सावित्रीबाई फुले के नाम पर हो बिहार के प्रस्तावित महिला विश्वविद्यालय का नाम

Written by ABHAY KUMAR | Published on: October 1, 2026
प्रस्तावित विश्वविद्यालय को “माँ सीता महिला विश्वविद्यालय” के नाम से जाना जाएगा और इसकी स्थापना पटना में की जाएगी।


फोटो साभार : गूगल

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में 23 अक्टूबर को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में राज्य में प्रथम महिला विश्वविद्यालय की स्थापना को मंज़ूरी दी गई। महिलाओं की उच्च शिक्षा संबंधी ज़रूरतों को पूरा करने के उद्देश्य से एक यूनिवर्सिटी खोलने का यह फ़ैसला स्वागत योग्य है, लेकिन विश्वविद्यालय का नाम एक हिंदू देवी के नाम पर रखने का निर्णय आरएसएस और भाजपा की भगवाकरण की राजनीति से प्रभावित नज़र आ रहा है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्तावित विश्वविद्यालय को “माँ सीता महिला विश्वविद्यालय” के नाम से जाना जाएगा और इसकी स्थापना पटना में की जाएगी।

नामकरण की यह प्रक्रिया बहुसंख्यकवादी राजनीति से प्रभावित नज़र आती है और ऐसा लगता है कि सार्वजनिक संस्थानों को भी धार्मिक प्रतीकों से जोड़ने की होड़ में बिहार की सरकार भाजपा शासित दूसरे राज्यों से प्रतिस्पर्धा करने में उतर आई है। 

किसी धार्मिक प्रतीक का सार्वजनिक जीवन में इस तरह इस्तेमाल एक गंभीर सवाल उठाता है कि क्या किसी विश्वविद्यालय, शैक्षणिक संस्थान या सार्वजनिक निकाय को किसी धर्म या मज़हब से जोड़ना संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के साथ संगत है, जो राज्य से सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार की अपेक्षा करता है।

इसके अलावा, भारत का संविधान धर्म के आधार पर नागरिकों के साथ भेदभाव करने से राज्य को रोकता है। राज्य से यह भी अपेक्षा की जाती है कि वह किसी एक धर्म को विशेष रूप से बढ़ावा न दे। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या किसी महिला विश्वविद्यालय को किसी ख़ास धर्म से जोड़ना धर्मनिरपेक्षता की भावना के ख़िलाफ़ नहीं है?

चूंकि सार्वजनिक विश्वविद्यालय सभी के लिए खुला है और इसमें विभिन्न धार्मिक समुदायों के लोग भी पढ़ेंगे, इसलिए प्रस्तावित विश्वविद्यालय का नाम बहुसंख्यक समुदाय से जुड़े किसी धार्मिक प्रतीक के नाम पर रखने का फैसला, खासकर अल्पसंख्यकों और हाशिए पर रहने वाली जातियों और समुदायों के बीच, इस धारणा को मजबूत कर सकता है कि राज्य धार्मिक रूप से तटस्थ नहीं है।

सार्वजनिक संस्थानों के ज़रिए बहुसंख्यक धर्म को बढ़ावा देने की ऐसी नीति अल्पसंख्यकों और कमज़ोर तबकों को अलग-थलग कर सकती है और राज्य की लेजिटिमेसी, अर्थात् वैधता, को और कमज़ोर कर सकती है। इसके अलावा, बहुसंख्यकवाद की राजनीति सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ सकती है और ‘विविधता में एकता’ के उस सिद्धांत को कमज़ोर कर सकती है, जो भारतीय राजनीति की आधारशिला है।

हालांकि विश्वविद्यालय का नाम देवी सीता के नाम पर रखने के फैसले को भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने मंजूरी दे दी है, लेकिन विपक्षी कांग्रेस, जो खुद को ‘धर्मनिरपेक्ष’ कहने से कभी नहीं थकती, ने विश्वविद्यालय के नामकरण पर कोई आपत्ति नहीं जताई है।

बिहार के मीडिया अध्यक्ष राजेश राठौर ने सीतामढ़ी को हिंदू देवी सीता की ‘जन्मभूमि’ बताया है और मांग की है कि प्रस्तावित विश्वविद्यालय राज्य की राजधानी के बजाय सीतामढ़ी में खोला जाए। हालांकि, उत्तर बिहार के इलाक़ों में शैक्षिक पिछड़ेपन को देखते हुए सीतामढ़ी में विश्वविद्यालय स्थापित करने की कांग्रेस नेता की मांग जायज़ है, लेकिन चिंता की बात यह है कि धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण से शिक्षा की ज़रूरत पर ज़ोर देने के बजाय वे सार्वजनिक जीवन में ‘हिंदू कार्ड’ खेलने में भाजपा से प्रतिस्पर्धा करते नज़र आ रहे हैं।

जहां एक ओर भाजपा स्कूलों के पाठ्यक्रम में बदलाव करके, मुगल इतिहास के अध्यायों को हटाकर, हिंदू धार्मिक प्रतीकों और हिंदुत्ववादी नेताओं के संदर्भों से पाठ्यक्रम को भरकर, तथा मुस्लिम और इस्लामी नामों से जुड़ी सड़कों और सार्वजनिक स्थानों के नाम बदलकर अपने हिंदुत्व एजेंडे को आक्रामक रूप से बढ़ावा दे रही है, वहीं कांग्रेस और अन्य धर्मनिरपेक्ष दल इन मुद्दों पर अक्सर पसोपेश नज़र आते हैं। जहां कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व सेक्युलर भाषा में बोलता है, वहीं राज्य और क्षेत्रीय स्तर पर कांग्रेसी नेताओं को हिंदुत्ववादी नेताओं से अलग करना अक्सर मुश्किल होता है।

भारतीय संविधान की मूलभूत विशेषताओं में से एक धर्मनिरपेक्षता है। इसलिए किसी धार्मिक व्यक्ति के नाम पर विश्वविद्यालय का नामकरण करना उचित नहीं है। लेकिन आज कई राजनीतिक नेता यह भूल जाते हैं कि एक धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था में धर्म निजी ज़िंदगी तक ही सीमित रहना चाहिए, जबकि सार्वजनिक संस्थानों को धार्मिक प्रभाव से मुक्त रहना चाहिए। यही कारण है कि प्रस्तावित विश्वविद्यालय का नाम किसी हिंदू देवता या किसी धार्मिक या दिव्य व्यक्तित्व के नाम पर नहीं रखा जाना चाहिए। यदि इसका नाम किसी ऐसे व्यक्तित्व के नाम पर रखना ही है, जिसने महिलाओं और वंचित तबकों की शिक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित किया, तो सावित्रीबाई फुले से बेहतर कोई विकल्प नहीं हो सकता।

सावित्रीबाई का जन्म 3 जनवरी 1831 को सतारा ज़िले के नायगांव में हुआ था। साल 1840 में उन्होंने ज्योतिबा फुले  से शादी की। ज्योतिबा फुले माली (शूद्र) जाति से थे और उन्होंने आधुनिक भारत में जात-पात के खिलाफ़ लड़ाई की अगुआई की। आगे चलकर बाबासाहेब आंबेडकर  ने इसी लड़ाई को आगे बढ़ाया। 

अपनी पूरी ज़िंदगी फुले-दंपति ने जाति-प्रथा, छुआछूत, अंधविश्वास, श्रमिक शूद्रों और अति-शूद्रों के शोषण और महिलाओं की दुर्दशा के खिलाफ़ आवाज़ उठाई। इस पूरी लड़ाई में सावित्रीबाई बराबर की शरीक रहीं।

समाज से शोषण ख़त्म करने के लिए, जब कार्ल मार्क्स यूरोप में ‘कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो’ लिखने में व्यस्त थे, तब ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले भारत में महिलाओं की शिक्षा के ज़रिये शोषण-मुक्त समाज बनाने की कोशिश कर रहे थे।

इसके लिए उन्होंने शूद्र और अति-शूद्र लड़कियों के लिए स्कूल खोला। सदियों से शिक्षा से वंचित रखे गए निचली जातियों के लोगों के लिए यह एक इन्क़लाबी क़दम था। आगे चलकर इस तरह के स्कूल अन्य जातियों की महिलाओं और श्रमिक वर्ग के लिए भी खोले गए।

शूद्रों, अति-शूद्रों और महिलाओं की शिक्षा के क्षेत्र में काम करने की वजह से फुले-दंपति को प्रतिक्रियावादी ब्राह्मणों के ज़बरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा। उनके ऊपर पत्थर और गोबर फेंके गए। एक बार ज्योतिबा पर जानलेवा हमला भी हुआ। 

मगर इस मुख़ालफ़त ने उनके अज़्म को और भी बुलंद कर दिया। उनकी कड़ी मेहनत की वजह से साल 1848 से 1852 के बीच 18 और स्कूल खोले गए। धीरे-धीरे बहुत से लोगों ने अपनी सोच बदली और अपनी बेटियों को उनके स्कूलों में भेजना शुरू किया।

सार यह है कि सावित्रीबाई फुले के नज़दीक शिक्षा का रास्ता नारी की मुक्ति की तरफ़ जाता है। यह बात उनकी रचनाओं में साफ़ तौर से मौजूद है। मसलन, ‘संगीत नाटिका’ कविता में सावित्रीबाई कहती हैं:

“स्वाभिमान से जीने हेतु बेटियों पढ़ो-लिखो, ख़ूब पढ़ो
पाठशाला रोज़ जाकर नित अपना ज्ञान बढ़ाओ
हर इंसान का सच्चा आभूषण शिक्षा है
हर स्त्री को शिक्षा का गहना पहनना है...”


शिक्षा के अलावा, सावित्रीबाई फुले ने विधवा-उत्थान और उनके पुनर्विवाह के लिए भी काम किया। उन्होंने काशीबाई नामक ब्राह्मण विधवा से हुए बच्चे को गोद लेकर पढ़ाया-लिखाया और डॉक्टर बनाया। बाद में उसका अंतर-जातीय विवाह भी करवाया। हैरत होती है कि उन्होंने इस तरह के क्रांतिकारी काम आज से 150 साल पहले किए, जबकि हमारा समाज आज भी महिला दमन, दहेज और जात-पात से पूरी तरह मुक्त होने के लिए जूझ रहा है। 

बिहार का राजनीतिक इतिहास बुद्ध के समय से लेकर भूमिहीन मज़दूरों के संघर्ष और बीसवीं सदी में मंडल राजनीति के उभार तक सामाजिक न्याय की लड़ाई से जुड़ा रहा है। प्रस्तावित विश्वविद्यालय का नाम सावित्रीबाई फुले के नाम पर रखना बिहार में समानता और सामाजिक न्याय के लिए चल रहे संघर्ष के जज़्बे के अनुरूप होगा।

[डॉ. अभय कुमार की हाल ही में प्रकाशित किताब है—‘मुस्लिम पर्सनल लॉ: डेफिनिशन्स, सोर्सेज़ एंड कॉन्टेस्टेशन्स’, मनोहर, 2026। ईमेल: debatingissues@gmail.com]

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