भारतीय मुस्लिमों के तीन अभिशाप : विक्टिमहुड सिंड्रोम, सत्ता धर्मशास्त्र, पहचान की राजनीति के प्रति जुनून

Written by MOHAMMAD SAJJAD | Published on: April 9, 2024
मुस्लिम अधिकारों और गरिमा की जारी लड़ाई में तार्किकता और आत्ममंथन की खुराक के लिए लेखक पिछली सदी के गहन अध्ययन पर आधारित एक ठोस तर्क पेश करता है और भारतीय मुस्लिमों से अनुरोध करता है कि भारत को धर्मनिरपेक्ष बनाने में अपना योगदान दें और स्पष्ट करता है कि अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता बहुसंख्यवाद का जवाब नहीं है। 


Image for representation only. Photo: Flickr/José Antonio Morcillo Valenciano CC BY 2.0

सोशल मीडिया खंगालते हुए, यदि कोई भारत में शिक्षित मुस्लिम युवाओं के ज़ेहन को टटोलना चाहे, तो क्या सामने आता है? एक मुस्लिम बहुल कैंपस में पढ़ाने और रहने वाले व्यक्ति के रूप में मेरे दिमाग में यह सवाल आता है। इसलिए मैं रोजाना आधार पर भारत के शिक्षित मुस्लिमों से चर्चा करता हूँ और मेरे पास बहुसंख्यवादी युग में रह रहे मुस्लिम ज़ेहन का विश्लेषण करने लायक पर्याप्त मात्रा में नमूना सामग्री है। 

मेरे विस्तारित परिवार, रिश्तेदारों और ग्रामीण पड़ोसियों के एक केवल मुस्लिमों के लिए व्हाट्सऐप समूह में एक युवक ने 2024 के गणतंत्र दिवस का बहिष्कार करने का प्रस्ताव दिया। उसने कारण यह बताया कि वर्तमान शासन ने कई तरीकों से मुस्लिमों को प्रताड़ित और उपेक्षित किया है। बहिष्कार का प्रस्ताव देने वाले युवक ने अपना डिप्लोमा एक केन्द्रीय निधि से चलने वाले, मुस्लिम अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय (जामिया मिलिया इस्लामी, नई दिल्ली-जेएमआई) से जुड़े पॉलीटेक्निक से प्राप्त किया है। जेएमआई, केन्द्रीय निधि से संचालित सरकारी विश्वविद्यालय है जिसका फीस ढांचा सब्सिडीकृत और सस्ता है। उसे डिप्लोमा के तुरंत बाद केंद्र सरकार में नौकरी भी मिली। बाद में, उसने सऊदी अरब में रोजगार मिलने पर वह नौकरी छोड़ दी। 

2024 के गणतंत्र दिवस के बहिष्कार के उसके इस “शानदार प्रस्ताव” को जवाब में उसे तर्क का सामना करना पड़ा कि वर्तमान शासन और उससे जुड़े संगठनों का मुख्य समर्थन आधार उस विचारधारा को मानता है जो जनतान्त्रिक संवैधानिक मूल्यों को अपने बहुसंख्यवादी उद्देश्यों को प्राप्त करने में बाधा मानता है। हालांकि वह उभार पर हैं और प्रतिरोधी ताकतें कमजोर दिख रहीं हैं लेकिन क्या दक्षिणी राज्य अब भी उनसे दूर नहीं हैं? कहने का मतलब यह कि हिंदुओं में भी बहुसंख्य हिन्दू बहुसंख्यवाद के खिलाफ हैं। यह सच है कि सत्ता के ढांचों और प्रक्रियाओं, शिक्षा, कारोबार और रोजगार में मुस्लिम समुदायों का हिस्सा बेहद असंतोषजनक हैं। लेकिन, यह स्थिति दशकों से है, इस शासन के सत्ता में आने से बहुत पहले से। यह उत्तर भारत के लिए भी उतनी ही सच है। उस युवक को बताया जाता है कि उत्तर और दक्षिण में फर्क विभिन्न कारकों से है, बाहरी और आंतरिक भी।  

इन तर्कों से उसे उस देश में सत्ता के ढांचों और प्रक्रियाओं की सरंचना के बारे में याद दिलाया जाता है, जहां वह काम कर रहा है। उसे बताया जाता है कि जिस देश में इस्लाम पैदा हुआ, वहाँ एक खानदान से ही कोई शासक बन सकता है, विरासत के जरिए, न तो जनता की इच्छा की किसी प्रणाली के जरिए, न किसी प्रकार के लोकतंत्र - मिलनसार लोकतंत्र या सर्वसम्मत लोकतंत्र (1) से, कि देश के विभिन्न समुदायों, क्षेत्रों और जातियों से हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके। उसे समझाया जाता है कि मिलनसार  लोकतंत्र सर्वसम्मत लोकतंत्र से अलग होता है (उदाहरण के लिए स्विट्ज़रलैंड), कि मिलनसार लोकतंत्र अल्पसंख्यक वीटो के साथ प्रतिनिधियों की सर्वसम्मति का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि सर्वसम्मत लोकतंत्र तमाम मतदाताओं से सर्वसम्मति चाहता है। उसके बाद उस युवक ने, चतुराई से उस इस्लामिक देश में बहिष्करण, भेदभाव और मताधिकार से वंचित करने  की स्थितियों से अनिभिज्ञता जताई। इसके अलावा, अपने सांप्रदायिक जुड़ावों में, वह सलाफ़ी विचारधारा के प्रति सहानुभूति रखता है। वह बाबरी मस्जिद के भीषण विध्वंस (1992) का मुद्दा उठाता है कि सुप्रीम कोर्ट में दोषी बताने के बावजूद किसीको सजा नहीं मिली। इनमें से कुछ को बेशर्मी से वोटों के तोहफों से नवाजा जा रहा है और वह सफल चुने हुए प्रतिनिधि हैं। 

उसे तब मक्का में एक ऐतिहासिक मस्जिद के विध्वंस की घटना याद दिलाई जाती है। 

... (2005 में), बादशाह फहद, जो महल बनाने के प्रति जुनूनी थे, मक्का में अपने नए आवास के शयन कक्ष की खिड़की से काबा देख सकते थे। महल पवित्र मस्जिद के पूर्वी हिस्से में स्थित था और मस्जिद को पूरी तरह से ढँक रहा था...  (ऐतिहासिक बिलाल मस्जिद, पैगंबर मोहम्मद के समय की मस्जिद, जो महल से सटी थी, ढहा दी गई। ऐसा इसलिए किया गया कि सुनिश्चित किया जा सके कि राजा हरम के प्रांगण में इबादत करने वालों को देख सकें, इसलिए महल के सामने कोई मीनारें नहीं बनाई गईं... (जियाउद्दीन सरदार (2014) द सेक्रेड सिटी, पृष्ठ 338)। 

इस युवक से फिर यह पूछा गया कि क्या केएसए, यूएई और ऐसे अन्य देशों की सत्तारूढ़ राजशाहियाँ और नागरिक समाज (यदि है तो) ने कभी भारतीय मुस्लिमों के प्रति भारत में हो रहे भेदभाव व हाशिएकरण को लेकर परवाह की है, उससे पूछा गया कि क्या इन अरब देशों ने जायनवादियों के अत्याचार या विश्व में अन्य उत्पीड़न की घटनाओं को लेकर नागरिक विरोध प्रदर्शन होने दिए, क्या भारतीय मुस्लिमों ने फ़लस्तीनियों पर जायनवादी अत्याचार के खिलाफ भारत में उनके दूतावासों के बाहर प्रदर्शन किए? 

उससे यह भी पूछा गया कि केएसए भारत में केवल धार्मिक मदरसों को निधि क्यों उपलब्ध कराता है और आधुनिक शैक्षणिक संस्थानों के लिए क्यों नहीं? जबकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29, 30 के प्रावधानों के तहत हमारी भारत सरकार देश भर में हमारे आधुनिक शिक्षा के स्कूलों और कॉलेजों, जो हमने स्थापित किए हैं व संचालित करते हैं, को निधि मुहैया कराता है। ऐसी व्यवस्थाओं को वर्तमान शासकों से खतरा दिख रहा है लेकिन हिन्दू बहुसंख्यकों में से भी ऐसे खतरों के खिलाफ प्रतिरोध जारी है। प्रतिरोध की ऐसी ताकतों को  समर्थन देने की आवश्यकता है, भारतीय मुस्लिमों को ऐसे देशों से अलगाव का अफीम चटाने या इनके अतिवादीकरण की नहीं।  

उस नौजवान को समझाया गया कि उसे भारतीय लोकतंत्र में एक शुक्रगुजार प्रतिभागी होना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र उसे और हमें अल्पसंख्यकों के अधिकार देता है, संविधान और लोकतंत्र ने उसे डिप्लोमा करने और आजीविका कमाने व सामाजिक-आर्थिक स्वाधीनता हासिल करने योग्य बनाया। उसे केवल पीड़ित होने की भावना पालने के बजाय भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को मजबूत बनाने, बहुसंख्यवाद का प्रतिरोध करने की दिशा में कार्य करने का सुझाव दिया गया। उसे यह भी बताया गया कि कुछ मायने में मुस्लिम रूढ़िवादिता, उनकी अपनी सांप्रदायिकता और अलगाववादी सोच व अनुचित या अतिश्योक्तिपूर्ण पीड़ित होने की भावना ऐसे अतिरिक्त कारक हैं, खासकर 1980 के दशक से बहुसंख्यवाद के तेज उभार में जिनका योगदान है। वह खामोश हो गया क्योंकि उससे उसके तर्कों के हथियार छीनकर निहत्था कर दिया गया था। दूसरे शब्दों में वह इसलिए चुप नहीं हुआ क्योंकि वह जवाबी तर्कों से सहमत हो गया। उसका द्वेष और झिझक अब भी बने हुए हैं। वह समझने को तैयार नहीं है। 

बड़ी और हठीली विफलताओं में से एक है सांप्रदायिक हिंसा के साज़िशकर्ताओं और अंजाम देने वालों को छोड़ दिया जाना। इस मामले में भारतीय न्याय प्रणाली का भी दोष है। भारतीय मुस्लिमों के सामूहिक शिकवा का इस पहलू से अधिक संबंध है, निष्कासन, भेदभाव और उत्पीड़न से भी ज्यादा। 

उदार-धर्मनिरपेक्ष आबादी के हिस्सों और बहुसंख्यवाद मानने वाले वर्गों के बीच बहस होती रहती है और बहस सांप्रदायिक झगड़े उकसाने वालों की तरफ घूमती है, सवाल पूछा जाता है कि पहला पत्थर किसने मारा? ऐसी ध्रुवीकृत बहस का सटीक जवाब है: साज़िशकर्ता और हिंसा में लिप्त जो भी हों (उन सुरक्षा बलों समेत जो जानबूझकर ऐसी हिंसा को रोक या नियंत्रित नहीं करते, अक्सर दंगाइयों से मिल भी जाते हैं और अदालतों के सामने जांच के सबूत प्रस्तुत करने में विफल रहते हैं) उन्हें सजा मिलनी चाहिए। उन्हें सजा देने में दुराग्रही विफलता को केवल एक ही कारक से समझाया जा सकता है - सत्ता और समाज का बहुसंख्यवादी चरित्र, जिसे घटना के बाद पछतावा तक न हो और न ही ऐसे पहचान आधारित रक्तपात और नरसंहारों के लिए आक्रोश हो।  

लेकिन, सवाल यह भी है कि अधिकांश मुस्लिम अगस्त 1946 के ग्रेट कलकत्ता में और बाद के महीनों में नोआखली में कत्लेआम को कैसे देखते हैं जो एच एस सुहरावर्दी और शेख मुजीबुर रहमान (1920-1975) के नेतृत्व में मुस्लिम लीग प्रशासन के तहत हुआ?

उपमहाद्वीप के एलिट मुस्लिम विभाजनों (1947 और 1971) की राजनीति को कैसे देखते हैं?

क्या वह हिंसा के इतिहास और राजनीति के इस पहलू को देखते हैं? 


क्या उन्हें एहसास है कि मुस्लिम एलिट के एक बड़े वर्ग (ज्यादातर पश्चिमी उत्तर प्रदेश से) ने विभाजन की मांग की थी और उन्हें पाकिस्तान मिला था इसलिए उन्हें (और उस विचारधारा को मानने वाले) और अंग्रेजी राज सहयोगियों को हिंसा और अत्याचार की ज़िम्मेवारी का बड़ा हिस्सा साझा करना चाहिए? 
इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि एक पक्ष पर दोष डाला जा रहा है और दूसरे को छूट दी जा रही है। मैंने विभाजन साहित्य, ऐतिहासिक भी और काल्पनिक भी, काफी पढ़ा है। भारत का विभाजन ब्रिटिश मौजूदगी में ही हो सकता था, इसका विभाजन प्रतिस्पर्धात्मक सांप्रदायिकता के कारण हुआ। मेरे विस्तृत अकादमिक कार्य और लेखन में यह विषय बार-बार आता है। इसके बावजूद, मुस्लिम राजनीति के नैरेटिव के संबंध में चयनात्मकता  के बारे में कुछ सवाल पहले से भी ज्यादा जोर देकर उठाए जाने की जरूरत है! 

क्या यह मुस्लिम एलिट महसूस कर पाते हैं कि पाकिस्तान की उन्हीं विचारधारा वाली ताकतों और वर्गों ने 1970 में शेख मुजीबुर रहमान को जनादेश के बावजूद सत्ता देने से इनकार किया?

क्या उन्हें एहसास है कि 1971 में पाकिस्तान के इस्लामिक गरणतंत्र के पूर्वी हिस्से में बंगाली नागरिकों पर 1971 में किस तरह के अन्याय, हिंसा, लूट आदि किए गए? मई 2014 में मृत्युंजय देवव्रत निर्देशित एक फिल्म रिलीज हुई थी, “द चिल्ड्रन ऑफ वॉर”, जिसे “द बास्टर्ड चाइल्ड” के रूप में भी जाना चाहता है, मुख्य भूमिकाएं राइमा सेन, फारूक शेख, ऋचा इनामदार और अन्य ने निभाई थी। इसमें 1971 के अत्याचारों को दर्शाया गया था। 

उपमहाद्वीप के कितने मुस्लिम इस फिल्म के बारे में जानना चाहते हैं या इसे याद करना चाहते हैं, दूसरे शब्दों में इंसानों, अपने सहधर्मियों, के खिलाफ इंसानी हिंसा के बारे में जानना  याद करना चाहते हैं। बाद में, 15 अगस्त 1975 को शेख मुजीबुर रहमान अपने परिवार के सभी सदस्यों के साथ अपने घर में मार दिए गए थे।

जहां तक इतिहास की गाथाओं को मिटाने या बनाने की बात है, नैरेटिव बनाने की राजनीति कौन तय करता है? क्या ऐसे सभी विषयों पर ईमानदार और समुचित आत्ममंथन हुआ है और बिरादरी व लिंग के आधार पर न्याय मांगा गया है? जोया चटर्जी ने अपनी हालिया किताब “शैडोस ऐट नून” में भूलने की बीमारी और रणनीतिक भूल जाने की “राष्ट्र निर्माण योजना का एक महत्वपूर्ण पहलू” के रूप में शिनाख्त की है। वह कहती हैं, राष्ट्र निर्माण की हर लहर के साथ आंतरिक अल्पसंख्यकों के हालात और बिगड़ते हैं, समूचे उपमहाद्वीप में। इसके बावजूद, 4 अप्रैल 1979 को जब ज़ुल्फिकार भुट्टो की “न्यायिक” फांसी हुई, 1971 में उनके किए बंगाली मुस्लिमों के नरसंहार को भारतीय मुस्लिमों के हिस्सों ने भुला दिया। फिल्म मुकद्दर का सिकंदर (1978) का एक लोकप्रिय बॉलीवुड गीत पैरडी के रूप में ढालकर “ओ भुट्टो रे... तेरे बिना भी क्या जीना” गाया गया। उस साल, भारत के आम के बागों में मुस्लिम लड़के यह गीत गा रहे थे, प्राथमिक स्कूलों की अर्द्धवार्षिक परीक्षाएं पूरी हो चुकी थीं और हमारे पास मनोरंजन के लिए पर्याप्त समय था। हमारे घरों में बड़ों के बीच भुट्टो के 1970-71 के कारनामों को भुला दिया गया। बाद में, जनरल जिया उल हक ने इस्लामिक अतिवादियों को उकसाना शुरू किया जो एक तरह से भुट्टो के खिलाफ कारनामों पर पर्दा डालने के लिए था। 

एक और ओपन सीक्रेट है कि हममें से कइयों को पाकिस्तानी क्रिकेट भारतीय क्रिकेट से ज्यादा पसंद था और हमें कलकत्ता के मोहम्मद खेल क्लब मोहन बगान या पूर्वी बंगाल से ज्यादा पसंद थे। समुदाय के अंदर ऐसे “सीक्रेट” अथवा ऐसे किस्से समुदाय के सामाजिक-राजनीतिक रवैयों और विचारों के बारे में कुछ तो बताते हैं। 

हर चुनाव के समय, कई भारतीय मुस्लिम युवा विधायिका में मुस्लिम प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाते हैं। जहां भी मुस्लिमों का आबादी में 20 फीसदी या उससे अधिक हिस्सा है, वह अधिकार के रूप में दावा जताते हैं कि सीट पर मुस्लिम प्रतिनिधित्व ही होना चाहिए। ऐसी आकांक्षाओं में कुछ बुरा नहीं है। लेकिन वह यह क्यों भूल जाते हैं कि बहुसंख्यवाद और बहुसंख्य चुनावी ध्रुवीकरण के युग में, जिसे पूंजी और मीडिया का पूरा समर्थन है, आबादी का 45 फीसदी हिस्सा होना भी उनकी जीत तय करने के लिए काफी नहीं है? वह क्यों नहीं समझते हैं कि सांप्रदायिकता का मुकाबला सांप्रदायिकता से नहीं किया जा सकता। और यदि, लड़ाई सांप्रदायिक आधार पर है तो बहुसंख्यक हमेशा जीतेंगे, तब तो और भी जब बहुसंख्यवाद उफान पर हो। यह वीएस नायपॉल (1932-2018) के उपनयास गुरिल्लास (1975) में सटीक तरीके से रखा गया है : जब हर कोई लड़ना चाहता है तो लड़ने के लिए कुछ नहीं होता। हर कोई अपनी छोटी लड़ाई लड़ना चाहता है। हर कोई गुरिल्ला है... जिन्होंने जीत लिया है, हर लड़ाई जीतेंगे।”

अल्पसंख्यकों का यह असहायपन फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली में और बढ़ जाता है। मुस्लिम एलिट का एक बड़ा हिस्सा, राष्ट्रीय आंदोलन के लोकप्रिय चरण के दौरान, मिलनसार लोकतंत्र में अलग निर्वाचन क्षेत्र के लिए अधिक और अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए कम लड़ा था। यहाँ तक कि संवैधानिक सभा चर्चाओं (सीएडी 1946-49) के दौरान इस मुद्दे पर शायद ही कोई चर्चा हुई। हमें खुद को याद दिलाना होगा कि सीएडी के दौरान, मुस्लिमों और उदार हिंदुओं की मोलतोल की क्षमता जुलाई 1947 के बाद उतनी मजबूत नहीं रह गई थी, जो पहले थी। यह काफी कम हो चुकी थी, जो एक और कारक है कि भारत में अल्पसंख्यक अधिकारों की जमीन क्यों कमजोर है (प्रतिनव अनिल के हालिया पुस्तक, “अनदर इंडिया: मैकिंग ऑफ द वर्ल्ड’स लार्जेस्ट मुस्लिम मायनोरिटी, 1947-77 में इसे ज्यादा स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है)। मेरे कुशाग्र गुरुओं में से एक ने मुझे याद दिलाया, “यदि ऐसी व्यवस्था होती कि जहां, कम से कम 51 फीसदी वोट पड़ें (पहली या दूसरी पसंद के जरिए) यह सामाजिक न्याय के लिए और अनुकूल होता और वोट बैंक कमज़ोर पड़ते। बेहद सम्मानित बीआर अंबेडकर भी यह जान नहीं सके। उन्होंने, आरक्षित सीटें सुरक्षित करने के बाद, कम से कम प्रतिरोध का पथ अपनाया और ऐसी मांगें सीएडी/संविधान में रखना भूल् गए। संविधान के कार्यचालन की समीक्षा के लिए गठित न्यायमूर्ति एम एम वेंकटचलैयाह आयोग (2000) ने निम्नलिखित सुझाव दिया: 

“समीक्षा आयोग ने अधिक प्रतिनिधिकारी लोकतंत्र के लिए फर्स्ट पास्ट पोस्ट द सिस्टम के मुकाबले डाले गए वोटों के 50 फीसदी प्लस वोट के आधार पर प्रतिनिधि चुनने के निर्णायक मुकाबले की संभावनाओं को लाभकारी बताया और सुझाव दिया कि भारतीय निर्वाचन आयोग चुनाव के सभी पहलुओं में न्यूनतम 50 फीसदी प्लस  एक वोट के मुद्दे की पड़ताल करे। समीक्षा आयोग ने यह भी कहा कि इसके लिए बड़े संवैधानिक संशोधन की जरूरत नहीं है बल्कि आवश्यक सुधार सामान्य विधेयक से हासिल किया जा सकता है, वर्तमान कानूनों या नियमों को कार्यपालिका द्वारा बदला जाए।  

1986 के बाद मुस्लिम रूढ़िवादियों और कट्टरपंथियों ने भारतीय धर्मनिरपेक्षता को और भी कमजोर बना दिया वह भी इस हद तक कि यह एक (प्रमुख मानें या मामूली) कारण बन गया जिसकी वजह से हम आज वहाँ पहुंचे हैं जहां हम हैं, जैसा कि जोया  चटर्जी की किताब, शैडो ऐट नून (पृष्ठ 203) कहती हैं, “हिन्दुत्व की नैतिक संहिता संविधान का हिस्सा नहीं बन पाई है लेकिन यह भारत के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा जरूर बन गई है।” 

महत्वपूर्ण सवाल, जो अब भी अनुत्तरित है कि आम मुस्लिमों को पीड़ित होने का अफीम कैसे चटाया जाता है? इसके जवाब के लिए हमें गोपाल कृष्ण द्वारा पीटर हार्डी (1912-47) की दो किताबों द मुस्लिम्स ऑफ ब्रिटिश इंडिया और पार्टनर्स इन फ्रीडम एण्ड द  ट्रू मुस्लिम्स : द  पोलिटिकल थॉट ऑफ सम मुस्लिम स्कॉलर्स इन ब्रिटिश इंडिया की समीक्षा (आईईएसएचआर, सेज, 1973) देखनी होंगी। समीक्षक गोपाल कृष्णा का विस्तृत उद्धरण देना होगा जो हमें फिर से पड़ताल के लिए कहता है और 

“सवाल उठायें तथा डब्ल्यू डब्ल्यू हंटर (इंडियन मुसलमान, 1871) के लेखन से निकले एक सामान्य किरदार के गलत स्थापित दावों की सावधानी से पड़ताल करें जैसे कि : मुस्लिम 1857 की बगावत के बाद ब्रिटिश द्वारा सताये गए थे”, “मुस्लिम शैक्षणिक रूप से तुलनात्मक रूप से पिछड़े थे”, “अंग्रेजों की नीति के कारण मुस्लिमों को ज़मीने हिंदुओं के हाथों गंवानी पड़ीं”, “मुस्लिमों को प्रशासन में समुचित हिस्सा नहीं मिला” जैसे कई अन्य दावे क्योंकि मुस्लिम एलिट द्वारा अलगाववादी मुहिम को बढ़ावा देने के लिए ऐसे दावे भी उतने ही जिम्मेवार थे जितने कि भारत में मुस्लिमों के पवित्र अभियान का विचार और हिन्दुत्व के पुनरुत्थान से मुस्लिमों को खतरे का विचार। अपेक्षाकृत वंचितीकरण और सांप्रदायिक उत्कृष्टता के मिथक ने उक्त अभियान को बुनियाद दी जिसने विभिन्न चरणों के बाद दावा करना शुरू किया कि मुस्लिम एक अलग राष्ट्र थे और अपने लिए अलग देश मांगने लगे। अपने अध्ययन द मुस्लिम्स इन ब्रिटिश इंडिया में, डॉ. हार्डी ने ऐसे कई विचारों पर उपलब्ध प्रमाणों की पड़ताल कर महतपूर्ण सेवा दी। उन्होंने लिखा, “उत्तरी भारत में एलिट मुस्लिमों के लिए, ब्रिटिश शासन का मतलब था आजीविका और शिक्षा के विनाश से भी ज्यादा जीवनशैली का विनाश।” (पृष्ठ 34) “न्याय न्यायपालिका, में उच्च पदों यानी न्यायाधीशों और जिलाधिकारियों को छोड़कर, 19वीं सदी के मध्य तक बंगाल में, आधुनिक उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में एक पीढ़ी बाद तक, का मुस्लिमों सिक्का था (पृष्ठ 36)। बंगाल में मुस्लिम पर पुनरारंभ प्रक्रियाओं के प्रभाव  के बारे में डॉ. हार्डी लिखते हैं, “मुस्लिमों को भी सहना पड़ा, लेकिन हिंदुओं के मुकाबले उन्हें ज्यादा सहना पड़ा, इस बारे में ठोस जानकारी नहीं है, यह मानने न मानने की बात ही है.” (पृष्ठ 40) और उन्होंने 1882 की एजुकेशन कमीशन रिपोर्ट के हवाले से कहा है, ‘कड़े से कड़े पुनरारंभ मामले का नतीजा धारक के अपनी संपत्ति से कब्जा खोना नहीं था बल्कि उस संपत्ति पर राजस्व के मूल्यांकन था और और वह भी उस समय की दर के पचास फीसदी से अधिक नहीं था।” (पृष्ठ 41) 

इन खुलासों के बाद, हमें यह पूछने की जरूरत है कि किसने गुमराह करते हुए मुस्लिमों के  उत्पीड़न के किस्सों को लोकप्रिय बनाया? और दूसरा सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि आजादी के बाद के समय में भारतीय मुस्लिमों की तरफ से शिक्षा, रोजगार, कारोबारी सुविधाओं (ऋण और अन्य प्रशासनिक सुविधाएं) के लिए कोई बड़ा जनआन्दोलन हुआ?  मुस्लिमों के सबसे बड़े देशव्यापी जन आंदोलनों में से एक मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधारों के विरोध में मुस्लिम महिलाओं के अधीनीकरण के लिए हुआ। सुधार जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और कई अरब देश पहले ही अपना चुके हैं। यह 1972-73 की और 1985-86 की बात है (इंडिया टुडे, 31 जनवरी 1986)। मुस्लिम विरोध की पहली लहर की परिणिती 1972 में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के गठन में हुई, हालांकि सम्बद्ध कानूनों में संशोधन हिंदुओं के बारे में अधिक था। दूसरी लहर की परिणिती बाबरी मस्जिद भगवधारियों के हवाले कर बदले में एक कानून (मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों की सुरक्षा) अधिनियम, 1986) पाने के रूप में हुई, जो सुप्रीम कोर्ट के 23 अप्रैल 1985 के शाह बानो के पक्ष में निर्णय के खिलाफ था। यह एआईएमपीएलबी के तत्कालीन प्रमुख अबुल हसन अली मियां नदवी (1914-1999) के उर्दू संस्मरण कारवां-ए-ज़िंदगी, 1988, वॉल्यूम 3, खंड 4 में किया गया है लेकिन इस आत्मस्वीकृति को नजरंदाज किया जाना जारी है। यह आत्मस्वीकृति भारत के अधिकांश मुस्लिमों को चौंकाती नहीं है।
 
इस संदर्भ में स्पष्टता के लिए यहाँ कुछ बातों का उल्लेख जरूरी है : 
1980 के दशक में भारतीय मुस्लिमों में एआइएमपीएलबी मार्का ताकतों ने बढ़ते बहुसंख्यवाद में अपना योगदान किया। 15 जनवरी 1986 को दिल्ली के सिरी फोर्ट सभागृह में मोमिन सम्मेलन के एक सत्र में तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के अप्रैल 1985 के शाह बानो के निर्णय को निरस्त करने के लिए कानून में संशोधन के अपने इरादे की  घोषणा की। मार्च में एक विधेयक लाया गया और यह मई 1986 में मुस्लिम महिला (तलाक के अधिकारों की सुरक्षा) अधिनियम बना। जनवरी 1986 में, जैसा कि बताया गया, प्रगतिशील फैसले के खिलाफ तीखे मुस्लिम विरोध प्रदर्शन हुए। निर्णय ने शाह बानो (1916-1992) को तलाक के बाद ऐलमोनी देने की व्यवस्था दी थी। (1930 के दशक में जिन्ना की अलगाववादी राजनीति के लिए, धार्मिक आधार पर शरीयत के न टिकने वाले प्रावधानों के और उस राजनीति के परवर्ती जीवन के लिए यह तीन किताबें देखें : सौम्य सक्सेना डिवोर्स एण्ड डेमोक्रेसी, 2022, जूलिया स्टीफंस, गवर्निंग इस्लाम 2019, रीना वर्मा विलियम्स, पोस्टकोलोनियल पॉलिटिक्स एण्ड पर्सनल लॉ, 2006)। 

रूढ़िवादी मुस्लिमों का रवैया उर्दू संस्मरण, कारवां-ए-ज़िंदगी, 1988 में प्रकाशित मौलाना अबुल हसन मियां नदवी (1914-99) से स्पष्ट हो जाता है। इसके वॉल्यूम 3, खंड 4 में पृष्ठ 134 पर नदवी स्पष्ट रूप से बताते हैं कि उन्होंने गांधी को यह बात स्वीकार न करने के लिए मनाया था कि कई इस्लामिक देश अपने पर्सनल लॉ में सुधार ला चुके हैं। नदवी का कथन विजय का भाव लिए हुए है, देश में उसी तरह के सुधारों को रोकने में अपने सफल प्रयास पर वह खुश होते दिखाई देते हैं। वह कहते हैं कि उनके अनुनय का राजीव गांधी पर विशेष मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा था और “वो तीर अपने निशाने पर बैठा!” पृष्ठ 157 पर नदवी की “आत्मस्वीकृति” आती है : 1986 में शरीयत को बचाने के लिए हमारी लामबंदी का नतीजा बाबरी मस्जिद मुद्दे के जटिलीकरण के रूप में हुआ और माहौल बड़े पैमाने पर बिगड़ा - वह लिखते हैं :  “इसने फिजा में इश्तेआल व इजतेराब पैदा करने में बहुत बड़ा हिस्सा लिया।”

इसकी और पुष्टि के लिए अली मियां नदवी के संस्मरण, निकोलस नुगेंट की किताब, राजीव गांधी : सन ऑफ अ डायन्स्टी (बीबीसी बुक्स, 1990, पृष्ठ 187) पढ़ें:
“...काँग्रेस आला कमान ने 1986 के प्रारंभ में एक निर्णय लिया था “हिन्दू कार्ड खेलने का’ ठीक उसी तरह जिस तरह मुस्लिम महिला विधेयक “मुस्लिम कार्ड खेलने का प्रयास था...       अयोध्या एक पैकेज डील होने वाला था... मुस्लिम महिला विधेयक का बदला... राजीव ने इस पैकेज डील के हिन्दू पक्ष को बाहर लाने में प्रमुख भूमिका निभाई और टीवी पर नए ताले खुले पूजास्थल पर हिंदुओं के पूजा अर्चना करने की तस्वीरें दिखाने की व्यवस्था की।”

ताला (बाबरी मस्जिद का) फैजाबाद की जिला अदालत के 1 फरवरी, 1986 के निर्णय आने के एक घंटे के भीतर खोला गया। जैसा कि पहले बताया गया है, प्रधानमंत्री और मुस्लिम धार्मिक नेताओं और मोमिन सम्मेलन के जियाउर रहमान अंसारी (राजीव गांधी सरकार में केन्द्रीय पर्यावरण राज्य मंत्री, जिनका निधन 1992 में हुआ) के बीच डील जनवरी 1986 में हो चुकी थी। उनकी जीवनी, विंग्स ऑफ डेस्टिनी, 2018 जो उनके बेटे फसीहुर  रहमान ने लिखी थी, में इसका संदर्भ है।

एक परेशान करने वाला सवाल अभी बाकी है : कौन चाहता था कि ताले खुलें और क्यों? क्या इसलिए कि कुछ उपचुनाव में काँग्रेस को मुस्लिमों के विरोध का सामना करना पड़ा था? अली मियां और जियाउर रहमान अंसारी के खुलासों और निकोलस नुगेंट की पुष्टि से  अधिकांश मुस्लिमों में कुछ नाराजगी पैदा होनी चाहिए थी, जैसी कि अब है। इसके बजाय मुस्लिम नेताओं और राजीव गांधी के बीच की गई डील के खिलाफ आक्रोश होने के स्थान पर पाखंडपूर्ण चुप्पी है। (शाह बानो के जीवन और समय पर एक समग्र जीवनी लाने की जरूरत है।)    

इससे हमें यह पता चलता है कि भारतीय मुस्लिमों ने मुस्लिम अधिकारों के लिए कभी कोई जन आंदोलन नहीं छेड़ा, न तो अंग्रेजी राज के समय और न आजादी के बाद। औपनिवेशी काल में अल्पसंख्यक अधिकार पाने व इसके नाम पर शुरू हुए मुस्लिम लीग ने अंतत: मुस्लिमों को राष्ट्र घोषित किया जिसका अपना देश होना चाहिए (जिन्ना ने खुद पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों को राष्ट्र नहीं माना)। इमरजेन्सी क्रानिकल्स के लेखक ज्ञान प्रकाश ने माणिक शर्मा के साथ अपने साक्षात्कार (फर्स्टपोस्ट, दिसम्बर 4, 2018)  में कहा :

(मुस्लिम) अल्पसंख्यकों को भारतीय संविधान में समान अधिकार अंग्रेजों के खिलाफ राष्ट्रीय आंदोलन में हिस्सा लेने के कारण मिले, न किसी अल्पसंख्यक नागरिक अधिकारों को लेकर संघर्ष के कारण। संभवत: केवल दलित आंदोलन ही नागरिक अधिकार संघर्ष के इतिहास का दावा कर सकता है। मुस्लिमों ने कभी नागरिक अधिकार आंदोलन विकसित नहीं किया और वह मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग और काँग्रेस पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति के बीच बंटे रहे। जब भाजपा ने राष्ट्रवाद के चोले पर कब्जा किया और इसे हिन्दू बहुसंख्यवादी मोड़ दिया, मुस्लिमों के पास कोई ऐतिहासिक संघर्ष या नागरिक अधिकार आंदोलन की कोई स्मृति याद दिलाने के लिए नहीं थी। आज, अल्पसंख्यक अधिकारों को नागरिक अधिकार संघर्ष से मिलकर कोई आंदोलन खड़ा नहीं किया जाता तो मुस्लिम चुनावी राजनीति के झूले में झूलते रहेंगे।  

आज मेरे जैसा शख्स जो पिछले ढाई दशक से आधुनिक एवं समकालीन भारतीय इतिहास में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम पढ़ा रहा है, उसके लिए गहन चिंता और सवाल का विषय है कि मेरे छात्र (अधिकतर मुस्लिम) जानते हैं कि बहुसंख्यवादी ताकतें सरदार पटेल (1875-50)  जैसों को अपना रही हैं। लेकिन, मेरे किसी छात्र को नहीं पता कि सरदार पटेल की मुस्लिम विरोधी छवि को रफीक जकारिया (1920-2005) ने 1996 में (सरदार पटेल एण्ड इंडियन मुस्लिम्स) नकार दिया था। शिक्षित मुस्लिमों में इस तरह का अज्ञान इस तथ्य के बावजूद है कि उक्त का उर्दू संस्करण भी है। हमें यह तथ्य नहीं भूलना चाहिए कि जकारिया ने अपने पीछे शैक्षणिक संस्थाओं की शृंखला की विरासत छोड़ी है। इसके बावजूद उनके अकादमिक हस्तक्षेप के बारे में शिक्षित मुस्लिमों की जानकारी अपर्याप्त है। 

अकादमिक क्षेत्र में मेरे कुछ बुद्धिजीवी मित्र जवाहरलाल नेहरू जैसे नेता की सोच और विचारों में मुस्लिम विरोध के उदाहरण ढूंढ लेते हैं। ठीक है। लेकिन सवाल है, क्या उन्हें इस्लामिक स्टेट/हुकूमत-ए-इलाहिया/निजाम-ए-मुस्तफा स्थापित करने की आकांक्षाओं के उदाहरण ढूंढ निकालने का समय मिलता है? इसके अलावा, पश्चिमी सेकुलरिज़्म, पाकिस्तानी अनुभवों के विपरीत भारतीय धर्मनिरपेक्षता ने जमात-ए-इस्लामी-ए-हिन्द जैसी इस्लामिक ताकतों को भी भारत में पर्याप्त जगह दी है कि वह अपनी पत्रिकाएं, किताबें प्रकाशित कर सकें, अपने मदरसे और यहाँ तक कि अपनी राजनीति भी चला सकें। वास्तव में मुस्लिम रूढ़िवाद और मुस्लिम सांप्रदायिकता के खिलाफ बोलने वाले लोग अपने समुदाय में ही अलोकप्रिय हैं। 

नैरेटिव निर्माण की मुस्लिम राजनीति से मैं अक्सर चकित हो जाता हूँ जिसमें मुस्लिम उत्पीड़न प्रमुख अंग होता है। मुझे आश्चर्य होता है कि कोई हमीद दलवाई (1932-1977) जैसा कोई बुद्धिजीवी-कार्यकर्ता और उपन्यासकार जिसे दिलीप चित्रे (1938-2009) ने  और मेहरुनिसा (1930-2017) (दलवाई की पत्नी) ने “एंग्री यंग सेकुलरिस्ट करार दिया (देखें हमीद दलवाई, मुस्लिम पॉलिटिक्स इन इंडिया, सम्पादन एवं अनुवाद दिलीप चित्रे 2023 रिप्रिन्ट) अधिकांश मुस्लिमों द्वारा बदनाम किया गया और तिरस्कृत किया गया। ऐसे उदाहरणों की तुलना उनसे करें जो उत्पीड़न के नैरेटिव गढ़ते रहते हैं। ऐसे प्रचारक मुस्लिमों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं। इन हालात का फिर से आकलन करना होगा, इन पर सवाल उठाने होंगे। 

मैंने कुछ फेसबुक पोस्ट और लेख देखे हैं जिनमें हदीस पर सवाल उठाने वालों और कुछ कुरान की आयतों की पुनर्व्याख्या करने वालों की उतनी आलोचना नहीं होती जितनी मुस्लिम सांप्रदायिकता और कट्टरपंथ तथा कौम को उत्पीड़न नैरेटिव के प्रति जुनून से मुक्त होने के लिए और उनके शक्ति धर्मशास्त्र पर सवाल उठाने और पहचान की राजनीति के प्रति उनके अनुचित जुनून की आलोचना करने  पर होती है। वह या तो मुस्लिमों के प्रतिक्रियावादी होने से इनकार करेंगे या फिर तर्क देंगे कि अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता बेअसर है या फिर उन्हें यदि अंतत: हार मानने पर मजबूर किया जाए तो वह कहेंगे कि यह सही समय नहीं है ऐसे  मुद्दे उठाने का। दुर्भाग्य से कई उदारवादी-वामपंथी भी ऐसे कपटी तर्क का अनुमोदन करते हैं। यहीं उदारवादी-वामपंथी अपनी विश्वसनीयता खो देते हैं और धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशीलता के लिए उनकी लड़ाई कमज़ोर हो जाती है और हिन्दुत्ववादी ताकतों को आगे बढ़ने का मौका मिल जाता है। जब वह कहते हैं कि भारत के मुस्लिम अल्पसंख्यक उतने कमज़ोर नहीं हैं, जितने उदारवादी-वामपंथियों द्वारा बताए जाते हैं तो हिन्दुत्व प्रभाव क्षेत्र और उसका जनसमर्थन लगातार बढ़ता जाता है। उनका तर्क है : 

मुस्लिम अंग्रेजों के खिलाफ तभी उठ खड़े हुए जब 1857 में उन्होंने मुगल राज गंवा दिया। उनमें से कई 1920 में राष्ट्रीय आंदोलन जुड़े, तुर्की में खिलाफत को अपनी व्यापक  इस्लामियत से बचाने के लिए, उन्हें 1947 में पाकिस्तान मिला, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट पर आक्रमण किया और संसद पर दबाव डालकर 1986 में उसके फैसले के खिलाफ कानून बनवाया। उनके पास पाँच दर्जन मुस्लिम देश हैं और उनकी इस्लामिक एकजुटता भारत के हिंदुओं को अल्पसंख्यक बनाती है भले अपने गृह देश - भारत - में वह बहुसंख्यक हैं। लाला लाजपत राय ने इसके बारे में  अपनी आशंकाओं पर सी आर दास और मदन मोहन मालवीय से चर्चा की थी। (इंतजार हुसैन, अजमल-ए-आजम, 1999)। अधिकाधिक हिन्दू भारतीय धर्मनिरपेक्षता को मुस्लिमों पर अहसान और उनकी प्रगतिगामिता  के रूप में देखते हैं और न कि राष्ट्रवाद के तर्कसंगत प्रगतिशील बुनियाद के रूप में। मुशिरूल हक (1933-1990) ने अपने निबंध में कहा था, “धर्मनिरपेक्षता? नहीं। धर्मनिरपेक्ष देश? बिल्कुल”, इसे हक की 1972 की पुस्तक, “इस्लाम इन सेकुलर इंडिया” में शामिल किया गया था। हक ने कहा था  कि अधिकांश मुस्लिम और उनके उलेमा मानते हैं कि देश को तो धर्मनिरपेक्ष रहना चाहिए लेकिन मुस्लिमों को धर्मनिरपेक्षता से बचाया जाना चाहिए। 

हक आगे कहते हैं कि भारतीय मुस्लिमों का छोटा हिस्सा जो धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखता है, मुस्लिम उन्हें तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं। यह किताब भी उर्दू में है। मैं इस निबंध में कुछ लेखन उर्दू में उपलब्ध होने का ज़िक्र कर रहा हूँ। इसलिए कि यह इस बात का संकेत है कि कोई यह न कहे कि उर्दू भाषी मुस्लिमों को पता नहीं है। बल्कि, यह तो मानना ही चाहिए कि यह न जानने के बारे में है ही नहीं, अपितु यह इस सच्चाई के बारे मैं है कि किस तरह मुस्लिम राजनीति के नैरेटिव बनाए जाते हैं और समुदाय में फैलाए जाते हैं। 

दूसरा उदाहरण लें। शायर अलामा इकबाल, भारत-पाक उपमहाद्वीप के मुस्लिमों के लिए लगभग “ अनौपचारिक पैगंबर” हैं। राष्ट्रवाद की राजनीति पर इकबाल के विचार भारत के मुस्लिमों के हिन्दू देशवासियों के साथ रहने को मुश्किल बनाते हैं। उनकी नेहरू के साथ 1930 के दशक में बहस ने इकबाल की “शिष्टाचार में कमी” को बेनकाब किया था। 

यह शिष्टाचार में कमी इकबाल के हुसैन अहमद मदनी के “मुत्ताहिदाह कौमियत” का जवाब देने में भी दिखा, जब उन्होंने हुसैन मदनी को “शरारती) (और लगभग काफिर?) भी कह दिया। इकबाल ने (एहसान, उर्दू रोजाना अखबार, लाहौर, 9 मार्च, 1938) में लिखा है, “मौलाना हुसैन अहमद और उनके जैसा सोचने वालों के ज़ेहन में राष्ट्रवाद के विचार का वही स्थान है जो कादियानी के जहाँ में  पवित्र पगम्बर के सत्य के नकार का है।   

(शामलू, संपादन, 1944, पृष्ठ 219, उर्दू में भी अनूदित, रेख्ता पर उपलब्ध, शामलू लतीफ़ अहमद शर्वनी का उपनाम था)। यह इकबाल के गुजरने (21 अप्रैल, 1938) से कुछ सप्ताह पहले ही की बात है। इकबाल ने नेहरू के निबंध “ऑर्थडाक्स ऑफ ऑल रिलीजंस, यूनाइट! (मॉडर्न रिव्यू, वॉल्यूम 58, अंक 5, 1935) का जवाब देते हुए अपने अपवर्जनात्मक  अलगाववादी राष्ट्रवाद की बात स्वीकार की थी: 

“यह मुस्लिमों की समस्या बन जाती है केवल उन्हीं देशों में जहां वह अल्पमत में होते हैं, और राष्ट्रवाद उनसे उनके स्व को पूरी तरह से मिटाने की मांग करता है। बहुसंख्यक देशों में इस्लाम राष्ट्रवाद को समायोजित करता है क्योंकि उनका इस्लाम और राष्ट्रवाद व्यावहारिक रूप से एक समान हैं, जबकि अल्पसंख्यक देशों में सांस्कृतिक इकाई के रूप में आत्म-निर्णय  की मांग न्यायोचित्त है। (शामलू, सम्पादन, सपीचेस एण्ड स्ततेमएनट्स ऑफ इकबाल, 1944, पृष्ठ 130)। 
इकबाल नेहरू पर आरोप लगाने की हद तक गए कि उन्हें “इस्लाम अथवा इसके 19 वीं सदी के धार्मिक इतिहास की जानकारी नहीं हैं।” नेहरू ने लेकिन, इकबाल के आरोप के जवाब में इकबाल पर हिन्दू धर्म को न जानने का आरोप नहीं लगाया। इकबाल नेहरू को “पंडित” के रूप में संबोधित करना जारी रखते हैं। मैं अब भी इस्लाम पूर्व स्पेन के साथ सहानुभूति दर्शाते इकबाल के निबंध (या शायरी) को देखना चाहता हूँ। पर अभी तक मुझे नहीं दिखी। 

मुस्लिम लीग के इलाहाबाद वार्षिक सत्र (29 दिसम्बर, 1930) की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा, “मैं किसी पार्टी का नेता नहीं, मैं किसी नेता का अनुसरण नहीं करता।” दूसरे शब्दों में एक राजनीतिक पार्टी के लिए राजनीतिक बयान देते हुए उन्होंने दावा किया कि वह राजनीतिक नहीं हैं। और नेहरू से तर्क (1935) करने से पहले  इकबाल ने ई जे थॉमप्सन (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी) को 1933-34 में नौ पत्र लिखे थे। यह राजनीतिक सवालों पर पत्राचार था। इकबाल के राजनीतिक और उनमें निहित कई आत्म विरोधाभासों का  समग्र विश्लेषण बताता है कि वह अलगाववादी ज्यादा थे और अर्थव्यवस्था, प्रशासन व परस्पर  सह अस्तित्व में अंतर-धर्मीय सहयोग की वकालत करने वाले कम। (एस हसन अहमद, द आइडिया ऑफ पाकिस्तान एण्ड इकबाल: अ डिस्क्लैमर। केबीएल, पटना, 2003/1979)। 

दूसरे शब्दों में, भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिम विचारक हिन्दू संस्कृति समझने के मामले में अनदेखी करने, परवाह न करने का रास्ता अपनाते रहे हैं। हमारे युग में संघ परिवार “संस्कृति के रास्ते सत्ता” तक पहुँच रहा है और शैक्षणिक व आर्थिक रूप से “समर्थ” हिन्दू उसी तरह बहुसंख्यक उत्पीड़न को देखता है, यह सुगत श्रीनिवास राजू ने अपने हालिया किताब, स्ट्रेंज बर्डन्स : पॉलिटिक्स एण्ड प्रेडिकामेंट्स ऑफ राहुल गांधी में कहते हैं। सुगत राजू कहते हैं, “गांधी के बाद, नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता ने धार्मिक याददाश्त को सांस्कृतिक याददाश्त समझने की भूल की। (पृष्ठ 139)। यही भारत के मुस्लिम विचारकों के बारे में कहा जा सकता है। अधिकांश ने हिन्दू संस्कृति को समझने में भूल की है और इसलिए वह सद्भाव में अर्थपूर्ण रचनात्मक जीवन के लिए संवाद साधने में विफल रहे। उन्होंने हिन्दू संस्कृति को विजेताओं, शासकों के रूप में अधिक देखा साझा विरासत और मुस्लिम शासकों से पहले के समय की साझा आनुवंशिकता के साथ कम।

यह सुधार (मुस्लिम शासकों से पहले के अतीत पर अपना दावा करना) हाल ही में हुआ है। 

उदाहरण के लिए, कोलम्बिया यूनिवर्सिटी के एक युवा पाकिस्तानी इतिहासकार मनन अहमद आसिफ ने अपनी किताब, द लॉस ऑफ हिंदुस्तान: द इन्वेन्शन ऑफ इंडिया (2020) और अपने पिछले वॉल्यूम, अ बुक ऑफ कान्क्वेस्ट: द चचनामा एण्ड मुस्लिम ओरिजिंस इन साउथ एशिया (2017) में इस नजरिए से इतिहास को समझने की कोशिश की है। सद्भावनापूर्ण और गरिमापूर्ण जीवन, साझा आनुवंशिकता पर दावा जताने के ऐसे कार्य समूचे उपमहाद्वीप में लोकप्रिय नैरेटिव में शामिल करना चाहिए। भारत के मुस्लिमों की तरह ही बहुसंख्य हिंदुओं को बताया जाना चाहिए कि यह धार्मिक उन्माद है जिसने पाकिस्तान को बर्बाद किया है। यह न्युक्लेयर फिज़िसिस्ट और बुद्धिजीवी, परवेज़ हूडभोय की हाल की एक किताब, पाकिस्तान : ओरिजिंस, आइडेंटिटी एण्ड फ्यूचर में दिखाया गया है। यह किताब लंबे समय से जटिल विषयों और मुद्दों - जैसे धार्मिक कट्टरवाद, पहचान निर्माण, लोकतंत्र और सैन्य शासन - आदि और पाकिस्तान के भविष्य पर उनके प्रभाव की पड़ताल करती है। हम, भारतीयों को अपने पड़ोसियों और अन्य की आत्म-विनाशी भूलों से सबक लेना चाहिए।       
निष्कर्ष के तौर पर, जारी चर्चा से यही निकालकर आता है कि भारतीय मुस्लिमों को तीन श्रापों से मुक्त होना; उत्पीड़ित होने की भावना, सत्ता धर्मशास्त्र और पहचान की राजनीति के प्रति जुनून। 

सरल शब्दों में कहें तो अधिक से अधिक मुस्लिमों को भारत को धर्मनिरपेक्ष बनाने मैं अपना योगदान देना होगा। उन्हें यह एहसास होना जरूरी है -- और इसे हकीकत बनाने के लिए काम भी करना होगा - कि सांप्रदायिकता सांप्रदायिकता का इलाज नहीं है और स्पर्धात्मक सांप्रदायिकता में बहुसंख्यकवाद की हमेशा विजय होगी; अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता हमेशा हारेगी। 

क्या मुस्लिम यह महसूस करने और आत्ममंथन के लिए तैयार हैं कि वह बढ़ते बहुसंख्यवाद की चुनौती का सामना कर सकें? 

क्या उदारवादी-वामपंथी ताकतें मुस्लिमों को यह बताने के लिए तैयार हैं कि उनकी रूढ़िवादिता और सांप्रदायिकता चुप रहकर या बार-बार दोहराए गए इस तर्क कि “परेशान धार्मिक अल्पसंकीयकों से आंतरिक सुधारों के लिए कहने का यह सही समय नहीं है” से बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अल्पसंख्यकों से आंतरिक सुधारों के लिए कहने के लिए सही समय कभी नहीं रहेगा और हर समय इसी तथ्य ने बहुसंख्यवाद को और मजबूत किया है।

भारत के मुस्लिम तर्कसंगतता और बहुलतावादी सह-अस्तित्व पर दावे की लड़ाई में शामिल हों ताकि कट्टरपंथ और धर्मांधता से लड़ सकें। 
पहले ही काफी देर हो चुकी है। लेकिन, जब जागो तब सवेरा। 

(लेखक अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर हैं) 

[1] ऐसी राजनीतिक प्रणाली से सम्बद्ध जो विभिन्न सामाजिक समूहों के सहकार से साझा सत्ता के आधार पर बनी है, “मिलनसार लोकतंत्र”। 

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