UAPA: दिल्ली हाई कोर्ट ने कथित टेरर फंडिंग मामले में लगभग पांच साल बाद कश्मीरी मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज को जमानत दी

Written by sabrang india | Published on: June 11, 2026
चार वर्ष सात महीने की हिरासत और दिसंबर 2024 में दिल्ली हाई कोर्ट में अपील दायर किए जाने के लगभग डेढ़ वर्ष बाद, वरिष्ठ मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज को 10 जून 2026 को कुछ शर्तों के साथ जमानत दे दी गई।


Image: Khurram Parvez Facebook Page

दिल्ली हाई कोर्ट ने 10 जून को कश्मीरी मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) द्वारा दर्ज कथित टेरर फंडिंग मामले में जमानत दे दी।

जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की पीठ ने परवेज की उस अपील को मंजूरी दे दी, जिसमें उन्होंने 17 दिसंबर 2024 को ट्रायल कोर्ट द्वारा जमानत से इनकार किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी। फैसला सुनाते हुए पीठ ने कहा, "हमने कुछ शर्तों के साथ जमानत दी है।"

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, खुर्रम परवेज को लगभग पांच वर्ष पहले गिरफ्तार किया गया था। उन पर NIA ने UAPA के तहत कथित टेरर फंडिंग, आपराधिक साजिश और प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के लिए लोगों की भर्ती करने के आरोप लगाए थे।

परवेज को 22 नवंबर 2021 को श्रीनगर से गिरफ्तार किया गया था। कई बार पुलिस हिरासत में रखे जाने के बाद 25 फरवरी 2022 को उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

19 दिसंबर 2024 को जब उन्होंने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी, तब तक वह लगभग तीन वर्ष एक महीने से हिरासत में थे। जमानत मिलने तक उनकी कुल हिरासत अवधि चार वर्ष सात महीने हो चुकी थी। दिल्ली हाई कोर्ट में उनकी जमानत याचिका के निपटारे में लगभग डेढ़ वर्ष का समय लगा।

NIA का आरोप था कि प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) से जुड़ा एक नेटवर्क 'ओवर ग्राउंड वर्कर्स' (OGWs) की भर्ती करता था, सुरक्षा प्रतिष्ठानों से संबंधित सूचनाएं जुटाता था और टेरर फंडिंग में सहायता करता था। जांच के दौरान परवेज को गिरफ्तार किया गया, जबकि मूल एफआईआर में उनका नाम शामिल नहीं था।

चार्जशीट के अनुसार, उन पर LeT के लिए ओवर ग्राउंड वर्कर्स की भर्ती करने, सेना की गतिविधियों और संरचना से संबंधित जानकारी एकत्र करने, पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों के साथ संबंध रखने तथा 2016 में बुरहान वानी की मौत के बाद विरोध प्रदर्शनों को भड़काने के आरोप लगाए गए थे।

हालांकि, अपनी अपील में परवेज ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष का मामला ठोस साक्ष्यों पर आधारित नहीं है और NIA द्वारा बताई गई कथित साजिश से उनका कोई संबंध नहीं है।

परवेज का कहना था कि ऐसा कोई डिजिटल साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि उनका किसी प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन के सदस्य से संपर्क था। उन्होंने यह भी कहा कि उनके और सह-आरोपी मुनीर अहमद कटारिया के बीच कथित मुलाकात के संबंध में कोई कॉल डिटेल रिकॉर्ड भी प्रस्तुत नहीं किया गया।

परवेज ने यह भी बताया कि वह मानवाधिकार संगठन 'जम्मू-कश्मीर कोएलिशन ऑफ सिविल सोसाइटी' (JKCCS) के कार्यक्रम समन्वयक और प्रवक्ता रह चुके हैं। इसके अलावा, वह फिलीपींस स्थित 'एशियन फेडरेशन अगेंस्ट इनवॉलंटरी डिसअपीयरेंस' (AFAD) के अध्यक्ष भी रहे हैं, जो जबरन गायब किए जाने (Enforced Disappearances) के मामलों पर काम करता है।

अपील में उन्होंने कहा कि वह कथित साजिश से पूरी तरह अनभिज्ञ थे और जांच एजेंसियां उनके तथा LeT के ऑपरेटिव्स या किसी प्रतिबंधित संगठन के सदस्यों के बीच किसी भी प्रकार का संपर्क साबित करने में विफल रही हैं।

उन्होंने कहा कि उनके जब्त किए गए डिजिटल उपकरणों की जांच में कथित हैंडलरों के साथ किसी बातचीत या ओवर ग्राउंड वर्कर्स की भर्ती से जुड़ा कोई साक्ष्य नहीं मिला।

परवेज ने उन आरोपों को भी खारिज किया कि पाकिस्तान की उनकी पूर्व यात्राएं किसी प्रतिबंधित संगठन से संबंध का संकेत देती हैं। उनका कहना था कि ये यात्राएं मानवीय और अधिकार-आधारित अभियानों के तहत सार्वजनिक रूप से की गई थीं, जिनमें बारूदी सुरंगों और जबरन गायब किए जाने के खिलाफ अभियान शामिल थे।

अपनी जमानत याचिका में उन्होंने यह भी तर्क दिया कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि उन्होंने किसी आतंकवादी ऑपरेटिव को संवेदनशील सैन्य जानकारी उपलब्ध कराई थी। साथ ही, उन पर किसी कथित टेरर-फंडिंग मनी ट्रेल से जुड़े होने का भी कोई आरोप नहीं था। परवेज की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता तनवीर अहमद मीर के साथ अधिवक्ता स्वाति खन्ना, रमिंदर कौर, मोहम्मद इमरान अहमद, शहजाद खान और कार्तिक वेणु पेश हुए। जमानत याचिका अधिवक्ता कार्तिक वेणु के माध्यम से दायर की गई थी।

वहीं NIA की ओर से विशेष लोक अभियोजक (SPP) राहुल त्यागी के साथ अधिवक्ता प्रिया राय, शुभम गोयल, जतिन खत्री और अमित रोहिला ने पक्ष रखा।

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