महाराष्ट्र पूरे राज्य में चर्च और मिशनरी की जमीन का ऑडिट क्यों कर रहा है?

Written by sabrang india | Published on: July 10, 2026
चर्च और ईसाई मिशनरी संगठनों की जमीन का पूरे राज्य में ऑडिट कराने के महाराष्ट्र सरकार के फैसले पर व्यापक बहस छिड़ गई है। जहां सरकार का कहना है कि इस कवायद का मकसद जमीन से जुड़े कथित गैर-कानूनी लेन-देन का पता लगाना और सरकारी रिकॉर्ड को सुरक्षित रखना है, वहीं ईसाई समुदाय के कई लोग इस घटनाक्रम पर बारीकी से नजर रखे हुए हैं।



यह ऑडिट नासिक में चर्च की जमीन से जुड़े कथित 300 करोड़ रुपये के घोटाले के बाद शुरू किया गया है। इसके तहत ब्रिटिश काल से चली आ रही चर्च की संपत्तियों के मालिकाना हक, उनके हस्तांतरण और अन्य लेन-देन की जांच की जाएगी। अधिकारियों का कहना है कि इस कवायद का उद्देश्य किसी धार्मिक समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि संभावित गड़बड़ियों का पता लगाना है।

ऑडिट क्यों शुरू किया गया?

राज्य सरकार का यह फैसला नासिक में लगभग छह एकड़ जमीन से जुड़े कथित घोटाले के बाद लिया गया। इस जमीन की कीमत करीब 300 करोड़ रुपये आंकी गई है।

पुलिस के मुताबिक, यह जमीन कानूनी तौर पर नासिक डायोसेसन ट्रस्ट एसोसिएशन (NDTA) की है। हालांकि, जांच एजेंसियों का आरोप है कि एक दूसरी संस्था, नासिक डायोसेसन काउंसिल (NDC), ने इस संपत्ति के साथ ऐसे व्यवहार किया जैसे वही इसकी कानूनी मालिक हो। आरोप है कि जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल कर कई दशकों तक सरकारी विभागों को यह जमीन लीज पर दी गई और इसके कुछ हिस्से निजी लोगों को बेच दिए गए।

कैथोलिक कनेक्ट ने इंडियन एक्सप्रेस के हवाले से लिखा कि यह कथित घोटाला तब सामने आया जब जांच में पता चला कि नासिक पुलिस कमिश्नरेट समेत कई सरकारी एजेंसियां ऐसे लोगों के साथ हुए लीज समझौतों के तहत किराया दे रही थीं, जिनका संपत्ति पर कोई कानूनी अधिकार नहीं था।

यह मामला तब राजनीतिक चर्चा का विषय बना जब भाजपा विधायक देवयानी फरांडे ने महाराष्ट्र विधानसभा में इसे उठाते हुए सरकार से यह जांच कराने की मांग की कि क्या राज्य के अन्य हिस्सों में भी इस तरह के मामले हैं।

इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने पूरे महाराष्ट्र में चर्च और मिशनरी के स्वामित्व वाली जमीन का व्यापक ऑडिट कराने की घोषणा की। सरकार का कहना है कि यह प्रक्रिया तीन महीने के भीतर पूरी करने का लक्ष्य है।

ऑडिट में क्या जांच की जाएगी?

पूरे राज्य में यह ऑडिट मंडल (डिवीजन) स्तर की समितियां करेंगी, जिनकी अध्यक्षता संबंधित मंडल आयुक्त (डिवीजनल कमिश्नर) करेंगे।

इन समितियों में राजस्व विभाग, सेटलमेंट कमिश्नर कार्यालय, इंस्पेक्टर जनरल ऑफ रजिस्ट्रेशन तथा पुलिस विभाग के अधिकारी शामिल होंगे।

इनका कार्य जमीन के स्वामित्व संबंधी रिकॉर्ड का सत्यापन करना, पुराने दस्तावेजों की जांच करना तथा स्वतंत्रता से पहले और बाद में हुए भूमि हस्तांतरण की समीक्षा करना होगा।

सरकार ने समितियों को कथित अवैध कब्जों, फर्जी स्वामित्व रिकॉर्ड तथा वर्तमान भूमि कानूनों का उल्लंघन करने वाले लेन-देन की जांच करने का भी निर्देश दिया है।

अधिकारियों के अनुसार, समीक्षा में ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान प्राप्त संपत्तियों के अलावा बाद में खरीद, दान और अनुदान के माध्यम से अर्जित भूमि भी शामिल होगी।

चर्चों के पास कितनी जमीन है?

फिलहाल ऐसा कोई आधिकारिक डेटाबेस उपलब्ध नहीं है, जिसमें महाराष्ट्र या पूरे भारत में चर्चों और ईसाई संस्थाओं के स्वामित्व वाली कुल भूमि का रिकॉर्ड हो।

कुछ अन्य धार्मिक संस्थाओं के विपरीत, जो एक ही प्रशासनिक ढांचे के अंतर्गत संचालित होती हैं, ईसाई संपत्तियों का स्वामित्व सैकड़ों कानूनी रूप से स्वतंत्र संस्थाओं के पास है।

कैथोलिक चर्च, प्रोटेस्टेंट संप्रदाय, डायोसिस (धर्मप्रांत), पैरिश (चर्च क्षेत्र), शैक्षणिक ट्रस्ट, चैरिटेबल सोसाइटियां और अस्पताल—ये सभी भारतीय कानून के तहत अपने-अपने नाम पर संपत्ति रखते हैं।

इनमें से अनेक संपत्तियां निजी दान, प्रत्यक्ष खरीद, कोंकण क्षेत्र में पुर्तगाली शासन के दौरान मिले अनुदान, ब्रिटिश काल में भूमि आवंटन तथा बाद में स्कूलों, अस्पतालों, चर्चों, अनाथालयों और अन्य चैरिटेबल संस्थाओं के लिए प्राप्त भूमि के माध्यम से विकसित हुई हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार, महाराष्ट्र की कुल आबादी में ईसाइयों की हिस्सेदारी लगभग 0.96 प्रतिशत है, जिनकी संख्या करीब 10.8 लाख है। यह समुदाय मुख्य रूप से मुंबई, ठाणे, पालघर, रायगढ़, पुणे, अहमदनगर और कोंकण क्षेत्र के कुछ हिस्सों में निवास करता है।

नासिक का मामला क्यों अहम है?

नासिक का मामला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें कथित पीड़ितों में स्वयं महाराष्ट्र सरकार भी शामिल है।

पुलिस का दावा है कि वर्ष 1990 से नासिक पुलिस कमिश्नरेट लीज समझौते के तहत विवादित जमीन के एक हिस्से का उपयोग कर रहा था। हालांकि कमिश्नरेट का कार्यालय 2014 में दूसरी जगह स्थानांतरित हो गया, लेकिन कई पुलिस कार्यालय अब भी उसी परिसर से संचालित हो रहे हैं।

जांच एजेंसियों का आरोप है कि सरकारी विभाग वर्षों तक ऐसे लोगों को किराया देते रहे, जिनके पास जमीन का वैध स्वामित्व नहीं था।

यदि यह आरोप अदालत में साबित होता है, तो यह सरकारी धन से जुड़े कथित धोखाधड़ीपूर्ण भूमि लेन-देन का एक बड़ा मामला होगा।

पुलिस का अनुमान है कि इस कथित धोखाधड़ी से लगभग 300 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।

अगर गड़बड़ी पाई जाती है तो क्या होगा?

महाराष्ट्र सरकार ने धार्मिक संस्थाओं को आश्वस्त किया है कि जिन संगठनों के पास वैध स्वामित्व संबंधी दस्तावेज हैं, उन्हें ऑडिट से घबराने की आवश्यकता नहीं है।

अधिकारियों का कहना है कि इस कवायद का उद्देश्य वास्तविक स्वामित्व और फर्जी रिकॉर्ड, अवैध हस्तांतरण अथवा बिना अनुमति की गई बिक्री जैसे मामलों के बीच अंतर स्पष्ट करना है।

जहां भी गड़बड़ी पाई जाएगी, वहां जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

जिन मामलों में विवादित भूमि पर पहले ही विकास कार्य हो चुके हैं या सार्वजनिक बुनियादी ढांचा तैयार हो चुका है, वहां सरकार का कहना है कि आगे की कार्रवाई कानूनी सलाह और प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के आधार पर तय की जाएगी।

ईसाई समुदाय की चिंताएं

हालांकि सरकार ने इस ऑडिट को एक कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया बताया है, लेकिन इसके व्यापक दायरे ने ध्यान आकर्षित किया है, क्योंकि इसमें पूरे राज्य की चर्च और मिशनरी संपत्तियां शामिल हैं।

उम्मीद की जा रही है कि कई ईसाई संस्थाएं सत्यापन प्रक्रिया में सहयोग करेंगी। साथ ही, वे यह आश्वासन भी चाहेंगी कि वैध संस्थाओं को अनावश्यक जांच या प्रशासनिक परेशानियों का सामना न करना पड़े।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि चर्च की संपत्तियों से जुड़े कई दस्तावेज एक सदी से भी अधिक पुराने हैं। ऐसे में सत्यापन एक जटिल प्रक्रिया होगी, जिसके लिए भूमि अभिलेख, ट्रस्ट डीड और राजस्व रिकॉर्ड की गहन जांच करनी पड़ेगी।

इस दृष्टि से यह ऑडिट महाराष्ट्र में ईसाई संस्थाओं की भूमि संबंधी रिकॉर्ड की अब तक की सबसे बड़ी समीक्षाओं में से एक हो सकता है।

एक अहम प्रशासनिक कवायद
पूरे राज्य में होने वाला यह ऑडिट महाराष्ट्र में चर्च और मिशनरी की जमीन से जुड़े रिकॉर्ड की जांच की एक अभूतपूर्व प्रशासनिक कवायद है।

अब यह देखना होगा कि जांच में केवल कुछ छिटपुट गड़बड़ियां सामने आती हैं या बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का खुलासा होता है। फिलहाल सरकार का कहना है कि इस कवायद का उद्देश्य पारदर्शिता सुनिश्चित करना, वैध स्वामित्व की रक्षा करना और नासिक मामले से जुड़े आरोपों की जांच करना है, जबकि वैध दस्तावेज रखने वाले वास्तविक संपत्ति मालिकों के हित प्रभावित नहीं होने चाहिए।

Related

UP अल्पसंख्यक आयोग को 2024 से नहीं मिला अध्यक्ष? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब, अधिकारी तलब

नाज़िया इलाही खान पर कथित घृणा भाषण (हेट स्पीच) को लेकर कई एफआईआर दर्ज

बाकी ख़बरें