TISS, मुंबई: जब संभावित विरोध के आगे डिग्री समारोह टल गया  

Written by sabrang india | Published on: August 3, 2026
TISS के सालाना दीक्षांत समारोह को अचानक स्थगित कर दिया गया। कहा जा रहा है कि यह फैसला भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के प्रस्तावित दौरे के दौरान संभावित विरोध-प्रदर्शन की आशंका के चलते लिया गया। यह घटना उस बढ़ती प्रवृत्ति को रेखांकित करती है, जिसमें संभावित असहमति के लिए जगह बनाने के बजाय उसे पहले से ही दबाने की कोशिश की जा रही है।



टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ (TISS) के 86वें दीक्षांत समारोह (Convocation) के अचानक स्थगित होने से कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इनमें संस्थान की पारदर्शिता, विश्वविद्यालयों में असहमति के लिए लगातार सिमटती जगह और संभावित विरोध-प्रदर्शनों के डर से छात्रों के हितों से समझौता करने की शैक्षणिक संस्थानों की प्रवृत्ति जैसे मुद्दे शामिल हैं। जो अवसर सैकड़ों स्नातक होने वाले छात्रों के लिए जश्न का दिन होना चाहिए था, वह कैंपस प्रशासन, छात्र राजनीति और सरकारी अधिकारियों के बीच बढ़ते तनाव का एक और उदाहरण बन गया।

संस्थान के मुंबई परिसर में 2 अगस्त को आयोजित होने वाला यह दीक्षांत समारोह कार्यक्रम से ठीक दो दिन पहले स्थगित कर दिया गया। 31 जुलाई की आधी रात के बाद छात्रों को रजिस्ट्रार की ओर से एक ईमेल मिला, जिसमें बताया गया कि "अप्रत्याशित परिस्थितियों" के कारण कार्यक्रम स्थगित किया जा रहा है। इस घोषणा के साथ कोई विस्तृत कारण नहीं बताया गया।

द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, इस फैसले की जानकारी छात्रों को रजिस्ट्रार के देर रात भेजे गए ईमेल से दी गई। बाद में संस्थान ने एक सार्वजनिक बयान जारी कर केवल इतना कहा कि समारोह "अनुकूल वातावरण" में आयोजित नहीं किया जा सकता था। प्रशासन का कहना है कि दीक्षांत समारोह जल्द ही दोबारा आयोजित किया जाएगा।

यह अंतिम समय में लिया गया फैसला ऐसे समय आया, जब देश-विदेश से आने वाले सैकड़ों स्नातक होने वाले छात्रों और उनके परिवारों ने पहले ही हवाई यात्रा, रेल टिकट और ठहरने की व्यवस्था कर ली थी। कई लोगों के लिए यह सिर्फ असुविधा का मामला नहीं था, बल्कि आर्थिक नुकसान के साथ-साथ जीवन में एक बार मिलने वाले महत्वपूर्ण शैक्षणिक अवसर के छिन जाने जैसा था।

CJI के दौरे से जुड़ी सुरक्षा चिंताएं

हालांकि TISS ने कभी भी आधिकारिक तौर पर मुख्य अतिथि के नाम की घोषणा नहीं की थी, लेकिन द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को समारोह की अध्यक्षता करनी थी। अखबार ने संस्थान के अधिकारियों और छात्रों के हवाले से बताया कि प्रशासन के भीतर सुरक्षा व्यवस्थाओं को लेकर लगातार चर्चा चल रही थी। आशंका थी कि दीक्षांत समारोह के दौरान 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) आंदोलन से जुड़े विरोध-प्रदर्शन हो सकते हैं।

द इंडियन एक्सप्रेस ने संस्थान के एक अधिकारी के हवाले से लिखा कि भले ही CJI के दौरे की औपचारिक घोषणा नहीं की गई थी, लेकिन कैंपस में यह बात "सबको पता थी" और मुख्य अतिथि को केंद्र में रखकर विरोध-प्रदर्शन होने की आशंका थी।

इसी तरह द क्विंट ने स्नातक होने वाले छात्रों और छात्र प्रतिनिधियों के हवाले से रिपोर्ट दी कि प्रशासन ने जानबूझकर मुख्य अतिथि के नाम की आधिकारिक घोषणा नहीं की थी क्योंकि उसे विरोध-प्रदर्शन की आशंका थी। एक छात्र ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि "सभी को पता था" कि CJI आने वाले हैं, भले ही इसकी कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई थी।

छात्रों ने द इंडियन एक्सप्रेस को यह भी बताया कि सुरक्षा तैयारियों के तहत समारोह से कुछ दिन पहले पुलिसकर्मी कैंपस आए थे। द क्विंट के अनुसार, समारोह स्थगित करने की घोषणा से एक दिन पहले, 30 जुलाई को वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ सुरक्षा संबंधी बैठक भी हुई थी।

प्रशासन ने कोई स्पष्ट स्पष्टीकरण नहीं दिया

व्यापक आलोचना के बाद TISS ने सार्वजनिक बयान जारी कर कहा कि संस्थान ने आकलन किया था कि समारोह "अनुकूल वातावरण" में आयोजित नहीं किया जा सकता।

आधिकारिक नोटिफिकेशन यहां देखा जा सकता है।

बयान में कहा गया कि समारोह आयोजित करने से छात्रों, संकाय, कर्मचारियों, गणमान्य अतिथियों और कैंपस जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता था। हालांकि इसमें यह स्पष्ट नहीं किया गया कि आखिर ऐसा कौन-सा कारण था जिससे वातावरण प्रतिकूल हो गया। यह सावधानीपूर्वक तैयार किया गया स्पष्टीकरण जवाब से अधिक सवाल खड़े करता है।

यदि यह निर्णय ठोस सुरक्षा आकलन पर आधारित था, तो संस्थान ने उससे जुड़ी कोई जानकारी साझा नहीं की। यदि संभावित हिंसा या कानून-व्यवस्था संबंधी कोई विश्वसनीय खुफिया सूचना थी, तो उसका भी उल्लेख नहीं किया गया। इसके बजाय प्रशासन ने अस्पष्ट शब्दों का सहारा लिया और अपेक्षा की कि छात्र बिना किसी ठोस कारण के अपने शैक्षणिक जीवन के सबसे महत्वपूर्ण समारोहों में से एक के स्थगित होने को स्वीकार कर लें।

संस्थान ने यह भी घोषणा की कि समारोह स्थगित होने से प्रभावित छात्रों के वित्तीय सहायता संबंधी अनुरोधों पर मामले-दर-मामले विचार किया जाएगा। साथ ही, छात्रों को भरोसा दिलाया गया कि प्रोविजनल डिग्री प्रमाणपत्र और अन्य शैक्षणिक दस्तावेज निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उपलब्ध कराए जाएंगे। यह भी कहा गया कि दीक्षांत समारोह की नई तिथि बाद में घोषित की जाएगी।

हालांकि, ये कदम कुछ व्यावहारिक समस्याओं को कम कर सकते हैं, लेकिन अंतिम समय में लिए गए इस निर्णय से हुई असुविधा और नुकसान की भरपाई नहीं कर सकते।

कैंपस में डराने-धमकाने के आरोप

समारोह स्थगित करने का फैसला ऐसे समय आया जब कैंपस में राजनीतिक तनाव बढ़ रहा था। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, छात्रों ने बताया कि CJP आंदोलन से जुड़े विरोध-प्रदर्शनों की संभावना को लेकर कई दिनों से चर्चा चल रही थी।

इस बीच द क्विंट ने आरोप लगाया कि दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े कुछ व्हाट्सएप समूहों में ऐसे संदेश प्रसारित किए गए, जिनमें छात्रों को चेतावनी दी गई कि यदि उन्होंने दीक्षांत समारोह के दौरान विरोध-प्रदर्शन किया तो उनके खिलाफ FIR दर्ज हो सकती है, गिरफ्तारी हो सकती है और अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जा सकती है। वेबसाइट ने ऐसे संदेशों के स्क्रीनशॉट भी प्रकाशित किए।

एक छात्र ने द क्विंट को बताया कि समारोह से पहले कैंपस का माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया था। छात्रों को कथित तौर पर यह चेतावनी दी गई थी कि किसी भी प्रकार का विरोध उनके करियर और प्लेसमेंट की संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है।

द क्विंट के अनुसार, प्रोग्रेसिव स्टूडेंट्स फोरम (PSF) के सदस्यों ने यह भी दावा किया कि जब छात्रों ने डीन (स्टूडेंट अफेयर्स) से समारोह स्थगित करने का कारण पूछा, तो उन्हें केवल इतना बताया गया कि यह फैसला "सुरक्षा कारणों" से लिया गया है।

छात्र संगठनों ने जवाबदेही की मांग की

प्रोग्रेसिव स्टूडेंट्स फोरम ने इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि यह प्रशासनिक विफलताओं के एक व्यापक पैटर्न का हिस्सा है, जिसका सबसे अधिक असर स्नातक होने वाले छात्रों पर पड़ रहा है।

संगठन ने कहा कि अंतिम परिणाम घोषित करने और डिग्री प्रमाणपत्र जारी करने में पहले से हो रही देरी के कारण नौकरी और उच्च शिक्षा के लिए आवेदन करने वाले छात्रों को नुकसान उठाना पड़ रहा था। ऐसे में दीक्षांत समारोह स्थगित होने से उनकी मुश्किलें और बढ़ गई हैं तथा संस्थान की विश्वसनीयता भी प्रभावित हुई है।

छात्र प्रतिनिधियों ने यह भी सवाल उठाया कि यदि औपचारिक दीक्षांत समारोह स्थगित करना आवश्यक था, तो भी डिग्रियों का वितरण क्यों नहीं किया जा सकता था।

द क्विंट के अनुसार, चुने हुए छात्र प्रतिनिधियों ने स्पष्टीकरण मांगने के लिए रजिस्ट्रार से मुलाकात की। छात्रों का आरोप है कि बैठक के दौरान रजिस्ट्रार ने बार-बार केवल "अप्रत्याशित परिस्थितियों" का हवाला दिया और कोई ठोस कारण बताने से इनकार कर दिया।

वेबसाइट ने यह भी बताया कि प्रशासन ने बाद में 3 अगस्त को 'नॉन-इंस्ट्रक्शनल डे' घोषित कर दिया, लेकिन समारोह स्थगित करने के कारणों को लेकर छात्रों की पारदर्शिता संबंधी मांगों पर कोई ध्यान नहीं दिया। इससे कई छात्रों की यह चिंता और गहरी हो गई कि प्रशासन की प्राथमिकता छात्रों से संवाद करने के बजाय कैंपस में लोगों के एकत्र होने को रोकना बन गई है।

विश्वविद्यालय अटकलों के आधार पर नहीं चल सकते

इतिहास गवाह है कि विश्वविद्यालय ऐसे संस्थान रहे हैं जहां शिक्षा, असहमति, राजनीतिक भागीदारी और लोकतांत्रिक संवाद साथ-साथ चलते हैं। केवल इस आशंका के आधार पर कि कुछ छात्र किसी सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान विरोध दर्ज करा सकते हैं, पूरे कार्यक्रम को रद्द कर देना उचित नहीं माना जा सकता।

शांतिपूर्ण विरोध संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत संरक्षित अधिकार है, बशर्ते उस पर विधिसम्मत और उचित प्रतिबंध हों। प्रशासनिक असुविधा या संभावित शर्मिंदगी का डर, सार्वजनिक व्यवस्था के लिए वास्तविक और ठोस खतरे का विकल्प नहीं हो सकता।

जहां वास्तविक सुरक्षा संबंधी चिंताएं हों, वहां विश्वविद्यालयों के पास कई कम कठोर विकल्प उपलब्ध होते हैं—जैसे बेहतर सुरक्षा व्यवस्था, नियंत्रित प्रवेश, विरोध-प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थान और पुलिस-प्रशासन के साथ समन्वय। इसके विपरीत, पूरे कार्यक्रम को स्थगित कर देना सबसे कठोर कदम है, जिसका सबसे अधिक नुकसान उन्हीं छात्रों को होता है जिनकी उपलब्धियों का जश्न मनाने के लिए यह समारोह आयोजित किया जाता है।

उतना ही चिंताजनक है निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव। जब कोई संस्थान अस्पष्ट "अप्रत्याशित परिस्थितियों" का हवाला देता है और किसी संवैधानिक पदाधिकारी के संभावित दौरे के दौरान विरोध-प्रदर्शन की ओर केवल संकेत करता है, तो अटकलें लगना स्वाभाविक है।

सबसे ज्यादा नुकसान छात्रों का

सुरक्षा और प्रोटोकॉल की चर्चाओं के बीच सबसे अधिक प्रभावित छात्र ही हुए। दीक्षांत समारोह केवल एक औपचारिक रस्म नहीं है। देश के दूर-दराज़ इलाकों से आने वाले और अपने परिवार में पहली बार उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले अनेक छात्रों के लिए यह वर्षों के संघर्ष, आर्थिक कठिनाइयों और निरंतर मेहनत का प्रतीक होता है।

बिना स्पष्ट कारण बताए अंतिम समय में समारोह स्थगित कर प्रशासन ने अपने फैसले का पूरा बोझ डिग्री प्राप्त करने वाले छात्रों पर डाल दिया।

चाहे समारोह स्थगित करने की वजह वास्तविक सुरक्षा संबंधी चिंताएं रही हों या केवल संभावित विरोध का डर, यह घटना भारतीय विश्वविद्यालयों में तेजी से उभरते एक व्यापक रुझान की ओर संकेत करती है। विभिन्न परिसरों में प्रशासन का रवैया संवाद और सहभागिता के बजाय पहले से ही प्रतिबंध लगाने वाला होता जा रहा है। कार्यक्रम छोटे किए जा रहे हैं, अनुमतियां वापस ली जा रही हैं और सार्वजनिक आयोजनों में बदलाव किए जा रहे हैं—इसलिए नहीं कि कोई अव्यवस्था हुई है, बल्कि इसलिए कि अधिकारियों को आशंका होती है कि विरोध हो सकता है।

ऐसे फैसले विश्वविद्यालयों को बौद्धिक विमर्श और लोकतांत्रिक संवाद के केंद्र बनाने के बजाय, एहतियाती नियंत्रण से संचालित संस्थानों में बदलने का खतरा पैदा करते हैं। जब तक TISS यह स्पष्ट नहीं करता कि दीक्षांत समारोह क्यों स्थगित किया गया, तब तक पारदर्शिता, संस्थागत जवाबदेही और सुरक्षा तथा लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन को लेकर उठे सवाल बने रहेंगे। संस्थान की चुप्पी ने केवल एक समारोह को स्थगित नहीं किया है, बल्कि इस चिंता को भी गहरा किया है कि क्या भारत के विश्वविद्यालय अब लोकतांत्रिक मूल्यों और असहमति के लिए जगह बनाने के बजाय, विरोध की मात्र आशंका के आधार पर सामान्य शैक्षणिक जीवन को सीमित करने की ओर बढ़ रहे हैं।

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