जमीन को सरकारी संपत्ति मानते हुए कोर्ट ने 30 दिनों के भीतर उसे खाली करने और दशकों से चले आ रहे कथित अनधिकृत कब्जे के लिए 6.41 करोड़ रुपये की वसूली का आदेश दिया।

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर की एक अदालत ने जिला कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित एक मस्जिद को हटाने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि यह ढांचा सरकारी जमीन पर बना है और इसे अनधिकृत कब्जा माना जाएगा। कोर्ट ने 30 दिनों के भीतर परिसर खाली करने का निर्देश दिया है और सार्वजनिक संपत्ति पर कथित अवैध कब्जे के लिए 6.41 करोड़ रुपये की वसूली का भी आदेश दिया है।
द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, यह आदेश सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह ने उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जेदारों की बेदखली) अधिनियम, 1972 के तहत जारी किया। यह विवाद बजरंग दल के पूर्व प्रांतीय समन्वयक विकास त्यागी की शिकायत से शुरू हुआ था। उन्होंने आरोप लगाया था कि कलेक्ट्रेट परिसर में अवैध रूप से एक मस्जिद बनाई गई है। उनका कहना था कि यह एक संवेदनशील सरकारी परिसर है, जहां प्रशासनिक और गोपनीय सरकारी कार्य होते हैं। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया था कि संपत्ति का उपयोग व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए किया जा रहा था, परिसर के कुछ हिस्से निजी व्यक्तियों को किराए पर दिए गए थे और वहां एक डाकघर भी संचालित हो रहा था।
राजस्व विभाग की जांच और आरोप
शिकायत के बाद राजस्व विभाग ने जांच शुरू की। मार्च 2025 में एक लेखपाल (राजस्व अधिकारी) ने सिटी मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन दायर किया। इसमें आरोप लगाया गया कि मस्जिद के प्रबंधक और मौलवी अब्दुल हामिद सरकारी जमीन पर अनधिकृत रूप से कब्जा किए हुए हैं। अप्रैल 2025 में प्रतिवादियों को नोटिस जारी किए गए और जून 2025 में उनकी आपत्तियां दर्ज की गईं।
राजस्व अधिकारियों का तर्क था कि यह जमीन कलेक्ट्रेट परिसर का हिस्सा है और आधिकारिक राजस्व अभिलेखों में सरकारी संपत्ति के रूप में दर्ज है। याचिका के अनुसार, यह इमारत मूल रूप से कलेक्ट्रेट आने वाले मुकदमों से जुड़े लोगों के लिए एक विश्राम गृह के रूप में इस्तेमाल होती थी, लेकिन बाद में प्रतिवादियों ने इस पर कब्जा कर लिया और कथित तौर पर इसके कुछ हिस्सों को मस्जिद में बदल दिया।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि भूतल और पहली मंजिल के कमरों पर कब्जा कर लिया गया था, वहां नमाज अदा की जा रही थी, कई कमरे आवासीय उद्देश्यों के लिए किराए पर दिए गए थे और किराएदारों के साथ-साथ परिसर में संचालित डाकघर से भी किराया वसूला जा रहा था।
अधिकारियों ने यह भी आरोप लगाया कि सरकारी इमारत के एक हिस्से को धार्मिक ढांचे में बदलने के लिए अनधिकृत निर्माण किया गया था। खबरों के अनुसार, जांच में यह निष्कर्ष निकला कि कब्जा करने वालों के पास परिसर पर कब्जा करने, तीसरे पक्ष को वहां रहने की अनुमति देने या इमारत को पूजा स्थल में बदलने का कोई लाइसेंस, अनुमति या कानूनी अधिकार नहीं था। राजस्व विभाग ने सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड, लखनऊ के कथित पत्र (कम्युनिकेशन) पर प्रतिवादियों के भरोसे को भी चुनौती दी और आरोप लगाया कि वह दस्तावेज फर्जी था। विभाग का तर्क था कि संबंधित संपत्ति राजस्व अभिलेखों में हमेशा कचहरी (कलेक्ट्रेट) और कोठियात भूमि के रूप में दर्ज रही है, न कि वक्फ या धार्मिक संपत्ति के रूप में।
अधिकारियों का यह भी कहना था कि सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के पास सरकारी भूमि को वक्फ संपत्ति घोषित करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। हालांकि प्रतिवादियों ने स्वयं को मस्जिद का मुतवल्ली और मौलवी बताया, लेकिन याचिका में कहा गया कि वे अपनी हैसियत या संपत्ति पर मालिकाना हक साबित करने के लिए कोई दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सके।
बेदखली की मांग के अलावा, याचिकाकर्ता ने किराएदारों से कथित तौर पर वसूले गए किराए, दंडात्मक किराए और अनधिकृत कब्जे से हुई कथित आय को 12 प्रतिशत चक्रवृद्धि ब्याज (Compound Interest) के साथ सरकारी खजाने में जमा कराने की भी मांग की।
मस्जिद कमेटी ने सरकार के दावे का विरोध किया
प्रतिवादियों ने आरोपों से इनकार करते हुए तर्क दिया कि राज्य विवादित संपत्ति पर अपना मालिकाना हक साबित करने में विफल रहा है। उनका कहना था कि अधिकारियों द्वारा जिन राजस्व अभिलेखों का हवाला दिया गया है, वे केवल जमीन की भौतिक प्रकृति या वर्गीकरण को दर्शाते हैं, न कि मालिकाना हक को निर्णायक रूप से स्थापित करते हैं।
उन्होंने आगे आरोप लगाया कि यह कार्रवाई मस्जिद और उससे सटी जमीन पर गैर-कानूनी तरीके से कब्जा करने के इरादे से शुरू की गई थी। प्रतिवादियों के अनुसार, याचिकाकर्ता ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया, आवश्यक राजस्व अभिलेख प्रस्तुत नहीं किए और अदालत को गुमराह करने की कोशिश की।
मुतवल्ली तनवीर अहमद ने कहा कि मस्जिद लगभग 150 वर्ष पुरानी है और प्रबंधन समिति इस आदेश को चुनौती देने के लिए पुनरीक्षण (रिवीजन) याचिका दायर करने की तैयारी कर रही है।
कोर्ट ने कब्जे को गैर-कानूनी माना
अपने समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों पर विचार करने के बाद सिटी मजिस्ट्रेट ने कहा कि प्रतिवादी विवादित संपत्ति पर कोई कानूनी अधिकार या मालिकाना हक साबित करने में विफल रहे हैं। कोर्ट ने पाया कि खसरा नंबर 539 राजस्व अभिलेखों में लगातार फसली वर्ष 1324, 1359 तथा उससे पहले के रिकॉर्ड में भी कलेक्ट्रेट/कचहरी की भूमि के रूप में दर्ज है। इसके आधार पर कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि जमीन राज्य सरकार की है और कानूनी अधिकार के बिना उस पर कब्जा करना उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जेदारों की बेदखली) अधिनियम, 1972 के तहत अवैध कब्जा है।
315 वर्ग मीटर क्षेत्र पर लंबे समय से चले आ रहे कब्जे को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि निर्धारित कानूनी फॉर्मूले के अनुसार फसली वर्ष 1359 से शुरू होकर 70 वर्षों की अवधि के लिए मुआवजे की गणना की जाए। इसके आधार पर लगभग 6.41 करोड़ रुपये की राशि निर्धारित की गई।
सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि कब्जाधारियों को परिसर खाली करने के लिए 30 दिन का समय दिया गया है। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो प्रशासन उन्हें हटाने की कार्रवाई करेगा।
धार्मिक ढांचों से जुड़े बड़े विवादों का हिस्सा
सहारनपुर का यह आदेश उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक भूमि पर बने कथित धार्मिक ढांचों से जुड़े कई विवादों के बीच आया है। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, पिछले महीने नॉर्दर्न रेलवे के वाराणसी डिवीजन ने काशी रेलवे स्टेशन के गेट नंबर 1 के पास स्थित एक मस्जिद को हटाने का नोटिस जारी किया था। नोटिस में कहा गया था कि यह ढांचा रेलवे की जमीन पर बना है। मस्जिद की प्रबंधन समिति अंजुमन इंतजामिया मसाजिद, वाराणसी ने इस नोटिस को चुनौती दी है और प्रस्तावित कार्रवाई को गैर-कानूनी बताया है।
यह विवाद कुशीनगर जिले में मदनी मस्जिद के एक हिस्से को गिराए जाने की कार्रवाई के बाद भी सामने आया है। फरवरी 2025 में अधिकारियों ने मस्जिद का एक हिस्सा यह आरोप लगाते हुए ध्वस्त कर दिया था कि उसका निर्माण कब्जाई गई जमीन पर किया गया था। मस्जिद समिति ने इस आरोप का खंडन करते हुए कहा कि जमीन कानूनी रूप से खरीदी गई थी और उन्हें स्थगन (स्टे) की अवधि समाप्त होने तक हाई कोर्ट से अंतरिम संरक्षण प्राप्त था।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को अवमानना कार्यवाही में नोटिस जारी किया। आरोप था कि ध्वस्तीकरण की कार्रवाई ने 13 नवंबर, 2024 के उस आदेश का उल्लंघन किया, जिसमें बिना पूर्व नोटिस दिए और प्रभावित पक्ष को सुनवाई का अवसर दिए देशभर में ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर रोक लगाई गई थी। यह मामला अभी भी लंबित है।
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द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, यह आदेश सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह ने उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जेदारों की बेदखली) अधिनियम, 1972 के तहत जारी किया। यह विवाद बजरंग दल के पूर्व प्रांतीय समन्वयक विकास त्यागी की शिकायत से शुरू हुआ था। उन्होंने आरोप लगाया था कि कलेक्ट्रेट परिसर में अवैध रूप से एक मस्जिद बनाई गई है। उनका कहना था कि यह एक संवेदनशील सरकारी परिसर है, जहां प्रशासनिक और गोपनीय सरकारी कार्य होते हैं। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया था कि संपत्ति का उपयोग व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए किया जा रहा था, परिसर के कुछ हिस्से निजी व्यक्तियों को किराए पर दिए गए थे और वहां एक डाकघर भी संचालित हो रहा था।
राजस्व विभाग की जांच और आरोप
शिकायत के बाद राजस्व विभाग ने जांच शुरू की। मार्च 2025 में एक लेखपाल (राजस्व अधिकारी) ने सिटी मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन दायर किया। इसमें आरोप लगाया गया कि मस्जिद के प्रबंधक और मौलवी अब्दुल हामिद सरकारी जमीन पर अनधिकृत रूप से कब्जा किए हुए हैं। अप्रैल 2025 में प्रतिवादियों को नोटिस जारी किए गए और जून 2025 में उनकी आपत्तियां दर्ज की गईं।
राजस्व अधिकारियों का तर्क था कि यह जमीन कलेक्ट्रेट परिसर का हिस्सा है और आधिकारिक राजस्व अभिलेखों में सरकारी संपत्ति के रूप में दर्ज है। याचिका के अनुसार, यह इमारत मूल रूप से कलेक्ट्रेट आने वाले मुकदमों से जुड़े लोगों के लिए एक विश्राम गृह के रूप में इस्तेमाल होती थी, लेकिन बाद में प्रतिवादियों ने इस पर कब्जा कर लिया और कथित तौर पर इसके कुछ हिस्सों को मस्जिद में बदल दिया।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि भूतल और पहली मंजिल के कमरों पर कब्जा कर लिया गया था, वहां नमाज अदा की जा रही थी, कई कमरे आवासीय उद्देश्यों के लिए किराए पर दिए गए थे और किराएदारों के साथ-साथ परिसर में संचालित डाकघर से भी किराया वसूला जा रहा था।
अधिकारियों ने यह भी आरोप लगाया कि सरकारी इमारत के एक हिस्से को धार्मिक ढांचे में बदलने के लिए अनधिकृत निर्माण किया गया था। खबरों के अनुसार, जांच में यह निष्कर्ष निकला कि कब्जा करने वालों के पास परिसर पर कब्जा करने, तीसरे पक्ष को वहां रहने की अनुमति देने या इमारत को पूजा स्थल में बदलने का कोई लाइसेंस, अनुमति या कानूनी अधिकार नहीं था। राजस्व विभाग ने सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड, लखनऊ के कथित पत्र (कम्युनिकेशन) पर प्रतिवादियों के भरोसे को भी चुनौती दी और आरोप लगाया कि वह दस्तावेज फर्जी था। विभाग का तर्क था कि संबंधित संपत्ति राजस्व अभिलेखों में हमेशा कचहरी (कलेक्ट्रेट) और कोठियात भूमि के रूप में दर्ज रही है, न कि वक्फ या धार्मिक संपत्ति के रूप में।
अधिकारियों का यह भी कहना था कि सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के पास सरकारी भूमि को वक्फ संपत्ति घोषित करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। हालांकि प्रतिवादियों ने स्वयं को मस्जिद का मुतवल्ली और मौलवी बताया, लेकिन याचिका में कहा गया कि वे अपनी हैसियत या संपत्ति पर मालिकाना हक साबित करने के लिए कोई दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सके।
बेदखली की मांग के अलावा, याचिकाकर्ता ने किराएदारों से कथित तौर पर वसूले गए किराए, दंडात्मक किराए और अनधिकृत कब्जे से हुई कथित आय को 12 प्रतिशत चक्रवृद्धि ब्याज (Compound Interest) के साथ सरकारी खजाने में जमा कराने की भी मांग की।
मस्जिद कमेटी ने सरकार के दावे का विरोध किया
प्रतिवादियों ने आरोपों से इनकार करते हुए तर्क दिया कि राज्य विवादित संपत्ति पर अपना मालिकाना हक साबित करने में विफल रहा है। उनका कहना था कि अधिकारियों द्वारा जिन राजस्व अभिलेखों का हवाला दिया गया है, वे केवल जमीन की भौतिक प्रकृति या वर्गीकरण को दर्शाते हैं, न कि मालिकाना हक को निर्णायक रूप से स्थापित करते हैं।
उन्होंने आगे आरोप लगाया कि यह कार्रवाई मस्जिद और उससे सटी जमीन पर गैर-कानूनी तरीके से कब्जा करने के इरादे से शुरू की गई थी। प्रतिवादियों के अनुसार, याचिकाकर्ता ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया, आवश्यक राजस्व अभिलेख प्रस्तुत नहीं किए और अदालत को गुमराह करने की कोशिश की।
मुतवल्ली तनवीर अहमद ने कहा कि मस्जिद लगभग 150 वर्ष पुरानी है और प्रबंधन समिति इस आदेश को चुनौती देने के लिए पुनरीक्षण (रिवीजन) याचिका दायर करने की तैयारी कर रही है।
कोर्ट ने कब्जे को गैर-कानूनी माना
अपने समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों पर विचार करने के बाद सिटी मजिस्ट्रेट ने कहा कि प्रतिवादी विवादित संपत्ति पर कोई कानूनी अधिकार या मालिकाना हक साबित करने में विफल रहे हैं। कोर्ट ने पाया कि खसरा नंबर 539 राजस्व अभिलेखों में लगातार फसली वर्ष 1324, 1359 तथा उससे पहले के रिकॉर्ड में भी कलेक्ट्रेट/कचहरी की भूमि के रूप में दर्ज है। इसके आधार पर कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि जमीन राज्य सरकार की है और कानूनी अधिकार के बिना उस पर कब्जा करना उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जेदारों की बेदखली) अधिनियम, 1972 के तहत अवैध कब्जा है।
315 वर्ग मीटर क्षेत्र पर लंबे समय से चले आ रहे कब्जे को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि निर्धारित कानूनी फॉर्मूले के अनुसार फसली वर्ष 1359 से शुरू होकर 70 वर्षों की अवधि के लिए मुआवजे की गणना की जाए। इसके आधार पर लगभग 6.41 करोड़ रुपये की राशि निर्धारित की गई।
सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि कब्जाधारियों को परिसर खाली करने के लिए 30 दिन का समय दिया गया है। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो प्रशासन उन्हें हटाने की कार्रवाई करेगा।
धार्मिक ढांचों से जुड़े बड़े विवादों का हिस्सा
सहारनपुर का यह आदेश उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक भूमि पर बने कथित धार्मिक ढांचों से जुड़े कई विवादों के बीच आया है। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, पिछले महीने नॉर्दर्न रेलवे के वाराणसी डिवीजन ने काशी रेलवे स्टेशन के गेट नंबर 1 के पास स्थित एक मस्जिद को हटाने का नोटिस जारी किया था। नोटिस में कहा गया था कि यह ढांचा रेलवे की जमीन पर बना है। मस्जिद की प्रबंधन समिति अंजुमन इंतजामिया मसाजिद, वाराणसी ने इस नोटिस को चुनौती दी है और प्रस्तावित कार्रवाई को गैर-कानूनी बताया है।
यह विवाद कुशीनगर जिले में मदनी मस्जिद के एक हिस्से को गिराए जाने की कार्रवाई के बाद भी सामने आया है। फरवरी 2025 में अधिकारियों ने मस्जिद का एक हिस्सा यह आरोप लगाते हुए ध्वस्त कर दिया था कि उसका निर्माण कब्जाई गई जमीन पर किया गया था। मस्जिद समिति ने इस आरोप का खंडन करते हुए कहा कि जमीन कानूनी रूप से खरीदी गई थी और उन्हें स्थगन (स्टे) की अवधि समाप्त होने तक हाई कोर्ट से अंतरिम संरक्षण प्राप्त था।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को अवमानना कार्यवाही में नोटिस जारी किया। आरोप था कि ध्वस्तीकरण की कार्रवाई ने 13 नवंबर, 2024 के उस आदेश का उल्लंघन किया, जिसमें बिना पूर्व नोटिस दिए और प्रभावित पक्ष को सुनवाई का अवसर दिए देशभर में ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर रोक लगाई गई थी। यह मामला अभी भी लंबित है।
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