आयोग के डिप्टी डायरेक्टर पी. पवन की ओर से जल्दबाजी में जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में, चुनाव आयोग ने इंडियन एक्सप्रेस की जांच का खंडन करने की कोशिश की है।

Image: m.thewire.in
'द इंडियन एक्सप्रेस' की जांच में पता चला कि तीन में से दो चुनाव आयुक्तों ने कम से कम नौ राज्यों में 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाए थे। इस पर चुनाव आयोग ने जल्दबाजी में एक प्रेस नोट जारी कर कहा कि सभी फैसले नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार लिए गए थे।
अखबार के सभी संस्करणों के पहले पन्ने पर छपी इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में बताया गया कि दो आयुक्तों - सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी - ने पिछले 10 महीनों में उनकी जानकारी के बिना लिए गए फैसलों और जारी किए गए आदेशों पर कम से कम 14 बार औपचारिक रूप से आपत्ति जताई थी। ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग ने सबसे अहम चिंताओं को नजरअंदाज कर दिया है - जिनमें से एक यह है कि ECI द्वारा वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' के तहत हटाए गए 13 करोड़ नामों का क्या हुआ।
जैसा कि 'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट में बताया गया है, SIR का विवादित राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जाना तीनों आयुक्तों की देखरेख में हुआ था। अब, SIR के दौरान लिए गए कुछ फैसलों पर सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की असहमति की खबरों के बाद, इस बेहद विवादित और बहस वाले काम की वैधता को लेकर फिर से गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं।
अपने प्रेस नोट में, ECI ने दोहराया है कि वह एक संवैधानिक निकाय है जो संविधान के अनुच्छेद 324, कानूनी नियमों और स्थापित संस्थागत परंपराओं के सख्त निर्देशों के तहत काम करता है। यह बताते हुए कि आयोग एक "बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय" के रूप में काम करता है, ECI का कहना है कि "लिखित नोट, टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच-पड़ताल (चेक-एंड-बैलेंस) मानक और निरंतर चलने वाली प्रक्रियाएं हैं, जिनका मकसद पूरी पारदर्शिता, कानूनी अनुपालन और कामकाज में सख्ती सुनिश्चित करना है।"
अखबार द्वारा बताई गई औपचारिक आपत्तियों के विवरण पर कोई जवाब न देते हुए, ECI ने दावा किया, "ECI के सभी कार्य कानूनों और आयोग के निर्देशों के अनुसार किए गए हैं।"
प्रेस नोट यहां देखा जा सकता है:

ECI ने यह भी घोषणा की:
"आयोग द्वारा जारी सभी आधिकारिक आदेश, फैसले और प्रशासनिक निर्देश पूरी तरह कानूनी रूप से मान्य हैं और 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' के तहत स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हैं।" हालांकि, ECI का यह कहना कि उसके काम कानूनी तौर पर सही थे, रिपोर्ट में बताई गई गंभीर बात को नजरअंदाज करता है – कि तीन सदस्यों वाली बॉडी में से दो चुनाव आयुक्तों ने शिकायत की थी कि नए वोटर जोड़ने और नाम हटाने के मामले में उन्हें अंधेरे में रखा गया।
इन दोनों ने वोटर सॉफ्टवेयर की विश्वसनीयता पर भी औपचारिक चिंता जताई है और सेंट्रलाइज़्ड वोटर डेटाबेस का मुद्दा उठाया है, जो राज्य के अधिकारियों को दरकिनार करता है।
ECI का जवाब इस चिंता को कम करके आंकता है और इसे 'ऑपरेशनल सवाल या सुझाव' की श्रेणी में रखता है, और कहता है:
“ड्राफ्ट स्टेज के दौरान कमीशन के सदस्यों द्वारा उठाए गए कोई भी ऑपरेशनल सवाल या सुझाव, वोटर के अधिकारों की सुरक्षा के मकसद से की जाने वाली सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। आयुक्तों द्वारा दिए गए सुझाव चुनावी प्रक्रियाओं को और बेहतर बनाने के लिए थे।”
ECI यह भी कहता है:
“किसी भी संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और टिप्पणियां होना सामान्य बात है। ये अंतिम निर्णय लेने से पहले निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। न केवल तीन आयुक्त, बल्कि कमीशन का हर अधिकारी चुनावी प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए कमीशन को अपने सुझाव देने के लिए पूरी तरह से अधिकृत है।”
इसके विपरीत, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से यह बिल्कुल साफ होता है कि चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां "सुझाव" नहीं थीं, बल्कि पूरी तरह से औपचारिक शिकायतें थीं। एक मामले में, संधू ने कहा है कि चुनाव आयोग ने दो आयुक्तों की लिखित सलाह के खिलाफ काम किया और दावा किया कि उसका काम "अनधिकृत और गैर-कानूनी" था। रिपोर्ट के अनुसार, संधू और जोशी ने कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखकर काम के बंटवारे में किए गए बदलावों के बारे में शिकायत की, जिससे उनकी सलाह के बावजूद महत्वपूर्ण निगरानी खत्म हो गई।
एक कमजोर बचाव के तौर पर, ECI ने आगे कहा:
“10 महीनों के दौरान कुछ खास अंदरूनी नोट/ऑब्जर्वेशन को हाईलाइट करना, जबकि मंजूरी, फैसले, निर्देश और पहल के बहुत बड़े हिस्से को नजरअंदाज करना, तस्वीर का सिर्फ एक पहलू दिखाता है। हाल के महीनों में, कमीशन ने कई फैसले लिए हैं, निर्देश जारी किए हैं, लगभग 40 नई पहल शुरू की हैं और कई चुनावी सुधार किए हैं, जिनमें देश भर में वोटर लिस्ट में सुधार (SIR सहित) शामिल है। ये सभी फैसले पिछले एक साल में पूरे कमीशन के सर्वसम्मत फैसलों का नतीजा हैं।”
इस बात के बावजूद कि कुछ बातचीत "अंदरूनी" दायरे से बाहर की थी – जैसे कि ऊपर बताई गई कैबिनेट सेक्रेटरी को की गई शिकायत – यह साफ नहीं है कि मंजूरी के कथित तौर पर बहुत बड़े हिस्से के बोझ तले 10 महीनों में 14 आपत्तियों की गंभीरता क्यों कम होनी चाहिए।
“कमीशन ने हाल ही में बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम और पश्चिम बंगाल में बड़े चुनाव और इस दौरान चुनाव से जुड़ी गतिविधियां सफलतापूर्वक आयोजित की हैं। इस काम में बड़े पैमाने पर प्रशासनिक और ऑपरेशनल मशीनरी और कमीशन की कई मंजूरियां और निर्देश शामिल थे।”
आज भी, इनमें से कुछ राज्यों, खासकर पश्चिम बंगाल में विवादित नामों को हटाने के मामले पर अदालतों में सुनवाई हो रही है और लोगों की सरकारी कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच पर इनके असर के बारे में काफी रिपोर्टिंग हुई है। चुनाव आयोग द्वारा इन SIRs को "सफल" बताने से मुद्दों और दांव पर लगी जिंदगियों के बारे में उसकी जानकारी पर सवाल उठते हैं।
उस रिपोर्ट के जवाब में, जिसमें सेंट्रल डेटाबेस के खिलाफ चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का जिक्र है, ECI का कहना है:
कमीशन के डिजिटल प्लेटफॉर्म, जैसे ECINet, बिना इजाजत छेड़छाड़, हेरफेर आदि को रोकने के लिए कड़े डेटा सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत काम करते हैं। IT सुरक्षा जांच और ऑडिट कंट्रोल राष्ट्रीय डेटाबेस में लागू किए जाने वाले स्टैंडर्ड साइबर सुरक्षा उपाय हैं। कानूनी अधिकारी, जिनमें इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (EROs) और जिला चुनाव अधिकारी (DEOs) शामिल हैं, कानून के तहत रजिस्ट्रेशन और नाम हटाने के लिए अपनी कानूनी शक्तियों के अनुसार काम करते हैं। ECI के मीडिया डिवीजन में डिप्टी डायरेक्टर पी. पवन के हस्ताक्षर वाले प्रेस नोट का समापन इस लाइन के साथ होता है:
"चुनाव आयोग हमारे लोकतंत्र को आगे बढ़ाने में अपनी अहम भूमिका को समझते हुए, पूरी ईमानदारी के साथ अपने संवैधानिक कर्तव्यों को निभाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।"
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'द इंडियन एक्सप्रेस' की जांच में पता चला कि तीन में से दो चुनाव आयुक्तों ने कम से कम नौ राज्यों में 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाए थे। इस पर चुनाव आयोग ने जल्दबाजी में एक प्रेस नोट जारी कर कहा कि सभी फैसले नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार लिए गए थे।
अखबार के सभी संस्करणों के पहले पन्ने पर छपी इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में बताया गया कि दो आयुक्तों - सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी - ने पिछले 10 महीनों में उनकी जानकारी के बिना लिए गए फैसलों और जारी किए गए आदेशों पर कम से कम 14 बार औपचारिक रूप से आपत्ति जताई थी। ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग ने सबसे अहम चिंताओं को नजरअंदाज कर दिया है - जिनमें से एक यह है कि ECI द्वारा वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' के तहत हटाए गए 13 करोड़ नामों का क्या हुआ।
जैसा कि 'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट में बताया गया है, SIR का विवादित राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जाना तीनों आयुक्तों की देखरेख में हुआ था। अब, SIR के दौरान लिए गए कुछ फैसलों पर सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की असहमति की खबरों के बाद, इस बेहद विवादित और बहस वाले काम की वैधता को लेकर फिर से गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं।
अपने प्रेस नोट में, ECI ने दोहराया है कि वह एक संवैधानिक निकाय है जो संविधान के अनुच्छेद 324, कानूनी नियमों और स्थापित संस्थागत परंपराओं के सख्त निर्देशों के तहत काम करता है। यह बताते हुए कि आयोग एक "बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय" के रूप में काम करता है, ECI का कहना है कि "लिखित नोट, टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच-पड़ताल (चेक-एंड-बैलेंस) मानक और निरंतर चलने वाली प्रक्रियाएं हैं, जिनका मकसद पूरी पारदर्शिता, कानूनी अनुपालन और कामकाज में सख्ती सुनिश्चित करना है।"
अखबार द्वारा बताई गई औपचारिक आपत्तियों के विवरण पर कोई जवाब न देते हुए, ECI ने दावा किया, "ECI के सभी कार्य कानूनों और आयोग के निर्देशों के अनुसार किए गए हैं।"
प्रेस नोट यहां देखा जा सकता है:

ECI ने यह भी घोषणा की:
"आयोग द्वारा जारी सभी आधिकारिक आदेश, फैसले और प्रशासनिक निर्देश पूरी तरह कानूनी रूप से मान्य हैं और 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' के तहत स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हैं।" हालांकि, ECI का यह कहना कि उसके काम कानूनी तौर पर सही थे, रिपोर्ट में बताई गई गंभीर बात को नजरअंदाज करता है – कि तीन सदस्यों वाली बॉडी में से दो चुनाव आयुक्तों ने शिकायत की थी कि नए वोटर जोड़ने और नाम हटाने के मामले में उन्हें अंधेरे में रखा गया।
इन दोनों ने वोटर सॉफ्टवेयर की विश्वसनीयता पर भी औपचारिक चिंता जताई है और सेंट्रलाइज़्ड वोटर डेटाबेस का मुद्दा उठाया है, जो राज्य के अधिकारियों को दरकिनार करता है।
ECI का जवाब इस चिंता को कम करके आंकता है और इसे 'ऑपरेशनल सवाल या सुझाव' की श्रेणी में रखता है, और कहता है:
“ड्राफ्ट स्टेज के दौरान कमीशन के सदस्यों द्वारा उठाए गए कोई भी ऑपरेशनल सवाल या सुझाव, वोटर के अधिकारों की सुरक्षा के मकसद से की जाने वाली सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। आयुक्तों द्वारा दिए गए सुझाव चुनावी प्रक्रियाओं को और बेहतर बनाने के लिए थे।”
ECI यह भी कहता है:
“किसी भी संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और टिप्पणियां होना सामान्य बात है। ये अंतिम निर्णय लेने से पहले निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। न केवल तीन आयुक्त, बल्कि कमीशन का हर अधिकारी चुनावी प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए कमीशन को अपने सुझाव देने के लिए पूरी तरह से अधिकृत है।”
इसके विपरीत, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से यह बिल्कुल साफ होता है कि चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां "सुझाव" नहीं थीं, बल्कि पूरी तरह से औपचारिक शिकायतें थीं। एक मामले में, संधू ने कहा है कि चुनाव आयोग ने दो आयुक्तों की लिखित सलाह के खिलाफ काम किया और दावा किया कि उसका काम "अनधिकृत और गैर-कानूनी" था। रिपोर्ट के अनुसार, संधू और जोशी ने कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखकर काम के बंटवारे में किए गए बदलावों के बारे में शिकायत की, जिससे उनकी सलाह के बावजूद महत्वपूर्ण निगरानी खत्म हो गई।
एक कमजोर बचाव के तौर पर, ECI ने आगे कहा:
“10 महीनों के दौरान कुछ खास अंदरूनी नोट/ऑब्जर्वेशन को हाईलाइट करना, जबकि मंजूरी, फैसले, निर्देश और पहल के बहुत बड़े हिस्से को नजरअंदाज करना, तस्वीर का सिर्फ एक पहलू दिखाता है। हाल के महीनों में, कमीशन ने कई फैसले लिए हैं, निर्देश जारी किए हैं, लगभग 40 नई पहल शुरू की हैं और कई चुनावी सुधार किए हैं, जिनमें देश भर में वोटर लिस्ट में सुधार (SIR सहित) शामिल है। ये सभी फैसले पिछले एक साल में पूरे कमीशन के सर्वसम्मत फैसलों का नतीजा हैं।”
इस बात के बावजूद कि कुछ बातचीत "अंदरूनी" दायरे से बाहर की थी – जैसे कि ऊपर बताई गई कैबिनेट सेक्रेटरी को की गई शिकायत – यह साफ नहीं है कि मंजूरी के कथित तौर पर बहुत बड़े हिस्से के बोझ तले 10 महीनों में 14 आपत्तियों की गंभीरता क्यों कम होनी चाहिए।
“कमीशन ने हाल ही में बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम और पश्चिम बंगाल में बड़े चुनाव और इस दौरान चुनाव से जुड़ी गतिविधियां सफलतापूर्वक आयोजित की हैं। इस काम में बड़े पैमाने पर प्रशासनिक और ऑपरेशनल मशीनरी और कमीशन की कई मंजूरियां और निर्देश शामिल थे।”
आज भी, इनमें से कुछ राज्यों, खासकर पश्चिम बंगाल में विवादित नामों को हटाने के मामले पर अदालतों में सुनवाई हो रही है और लोगों की सरकारी कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच पर इनके असर के बारे में काफी रिपोर्टिंग हुई है। चुनाव आयोग द्वारा इन SIRs को "सफल" बताने से मुद्दों और दांव पर लगी जिंदगियों के बारे में उसकी जानकारी पर सवाल उठते हैं।
उस रिपोर्ट के जवाब में, जिसमें सेंट्रल डेटाबेस के खिलाफ चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का जिक्र है, ECI का कहना है:
कमीशन के डिजिटल प्लेटफॉर्म, जैसे ECINet, बिना इजाजत छेड़छाड़, हेरफेर आदि को रोकने के लिए कड़े डेटा सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत काम करते हैं। IT सुरक्षा जांच और ऑडिट कंट्रोल राष्ट्रीय डेटाबेस में लागू किए जाने वाले स्टैंडर्ड साइबर सुरक्षा उपाय हैं। कानूनी अधिकारी, जिनमें इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (EROs) और जिला चुनाव अधिकारी (DEOs) शामिल हैं, कानून के तहत रजिस्ट्रेशन और नाम हटाने के लिए अपनी कानूनी शक्तियों के अनुसार काम करते हैं। ECI के मीडिया डिवीजन में डिप्टी डायरेक्टर पी. पवन के हस्ताक्षर वाले प्रेस नोट का समापन इस लाइन के साथ होता है:
"चुनाव आयोग हमारे लोकतंत्र को आगे बढ़ाने में अपनी अहम भूमिका को समझते हुए, पूरी ईमानदारी के साथ अपने संवैधानिक कर्तव्यों को निभाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।"
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