लालू यादव और भ्रश्ताचार का प्रश्न

Written by विद्या भूषण रावत | Published on: January 12, 2018
जब से लालू यादव को जेल की सजा हुई है तब से बहुत से लोगो के दिल गदगद है. सोचते है रास्ते का काँटा निकल गया अब तो वो आराम से राजनीती करेंगे लेकिन मैं मानता हूँ के जेल के अन्दर का लालू और भी खतरनाक होगा और बिहार में संघी कंधो पर बहुत समय तक नहीं चल पाएंगे नितीश कुमार. जब भी भ्रष्टाचार के एक के प्रकार के मामले होते हैं, उन्हें एक साथ कर दिया जाना चाहिए ताकि कोर्ट का काम भी कम हो और लोगो का अनावश्यक हरासमेंट न हो.

lalu Prasad
Image: PTI
 
लालू को राजनैतिक तौर पर ख़त्म करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई देवे गोडा ने जब वह प्रधानमंत्री थे. बिहार की अलग अलग अदालतो में उनके खिलाफ ऍफ़ आई आर करने का मतलब ही यही था का उनको मुकद्दमो में फंसाया जाए. हाँ, लालू को ख़त्म करने में मात्र भाजपा की ही दिलचस्पी हो ऐसा कहना गलत होगा. बहुत से पुराने लोहिया जय प्रकाश वादी भी ऐसा ही चाहते थे. नितीश तो ऐसा लगता है फूले नहीं समां रहे है और उनके जनता साथी भी तरह तरह के बयान दे रहे है जैसे भारत में लालू से खतरनाक कोई व्यक्ति नहीं आया.
 
केस तो बहुत लम्बा खींचेगा और हमें ये भी मानना पड़ेगा के राजनैतिक लोग जब पुलिस और प्रशासन का इस्तेमाल अपने व्यक्तिगत हितो के लिए करते है तो ऐसा होगा ही. लालू यादव पर जो मुकद्दमे हुए है वो भ्रष्टाचार के विरुद्ध कोई लड़ाई नहीं है अपितु इनके पीछे राजनैतिक महत्वकांक्षाए भी शामिल है. हमे नहीं भूलना चाहिए के देवे गोडा से ज्यादा लालू की महत्वकंषा थी प्रधानमंत्री बन्ने की. भारतीय राजनीती में जब भी महत्वकंशाओ की टकराहट हुई है तो 'दुश्मन' को समाप्त करने के लिए जो भी तौर तरीके होते है जो 'लोकतान्त्रिक' है वो इस्तेमाल करते है और जो सत्ता में है वो तो इसमें माहिर होता ही है. जनता परिवार में भी जो अपने को लालू से अधिक योग्य और बड़े राज्य का मानते थे वो भी खुश थे. मुलायम सिंह का लालू पर आरोप था उनके प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लालू ने गड़बड़ाया. दोनों में भी राजनैतिक समीकरण नहीं बने. लेकिन इन महत्वाकांक्षाओ और अंतरविरोधो का सबसे बड़ा लाभ सवर्ण जातिवादी प्रभुत्ववादी ताकतों ने उठाया जो लालू को समाप्त कर देना चाहते थे.
 
लालू कोई दोष से परे नहीं है. पर लालू संघ और भाजपाई राजनीती से लड़ने के लिए विपक्ष से सबसे बड़े हथियार है. दो वर्ष पूर्व जब लालू और नितीश ने समझौता किया और सरकार बनाने की नौबत आये तो लालू को सावधानी से काम करना चाहिए था. अपने पूरे खानदान को राजनीती में जबरन धकेलने और सीधे से मंत्रियो की कुर्सियों तक पहुचने में वो बहुत जल्दबाजी में दिखे. हालाँकि तेजस्वी यादव बहुत मंझे हुए राजनेता नज़र आ रहे है लेकिन अपनी ही पार्टी के बुजुर्ग नेताओं को भी वह अच्छे पदों दिलवा सकते थे. फिर एक बेटे को अगर बनाया तो सभी को तो बनाने का मतलब नहीं बनता. एक लालू कोई लोगो को बना सकता है. क्या सामाजिक न्याय केवल परिवार को कुर्सी तक पहुचाने के लिए रहेगा ?
 
लालू से सवर्णों की नफ़रत उनकी मुद्दों पर साफ़ पकड़ से है. लालू ने पिछड़ा वर्ग की बिहार राजनीती की शैली अपनाया जो पेरियार के पिछड़ा दर्शन के अनुसार नहीं है. उन्होंने अपने को 'अधार्मिक' या गैर हिन्दू नहीं कहा अपितु हिन्दू धर्म पर शान से अपने अधिकार की बात की. अगर लालू धर्म से बाहर आने की पॉलिटिक्स करते तो शायद सफल नहीं होते. पोलिटिकल डिस्कोर्स लोगो को सुधारने के लिए नहीं अपितु उनके अनुसार खुद को ढालने के लिए होते है. बिहार में शायद उतना रेडिकल नहीं हो सकता था जो पेरियार ने तमिलनाडु में किया. ये भी हकीकत है के लालू पेरियार नहीं हो सकते थे क्योंकि पेरियार ने तो ये मान लिया था के सामाजिक आन्दोलन ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि उसकी ताकत के दम पर तो हम बड़े बड़े ताकतवर नेता को झुका सकते है और ये हकीकत भी है के पेरियार बिना किसी सरकारी पद पर न होने के बावजूद भी तमिलनाडु का सबसे बड़ा नाम है और उनके नाम के बिना तमिलनाडु की द्रविड़ियन राजनीती नहीं चल सकती. पेरियार साफ़ कहते थे के राजनीती में समझौते करने पड़ते है और अधिकांशतः ये समझौते उन लोगो के खिलाफ जाते है जिनको हम चाहते है. पेरियार अपनी जनता की कीमत पर कोई समझौता नहीं किये. उनके शिष्य उनसे अलग होकर पार्टियाँ बनाये और उनके उद्देश्यों के साथ ही शुरुआत किये लेकिन पिछले बीस वर्षो की द्रविड़ियन राजनीती केवल परिवार और भ्रष्टाचार का शिकार हुई. पेरियार के जीतेजी ऐसा संभव नहीं था क्योंकि उनका नैतिक बल बहुत बड़ा था.
 
बाबा साहेब आंबेडकर के साथ भी यही स्थिति थी. कानून के बड़े जानकार होने के बावजूद भी बाबा साहेब नैतिक बल बहुत महत्वपूर्ण मानते थे और अंत में सांस्कृतिक क्रांति की और आये. राजनीती ही हर सवाल का उत्तर नहीं है.
लेकिन सांस्कृतिक प्रश्नों को जय प्रकाश या लोहिया के शिष्यों ने कभी तरजीह नहीं दी. शायद इसलिए के वो कोई सामाजिक बदलाव का आन्दोलन नहीं कर रहे थे. ज्यादातर जातियों में अपनी जमीन तराश रहे थे. उत्तर भारत का पिछड़ा वर्ग आन्दोलन या उसके नेता चाहे राजनैतिक तौर पर सफल रहे हो लेकिन वो ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक सामाजिक बर्चस्व को नहीं तोड़ पाए हालाँकि लठैती में वो ब्राह्मण-भूमिहार-ठाकुरों का मुकाबला करते दिखे लेकिन दुर्भाग्यवश उनके दण्डो का रुख गाँव के दक्षिण की और की दलित बस्तियों की तरफ ही ज्यादा दिखा.
 
१९९० के लालू और सन २००० के लालू में भी बहुत फर्क है. १९९० के लालू ने दलित पिछडो के बीच आत्मसम्मान बढाया और न केवल ये, उन्होंने कई नए प्रयोग किये जिसके फलस्वरूप इन जातियों में गहन राजनैतिक चेतना आई. ऐसा भी माना जाता है के बिहार की सशक्त ब्राह्मण-भूमिहार-कायस्थ जिसने प्रगतिशीलता का चोला ओढ़ बिहार की सरकारी सेवाओं में घोर बिरादरीवाद किया, उनके एकाधिकार को लालू ने ही चुनौती दी हालाँकि लालू शिक्षा के क्षेत्र में कुछ नहीं कर पाए या यू मान लीजिये वो उनका अजेंडा ही नहीं था. मुशाहार बस्तियों में लालू के प्रयोग, उनका चरवाहा विद्यालय आदि काफी कामयाब रहे लेकिन लालू को केवल जुमलो की राजनीती से आगे आने की जरुरत भी थी.
 
बहुजन समाज के नेताओं ने अपने आपको जानबूझकर बुद्धिजीवियों और सामाजिक आन्दोलनो से दूर रखा. कुछ तो उनको गरियाते है. आज बाबा साहेब आंबेडकर, ज्योति बा फुले या पेरियार के आन्दोलन क्यों जिन्दा है ? अगर वो लिखते नहीं और अपना मीडिया खड़ा नहीं करते तो क्या आज जिन्दा रहते ? १९९० तक कोई भी हिन्दू उनके बारे में लिखने को तैयार नहीं था. आज ये लोग जिन्दा है अपने लेखन और सांस्कृतिक क्रांति की बदौलत क्योंकि उन्होंने काम करने वाले जिन्दा दिल लोगो को तैयार किया, भक्त तैयार नहीं किये. क्योंकि उन्होंने सामाजिक क्रांति का बीज बोया और वैचारिक धार दी. सबने खूब लिखा और और सभी अपने आप में लेखक और पत्रकार भी थे.भक्तो की फौज तैयार करके हम बहुत नुक्सान करते है. भक्त भी तभी तक भक्त रहता है जब तक उसका हित होता है या माल मिलने की उम्मीद बनी रहती है नहीं तो वो दुश्मन भी पहले बन जाता है. आज यदि भाजपा है तो वो संघ की बदौलत है. मोदी तो आयेंगे और जायेंगे लेकिन संघ तो खड़ा है चाहे उनसे हमारे विचार न मिले लेकिन वो तो अपना काम कर ही रहे है.
 
लालू से सवर्णों की नफ़रत उनके आत्मविश्वास के कारण हुई है. क्योंकि लालू खुद का दिमाग रखते हैं और अधिकारियों को समय समय पर उन्होंने खूब 'जलील' भी किया. उनका भूरा बाल या अन्य जातीय प्रश्नों पर ठेठ बिहारी लहजे में बात करके भी अधिकारी परेशान थे. जातीय अहंकार में डूबे ये अधिकारी दलित बस्तियों में कभी जाना भी नहीं चाहते. आज भी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार के सवर्ण अधिकारी दलितों को जानबुझकर हरिजन शब्द से बुलाते है.
 
बिहार में जब लालू ने अधिकारियो को मुशाहार बस्तियों में जाकर शैम्पू और बाल कटाने और सफाई करवाने के लिए भेजा तो अधिकांश नहीं चाहते थे. भारत का मनुवाद हमारे गाँवों के अलावा, हमारे मीडिया, ब्यूरोक्रेसी और न्यायपालिका में भी है. लालू के कई प्रयोगों से अधिकारी परेशान थे. उनकी बिरादरी के दबंगों ने भी लालू की इमेज को ख़राब किया. उनके दो सालो के कारण भी वो बदनाम हुए. इसीलिये मैंने कहा के सत्ता में आने पर दलित बहुजन नेताओं को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए क्योंकि परिवार के जरिये ही नेता भ्रष्ट होता है. इस सन्दर्भ में सबसे बेहतरीन उदहारण मान्यवर कांशीराम साहेब है. मै ये समझता हूँ, के उन्होंने स्वयं को अपने परिवार से बिलकुल दूर कर समाज के लिए पुर्णतः समर्पित कर दिया और कभी भी परिवार के किसी सदस्य को राजनीती में लाने का प्रयास नहीं किया. नतीजा ये निकला के कोई भी उन पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगा सकता. जहा तक पार्टी के लिए धन इकठ्ठा करने की बात है तो वो हरेक करता है और वो पार्टी का पैसा था न के उनका व्यक्तिगत. कहने का आशय यह के जब तक आज के दौर के नेता अपने परिवारों को अधिक से अधिक राजनीती से दूर नहीं रखेंगे उनके लिए खतरे बने रहेंगे . आज मीडिया, सोशल मीडिया के जरिये लोग अपनी बात रख रहे है और किसी को ये गलत फहमी में नहीं रहना चाहिए के वे नहीं रहेंगे तो लोगो का क्या होगा. लोग आयेंगे और खड़े भी होंगे और आप से बेहतर भी आ सकते है.
 
लालू यादव के बारे में सी बी आई कोर्ट की टिप्पणियों के बारे में मै यही कहूँगा के भारत के प्रभुत्ववादी समाज और उनके चहेते मनुवादी मीडिया ने पहले से ही लालू को अपराधी घोषित कर दिया है इसलिए उनकी टिप्पणियों का क्या कहें . अगर वो लालू को अपराधी कह रहे है तो निसंदेह लालू जी ने कोई न कोई अच्छा काम किया होगा जिसके लिए इतनी गलिया खा रहे है.
 
लालू यादव की सबसे बड़ी ताकत है उनके वैचारिक साफगोई और पक्की जुबान. उन्होंने जमीनी राजनीती की है इसलिए उनको बिहार का समाज शास्त्र पता है और शायद किसी बड़े समाज शास्त्री से ज्यादा लेकिन जरुरत अपनी जातियों से बाहर निकलकर और परिवर्तनकारी समाज बनाने में. दलित बहुजन नेताओं को भी अपने थिंक टैंक बनाने होंगे और उनको समर्थन करना होगा जो लोग दिन रात सरकार और देश दुनिया की नीतियों का अध्ययन करते रहे और इन नेताओं को समय समय पर बताते रहे और नयी पौधों का मार्ग दर्शन करें. वो जमाना गया के जब नेता लोग पढने लिखने का मजाक उड़ाते थे. अब का दौर सूचना तंत्र का दौर है और इसमें अगर हमारे पास सोचने समझने वाले लोग नहीं होंगे तो चाहे हमें राजनैतिक सत्ता मिल भी जाएगी तो उसके बहुत मतलब नहीं होंगे यदि आपको दो चार लोग अच्छे मार्गदर्शन वाले न मिले.
 
लालू यादव ने क्या किया क्या नहीं किया वो तो अब कोर्ट में लम्बी लड़ाई का मामला है लेकिन उनको फंसाया गया है और इतने सारे मुकद्दमो में फंसाकर उनके राजनीतिक करियर को ख़त्म करने का प्रयास है. हम उम्मीद करते है कांग्रेस और अन्य सहयोगी पार्टिया लालू यादव के साथ में रहेंगी क्योंकि अगर भ्रष्टाचार से लड़ने की बात होगी तो पहले जो पार्टी अरबो खरबों का खर्चा कर रही है, जो बाबाओं और लालाओ की मोनोपोली और पूंजी के सहारे बेइंतहा पैसा खर्चा कर रही है, वो तो कुछ बताये के पैसा कहाँ से आया. वैसे ईमानदार जग्गंनाथ मिश्र छूट ही गए है और दुसरे बड़े लोग उनके भ्रष्टाचार के बारे में बोलने पर मुकद्दमा करने की धमकी दे रहे है इसलिए भ्रष्ट केवल वो रह गए है जिनमे पर सी बी आई मुक्दाम्मा कर रही है, बाकि सभी तो 'इमानदार' है.
 
लालू यादव का लगातार परेशानी राजनैतिक है. ये बात सही है यदि लालू कांग्रेस के साथ नहीं खड़े होते तो या भाजपा के पास चले जाते तो वो इमानदार होते. ईमानदारी का सर्टिफिकेट आजकल सरकार के पास है. भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई कभी भी अंतिम मुकाम तक नहीं पहुंचेगी जब तक उसमे बौद्धिक और वैचारिक ईमानदारी नहीं होगी और वो राजनैतिक रोटियां सेकने का यंत्र न बन जाए. भ्रष्टाचार के विरुद्ध सही लड़ाई के लिए एक नए तंत्र की जरुरत है और उसमे सभी राजनैतिक दलों और देश के नागरिक और मानवाधिकार संगठनो की भी भूमिका है. दलाली पर पलने वाला, देश में राष्ट्रवाद का एकमात्र ठेकेदार मीडिया भी अपने गिरेबान में झांके के उनकी दुकाने कैसे चल रही है और वो इतना क्यों भौंक रहे है.
 
लालू एक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे है, एक पार्टी के बड़े नेता है, केंद्रीय मंत्री भी रहे है और उनकी उम्र भी है. मैं समझता हूँ को न्यायपालिका के लोगो को भी कोई कमेंट करने से पहले सोचना पड़ेगा के उनके वक्तव्यों के क्या मायने है. देश की अधिसंख्य जेलो में आज भी दलित आदिवासी और मुसलमानों की संख्या है और इन्ही तबको की सूचना, तंत्र, प्रशाशन और न्यायपालिका में भागीदारी बिलकुल नगण्य है. क्या दलित पिछड़े आदिवासी मुसलमानों के प्रति नकारात्मक रवैये में उनकी नगण्य भागदारी होना कोई कारण नहीं है ? क्या जाति हमारे प्रशासन और न्याय को प्रभावित नहीं करते ? यदि नहीं तो आज तक बिहार में हुए इतने हत्याकांडो में जिनमे बड़ी बड़ी माफिया सेनाओं के नेताओं की बड़ी भूमिका रही है, अभी तक कितने लोगो को सजा हुई है ? क्या ये शर्मनाक नहीं है ? क्या लक्ष्मनपुर बाथे या शंकर बिगहा के हत्याकांड के आरोपित लोगो को छोड़ने पर लोगो में ये धरना मज़बूत नहीं हुई के न्याय भी जातिवादी है ?
 
फिलहाल ये एक सन्देश भी है बहुत से नेताओं के लिए के २०१९ से पहले कोई गठबंधन मत करना नहीं तो आपको ईमानदारी की पीर्क्षा देनी पड सकती है. लालू यादव तो उस परीक्षा को दे ही रही है लेकिन औरो का भी नंबर आ सकता है. हम समझते है के ऐसे धमकियों से राजनैतिक लोगो को नहीं घबराना चाहिए अपितु उन्हें और मजबूती से एक साथ खड़ा होना चाहिए ताकि जन विरोधी शक्तियों को परास्त किया जा सके.