छत्तीसगढ़ के एक गांव में रविवार की प्रार्थना सभा के दौरान एक गर्भवती महिला सहित 25 से अधिक ईसाइयों पर हमला किया गया। इस घटना के बाद क्षेत्र में ईसाई समुदायों की सुरक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं।

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले की ग्राम पंचायत पालेम के अंतर्गत आने वाले सद्रापाल गांव में यह घटना 31 मई को हुई। यहाँ लगभग 70 अनुयायी अपनी नियमित प्रार्थना सभा के लिए इकट्ठा हुए थे। इस सभा का नेतृत्व स्थानीय प्रार्थना फेलोशिप समन्वयक हुंगा मंडावी कर रहे थे।
पीड़ितों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, अचानक लोगों का एक समूह प्रार्थना सभा में घुस आया और वहां मौजूद लोगों पर हमला कर दिया। इस हमले में कई अनुयायी घायल हो गए, जिनमें मंडावी और उनकी गर्भवती पत्नी भी शामिल हैं। गर्भवती महिला पर हुए इस हमले ने स्थानीय ईसाई समुदाय के बीच गहरी चिंता और आक्रोश पैदा कर दिया है।
कैथोलिक कनेक्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रभावित समुदाय के सदस्यों ने बताया कि करीब 25 से 30 लोगों के साथ मारपीट की गई है, जिनमें से कम से कम पांच लोगों को गंभीर चोटें आईं। घायलों में से कुछ का इलाज टोंगपाल स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में किया गया, जबकि जिन्हें अधिक गहन चिकित्सा देखभाल (ICU) की आवश्यकता थी, उन्हें सुकमा के जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया।
समुदाय के सदस्यों ने इस बात पर जोर दिया कि जब हमला हुआ, तब सभी अनुयायी शांतिपूर्वक प्रार्थना कर रहे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि यह हिंसा उनके ईसाई धर्म और पूजा-पाठ की गतिविधियों के प्रति नफरत की भावना से प्रेरित थी। स्थानीय ईसाइयों ने उन दावों को भी सिरे से खारिज कर दिया, जिनमें इस घटना को जमीन विवाद से जोड़ा जा रहा था। उन्होंने साफ किया कि इस हमले का किसी भी संपत्ति या निजी विवाद से कोई लेना-देना नहीं था।
इस मामले में पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कर ली है और शिकायत में कई नामजद लोगों को शामिल किया गया है। प्रभावित परिवारों ने अधिकारियों से अपील की है कि वे इस घटना की निष्पक्ष, पारदर्शी और विस्तृत जांच कराएं और इसके लिए जिम्मेदार दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करें।
इस घटना ने क्षेत्र के ईसाइयों के बीच मौलिक संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं, जिनमें अंतरात्मा की स्वतंत्रता और अपने धर्म को मानने तथा उसका शांतिपूर्ण पालन करने का अधिकार शामिल है। स्थानीय लोगों ने बताया कि इस बर्बर हमले के कारण कई परिवार बुरी तरह भयभीत और सदमे में हैं।
चर्च के सदस्यों और समुदाय के नेताओं ने सरकारी अधिकारियों, कानून प्रवर्तन एजेंसियों, मानवाधिकार निकायों और नागरिक समाज संगठनों से अपील की है कि वे पीड़ितों और प्रत्यक्षदर्शियों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। साथ ही घायलों को पर्याप्त चिकित्सा देखभाल और पुनर्वास सुविधाएं प्रदान की जाएं, और भविष्य में होने वाली हिंसा या डराने-धमकाने की घटनाओं को रोकने के लिए पुख्ता एहतियाती कदम उठाए जाएं।
समुदाय ने इस हमले में घायल हुए लोगों के लिए प्रार्थना करने का भी अनुरोध किया है, विशेष रूप से उन लोगों के लिए जिन्हें गंभीर चोटें आई हैं और उस गर्भवती महिला के लिए जो इस हिंसा का शिकार हुई। स्थानीय ईसाइयों ने उम्मीद जताई है कि उन्हें न्याय मिलेगा और स्वतंत्र रूप से पूजा करने व शांतिपूर्वक जीवन जीने के उनके अधिकारों की रक्षा की जाएगी।
ओडिशा की घटना का संदर्भ
ज्ञात हो कि इसी साल जनवरी महीने में ओडिशा के ढेंकनाल जिले में भी एक हिंदुत्ववादी भीड़ द्वारा एक ईसाई पादरी पर बेरहमी से हमला किया गया था, उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित और प्रताड़ित किया गया था। उस घटना को पंद्रह दिन से अधिक समय बीत जाने के बावजूद कोई गिरफ्तारी नहीं हुई थी, जिसने पुलिस की निष्क्रियता, कानून के चयनात्मक इस्तेमाल और धार्मिक अल्पसंख्यकों के बिना डर के रहने के अधिकार पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।
पादरी बिपिन बिहारी नाइक पर 4 जनवरी, 2026 को परजंग गांव में हुए हमले में हिंसा इस हद तक बढ़ गई थी कि उसने सार्वजनिक यातना और धार्मिक जबरदस्ती का रूप ले लिया था। इसमें पादरी को जबरन गोबर खिलाना, चप्पलों की माला पहनाकर सार्वजनिक रूप से घुमाना और धार्मिक नारे लगाने के लिए मजबूर करना शामिल था।
उस घटना को लेकर चिंता पूरे क्षेत्र के ईसाई समुदाय में फैल गई थी, जिसके बाद कई लोग कथित तौर पर छिपने को मजबूर हो गए थे। परजंग में जो हुआ, उसे अब एक अलग-थलग घटना के रूप में नहीं, बल्कि सांप्रदायिक हिंसा, प्रशासनिक उदासीनता और धार्मिक आचरण के अपराधीकरण के बढ़ते पैटर्न के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।
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छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले की ग्राम पंचायत पालेम के अंतर्गत आने वाले सद्रापाल गांव में यह घटना 31 मई को हुई। यहाँ लगभग 70 अनुयायी अपनी नियमित प्रार्थना सभा के लिए इकट्ठा हुए थे। इस सभा का नेतृत्व स्थानीय प्रार्थना फेलोशिप समन्वयक हुंगा मंडावी कर रहे थे।
पीड़ितों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, अचानक लोगों का एक समूह प्रार्थना सभा में घुस आया और वहां मौजूद लोगों पर हमला कर दिया। इस हमले में कई अनुयायी घायल हो गए, जिनमें मंडावी और उनकी गर्भवती पत्नी भी शामिल हैं। गर्भवती महिला पर हुए इस हमले ने स्थानीय ईसाई समुदाय के बीच गहरी चिंता और आक्रोश पैदा कर दिया है।
कैथोलिक कनेक्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रभावित समुदाय के सदस्यों ने बताया कि करीब 25 से 30 लोगों के साथ मारपीट की गई है, जिनमें से कम से कम पांच लोगों को गंभीर चोटें आईं। घायलों में से कुछ का इलाज टोंगपाल स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में किया गया, जबकि जिन्हें अधिक गहन चिकित्सा देखभाल (ICU) की आवश्यकता थी, उन्हें सुकमा के जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया।
समुदाय के सदस्यों ने इस बात पर जोर दिया कि जब हमला हुआ, तब सभी अनुयायी शांतिपूर्वक प्रार्थना कर रहे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि यह हिंसा उनके ईसाई धर्म और पूजा-पाठ की गतिविधियों के प्रति नफरत की भावना से प्रेरित थी। स्थानीय ईसाइयों ने उन दावों को भी सिरे से खारिज कर दिया, जिनमें इस घटना को जमीन विवाद से जोड़ा जा रहा था। उन्होंने साफ किया कि इस हमले का किसी भी संपत्ति या निजी विवाद से कोई लेना-देना नहीं था।
इस मामले में पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कर ली है और शिकायत में कई नामजद लोगों को शामिल किया गया है। प्रभावित परिवारों ने अधिकारियों से अपील की है कि वे इस घटना की निष्पक्ष, पारदर्शी और विस्तृत जांच कराएं और इसके लिए जिम्मेदार दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करें।
इस घटना ने क्षेत्र के ईसाइयों के बीच मौलिक संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं, जिनमें अंतरात्मा की स्वतंत्रता और अपने धर्म को मानने तथा उसका शांतिपूर्ण पालन करने का अधिकार शामिल है। स्थानीय लोगों ने बताया कि इस बर्बर हमले के कारण कई परिवार बुरी तरह भयभीत और सदमे में हैं।
चर्च के सदस्यों और समुदाय के नेताओं ने सरकारी अधिकारियों, कानून प्रवर्तन एजेंसियों, मानवाधिकार निकायों और नागरिक समाज संगठनों से अपील की है कि वे पीड़ितों और प्रत्यक्षदर्शियों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। साथ ही घायलों को पर्याप्त चिकित्सा देखभाल और पुनर्वास सुविधाएं प्रदान की जाएं, और भविष्य में होने वाली हिंसा या डराने-धमकाने की घटनाओं को रोकने के लिए पुख्ता एहतियाती कदम उठाए जाएं।
समुदाय ने इस हमले में घायल हुए लोगों के लिए प्रार्थना करने का भी अनुरोध किया है, विशेष रूप से उन लोगों के लिए जिन्हें गंभीर चोटें आई हैं और उस गर्भवती महिला के लिए जो इस हिंसा का शिकार हुई। स्थानीय ईसाइयों ने उम्मीद जताई है कि उन्हें न्याय मिलेगा और स्वतंत्र रूप से पूजा करने व शांतिपूर्वक जीवन जीने के उनके अधिकारों की रक्षा की जाएगी।
ओडिशा की घटना का संदर्भ
ज्ञात हो कि इसी साल जनवरी महीने में ओडिशा के ढेंकनाल जिले में भी एक हिंदुत्ववादी भीड़ द्वारा एक ईसाई पादरी पर बेरहमी से हमला किया गया था, उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित और प्रताड़ित किया गया था। उस घटना को पंद्रह दिन से अधिक समय बीत जाने के बावजूद कोई गिरफ्तारी नहीं हुई थी, जिसने पुलिस की निष्क्रियता, कानून के चयनात्मक इस्तेमाल और धार्मिक अल्पसंख्यकों के बिना डर के रहने के अधिकार पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।
पादरी बिपिन बिहारी नाइक पर 4 जनवरी, 2026 को परजंग गांव में हुए हमले में हिंसा इस हद तक बढ़ गई थी कि उसने सार्वजनिक यातना और धार्मिक जबरदस्ती का रूप ले लिया था। इसमें पादरी को जबरन गोबर खिलाना, चप्पलों की माला पहनाकर सार्वजनिक रूप से घुमाना और धार्मिक नारे लगाने के लिए मजबूर करना शामिल था।
उस घटना को लेकर चिंता पूरे क्षेत्र के ईसाई समुदाय में फैल गई थी, जिसके बाद कई लोग कथित तौर पर छिपने को मजबूर हो गए थे। परजंग में जो हुआ, उसे अब एक अलग-थलग घटना के रूप में नहीं, बल्कि सांप्रदायिक हिंसा, प्रशासनिक उदासीनता और धार्मिक आचरण के अपराधीकरण के बढ़ते पैटर्न के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।
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