकता है?"

हरिकांत बताते हैं, "30 मार्च की रात करीब 9 बजे मेरे कुछ रिश्तेदार सनी के लिए खाना लेकर तरवां थाने पहुंचे थे। पुलिस ने उन्हें भगा दिया। उसी रात मेरे बेटे को टार्चर किया गया। पूरी रात उसे पीटा गया और जब उसने दम तोड़ दिया तो पुलिस ने झूठी कहानी गढ़ दी। शव का वीडियो देखिए, गले में रस्सी का निशान नीचे है, जिससे साफ पता चलता है कि हत्या के बाद निशान बनाया गया होगा।"

"सनी की मौत के बाद गांव के लोग थाने पहुंचे तो सभी दरोगा और सिपाही मोबाइल बंद कर भाग निकले। हमें शक है कि थाने का सीसीटीवी कैमरा भी बंद कर दिया गया होगा या डीवीआर की हार्डडिस्क गायब कर दी गई होगी। हमारी मांग है कि डीवीआर की फुटेज की कॉपी हमें भी दी जाए।"

इसी टायलेट में कथित तौर पर सनी ने लगाई थी फांसी

सनी की बड़ी बहन आंचल कुमारी उर्फ डिंपल (26 साल) कहती है, "हमें भाई की लड़की से दोस्ती के बारे में जानकारी थी। पंचायत में तय हुआ था कि दोनों एक-दूसरे से नहीं मिलेंगे। लेकिन लड़की ने पीछा नहीं छोड़ा। अगर लड़की से दोस्ती थी भी तो पुलिस को हमारे भाई को पीट-पीटकर मारने की क्या जरूरत थी?"

सनी के पिता हरिकांत जैसवार मुंबई में काम करते थे। बेटे के पकड़े जाने की खबर सुनते ही वह फ्लाइट पकड़कर बनारस पहुंचे, लेकिन तब तक पुलिस ने शव दफना दिया था। सनी की मौत के बाद से उसकी मां कुसुम देवी की हालत बिगड़ गई है। लोग घर पहुंचते हैं तो वह रोने लगती हैं और बार-बार बेहोश हो जाती हैं।

आजमगढ़ से उमर पट्टी की दूरी करीब 45 किमी है। इस गांव में 80 से अधिक दलित परिवार रहते हैं। ग्राम प्रधान नागेंद्र चौबे की पहल पर पहले इस मामले में लिखित तौर पर सुलह-समझौता हो चुका था, लेकिन पुलिस की क्रूरता ने एक होनहार युवक की जान ले ली। जिस लड़की की वजह से यह घटना घटी, उसके परिजन गांव से फरार हो चुके हैं। खास बात यह है कि समझौते में पैसे का लेन-देन भी हुआ था। सनी के परिजनों ने मान-सम्मान के एवज में आर्थिक तौर पर भरपाई की थी।

उधर इस मामले में उग्र भीड़ द्वारा थाने पर प्रदर्शन के दौरान हुए लाठी चार्ज के बाद बिखरी भीड़ द्वारा पुलिस की गाड़ी तोड़ फोड़ करने पर संगीन धाराओं के तहत 13 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज वहीं 40 अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई है। पुलिस अधिकारियों का दावा है कि उपद्रवियों की गिरफ्तारी के लिए दबिश दी जा रही है।


पुलिस का कहना है कि इसी ग्रील में नाड़े से सनी ने लगाई थी फांसी

31 मार्च की रात क्या हुआ?

सनी की चाची सुनीता देवी काफी एक्टिव महिला हैं। नेताओं और पत्रकारों से वही बातचीत करती हैं। वह कहती हैं, "30 मार्च 2025 की रात दस बजे तक सनी लॉकअप में ठीक था। रात में दरोगा और सिपाहियों ने उसे बुरी तरह पीटा और तब तक मारा जब तक उसकी जान नहीं चली गई। हत्या के बाद भी पुलिस वालों ने हमें खबर नहीं दी। वो सभी मौत को छिपाते रहे और झूठी कहानियां गढ़ते रहे। 30 मार्च तक हमें तनिक भी एहसास नहीं था कि पुलिस उसकी जान ले लेगी।"

सुनीता कहती हैं, "हमें भी अंदाज़ा नहीं था कि ऐसा हो सकता है। हमें लगा था जब पंचायत में फैसला हो चुका है तो पुलिस पूछताछ करने के बाद छोड़ देगी। अब ऐसी बातों पर क्या पुलिस किसी की जान ले लेती है। पुलिस अफसर शुरुआत में हमारी एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी कर रही थी। सनी दो बहनों में इकलौता भाई था और वो पढ़ने में बहुत अच्छा था। वह घर आता था तो आसपास के बच्चों को फ्री में भी पढ़ाता था। वो पढ़ाई के अलावा किसी तरह की बात नहीं करता था।"

क्या कभी सनी ने उस लड़की के बारे में अपने परिजनों से बात की थी? इस सवाल पर उसकी चाची सुनीता कहती हैं, "उसने कभी किसी लड़की के बारे में घर में बात नहीं की थी। वो लड़की उसे क्लास में मिली थी, अगर दोनों की दोस्ती भी थी तो इसमें गलत क्या है? आजकल बच्चों की दोस्ती हो जाती है। सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि एक नौजवान लड़के को सिर्फ एक लड़की से दोस्ती होने की वजह से जान से मार दिया गया है। ये घटनाएं कब तक होती रहेंगी?"

हरिकांत के पड़ोसी सूर्यकांत कहते हैं, "इस इलाके में इस तरह की घटना पहले नहीं हुई है, एक नौजवान को इस तरह मारा गया है, इस मामले में त्वरित सुनवाई होनी चाहिए ताकि आगे ऐसी घटना ना हो। यदि ऐसे मामलों में त्वरित सुनवाई ना हुई और इंसाफ न मिला तो पुलिस व सरकार दोनों की साख गिर जाएगी। लोग ऐसी घटनाओं पर भी तनाव भड़का सकते हैं। पीड़ित परिवार गरीब है और उन्हें अभी तक आर्थिक मदद भी नहीं मिली है। वैसे भी कोई आर्थिक मदद उनके जख्मों को नहीं भर सकती है। गांव का नौजवान असमय चला गया है। हम किसी भी कीमत पर उसके लिए इंसाफ चाहते हैं। जो भी इस घटना में शामिल है बचना नहीं चाहिए।"

सनी की दादी सुखदेयी देवी सुबकते हुए कहती हैं, "सनी पढ़ने-लिखने वाला लड़का था, पता नहीं लड़की ने उसे कैसे अपनी जाल में फंसा लिया। बेगुनाह होने के बावजूद पुलिस ने फंसाया और उसकी जान ले ली। अब तो हमारी जिंदगी में अंधेरा ही अंधेरा है।" उमर पट्टी में सनी की मां को जब भी होश आता है, वो रोते हुए कातिल पुलिस वालों के खिलाफ सख्त से सख्त सज़ा की मांग करने लगती हैं।

सनी के पिता हरिकांत जैसवार, जिनकी आंखों में अब भी बेटे को खोने का अविश्वास झलकता है, सरकार से अपील करते हैं, "हमें न्याय चाहिए। हमें किसी से सहानुभूति नहीं चाहिए, हमें सिर्फ न्याय चाहिए। अगर आज हमारे बेटे को ऐसे मार दिया गया और कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो कल किसी और के बेटे के साथ भी ऐसा ही होगा। क्या हम दलित होकर इंसाफ के हकदार नहीं हैं?" यह कहते हुए उनकी आवाज भर्रा जाती है और उनके चेहरे पर छाया दर्द साफ झलकता है।

थाने में नेताओं की गहमा-गहमी

गांव के बुजुर्गों की आंखों में भी नमी है। एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति कहते हैं, "पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि पुलिस ने इस तरह से किसी मासूम को मार दिया हो। यह अन्याय है और इसके खिलाफ लड़ना जरूरी है। नहीं तो कल कोई और सनी इस बेदर्दी का शिकार होगा।"

गांव के लोग अब भी सन्न हैं। हर किसी की आंखों में सवाल हैं, मगर जवाब कोई नहीं दे पा रहा। पुलिस से इंसाफ की उम्मीद धुंधली पड़ती जा रही है, लेकिन सनी का परिवार अब भी इस उम्मीद में बैठा है कि शायद कोई उनकी पुकार सुने और उन्हें इंसाफ मिले। अब यह सवाल उठता है कि क्या सनी को न्याय मिलेगा? या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा? न्याय की इस लड़ाई में अब पूरा समाज सनी के परिवार के साथ खड़ा है और उनका कहना है कि वे तब तक चैन से नहीं बैठेंगे, जब तक न्याय नहीं मिल जाता।

घटना से पहले और बाद में क्या हुआ?

31 मार्च 2025 की सुबह उमरी पट्टी गांव में मातम पसरा था। सनी कुमार की मौत की ख़बर आग की तरह फैल चुकी थी। रात तक जो लड़का पुलिस हिरासत में था, वो अब लाश बन चुका था। तरवां थाने के एक संकरे, अंधेरे टायलेट में उसकी ज़िंदगी खत्म हो चुकी थी। पुलिस कह रही थी कि यह आत्महत्या थी, लेकिन घरवालों की चीखें कुछ और बयान कर रही थीं।

सनी की चाची सुनीता देवी का गला रो-रोकर सूख चुका था। वह लगातार दोहराए जा रही थीं कि उनका भतीजा इतना कमजोर नहीं था कि अपनी जान ले ले। वह कहती हैं कि रात के अंधेरे में पुलिसवालों ने उसे बेरहमी से मारा। जब तक वह बेहोश नहीं हुआ, लाठियां चलाते रहे और फिर, जब उसकी सांसें थम गईं, तब उन्होंने आत्महत्या की कहानी गढ़ दी।

पुलिस का बयान था कि 31 मार्च की सुबह सनी का शव लॉकअप के टॉयलेट में लटका मिला। वह नाड़े से फांसी पर झूल रहा था। लेकिन सवाल उठने लगे—थाने में मौजूद पुलिसकर्मियों को रातभर कुछ क्यों नहीं दिखा? चार फीट ऊंची खिड़की से कोई अपने ही हाथों कैसे लटक सकता है?

आजमगढ़ के उमरी पट्टी गांव के लोगों में जबर्दस्त गुस्सा था। सनी की मौत की सूचना पर सुबह होते ही भीड़ जुटने लगी। लोगों ने सड़कें जाम कर दीं। नारे लगने लगे—"सनी को इंसाफ दो, कातिलों को सज़ा दो!" पुलिस पहले चुप रही, लेकिन जब भीड़ काबू से बाहर होने लगी, तो लाठियां बरसने लगीं। आंसू गैस के गोले दागे गए। माहौल और बिगड़ता चला गया...।

शाम होते-होते सनी का शव घर लाया गया। मां बेसुध पड़ी थीं। बहनें भाई की तस्वीर से लिपटकर रो रही थीं। पिता हरिकांत के आंसू सूख चुके थे, लेकिन उनकी आंखों में सवाल था, “मेरा बेटा किसका गुनहगार था?”



पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट कह रही थी कि मौत दम घुटने से हुई, लेकिन परिजन इसे हत्या करार दे रहे थे। 31 मार्च को रात के नौ बजे तक पुलिस सनी के अंतिम संस्कार का दबाव बना रही थी, लेकिन परिवार अड़ गया, “जब तक हत्यारों पर केस दर्ज नहीं होगा, हम चिता नहीं जलाएंगे।”

आजमगढ़ जिले के आला अधिकारी मौके पर पहुंचे, समझाने की कोशिशें हुईं, लेकिन इंसाफ की मांग पर अडिग लोग टस से मस नहीं हुए। आखिरकार, रात के अंधेरे में, भारी पुलिस बल की मौजूदगी में कब्र खोदी गई और उसमें सनी को दफना दिया गया। पुलिस ने आनन-फानन में तरवां थाना प्रभारी, एक दरोगा और एक सिपाही को निलंबित कर दिया गया, लेकिन लोगों को यह महज़ दिखावा लगा।

राजनीतिक दलों के बयान आने लगे। समाजवादी पार्टी ने इसे दलितों पर अत्याचार करार दिया। कांग्रेस ने सरकार की नीयत पर सवाल उठाए। भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं ने ऐलान किया कि वे सनी को इंसाफ दिलाने के लिए सड़क पर उतरेंगे। उधर, गांव की गलियों में अजीब-सी ख़ामोशी थी। दीवारों पर चिपके पोस्टर फाड़ दिए गए थे। सनी की बहनों के रोने की आवाज़ें दूर तक सुनाई दे रही थीं। और मां... मां बस एक ही बात बड़बड़ा रही थीं, "मेरा लाल तो बस पढ़ना चाहता था... उसका कसूर क्या था?"

बढ़ता जनाक्रोश, नेताओं का जमघट

सनी कुमार की मौत को लेकर आज़मगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे पूर्वांचल के दलितों में गुस्से की लहर दौड़ रही है। दलित संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस घटना को पुलिस की बर्बरता और जातिगत भेदभाव का एक और उदाहरण बताया है। स्थानीय स्तर पर आक्रोशित लोग लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। पुलिस और प्रशासनिक अमला हर स्थिति पर नजर बनाए हुए है, लेकिन तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है।

घटना के बाद से राजनीतिक दलों के बयान भी तेज़ हो गए हैं। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ट्वीट कर लिखा, "यह दलित उत्पीड़न का जघन्य उदाहरण है। यूपी सरकार को जवाब देना होगा कि उसकी पुलिस थानों में हिरासत में मौतें क्यों हो रही हैं? दोषियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज हो और पीड़ित परिवार को न्याय मिले।" कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी सरकार को घेरते हुए बयान जारी किया, "उत्तर प्रदेश में कानून का नहीं, बल्कि सत्ता का राज चल रहा है। पुलिस जनता की सुरक्षा के लिए है, लेकिन जब वही पुलिस अत्याचार करने लगे, तो जनता कहां जाएगी?"

भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद आज़मगढ़ पहुंचने वाले हैं। उन्होंने कहा है कि यदि दोषियों पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो वे आंदोलन छेड़ देंगे। उधर, बसपा सुप्रीमो मायावती ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, "यूपी में दलित समाज के लोगों पर अत्याचार बढ़ रहा है। बीजेपी सरकार दलितों के हक की बात तो करती है, लेकिन न्याय देने में हमेशा पीछे रहती है।"


दलितो को पीटने के लिए थप्पड़ दिखाते पुलिस कप्तान 

सनी की मां कुसुम देवी हर आने-जाने वाले से एक ही सवाल पूछ रही हैं, "मेरा बेटा कहां गलत था?" पिता हरिकांत पुलिस से सिर्फ एक बात कह रहे हैं, "मेरे बच्चे ने कुछ नहीं किया था, फिर उसे क्यों मारा?" परिवार का कहना है कि सनी के साथ निर्दयता से मारपीट की गई और फिर पुलिस ने उसे झूठे केस में फंसा दिया। परिजन इस घटना की न्यायिक जांच और दोषी पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी की मांग कर रहे हैं।

वहीं, गांव के लोग खुलकर बोलने से डर रहे हैं। लेकिन दबे स्वर में कई लोगों ने बताया कि पुलिस ने परिवार को धमकाया था कि यदि वे ज़्यादा विरोध करेंगे, तो उनके खिलाफ भी केस दर्ज कर दिए जाएंगे। मृतक की बहनों का कहना है, "भैया ने तो बस प्यार किया था। क्या यही गुनाह था? क्या किसी दलित को मोहब्बत करने की इजाजत नहीं?"

इस घटना ने एक बार फिर हिरासत में होने वाली मौतों पर बहस छेड़ दी है। पिछले तीन वर्षों में यूपी में पुलिस कस्टडी में 35 से अधिक मौतें हुई हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर मामलों में जांच की आंच पुलिस तक नहीं पहुंची। क्या सनी का मामला भी ऐसे ही दब जाएगा?

मानवाधिकार कार्यकर्ता राजीव यादव कहते हैं, "आजमगढ़ में हर बार पुलिस कस्टडी में हुई मौत को आत्महत्या का नाम दे दिया जाता है। यह कोई इकलौती घटना नहीं है। जब तक सिस्टम में जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे मामलों में न्याय नहीं मिलेगा।  सनी की मौत के बाद उसका गांव सिसक रहा है, लेकिन उसके सवाल हवा में तैर रहे हैं—क्या सच सामने आएगा? क्या दोषियों को सजा मिलेगी? या फिर यह मामला भी किसी फाइल में कैद होकर इंसाफ का इंतजार करता रहेगा?"

थम नहीं रही जुल्म-ज्यादती

आजमगढ़ में दलितों पर अत्याचार की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। दलित युवकों की पिटाई, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, जातिगत भेदभाव और पुलिस की बर्बरता की खबरें आए दिन सामने आती रहती हैं। यह सिलसिला कोई नया नहीं है, बल्कि वर्षों से चलता आ रहा है। हर साल ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, जो दलितों के खिलाफ हिंसा की भयावह तस्वीर पेश करती हैं।

आजमगढ़ का तरवां थाना विशेष रूप से पुलिस की ज्यादतियों के लिए कुख्यात है। जनवरी 2023 में ठाटा ऊचहुंआ गांव में शोभनाथ चौहान नामक व्यक्ति का पड़ोस की एक महिला से विवाद हो गया। यह महिला तरवां थाने के सिपाहियों प्रभात त्रिपाठी और प्रशांत पांडे के संपर्क में थी। उसने पुलिस को बुला लिया, और ये दोनों सिपाही तत्काल गांव पहुंच गए। उस समय शोभनाथ खाना खा रहे थे।

जब वह तुरंत बाहर नहीं आए, तो पुलिस उनके घर में घुस गई, उन्हें बाहर निकाला और लात-घूसों से पीटना शुरू कर दिया। सिर पर गंभीर चोट लगने से वह बेहोश हो गए। जब ग्रामीणों ने इस घटना का वीडियो बनाना शुरू किया, तो दोनों सिपाही वहां से भाग निकले। गंभीर रूप से घायल शोभनाथ को पहले जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन उनकी मौत हो गई। इस मामले में भी तरवां थाना पुलिस ने फांसी लगाकर आत्महत्या की झूठी कहानी गढ़ दी।

आजमगढ़ के पलिया गांव की घटना आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। जब मामूली झड़प के बाद पुलिस ने रात में दलित बस्ती पर हमला बोल दिया। तत्कालीन पुलिस क्षेत्राधिकारी गोपाल स्वरूप वाजपेयी और सगड़ी के एसडीएम गौरव कुमार की मौन स्वीकृति से पुलिस ने महिलाओं और बच्चों तक को नहीं बख्शा। पुलिसकर्मियों ने जमकर लूटपाट की, महिलाओं के कपड़े फाड़े, गुप्तांगों पर हमला किया और कुछ महिलाओं व लड़कियों की इज्जत से भी खिलवाड़ किया। उनके आभूषण और कीमती सामान लूट लिए गए।

बाद में चार मकानों को जेसीबी से जमींदोज कर दिया गया। इस घटना की जड़ एक लड़की के आपत्तिजनक वीडियो से जुड़ी थी, जिसे लेकर पंचायत के दौरान झगड़ा हुआ। पुलिस की बर्बरता से गांव में दहशत का माहौल बन गया। प्रशासन इस घटना को मामूली बताने में लगा रहा, लेकिन कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी के ट्वीट के बाद यह मामला तूल पकड़ गया। बावजूद इसके, पीड़ितों को आज तक न्याय नहीं मिला।

पुलिसिया उत्पीड़न की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जुलाई 2021 के पहले हफ्ते में पुलिस अधीक्षक सुधीर कुमार सिंह ने भारी पुलिस बल के साथ गोधौरा गांव में दलितों के घर गिरवा दिए थे। इस दौरान महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार हुआ और लूटपाट की गई। इसी तरह, जीयनपुर थाना क्षेत्र के भटौली इब्राहिमपुर गांव के लाटघाट कस्बे में पुलिस ने दलित डॉ. शिवकुमार को जबरन थाने ले जाकर शांतिभंग के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। यह गिरफ्तारी सिर्फ इस वजह से की गई थी कि वो दलित थे और उन्होंने करणी सेना के खिलाफ टिप्पणी कर दी थी।

आजमगढ़ के एससी/एसटी कोर्ट ने दो महीने पहले एक दलित की हत्या के मामले में तीन लोगों को आजीवन कारावास और 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। साल 2003 में बरदह थाना क्षेत्र के उसरगांव गांव में राजेंद्र नामक व्यक्ति की हत्या कर दी गई थी। कोर्ट ने राणा प्रताप सिंह, प्रदीप सिंह और मनीष सिंह को दोषी मानते हुए सजा सुनाई।

दलितों पर अत्याचार की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन प्रशासन की भूमिका अक्सर सवालों के घेरे में रहती है। साल 2011 में बैटरी चोरी के आरोप में हिरासत में लिए गए कमलेश पटेल को गंभीरपुर थाना पुलिस ने टॉर्चर करके मार डाला था और बाद में बिलजी के होल्डर से लटककर आत्महत्या की झूठी कहानी गढ़ दी थी। पुलिस पर पीआईएल दाखिल होने के बावजूद आरोपियों पर कोई कड़ी कार्रवाई नहीं हुई। आजमगढ़ की घटनाएं दिखाती हैं कि दलितों पर अत्याचार का सिलसिला जारी है। प्रशासनिक तंत्र के संरक्षण में पुलिसिया जुल्म थमने का नाम नहीं ले रहा। पीड़ित आज भी न्याय की आस में हैं, लेकिन उन्हें अब तक इंसाफ नहीं मिल रहा है।

सांसत में पुलिस अफसरों की जांच

पुलिस क्यों हो जाती है अराजक?

आज़मगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार उमेश राय कहते हैं, "यहां पुलिस इसलिए अराजक है, क्योंकि भाजपा के पास जिले में कोई कद्दावर नेता नहीं है। पुलिस किसी को भी, कभी भी उठा सकती है। क्या पैजामे की डोरी से आत्महत्या संभव है? आज़मगढ़ पुलिस असंभव को संभव करने की कोशिश कर रही है। एसपी और डीएम की कार्यशैली में कोई अंतर नहीं है। दोनों ही भाजपा की छवि को धूमिल कर रहे हैं, विपक्ष को मुद्दे दे रहे हैं और विरोधी दलों के लिए रास्ता आसान बना रहे हैं। अराजकता इस हद तक बढ़ चुकी है कि बिना वारंट के किसी को भी गिरफ्तार किया जा सकता है या किसी का घर गिराया जा सकता है। खासतौर पर अगर कोई दलित पुलिस के निशाने पर आ जाए, तो उसका बच पाना मुश्किल होता है।"

वे आगे कहते हैं, "जब राजा अंधा हो जाता है और सत्ता के नशे में चूर हो जाता है, तब न्याय मांगना भी अपराध बन जाता है। तरवां थाना पुलिस का व्यवहार किसी अंग्रेजी हुकूमत की याद दिलाता है। उनकी तानाशाही और गुंडागर्दी पर सवाल उठना लाज़िमी है। आज़मगढ़ पुलिस जब चाहे, जहां चाहे, बुलडोज़र चला देती है। भारतीय कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो पुलिस को घर तोड़ने का अधिकार देता हो। कानून के मुताबिक, सिर्फ कुर्की और नीलामी का प्रावधान है, घर ढहाने का नहीं। अपराध साबित हुए बिना, किसी सूचना के बगैर किसी का घर गिरा देना क्या पुलिस की गुंडागर्दी नहीं है?"

पत्रकार उमेश राय का सवाल है, "उमर पट्टी गांव में मारे गए निर्दोष सनी को न्याय मिलेगा या यह मामला भी अन्य मामलों की तरह धीरे-धीरे गुमनामी में खो जाएगा? न्याय की इस लड़ाई में पूरा समाज सनी के परिवार के साथ खड़ा है और जब तक इंसाफ नहीं मिलेगा, वे चैन से नहीं बैठेंगे। क्या सरकार का मुआवजा उस मां के दुख को कम कर पाएगा, जिसने अपने बेटे के लिए कभी बद्दुआ तक नहीं मांगी थी? क्या न्याय व्यवस्था सनी की बेगुनाही साबित करेगी या यह मामला भी सरकारी फाइलों में दफन होकर रह जाएगा?"

भारत में दलितों की सुरक्षा के लिए अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 मौजूद है, जिसके तहत दलितों और आदिवासियों के खिलाफ होने वाले अपराधों की जांच, मुकदमा और दंड का प्रावधान है। इसके अलावा पीड़ितों को राहत और पुनर्वास देने के लिए विशेष अदालतों की स्थापना की गई है। अस्पृश्यता को समाप्त करने के लिए 1955 में अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम बनाया गया था, जिसे बाद में नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम में परिवर्तित किया गया। इस कानून के तहत छुआछूत को बढ़ावा देने और उसके प्रयोग करने वालों के खिलाफ कड़ी सजा का प्रावधान है।

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि कई मामले मीडिया और राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण चर्चा में आ जाते हैं, लेकिन अधिकांश घटनाएं पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज तक नहीं हो पातीं। ऐसे में सवाल उठता है कि समस्या कानून में है या उसे लागू करने वालों की मंशा में? क्या दलितों पर हो रही हिंसा की असली वजह समाज की मानसिकता है?

दलित चिंतक विनोद यादव का मानना है कि "दलितों पर हिंसा उनकी बढ़ती जागरूकता और सशक्तिकरण की कीमत है। पहले उनके खिलाफ हिंसक हमले कम होते थे, लेकिन बीते 10-15 वर्षों में ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं। जैसे-जैसे दलित तरक्की कर रहे हैं, वैसे-वैसे उन पर हमले तेज़ हो रहे हैं। यह सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि एक सामाजिक समस्या है।"

वे आगे कहते हैं, "भारत में कानूनों की कोई कमी नहीं है, लेकिन समस्या उनके क्रियान्वयन की है। आज भी ऊंची जातियों के कई लोग दलितों को समान दर्जा देने के लिए तैयार नहीं हैं। मीडिया, पुलिस और न्याय व्यवस्था में भी यह मानसिकता बनी हुई है। पुलिस स्टेशन पीड़ित की पहली उम्मीद होती है, लेकिन कई बार उसे वहां उपेक्षा झेलनी पड़ती है। न्याय पाना गरीबों के लिए हमेशा मुश्किल रहा है और दलितों का एक बड़ा वर्ग आर्थिक रूप से कमजोर है।"

विनोद यादव समाधान सुझाते हैं, "दलितों की आर्थिक स्थिति सुधारने की ज़रूरत है। गांवों में ज़मीन और संपत्ति का न्यायसंगत वितरण होना चाहिए ताकि वे आर्थिक रूप से मजबूत बन सकें। अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जिससे जातिगत भेदभाव कम हो। पुलिस तंत्र को भी संवेदनशील और जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। अपराध दर्ज करना ही काफी नहीं है, बल्कि न्याय प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाना भी ज़रूरी है।"

(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार हैं। आज़मगढ़ से उनकी ग्राउंड रिपोर्ट है।)

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