ये आंकड़े ऐसे समय में सामने आए हैं, जब प्रभावित परिवारों को मुआवजा मिलने में देरी और राज्य में फसल बीमा योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

साभार : द न्यूज मिनट
महाराष्ट्र सरकार ने राज्य विधानसभा में जानकारी दी कि वर्ष 2023 में राज्य में 6,667 किसानों ने आत्महत्या की, जिनमें सूखा-प्रभावित मराठवाड़ा क्षेत्र के 217 किसान शामिल थे।
सरकार द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, आत्महत्या करने वालों में 4,150 किसान, 2,519 खेतिहर मजदूर और 77 महिला किसान शामिल हैं।
विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, आत्महत्या करने वाले कई भूमिहीन किसानों को आधिकारिक आंकड़ों में शामिल नहीं किया गया है।
ये आंकड़े ऐसे समय में सामने आए हैं, जब प्रभावित परिवारों को मुआवजा मिलने में देरी और राज्य में फसल बीमा योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, NCP (SP) के विधायक रोहित पवार ने आरोप लगाया कि आत्महत्या करने वाले किसानों के कई परिवारों को राज्य सरकार की ओर से दी जाने वाली 1 लाख रुपये की आर्थिक सहायता अब तक नहीं मिली है।
पवार ने कहा, "इन किसानों के परिवार दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन सरकार उनकी मदद नहीं कर रही है। मुआवजे की कई फाइलें अब भी तकनीकी कारणों से लंबित हैं। इसलिए राज्य सरकार को इस गंभीर मुद्दे पर तत्काल ध्यान देना चाहिए। साथ ही, मुआवजा प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिए जिला और तालुका स्तर पर समितियों का गठन किया जाना चाहिए, ताकि स्थानीय स्तर पर समस्याओं का समाधान हो सके।"
अपने जवाब में राज्य सरकार ने कहा कि वह किसानों के बीच जागरूकता शिविर और विभिन्न आउटरीच कार्यक्रम आयोजित कर रही है।
सरकार ने अपने लिखित जवाब में कहा, "राज्य सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि राज्य और केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ किसानों और उनके परिवारों तक प्रभावी ढंग से पहुंचे। किसान (पति) की मृत्यु के बाद उनकी जमीन जीवनसाथी के नाम हस्तांतरित की जाएगी। इसके अलावा, मृतक किसान की संपत्ति का बंटवारा उनके बच्चों के बीच भी किया जाएगा।"
इस बीच, सरकारी आंकड़ों से यह भी सामने आया कि वर्ष 2016 से 2025 के बीच फसल बीमा कंपनियों ने फसल बीमा योजनाओं के तहत कुल 55,425 करोड़ रुपये प्रीमियम के रूप में प्राप्त किए।
विधानसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार, इस राशि में से 39,918 करोड़ रुपये फसल नुकसान झेलने वाले किसानों को दावों के रूप में दिए गए, जबकि बीमा कंपनियों ने 6,944 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया।
सरकार ने बताया कि बीमा कंपनियों को अधिकतम 20 प्रतिशत तक मुनाफा कमाने की अनुमति है। निर्धारित सीमा से अधिक का लाभ राज्य सरकार को वापस करना होता है।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के तहत सिंचित फसलों के नुकसान पर प्रति हेक्टेयर 35,000 रुपये और असिंचित फसलों के नुकसान पर प्रति हेक्टेयर 17,000 रुपये का मुआवजा दिया जाता है।
राज्य सरकार ने यह भी बताया कि उसने 1 रुपये वाली फसल बीमा योजना बंद कर दी है, क्योंकि उसके अनुसार इस योजना का दुरुपयोग और हेरफेर किया जा रहा था।
सरकार के मुताबिक, अब फसल बीमा दावों का आकलन कटाई के बाद प्राप्त उत्पादन और वास्तविक उपज में हुए नुकसान के आधार पर किया जाता है।
इस बीच, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की 7 मई, 2026 को जारी 'भारत में आकस्मिक मौतें और आत्महत्याएं 2024' रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में खेती-बाड़ी से जुड़े कम से कम 10,546 लोगों ने आत्महत्या की। यह देश में हुई कुल 1,70,746 आत्महत्याओं का 6.2 प्रतिशत है।
हालांकि, यह आंकड़ा वर्ष 2023 के मुकाबले थोड़ा कम है, जब खेती-बाड़ी से जुड़े 10,786 लोगों ने आत्महत्या की थी। इसके बावजूद, देश में आज भी औसतन हर दिन 28 किसान और खेतिहर मजदूर आत्महत्या करते हैं।
खेती से जुड़े लोगों की आत्महत्या का सबसे अधिक आंकड़ा वर्ष 2022 में 11,290 दर्ज किया गया था। इसके बाद संख्या में कुछ कमी आई है, लेकिन जमीनी हालात में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं दिखता। पिछले पांच वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि भारत में अब भी औसतन हर घंटे एक किसान या खेतिहर मजदूर आत्महत्या करता है।
NCRB के आंकड़ों से एक और चिंताजनक तथ्य सामने आया है कि खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या की संख्या किसानों/खेती करने वालों से अधिक रही।
खेती-बाड़ी से जुड़े 10,546 आत्महत्या के मामलों में से 5,913 यानी लगभग 56 प्रतिशत खेतिहर मजदूर थे। यह पिछले पांच वर्षों में दूसरी सबसे बड़ी संख्या है। वर्ष 2020 में खेती क्षेत्र की कुल आत्महत्याओं में खेतिहर मजदूरों की हिस्सेदारी 47.75 प्रतिशत थी।
वर्ष 2021 में पहली बार खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या का अनुपात किसानों से अधिक हुआ और तब से इस वर्ग में आत्महत्याओं का प्रतिशत लगातार बढ़ता जा रहा है।
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साभार : द न्यूज मिनट
महाराष्ट्र सरकार ने राज्य विधानसभा में जानकारी दी कि वर्ष 2023 में राज्य में 6,667 किसानों ने आत्महत्या की, जिनमें सूखा-प्रभावित मराठवाड़ा क्षेत्र के 217 किसान शामिल थे।
सरकार द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, आत्महत्या करने वालों में 4,150 किसान, 2,519 खेतिहर मजदूर और 77 महिला किसान शामिल हैं।
विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, आत्महत्या करने वाले कई भूमिहीन किसानों को आधिकारिक आंकड़ों में शामिल नहीं किया गया है।
ये आंकड़े ऐसे समय में सामने आए हैं, जब प्रभावित परिवारों को मुआवजा मिलने में देरी और राज्य में फसल बीमा योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, NCP (SP) के विधायक रोहित पवार ने आरोप लगाया कि आत्महत्या करने वाले किसानों के कई परिवारों को राज्य सरकार की ओर से दी जाने वाली 1 लाख रुपये की आर्थिक सहायता अब तक नहीं मिली है।
पवार ने कहा, "इन किसानों के परिवार दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन सरकार उनकी मदद नहीं कर रही है। मुआवजे की कई फाइलें अब भी तकनीकी कारणों से लंबित हैं। इसलिए राज्य सरकार को इस गंभीर मुद्दे पर तत्काल ध्यान देना चाहिए। साथ ही, मुआवजा प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिए जिला और तालुका स्तर पर समितियों का गठन किया जाना चाहिए, ताकि स्थानीय स्तर पर समस्याओं का समाधान हो सके।"
अपने जवाब में राज्य सरकार ने कहा कि वह किसानों के बीच जागरूकता शिविर और विभिन्न आउटरीच कार्यक्रम आयोजित कर रही है।
सरकार ने अपने लिखित जवाब में कहा, "राज्य सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि राज्य और केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ किसानों और उनके परिवारों तक प्रभावी ढंग से पहुंचे। किसान (पति) की मृत्यु के बाद उनकी जमीन जीवनसाथी के नाम हस्तांतरित की जाएगी। इसके अलावा, मृतक किसान की संपत्ति का बंटवारा उनके बच्चों के बीच भी किया जाएगा।"
इस बीच, सरकारी आंकड़ों से यह भी सामने आया कि वर्ष 2016 से 2025 के बीच फसल बीमा कंपनियों ने फसल बीमा योजनाओं के तहत कुल 55,425 करोड़ रुपये प्रीमियम के रूप में प्राप्त किए।
विधानसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार, इस राशि में से 39,918 करोड़ रुपये फसल नुकसान झेलने वाले किसानों को दावों के रूप में दिए गए, जबकि बीमा कंपनियों ने 6,944 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया।
सरकार ने बताया कि बीमा कंपनियों को अधिकतम 20 प्रतिशत तक मुनाफा कमाने की अनुमति है। निर्धारित सीमा से अधिक का लाभ राज्य सरकार को वापस करना होता है।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के तहत सिंचित फसलों के नुकसान पर प्रति हेक्टेयर 35,000 रुपये और असिंचित फसलों के नुकसान पर प्रति हेक्टेयर 17,000 रुपये का मुआवजा दिया जाता है।
राज्य सरकार ने यह भी बताया कि उसने 1 रुपये वाली फसल बीमा योजना बंद कर दी है, क्योंकि उसके अनुसार इस योजना का दुरुपयोग और हेरफेर किया जा रहा था।
सरकार के मुताबिक, अब फसल बीमा दावों का आकलन कटाई के बाद प्राप्त उत्पादन और वास्तविक उपज में हुए नुकसान के आधार पर किया जाता है।
इस बीच, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की 7 मई, 2026 को जारी 'भारत में आकस्मिक मौतें और आत्महत्याएं 2024' रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में खेती-बाड़ी से जुड़े कम से कम 10,546 लोगों ने आत्महत्या की। यह देश में हुई कुल 1,70,746 आत्महत्याओं का 6.2 प्रतिशत है।
हालांकि, यह आंकड़ा वर्ष 2023 के मुकाबले थोड़ा कम है, जब खेती-बाड़ी से जुड़े 10,786 लोगों ने आत्महत्या की थी। इसके बावजूद, देश में आज भी औसतन हर दिन 28 किसान और खेतिहर मजदूर आत्महत्या करते हैं।
खेती से जुड़े लोगों की आत्महत्या का सबसे अधिक आंकड़ा वर्ष 2022 में 11,290 दर्ज किया गया था। इसके बाद संख्या में कुछ कमी आई है, लेकिन जमीनी हालात में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं दिखता। पिछले पांच वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि भारत में अब भी औसतन हर घंटे एक किसान या खेतिहर मजदूर आत्महत्या करता है।
NCRB के आंकड़ों से एक और चिंताजनक तथ्य सामने आया है कि खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या की संख्या किसानों/खेती करने वालों से अधिक रही।
खेती-बाड़ी से जुड़े 10,546 आत्महत्या के मामलों में से 5,913 यानी लगभग 56 प्रतिशत खेतिहर मजदूर थे। यह पिछले पांच वर्षों में दूसरी सबसे बड़ी संख्या है। वर्ष 2020 में खेती क्षेत्र की कुल आत्महत्याओं में खेतिहर मजदूरों की हिस्सेदारी 47.75 प्रतिशत थी।
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