मथुरा: कब्रों को नुकसान, 100-100 रुपये मुआवजे पर भड़का मुस्लिम समुदाय  

Written by sabrang india | Published on: June 24, 2026
परिवारों का आरोप है कि स्थानीय अधिकारियों की देखरेख में काम कर रही JCB मशीनों से कब्रों को नुकसान पहुंचाया गया और एक सोची-समझी रणनीति के तहत देर रात कब्रिस्तान में प्रवेश किया गया।



मथुरा के मनोहरपुरा में 26 अप्रैल, 2026 को मुस्लिम समुदाय को बड़ा झटका लगा, जब लोगों ने देखा कि 'अहल-ए-मुस्लिमीन कब्रिस्तान' की कई कब्रें क्षतिग्रस्त कर दी गई थीं, बाउंड्री को नुकसान पहुंचाया गया था और कुछ स्थानों पर दफन लोगों के कफन तक बाहर दिखाई देने लगे थे।

मनोहरपुरा के एक स्थानीय निवासी ने कहा, "मैं अपने मृत भाई के प्रति सम्मान कहां व्यक्त करूं? जब कब्रें तोड़ी गईं, तो उनका कफन तक दिखाई देने लगा।"

द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, प्रभावित परिवारों का आरोप है कि स्थानीय अधिकारियों की निगरानी में देर रात कब्रिस्तान में घुसी JCB मशीनों ने उनके पिता, दादा और अन्य रिश्तेदारों की कब्रों को नुकसान पहुंचाया। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह एक सोची-समझी कार्रवाई थी।

'अहल-ए-मुस्लिमीन कब्रिस्तान' में नौ कब्रों को नुकसान पहुंचाया गया। यह कब्रिस्तान वर्ष 1909 से इसी स्थान पर मौजूद है। आरोप है कि मथुरा नगर निगम के सहायक नगर आयुक्त के आदेश पर आधी रात को पहुंची JCB मशीनों ने छह पेड़, बाउंड्री फेंसिंग के 20 खंभे, हरियाली और लैंडस्केपिंग वाले हिस्सों को भी क्षति पहुंचाई।

हालांकि, स्थानीय मुस्लिम समुदाय इसे राज्य में माहौल को और तनावपूर्ण बनाने की एक कोशिश के रूप में देखता है।

दुख और शिकायतों का समाधान

कब्रों को इस तरह उखाड़ा गया कि उनमें दफन लोगों के कफन और कंकाल तक दिखाई देने लगे, जिससे स्थानीय मुस्लिम समुदाय में गहरा दुख और आक्रोश फैल गया।

उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के दस्तावेजों के अनुसार, यह कब्रिस्तान 'वक्फ नंबर 74' और 'वक्फ नंबर 858' के अंतर्गत एक अधिसूचित (गजेटेड) वक्फ संपत्ति है। इसका प्रमाणपत्र दिसंबर 2023 में नवीनीकृत किया गया था। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कब्रिस्तान पीढ़ियों से मुस्लिम परिवारों की सेवा करता आ रहा है और यहां उनके माता-पिता, दादा-दादी तथा अन्य परिजनों को दफनाया गया है।

तौसीफ शेख, जिनके चाचा की कब्र इस कार्रवाई में क्षतिग्रस्त हुई, ने कहा, "मुसलमानों की कोई अहमियत नहीं है, चाहे वे जीवित हों या मृत। प्रशासन हमारी कब्रों का भी सम्मान नहीं करता। हमने वक्फ बोर्ड द्वारा मान्यता प्राप्त जमीन पर अपने मृतकों को दफनाया था, फिर भी हमें जमीन छीने जाने का सामना करना पड़ रहा है। कब्रों से कफन तक बाहर निकाल दिए गए।"

राज्य में JCB कार्रवाई से प्रभावित ताजुद्दीन अपनी दादी की बहन की कब्र के क्षतिग्रस्त होने से दुखी हैं। उन्होंने द वायर से कहा, "हम एक दशक से अधिक समय से इस कब्रिस्तान का उपयोग कर रहे हैं। इसे जल्द से जल्द बहाल किया जाना चाहिए। यह एक अमानवीय कृत्य है।"

आक्रोशित स्थानीय लोगों और 'अहल-ए-मुस्लिमीन कब्रिस्तान' का संचालन करने वाली समिति के सदस्यों ने उत्तर प्रदेश के इंटीग्रेटेड ग्रीवेंस रिड्रेसल सिस्टम (IGRS) के माध्यम से शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद मथुरा-वृंदावन नगर निगम ने जांच शुरू की।

हुए नुकसान की भरपाई

IGRS के माध्यम से शिकायत दर्ज होने के बाद स्थानीय लोगों, नगर निगम अधिकारियों और तोड़फोड़ का काम करने वाले ठेकेदार के बीच बातचीत शुरू हुई।

द वायर द्वारा देखे गए दस्तावेजों के अनुसार, 8 मई 2026 को मथुरा-वृंदावन नगर निगम ने औपचारिक रूप से स्वीकार किया कि कब्रिस्तान के भीतर लगभग नौ कब्रों को नुकसान पहुंचा था। IGRS शिकायत के जवाब में जारी पत्र में नगर निगम के स्वास्थ्य अधिकारी ने प्रति कब्र 100 रुपये के हिसाब से कुल 900 रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया।

दस्तावेज में ठेकेदार नेचर ग्रीन टूल्स एंड मशीन्स प्राइवेट लिमिटेड को कब्रिस्तान समिति को यह राशि देने का निर्देश भी दिया गया। जिन स्थानीय लोगों ने कई दिनों तक नुकसान का दस्तावेजीकरण किया और शिकायतें दर्ज कराईं, उनके लिए यह पहली आधिकारिक स्वीकारोक्ति थी कि वास्तव में कब्रों को नुकसान पहुंचा था।

26 मई को नगर निगम अधिकारियों ने कब्रिस्तान परिसर में हुए अन्य नुकसानों का भी आकलन किया। रिपोर्ट के अनुसार, छह पेड़ और बाउंड्री फेंसिंग के लगभग 20 खंभे क्षतिग्रस्त हुए थे। अधिकारियों ने पेड़ों के लिए 600 रुपये और खंभों के लिए 2,000 रुपये निर्धारित किए, जिससे कुल मुआवजा 2,600 रुपये तय हुआ।

रिकॉर्ड से यह भी पता चलता है कि कब्रिस्तान समिति के नाम 28 मई 2026 को दो चेक जारी किए गए। एक 900 रुपये का और दूसरा 2,600 रुपये का।

9 जून को ठेकेदार द्वारा भेजे गए एक अन्य पत्र में भी पुष्टि की गई कि नगर निगम के निर्देशों के अनुसार मुआवजा दे दिया गया है।

ये सभी दस्तावेज शिकायत से लेकर प्रशासन और ठेकेदार द्वारा नुकसान स्वीकार करने तथा मुआवजा देने तक की पूरी प्रक्रिया का रिकॉर्ड प्रस्तुत करते हैं। फिर भी, कई लोगों के लिए यह आधिकारिक प्रतिक्रिया उनके दुख को और गहरा कर गई।

शेख सवाल करते हैं, "एक कब्र की कीमत क्या है? उन्होंने पेड़ों, बाड़ और कब्रों के लिए मुआवजा तय कर दिया। लेकिन उन परिवारों के दर्द की भरपाई कैसे होगी जिनके मृत परिजनों की कब्रों के साथ यह व्यवहार किया गया? क्या सौ रुपये देकर इस नुकसान और उल्लंघन की भरपाई हो जाती है?"

परेशान किए जाने का इतिहास

आज भी यह कब्रिस्तान उस सदमे का गवाह बना हुआ है, जो वहां दफन लोगों के अवशेषों को झेलना पड़ा। कई लोगों के लिए, अहल-ए-मुस्लिमीन कब्रिस्तान को हुआ नुकसान केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि मथुरा के मुसलमानों द्वारा महसूस किए जा रहे लगातार हाशिए पर धकेले जाने का हिस्सा है।

यह कब्रिस्तान पहले भी कई विवादों के केंद्र में रहा है। स्थानीय लोगों और कब्रिस्तान समिति के सदस्यों का कहना है कि वर्षों से इसके आसपास अतिक्रमण, प्रवेश द्वार के पास कचरा डंपिंग प्वाइंट बनाने और जमीन के स्वरूप को बदलने की कोशिशें होती रही हैं।

यह ताजा विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब मथुरा के मुसलमान पहले से ही बढ़ती असुरक्षा महसूस कर रहे हैं। हाल के वर्षों में जिले में मुस्लिम कारोबारों के खिलाफ अभियान, मुस्लिम इलाकों में तोड़फोड़ की कार्रवाइयां और शाही ईदगाह विवाद को लेकर राजनीतिक सक्रियता बढ़ी है।

कब्रिस्तान समिति के सदस्य शाकिर हुसैन ने द वायर से कहा, "जो कुछ हो रहा है, हम सब समझ रहे हैं। जिस तरह हमें अपने समुदाय और वक्फ से जुड़े दावों को छोड़ने के लिए परेशान किया जा रहा है, वह साफ दिखाई देता है। सरकारी काम पर लगा एक ठेकेदार कब्रिस्तान को समतल कर देता है और बदले में हमें सिर्फ 2,600 रुपये का चेक मिलता है। हम कहां इबादत करते हैं, क्या खाते हैं, क्या बेचते हैं और अब हमारे कब्रिस्तान तक — सब कुछ सरकार की निगाह में है। इसलिए हम इन सभी घटनाओं का रिकॉर्ड रख रहे हैं और संबंधित विभागों में अपने दावे पेश कर रहे हैं।"

द वायर से बातचीत करने वाले कई स्थानीय लोगों ने कहा कि कब्रों को नुकसान पहुंचाने के बाद दिया गया मुआवजा इस धारणा को और मजबूत करता है कि अधिकारियों का रवैया मुस्लिम समुदाय के मुद्दों के प्रति अलग है। उनका कहना है कि यह मामला केवल आर्थिक नुकसान का नहीं, बल्कि सम्मान और धार्मिक अधिकारों का भी है।

समिति के एक अन्य सदस्य ने कहा, "आज हमारी कब्रें निशाना बनी हैं। कल हमारे घर और दुकानें थीं। पता नहीं अगला नंबर किसका होगा।"

उन्होंने आगे कहा, "असली मुद्दा यह है कि जिस जगह पर हमारे प्रियजनों को दफनाया गया था, वहां उसकी स्पष्ट कानूनी स्थिति के बावजूद प्रवेश कर नुकसान पहुंचाया गया।"

समुदाय के लोगों के लिए, अहल-ए-मुस्लिमीन कब्रिस्तान का यह विवाद अब केवल कब्रों को हुए नुकसान का मामला नहीं रह गया है। यह उस लंबे संघर्ष का एक और अध्याय बन गया है, जिसे वे ऐसे शहर में मुस्लिम स्थानों और विरासत को बचाने की लड़ाई बताते हैं, जहां जमीन, इतिहास और पहचान के सवाल लगातार राजनीतिक रंग लेते जा रहे हैं।

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