पंजाब में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से चिंता फैल गई कि ईसाई दलित नहीं हो सकते

Written by sabrang india | Published on: April 11, 2026
सभी राज्यों में पंजाब में दलितों का अनुपात सबसे ज्यादा है, और इनमें से कई लोग धर्म या सांस्कृतिक रीति-रिवाजों के हिसाब से ईसाई हैं। वे सुप्रीम कोर्ट में चल रही मौजूदा कानूनी चुनौतियों पर भरोसा कर रहे हैं, ताकि उन्हें अनुसूचित जाति के सदस्य के तौर पर स्वीकार और मान्यता दी जा सके।


फोटो साभार : टाइम्स ऑफ इंडिया (फाइल फोटो)

आंध्र प्रदेश के एक पादरी के मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने एक संवेदनशील बहस छेड़ दी है। इसमें कहा गया है कि हिंदू धर्म, सिख धर्म और बौद्ध धर्म के अलावा किसी दूसरे धर्म में धर्मांतरण करने पर अनुसूचित जाति का दर्जा खत्म माना जाएगा। इस फैसले ने खास तौर पर पंजाब के दलितों के बीच एक संवेदनशील मुद्दे को छू गया है। यह राज्य, जहां अनुसूचित जातियों का अनुपात सबसे ज्यादा है यानी आबादी का लगभग एक-तिहाई (2011 की जनगणना के अनुसार 31.9%)  है, यहां जाति-आधारित भेदभाव का भी एक लंबा इतिहास रहा है।

द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, चिंथाडा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के मामले में, पादरी ने सुप्रीम कोर्ट से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत सुरक्षा की मांग की थी। इस सुरक्षा से इनकार करने वाले फेसले से पंजाब के दलित ईसाइयों में चिंता है, ये लोग मुख्य रूप से वाल्मीकि, मझबी सिख और आदि-धर्मी समुदायों से आते हैं, जो राज्य के प्रमुख अनुसूचित जाति समूह हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार, पंजाब की आबादी का लगभग 1.5% हिस्सा ईसाई है। इस समुदाय के भीतर पुनरुत्थान देखने को मिला है, जिसके तहत माझा और दोआबा क्षेत्रों के जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला, अमृतसर, तरनतारन, गुरदासपुर, फ़िरोजपुर और पठानकोट ज़िलों के गांवों, कस्बों और शहरों में स्वतंत्र मंत्रालय और चर्च खुल रहे हैं।

दलित ईसाई मुख्य रूप से दोआबा क्षेत्र में रहते हैं, यह एक ऐसा इलाका है जहां सभी धर्मों को मानने वाली पंजाबी दलित आबादी का 32% से अधिक हिस्सा रहता है। इसके उलट, माझा क्षेत्र में वाल्मीकि समुदाय और मजहबी सिखों की अच्छी-खासी आबादी है, जिनमें से भी बड़ी संख्या में लोग ईसाई धर्म को मानते हैं।

हाल ही में, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्य के मोगा में आयोजित एक 'बदलाव' रैली के दौरान कहा कि BJP एक नया कानून लाकर पंजाब में धर्मांतरण पर रोक लगाएगी। इस संदर्भ में, सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने दलित ईसाइयों के बीच डर और बढ़ा दिया है, भले ही BJP  पंजाब की राजनीति में एक छोटी सी भूमिका निभाती है।

दलित ईसाई वंचित हैं

'द वायर' से बात करते हुए, पंजाब अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफैसर इमैनुएल नाहर ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हैं, लेकिन उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि वह पंजाब के उन दलितों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर भी विचार करे, जिन्होंने ईसाई धर्म को अपने विश्वास के तौर पर अपनाया है।

उन्होंने कहा, "सुप्रीम कोर्ट को दलितों और मुसलमानों पर क्रमशः रंगनाथ मिश्रा और सच्चर समिति की रिपोर्टों पर विचार करना चाहिए। दोनों आयोगों ने दलित मुसलमानों और ईसाइयों के लिए आरक्षण की वकालत की थी।"

पटियाला में जगत गुरु नानक देव पंजाब स्टेट ओपन यूनिवर्सिटी में सामाजिक विज्ञान और लिबरल आर्ट्स के डीन नाहर ने कहा कि दलित ईसाई एक पिछड़ा वर्ग हैं और उन्हें भारी अभावों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा, "मझबी सिखों और रविदासियों को 1956 में अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल किया गया था, जब संसद ने [संविधान में] पहला संशोधन पारित किया था और 1990 में दूसरे संशोधन के बाद बौद्धों को भी इसमें जोड़ा गया। ईसाई और मुसलमानों को अपने हाल पर छोड़ दिया गया।"

उन्होंने कहा कि पिछले कुछ सालों में, जहां पंजाब के आदि-धर्मी, रविदासी और रामदासी सिख समुदाय आरक्षण के जरिए आगे बढ़े, वहीं वाल्मीकि, ईसाई और मुसलमान, जिन्होंने धर्म परिवर्तन किया था, वंचित ही रहे, वे सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से पिछड़े ही रह गए।

शाह की उस घोषणा पर कि धर्मांतरण पर कानून बनाकर रोक लगाई जाएगी, उन्होंने कहा, "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि गृह मंत्री ने ऐसा बयान दिया। मैं इसकी निंदा करता हूं। अगर मंत्री को जबरदस्ती धर्मांतरण के बारे में पक्का पता है, तो उन्हें कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन उन्हें यह आंकड़ा भी बताना चाहिए कि कितने लोगों ने दबाव में आकर अपना धर्म बदला है।"

नाहर ने आगे कहा, "गृह मंत्री के तौर पर, वह मणिपुर में जातीय हिंसा को रोकने में नाकाम रहे और अब वह धर्मांतरण को लेकर चिंता जता रहे हैं। पंजाब एक शानदार राज्य है, जिसने कभी भी ऐसी भावनाओं के आगे घुटने नहीं टेके हैं।"

नाहर ने कहा कि उनकी योजना सांसदों से संपर्क करने की है, ताकि इस मुद्दे को संसद में उठाया जा सके। उन्होंने कहा, "मेरी योजना भारत की राष्ट्रपति से भी संपर्क करने की है, ताकि वह इस मामले में हस्तक्षेप करें, यह एक ऐसा मामला है जिसे लंबे समय से सिर्फ इसलिए नजरअंदाज किया जाता रहा है, क्योंकि यह प्रभुत्वशाली वर्ग की विचारधारा से मेल नहीं खाता।"

‘दलित ईसाइयों की स्थिति’

सुप्रीम कोर्ट के फैसले को विवादित और भेदभावपूर्ण बताते हुए, पंजाब क्रिश्चियन मूवमेंट के अध्यक्ष हामिद मसीह ने कहा, “कोर्ट मुसलमानों और ईसाइयों को भारत का मूल निवासी नहीं मानता, जबकि सच तो यह है कि वे यहां सदियों से रह रहे हैं।”

उन्होंने 1950 के विवादित राष्ट्रपति आदेश का जिक्र किया, जो अनुसूचित जातियों को मिलने वाले संवैधानिक समर्थन और सुरक्षा से गैर-हिंदू दलितों को बाहर रखने का पहला आधिकारिक फैसला था।

मसीह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को यह भी साफ़ करना चाहिए कि उसका फ़ैसला जाति पर आधारित था या धर्म पर। उन्होंने कहा, “कोर्ट ने जाति व्यवस्था को नज़रअंदाज़ कर दिया और धार्मिक धर्मांतरण पर ध्यान केंद्रित किया।” उन्होंने एक तीखा सवाल पूछा: क्या कोर्ट किसी ईसाई को (मूल) भारतीय नागरिक मानेगा, अगर वह हिंदू धर्म अपना ले?

उन्होंने फ़ैसले के समय और शाह के बयान पर चिंता जताते हुए कहा कि इनका मकसद ऐसे समय में मतदाताओं का ध्रुवीकरण करना है, जब चुनाव नजदीक हैं। उन्होंने आगे कहा, “चाहे पंजाब हो, जहां अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं, या छह राज्यों में चल रहे चुनाव, BJP की कोशिश हमेशा से ही सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काना और लोगों के बीच नफरत पैदा करना रही है।”

उन्होंने कहा कि अगर पंजाब में चर्च बनाए जा रहे हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि जबरदस्ती धर्मांतरण हो रहा है। उन्होंने कहा, “देखिए – अनुसूचित जाति श्रेणी के तहत आरक्षण का फायदा सिर्फ दलितों को मिलता है। बाकी लोग, जिनमें मुसलमान और ईसाई भी शामिल हैं, भेदभाव का सामना करते हैं।”

उन्होंने कहा कि पंजाब सरकार के तहत ईसाइयों के लिए नौकरियों का कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने आगे कहा, “पंजाब में दलित ईसाई या तो निजी क्षेत्र में काम कर रहे हैं या दिहाड़ी मजदूर के तौर पर, जिससे उनके पास आर्थिक विकास का कोई मौका नहीं बचता। चर्च में, कम से कम उनके साथ बराबरी और सम्मान का बर्ताव होता है, जो उन्हें दूसरे धर्मों में नहीं मिल पाता।”

दलित ईसाइयों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है

‘द वायर’ से बात करते हुए, जालंधर के भूमिहीन मजदूरों के संगठन ‘पेंडू मजदूर यूनियन’ के अध्यक्ष तरसेम पीटर ने कहा कि भारत में हर जगह दलितों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है, जिसमें पंजाब भी शामिल है, जहां दलितों की आबादी बहुत ज्यादा है।

उन्होंने कहा, “यह सरासर भेदभाव है कि पंजाब में दलित सिख, हिंदू और बौद्ध तो आरक्षण का फायदा उठा पाते हैं, लेकिन जो दलित ईसाई धर्म अपना लेते हैं, वे सिर्फ इसलिए गरीबी में जीने को मजबूर हो जाते हैं, क्योंकि वे अल्पसंख्यक श्रेणी में आ जाते हैं।” पंजाब के बारे में बात करते हुए पीटर ने कहा कि पहले ईसाई मिशनरियों को अंतरराष्ट्रीय फंडिंग मिलती थी, लेकिन जब से केंद्र सरकार ने इसे रोक दिया है, कुछ पादरियों ने अपनी स्वतंत्र मिनिस्ट्री शुरू कर दी हैं। उन्होंने कहा, "इस बदलाव के बाद, ऐसी मिनिस्ट्री की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है, जो लोगों की आर्थिक और शारीरिक स्थिति में चमत्कारिक बदलाव का वादा करती हैं और उनका प्रचार करती हैं।"

पीटर ने कहा कि पंजाब की मुख्य मिनिस्ट्री में अंकुर नरूला मिनिस्ट्री, खोजेवाल मिनिस्ट्री और बरजिंदर देओल मिनिस्ट्री शामिल हैं। उन्होंने कहा, "हालांकि, ईसाइयों की सही संख्या जनगणना होने के बाद ही सामने आएगी। हर मिनिस्ट्री में लगभग 95% अनुयायी दलित थे। सच तो यह है कि अमीर चर्चों में समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लोग ही अनुयायी होते हैं। लोग नहीं, बल्कि सरकारें और राजनेता ही इस व्यवस्था का गलत फायदा उठाते हैं।"

इससे पहले, पीटर ने लोगों से आग्रह किया कि वे आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर 'सामूहिक डर' (mass phobia) का शिकार न बनें। उन्होंने कहा, "इसके पीछे BJP-RSS और 'गोदी मीडिया' की बांटने वाली राजनीति है।"

तरन तारन के पट्टी कस्बे के जसबीर संधू, जिन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया है, ने 'द वायर' को बताया कि चाहे कोई दलित ईसाई बन जाए या उसी धर्म में बना रहे जिसमें उसका जन्म हुआ था, उसकी आर्थिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आता। उन्होंने कहा, "सरकार 'अमृत काल' और 'डिजिटल इंडिया' की बात करती है, तो फिर हमारे साथ यह भेदभाव क्यों? उन्हें हमारी तकलीफ समझनी चाहिए।"

संधू ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से वे चिंतित हैं। उन्होंने कहा कि पंजाब के सीमावर्ती इलाकों में सैकड़ों भूमिहीन मजदूर, उनकी ही तरह, घोर गरीबी में जी रहे हैं। "अगर उन्हें समाज में आरक्षण और प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है, तो वे आगे कैसे बढ़ सकते हैं?"

संधू ने पूछा कि BJP ने उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जिन्होंने नया धर्म अपना लिया है क्योंकि इस बात का कोई आधिकारिक डेटा नहीं था कि पंजाब में असल में कितने दलितों ने दूसरा धर्म अपनाया है।

उन्होंने कहा, “BJP जानती है कि ज्यादातर अल्पसंख्यक उनका समर्थन नहीं करते। चूंकि अगले साल की शुरुआत में पंजाब विधानसभा चुनाव होने हैं, इसलिए उन्होंने वोट मांगने के लिए इस मुद्दे को उठाना शुरू कर दिया है। शायद BJP को यह नहीं पता कि पंजाब में नफरत का बीज कभी नहीं उग सकता। पंजाबी हमेशा एक साथ रहे हैं, चाहे उनकी जाति या धार्मिक पसंद कुछ भी रही हो।” 

पंजाब भर सभाओं के बारे में उन्होंने कहा कि, हालांकि धर्म-परिवर्तन सामाजिक और राजनीतिक मंचों पर एक बड़ा मुद्दा था, लेकिन पंजाब में धार्मिक धर्म-परिवर्तन नहीं हो रहे थे।

उन्होंने आगे कहा, “ज्यादातर दलित चर्च जाते तो हैं, लेकिन उन्होंने आधिकारिक तौर पर ईसाई धर्म नहीं अपनाया है। साथ ही, पंजाब में ऐसे ईसाई भी हैं जिन्होंने धर्म-परिवर्तन कर लिया है, लेकिन वे अभी भी अनुसूचित जाति श्रेणी के तहत मिलने वाले लाभ का फायदा उठा रहे हैं।” 

संधू ने जोर देकर कहा कि एक दलित के लिए, चर्च जाना किसी और चीज से ज्यादा सामाजिक रूप से बराबरी का दर्जा पाने के बारे में होता है, क्योंकि चाहे कोई दलित अपना धर्म बदले या अपनी जातिगत पहचान बनाए रखे, उसकी जिंदगी और संघर्ष वैसे ही रहते हैं। उन्होंने कहा, “न तो हमारी हालत सुधरी है और न ही हमारे दुख-दर्द खत्म हुए हैं।” 

दलित ईसाइयों को SC का दर्जा देने वाली याचिकाएं SC में लंबित हैं

“दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति का दर्जा दो” के नारे से प्रेरित होकर - और 1976 और 1985 के पिछले फ़ैसलों को चुनौती देते हुए - सुप्रीम कोर्ट में लगभग एक दर्जन याचिकाएं दायर की गई हैं। इन याचिकाओं में संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 के एक पैराग्राफ़ को हटाने की मांग की गई है, ताकि दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जा सके।

नेशनल काउंसिल ऑफ दलित क्रिश्चियंस (NCDC), कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ़्रेंस ऑफ इंडिया (CBCI) और नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज इन इंडिया (NCCI) ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट फिलहाल इन सभी याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई कर रहा है।

अब तक, कोर्ट ने इन रिट याचिकाओं पर कोई फैसला नहीं सुनाया है।

ईसाई संगठनों ने एक बयान में कहा कि चिंथाडा आनंद मामले में 24 मार्च का फैसला एक व्यक्तिगत मामले से जुड़ा था। यह मामला आंध्र प्रदेश के बापटला जिले में एक पादरी पर कथित हमले के बाद 'अत्याचार निवारण अधिनियम' (Atrocities Act) को लागू करने की मांग वाली एक याचिका से जुड़ा था। हालांकि, दूसरे मामले में, जिसमें एक दर्जन से ज्यादा याचिकाएं शामिल हैं, संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार – पूरे दलित ईसाई समुदाय की ओर से अनुसूचित जाति का दर्जा दिए जाने की मांग की जा रही है। अनुच्छेद 25 भारत में हर किसी को धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। इन याचिकाओं में संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 को हटाने की मांग की गई है, इनका कहना है कि यह संविधान की मूल भावना के विपरीत है, लेकिन अब तक इस पर कोई फैसला नहीं आया है।

इस बीच, अक्टूबर 2022 में केंद्र सरकार ने जस्टिस के.जी. बालकृष्णन की अध्यक्षता में तीन सदस्यों वाला एक जांच आयोग नियुक्त किया। इस आयोग का काम उन दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की संभावना की जांच करना है, जिन्होंने हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा कोई और धर्म अपनाया है – विशेष रूप से ईसाई और मुस्लिम धर्म अपनाने वालों पर ध्यान केंद्रित करते हुए।

इस आयोग को 'डॉ. अंबेडकर अनुसूचित जाति अधिकारी कर्मचारी मंच' जैसे समूहों से आपत्तियां मिली हैं। इन समूहों का तर्क है कि धर्म बदलने वालों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने से, पहले से ही इस दर्जे का लाभ उठा रहे लोगों के मौजूदा अधिकारों और फायदों में कमी आ जाएगी।

Related

“Inside the SIR”: पुस्तिका ने मतदाता सूची संशोधन में ‘यांत्रिक रूप से मताधिकार से वंचित करने’ को लेकर चिंता जताई

जाति उन्मूलन : कहां तक पहुंचे हैं हम?

बाकी ख़बरें