ओडिशा: 18 महीनों में सांप्रदायिक हिंसा के 54 और मॉब लिंचिंग के 7 मामले सामने आए

Written by sabrang india | Published on: March 10, 2026
ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने सोमवार, 9 मार्च को राज्य विधानसभा में एक लिखित जवाब में स्वीकार किया कि जून 2024 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सत्ता में आने के बाद से राज्य में सांप्रदायिक नफरत से जुड़े अपराधों में वृद्धि हुई है। उन्होंने बताया कि इस अवधि में राज्य में ऐसी 54 घटनाएं और भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या (मॉब लिंचिंग) के सात मामले दर्ज किए गए।


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राज्य विधानसभा में अपने लिखित जवाब में मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने कहा कि जून 2024 में BJP के नेतृत्व वाली सरकार के सत्ता में आने के बाद से ओडिशा में सांप्रदायिक नफरत से जुड़े अपराधों की 54 घटनाएं दर्ज की गई हैं। उन्होंने बताया कि इस अवधि में सांप्रदायिक दंगों की 54 घटनाएं और मॉब लिंचिंग (भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या) के सात मामले सामने आए हैं।

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि दंगों में कथित संलिप्तता के आरोप में लगभग 300 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जबकि 50 प्रतिशत से भी कम मामलों में चार्जशीट दाखिल की गई है। ओडिशा में भी वही पैटर्न दिखाई दे रहा है जो राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे भाजपा-शासित अन्य राज्यों में देखा गया है।

अपने लिखित जवाब में मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि सांप्रदायिक दंगों के सबसे अधिक मामले—24—बालासोर जिले में दर्ज किए गए, जबकि इसके बाद खुर्दा जिले में 16 मामले सामने आए। राज्य की राजधानी भुवनेश्वर भी खुर्दा जिले में ही स्थित है।

मुख्यमंत्री के जवाब में दुर्गा पूजा विसर्जन के दौरान और उसके बाद कटक में हुई सांप्रदायिक झड़पों का कोई उल्लेख नहीं किया गया। अक्टूबर 2025 में, शहर के इतिहास में दुर्लभ मानी जाने वाली एक घटना में कटक को सांप्रदायिक हिंसा के कारण लगभग तीन दिनों तक कर्फ्यू का सामना करना पड़ा था। इस हिंसा की शुरुआत दुर्गा पूजा विसर्जन के दौरान हुई एक झड़प से हुई थी। कुछ दिनों बाद विश्व हिंदू परिषद (VHP) के सदस्यों की पुलिस के साथ झड़प हुई और उन्होंने तोड़फोड़ तथा आगजनी की घटनाओं को अंजाम दिया।

राज्य विधानसभा में हुई इन चर्चाओं के दौरान तीखी नोकझोंक देखने को मिली, जब विपक्षी दलों ने सरकार को निशाने पर लेते हुए आरोप लगाया कि नफरत से जुड़े अपराधों और सांप्रदायिक झड़पों के मामलों में भारी बढ़ोतरी हुई है। मुख्यमंत्री ने अपने प्रशासन का बचाव करते हुए कहा कि विभिन्न पुलिस थानों के अंतर्गत गठित शांति समितियों और स्थानीय प्रशासन के माध्यम से अलग-अलग समुदायों के साथ समन्वय स्थापित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।

पिछले 20 महीनों के दौरान ओडिशा के आधा दर्जन से अधिक कस्बों में सांप्रदायिक घटनाओं—जिनमें बंगाली भाषी मुसलमानों की लिंचिंग की घटनाएं भी शामिल हैं—के चलते कर्फ्यू लगाना पड़ा और इंटरनेट सेवाएं निलंबित करनी पड़ीं। इनमें से अधिकांश मामलों में आरोपी दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े हुए बताए गए। अधिकारियों ने यह भी स्वीकार किया कि कुछ मामले शायद दर्ज ही नहीं हो पाए हों—विशेषकर तब, जब पीड़ित दिहाड़ी मजदूर हों और पुलिस के पास जाने में हिचकिचाते हों। विपक्ष ने राज्य में “सांप्रदायिक तनाव” फैलने के आरोपों को लेकर सरकार की आलोचना की है। इसी राज्य में जून 2024 में BJP ने पहली बार अपने दम पर सरकार बनाई थी।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, ओडिशा में सांप्रदायिक या धर्म से जुड़ी घटनाओं की संख्या 2021 में 10, 2023 (चुनाव से पहले का वर्ष) में 44 और 2025 में 15 रही। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा संसद में साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, ओडिशा में 2018 में नौ सांप्रदायिक घटनाएं हुई थीं, जबकि 2019 में ऐसी कोई घटना दर्ज नहीं की गई थी।

‘सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस’ ने पिछले 18 महीनों के दौरान राज्य में लक्षित हिंसा (targeted violence) में हुई इस बढ़ोतरी पर लगातार रिपोर्ट की है। इन रिपोर्टों में जनवरी 2026 की शुरुआत में ढेंकनाल जिले में एक पादरी के साथ हुई बदसलूकी और उन पर हुए हमले का भी विस्तार से उल्लेख किया गया है। राज्य में बंगाली मूल के प्रवासी मजदूरों की मनमाने ढंग से की गई गिरफ्तारियों पर भी अदालत ने सवाल उठाए थे। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह रही कि दिसंबर 2025 के आखिर में ओडिशा, राजस्थान और मध्य प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में चर्चों और क्रिसमस का सामान बेचने वाले विक्रेताओं (दिहाड़ी मजदूरों) पर सुनियोजित और लगातार हमले किए गए।

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