वाराणसी में अखिलेश के इस दांव से 32 साल से काबिज बीजेपी को लगेगा बड़ा झटका?

Written by Sabrangindia Staff | Published on: March 5, 2022
पूर्वांचल में वाराणसी की शहर दक्षिणी विधानसभा सीट इस चुनाव में काफी चर्चा में है। वजह है काशी विश्वनाथ मंदिर। 32 सालों से इस सीट पर भाजपा जीत रही है। इस बार भाजपाई भी कहने की स्थिति में नहीं है कि क्या होगा?



 दरअसल, 2017 में जीते नीलकंठ तिवारी इस बार भी भाजपा के उम्मीदवार हैं। योगी सरकार में पर्यटन मंत्रालय संभाला। लोगों की सबसे बड़ी नाराजगी इनका पिछले 5 साल क्षेत्र में नहीं दिखना है। दो दिन पहले वीडियो जारी कर इन्होंने माफी मांगी। बोले- व्यस्तता के कारण लोगों से थोड़ी दूरी रही। गलती के लिए माफी मांगता हूं।
 
विश्वनाथ मंदिर वाली इस सीट पर पेशे से अधिवक्ता डॉ. नीलकंठ तिवारी और श्री महामृत्युंजय महादेव मंदिर के महंत कामेश्वर दीक्षित उर्फ किशन दीक्षित आमने सामने हैं। इस सीट की दो खास पहचान हैं। पहली खास बात यह है कि यहां 1989 से लगातार भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है। दूसरी विशेष बात यह है कि यहां बीते साल दिसंबर महीने में श्रीकाशी विश्वनाथ धाम का लोकार्पण हुआ था। 

प्रत्याशी तो यहां 11 हैं, लेकिन मुख्य लड़ाई भाजपा और सपा के बीच मानी जा रही है। भाजपाइयों का कहना है कि 4 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब रोड शो करेंगे तो पासा पलट जाएगा। वहीं, सपाइयों का दावा है कि हमारे नेता अखिलेश यादव और TMC प्रमुख ममता बनर्जी ने गुरुवार को तय कर दिया है कि जीत हमारे ही प्रत्याशी की होनी है।
 
शहर दक्षिणी विधानसभा में मतदाताओं की संख्या 3 लाख 23 हजार 470 है। एक अनुमान के अनुसार, इन मतदाताओं में सबसे ज्यादा संख्या ब्राह्मणों की है। इसके अलावा, मुसलमान, कायस्थ, बंगाली, वैश्य, यादव और खत्री मतदाता भी निर्णायक भूमिका में हैं। बाकी मतदाताओं में पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, गुजराती, महाराष्ट्रियन और सामान्य वर्ग जातियों के मतदाता हैं।

समाजवादी पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस के समर्थन के साथ ही SBSP सहित अन्य दलों के गठबंधन के बाद शहर दक्षिणी विधानसभा से दारानगर स्थित महामृत्युंजय मंदिर के महंत परिवार के सदस्य किशन दीक्षित को प्रत्याशी बनाया है। सपा के रणनीतिकारों का दावा है कि ब्राह्मण, यादव, मुस्लिम, बंगाली और अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं के सहारे उन्हें जीत हासिल होगी।
 
नीलकंठ और किशन दोनों ही ब्राह्मण हैं। किशन का परिवार आस्था के दरबार से जुड़ा होने के कारण ब्राह्मणों के साथ ही सभी वर्गों में प्रभाव रखता है। नीलकंठ और किशन दोनों ही मुख्य धारा की राजनीति में छात्र राजनीति से आए हैं। भाजपा के ही लोगों का कहना है कि नीलकंठ विधायक बने तो उनके व्यवहार में परिवर्तन आ गया। वहीं, किशन सभी के लिए सर्वसुलभ हैं। राजनीति के जानकार कहते हैं कि जातिगत समीकरण और अपने व्यवहार के कारण किशन दीक्षित BJP के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन कर उभरे हैं।

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