पदों पर नियुक्ति में देरी पर नाराज़गी जताते हुए अदालत ने प्रमुख सचिव को तलब किया। मामले की अगली सुनवाई 20 जुलाई 2026 को होगी। साथ ही, राज्य सरकार के अधिवक्ता को न्यायालय के आदेश का समयबद्ध और प्रभावी ढंग से पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति में हो रही अत्यधिक देरी पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। अदालत ने इस मामले में प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए संबंधित अधिकारियों को स्पष्टीकरण देने के लिए व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होने का निर्देश दिया है।
जस्टिस राजन राय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने जनहित याचिका (पीआईएल संख्या 34/2025) पर सुनवाई के दौरान पाया कि उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग के पिछले अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल वर्ष 2024 में समाप्त हो चुका है। इसके बावजूद अब तक नए अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति नहीं की गई है।
यह जनहित याचिका शम्स तबरेज द्वारा दायर की गई थी। याचिका में राज्य सरकार को उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति के लिए शीघ्र और प्रभावी कदम उठाने का निर्देश देने की मांग की गई है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव (या अपर मुख्य सचिव) को 20 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होने का निर्देश दिया है। अदालत ने उनसे यह स्पष्ट करने को कहा है कि आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति अब तक क्यों नहीं की गई तथा इस संबंध में राज्य सरकार के अधिवक्ता को लिखित निर्देश क्यों उपलब्ध नहीं कराए गए।
द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले में पहले 17 जनवरी 2025 और 24 अप्रैल 2026 को भी सुनवाई हुई थी, जहां सरकार की ओर से नियुक्ति प्रक्रिया जारी होने की बात कही गई थी। हालांकि, 6 जुलाई को हुई सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने केवल मौखिक रूप से बताया कि नामांकन की प्रक्रिया अभी भी जारी है। इस पर अदालत ने असंतोष व्यक्त करते हुए इसे न्यायालय के आदेशों के प्रति 'अनादर' (disrespectful) बताया।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि 24 अप्रैल 2026 को पारित आदेश में पहले ही राज्य सरकार से अगली सुनवाई तक आयोग में नियुक्तियों की स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया था। इसके बावजूद सरकार की ओर से न तो कोई लिखित निर्देश प्रस्तुत किया गया और न ही कोई स्थिति रिपोर्ट दाखिल की गई।
इस पर नाराज़गी जताते हुए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव (या अपर मुख्य सचिव) को 20 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होने का निर्देश दिया है। अदालत ने उनसे यह स्पष्ट करने को कहा है कि आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्तियां अब तक क्यों नहीं की गईं तथा इस संबंध में राज्य सरकार के अधिवक्ता को आवश्यक लिखित निर्देश क्यों उपलब्ध नहीं कराए गए।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि यदि अल्पसंख्यक कल्याण विभाग में अपर मुख्य सचिव का पद नहीं है, तो विभाग के प्रमुख सचिव को 20 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होना होगा।
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 20 जुलाई 2026 को निर्धारित की है। साथ ही, राज्य सरकार के अधिवक्ता को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि न्यायालय के आदेश का समयबद्ध और प्रभावी ढंग से पालन किया जाए।
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इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति में हो रही अत्यधिक देरी पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। अदालत ने इस मामले में प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए संबंधित अधिकारियों को स्पष्टीकरण देने के लिए व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होने का निर्देश दिया है।
जस्टिस राजन राय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने जनहित याचिका (पीआईएल संख्या 34/2025) पर सुनवाई के दौरान पाया कि उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग के पिछले अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल वर्ष 2024 में समाप्त हो चुका है। इसके बावजूद अब तक नए अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति नहीं की गई है।
यह जनहित याचिका शम्स तबरेज द्वारा दायर की गई थी। याचिका में राज्य सरकार को उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति के लिए शीघ्र और प्रभावी कदम उठाने का निर्देश देने की मांग की गई है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव (या अपर मुख्य सचिव) को 20 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होने का निर्देश दिया है। अदालत ने उनसे यह स्पष्ट करने को कहा है कि आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति अब तक क्यों नहीं की गई तथा इस संबंध में राज्य सरकार के अधिवक्ता को लिखित निर्देश क्यों उपलब्ध नहीं कराए गए।
द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले में पहले 17 जनवरी 2025 और 24 अप्रैल 2026 को भी सुनवाई हुई थी, जहां सरकार की ओर से नियुक्ति प्रक्रिया जारी होने की बात कही गई थी। हालांकि, 6 जुलाई को हुई सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने केवल मौखिक रूप से बताया कि नामांकन की प्रक्रिया अभी भी जारी है। इस पर अदालत ने असंतोष व्यक्त करते हुए इसे न्यायालय के आदेशों के प्रति 'अनादर' (disrespectful) बताया।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि 24 अप्रैल 2026 को पारित आदेश में पहले ही राज्य सरकार से अगली सुनवाई तक आयोग में नियुक्तियों की स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया था। इसके बावजूद सरकार की ओर से न तो कोई लिखित निर्देश प्रस्तुत किया गया और न ही कोई स्थिति रिपोर्ट दाखिल की गई।
इस पर नाराज़गी जताते हुए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव (या अपर मुख्य सचिव) को 20 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होने का निर्देश दिया है। अदालत ने उनसे यह स्पष्ट करने को कहा है कि आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्तियां अब तक क्यों नहीं की गईं तथा इस संबंध में राज्य सरकार के अधिवक्ता को आवश्यक लिखित निर्देश क्यों उपलब्ध नहीं कराए गए।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि यदि अल्पसंख्यक कल्याण विभाग में अपर मुख्य सचिव का पद नहीं है, तो विभाग के प्रमुख सचिव को 20 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होना होगा।
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 20 जुलाई 2026 को निर्धारित की है। साथ ही, राज्य सरकार के अधिवक्ता को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि न्यायालय के आदेश का समयबद्ध और प्रभावी ढंग से पालन किया जाए।
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