यूपी के मदरसों से अब नहीं मिलेंगी कामिल-फाजिल की डिग्रियां

Written by sabrang india | Published on: August 5, 2026
अब यूपी के मदरसे कामिल (बीए) और फाजिल (एमए) की डिग्रियां नहीं दे पाएंगे। मदरसों से निकलकर उच्च शिक्षा हासिल करने की इच्छा रखने वाले छात्रों को अब सामान्य विश्वविद्यालयों में ही दाखिला लेना होगा।



उत्तर प्रदेश के मदरसे अब कामिल और फाजिल स्तर की डिग्रियां जारी नहीं कर सकेंगे। इसके लिए राज्य सरकार उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद अधिनियम में संशोधन करने जा रही है।

अब तक मदरसों से मिलने वाली कामिल की डिग्री को स्नातक (बीए) और फाजिल की डिग्री को परास्नातक (एमए) के समकक्ष माना जाता था। प्रस्तावित संशोधन लागू होने के बाद मदरसे केवल आलिम स्तर, यानी 12वीं कक्षा तक की शिक्षा ही संचालित कर सकेंगे और उसी स्तर तक के प्रमाणपत्र जारी कर पाएंगे।

आज तक की रिपोर्ट के अनुसार, योगी आदित्यनाथ सरकार ने मंगलवार को हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद अधिनियम, 2004 में संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब इसे विधानसभा में पारित कराया जाएगा।

यूपी सरकार ने यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए लिया है। 5 नवंबर 2024 को अंजुम कादरी बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मदरसे उच्च शिक्षा की डिग्रियां नहीं दे सकते। यूपी सरकार के अनुसार, कामिल और फाजिल डिग्रियों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से मान्यता प्राप्त नहीं है। इसलिए इन डिग्रियों की मान्यता समाप्त की जाएगी।

सरकार का कहना है कि उच्च शिक्षा को राष्ट्रीय मानकों और नियामकीय व्यवस्था के अनुरूप बनाने के उद्देश्य से यह कदम उठाया जा रहा है। इसके लिए उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद से जुड़े मौजूदा कानून में संशोधन किया जाएगा, जिसके बाद मदरसा शिक्षा व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण बदलाव लागू होंगे।

सरकार का दावा है कि इस संशोधन से उच्च शिक्षा प्रणाली में एकरूपता, पारदर्शिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।

रिपोर्ट के अनुसार, सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पहले से जारी की जा चुकी उच्च शिक्षा की डिग्रियों को भी अमान्य करने की तैयारी में है। यदि ऐसा होता है, तो प्रदेश के हजारों-लाखों छात्रों के सामने गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। ऐसे किसी भी फैसले से उनकी डिग्रियां महज कागज का टुकड़ा बनकर रह जाएंगी। इसके बाद वे न तो उन डिग्रियों के आधार पर आगे की पढ़ाई कर सकेंगे और न ही नौकरी के लिए आवेदन कर पाएंगे।

कामिल और फाजिल की डिग्रियां क्या हैं?

'कामिल' अरबी, फ़ारसी और इस्लामी अध्ययन का तीन वर्षीय पाठ्यक्रम है। उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद द्वारा प्रदान की जाने वाली 'कामिल' डिग्री को अब तक स्नातक (बीए) के समकक्ष माना जाता रहा है।

वहीं, 'फाजिल' दो वर्षीय उच्च स्तरीय पाठ्यक्रम है, जिसे 'कामिल' के बाद किया जाता है। राज्य मदरसा शिक्षा परिषद द्वारा प्रदान की जाने वाली 'फाजिल' डिग्री को परास्नातक (एमए) के समकक्ष माना जाता रहा है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के 5 नवंबर 2024 के आदेश का पालन करने के लिए लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अंजुम कादरी बनाम भारत संघ मामले की सुनवाई के दौरान यह फैसला सुनाया था।

अंजुम कादरी बनाम भारत संघ मामला

अंजुम कादरी बनाम भारत संघ का मामला उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद अधिनियम, 2004 की संवैधानिक वैधता से जुड़ा था।

यह मामला उस समय चर्चा में आया, जब 22 मार्च 2024 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद अधिनियम, 2004 को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि यह कानून संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के साथ-साथ अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21ए के प्रावधानों के भी विपरीत है।

हाईकोर्ट के इस फैसले को अंजुम कादरी समेत अन्य याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने 5 नवंबर 2024 को एक अहम फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस निर्णय को रद्द कर दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने मदरसा अधिनियम को असंवैधानिक ठहराया था।

मदरसा अधिनियम पर यह फैसला तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने सुनाया था। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट का फैसला सही नहीं था। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने मदरसा अधिनियम की संवैधानिक वैधता को भी बरकरार रखा।

मदरसा अधिनियम वैध

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद अधिनियम का उद्देश्य मदरसों में शिक्षा, शिक्षकों की योग्यता, परीक्षा प्रणाली और प्रशासनिक व्यवस्था को विनियमित करना है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि मदरसों में धार्मिक शिक्षा भी दी जाती है, इस कानून को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता।

अल्पसंख्यकों के अधिकार सुरक्षित

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 30 धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका संचालन करने का अधिकार देता है। साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य इन संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण और आवश्यक धर्मनिरपेक्ष शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए उचित नियमन कर सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूरे उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद अधिनियम को निरस्त कर दिया था, जबकि यदि किसी कानून के कुछ प्रावधान असंवैधानिक या वैधानिक नियमों के विपरीत पाए जाते हैं, तो केवल उन्हीं प्रावधानों को निरस्त किया जाना चाहिए। अदालत के अनुसार, पूरे अधिनियम को रद्द करना उचित नहीं था।

हालांकि, इसी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मदरसों द्वारा जारी की जाने वाली कामिल और फाजिल डिग्रियों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी भी की थी।

उच्च शिक्षा की डिग्रियां देने का अधिकार यूजीसी को: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में माना कि मदरसा बोर्ड द्वारा 'कामिल' और 'फाजिल' जैसी उच्च शिक्षा स्तर की डिग्रियां प्रदान करने का प्रावधान संविधान के अनुरूप नहीं है। अदालत ने कहा कि उच्च शिक्षा के मानकों का निर्धारण और विनियमन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) अधिनियम के तहत केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। ऐसे में मदरसा शिक्षा परिषद अधिनियम का यह हिस्सा संवैधानिक व्यवस्था से मेल नहीं खाता।

अब उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इसी फैसले के आधार पर मदरसों द्वारा जारी की जाने वाली 'कामिल' और 'फाजिल' जैसी उच्च शिक्षा की डिग्रियां बंद करने का निर्णय लिया है।

उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय जाना होगा

इस फैसले के बाद मदरसों से 12वीं (आलिम) की पढ़ाई पूरी करने वाले छात्रों को स्नातक (बीए) की पढ़ाई के लिए विश्वविद्यालयों में ही प्रवेश लेना होगा। उन्हें अन्य छात्रों की तरह सामान्य प्रवेश प्रक्रिया से गुजरना होगा।

मदरसा अधिनियम को समझें

उत्तर प्रदेश में मदरसा अधिनियम 2004 में बनाया गया था। इसका उद्देश्य मदरसा शिक्षा को सुव्यवस्थित करना था। इसके तहत अरबी, उर्दू, फ़ारसी, इस्लामी अध्ययन, ट्रेडिशनल मेडिसिन और फिलॉसफी जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं।

नवंबर 2025 के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में लगभग 25 हजार मदरसे हैं। इनमें से करीब 16 हजार को उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद से मान्यता प्राप्त है, जबकि लगभग साढ़े आठ हजार मदरसों को अभी तक मान्यता नहीं मिली है।

मदरसा शिक्षा परिषद अब तक आलिम (12वीं), कामिल (बीए) और फाजिल (एमए) के अलावा मुंशी और मौलवी (10वीं) स्तर की परीक्षाएं भी आयोजित करती रही है।

मदरसा अधिनियम का उद्देश्य धार्मिक शिक्षा को सामान्य विषयों के साथ समन्वित करना है, ताकि छात्रों को इस्लामी और आधुनिक शिक्षा, दोनों का ज्ञान प्राप्त हो सके।

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