बलाई परिवार अपनी परंपरा की शुरुआत घासीरामजी बलाई से जोड़ता है, जिन्होंने सत्रहवीं शताब्दी के आरंभ में वर्तमान हड़किया गांव के निकट खाकुल देव की मूर्ति की खोज की थी। बाद में मंदिर बाराणा में स्थापित हुआ और धीरे-धीरे मेवाड़ तथा आसपास के क्षेत्रों का एक प्रमुख आस्था-केन्द्र बन गया।

जब राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के बाराणा गांव स्थित खाकुल देव मंदिर के पारंपरिक पुजारी विष्णु कुमार बलाई ने इसी वर्ष मई में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर पूछा—"क्या हम हिंदू नहीं हैं?"—तो इसे केवल दलित उत्पीड़न और जातिगत भेदभाव की एक और घटना के रूप में ही देखा गया। लेकिन ऐसा दृष्टिकोण इस पूरे विवाद के ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व को समझने में चूक जाता है।
यह कहानी किसी ब्राह्मणवादी मंदिर में दलित प्रवेश के विरोध की नहीं है ना इन मंदिरो में होते भेदभाव की है । यह एक ऐसे बलाई परिवार की कहानी है, जो लगभग चार शताब्दियों से एक मंदिर के संस्थापक, स्वामी और पारम्परिक संरक्षक के तौर पर स्थापित है । परिवार के पास अपने अधिकारों के समर्थन में वंशावली, अभिलेख, शिलालेख और अन्य ऐतिहासिक दस्तावेज़ मौजूद हैं । परिवार के अनुसार, उसकी पुश्तैनी पुजारी परंपरा और मंदिर पर अधिकार को 1624 ई. में मेवाड़ के शासक महाराणा करण सिंह द्वितीय, जो महाराणा प्रताप के पौत्र थे, द्वारा जारी एक ताम्रपत्र से मान्यता प्राप्त हुई थी। यही ऐतिहासिक निरंतरता आज के विवाद को और भी महत्वपूर्ण बना देती है। जिस परंपरा को 17वीं शताब्दी के मेवाड़ राज्य ने आधिकारिक मान्यता दी , वही 21वीं सदी के लोकतांत्रिक भारत में चुनौती के घेरे में है।
इसलिए खाकुल देव का विवाद केवल एक गांव का विवाद नहीं रह जाता। यह एक बड़ा प्रश्न खड़ा करता है—सदियों पुरान दलित मंदिर-स्वामित्व की परंपरा आज राजनीतिक विवाद का विषय क्यों बन गई है?

चार सौ वर्षों की परंपरा
बलाई परिवार अपनी परंपरा की शुरुआत घासीरामजी बलाई से जोड़ता है, जिन्होंने सत्रहवीं शताब्दी के आरंभ में वर्तमान हड़किया गांव के निकट खाकुल देव की मूर्ति की खोज की थी। बाद में मंदिर बाराणा में स्थापित हुआ और धीरे-धीरे मेवाड़ तथा आसपास के क्षेत्रों का एक प्रमुख आस्था-केन्द्र बन गया।
परिवार के पास संरक्षित वंशावलियां, मंदिर अभिलेख, शिलालेख और 1624 का ताम्रपत्र इस पुश्तैनी परंपरा की निरंतरता को समर्थन देते हैं। परिवार का कहना है कि ताम्रपत्र में न केवल मंदिर और उससे जुड़ी भूमि का उल्लेख है, बल्कि उनके पुश्तैनी पुजारी अधिकार और संरक्षक की भूमिका को भी मान्यता दी गई है। इन दस्तावेज़ों को साथ रखकर देखने पर इतना अवश्य स्पष्ट होता है कि यह दावा किसी हालिया विवाद की उपज नहीं, बल्कि एक लंबी ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा है।

1624 ई. (1681 वि.सं.) के ताम्रपत्र अभिलेख की स्कैन प्रति, जो मंदिर के वंशानुगत स्वामित्व की पुष्टि करती है।
राजस्थान की गैर-ब्राह्मण पुजारी परंपराएँ
राजस्थान के अनेक लोकदेवताओं के मंदिर ब्राह्मणवादी धार्मिक ढांचे से बाहर विकसित हुए हैं।
बाबा रामदेव के मंदिर में राजपूतों और मेघवालों की पुश्तैनी धार्मिक भूमिका आज भी परंपरा का अभिन्न हिस्सा है। रामदेवरा स्थित मुख्य मंदिर में बाबा रामदेव और उनकी धर्मबहन डालीबाई मेघवाल की समाधियाँ साथ-साथ स्थित हैं। यद्यपि बाबा रामदेव तोमर राजपूत थे, किंतु उन्हें मेघरिषि की परंपरा से भी जोड़ा जाता है।
इसी प्रकार पाबूजी राठौड़ की परंपरा नायक भीलों और भोपाओं के बिना अधूरी मानी जाती है। गुज्जर लोकदेवता देवनारायण के अधिकांश प्रमुख मंदिर मेवाड़ के शासकों द्वारा निर्मित कराए गए थे। वहीं गोगामेड़ी में बीकानेर रियासत द्वारा निर्मित वर्तमान मंदिर में मुस्लिम पुजारियों की परंपरा आधुनिक काल तक बनी रही।
इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो खाकुल देवजी का मंदिर कोई अपवाद नहीं, बल्कि राजस्थान की उसी पुरानी धार्मिक परंपरा का जीवित उदाहरण है जिसमें धार्मिक अधिकार केवल ब्राह्मणों तक सीमित नहीं थे। इतिहासकार दिव्या चेरियन अपनी पुस्तक ‘मर्चेंट्स ऑफ़ ववर्च्यू’ में दिखाती हैं कि अठारहवीं शताब्दी में महाजन-वर्ग के बढ़ते आर्थिक वरचस्व से हुए राजपूत दरबारों के ब्राह्मणीकरण ने सामाजिक वैधता और सत्ता के स्वरूप को किस प्रकार बदल दिया। खाकुल देव, रामदेव, पाबूजी और गोगाजी जैसी परंपराएँ संकेत करती हैं कि राजस्थान का धार्मिक इतिहास बाद की ब्राह्मणवादी व्यवस्था की अपेक्षा कहीं अधिक बहुलतावादी था।
सवाल प्रवेश का नहीं, स्वामित्व का है
इस विवाद पर सामाजिक चिंतक और कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी बताते हैं कि "खाखुल देव मंदिर विवाद से यह तथ्य भी उभर कर आया है कि जिस सामंती व्यवस्था की और राजतंत्र की हम अकसर आलोचना करते हैं,उसमें दलितों को न केवल मंदिर के पुजारी के रूप में मान्यता दी गई बल्कि उन मंदिरों के साथ भूमि का अधिकार भी मिला,लेकिन आज लोकतंत्र में ज्यादातर जगहों पर वर्चस्ववादी कथित पिछड़ी जातियों ने दलितों से उनसे मंदिर,चढ़ावा और जमीनें सब छीनना शुरू कर दिया है और ऊपर से जातिगत रूप से अपमानित करना भी प्रारंभ कर दिया है।"
मंदिरों और जाति पर होने वाली अधिकांश बहसें दलितों के मंदिर प्रवेश के अधिकार के इर्द-गिर्द घूमती रही हैं। खाकुलदेव का मामला इससे बिल्कुल अलग है।बलाई परिवार किसी दूसरे के मंदिर में प्रवेश नहीं मांग रहा। उनके पूर्वजों ने इस मंदिर की स्थापना की, पीढ़ियों तक उसकी देखरेख की और पुश्तैनी पुजारी रहे। आज चुनौती उस ऐतिहासिक अधिकार को दी जा रही है। यानी विवाद प्रवेश का नहीं, स्वामित्व और संरक्षकत्व का है। प्रश्न यह है कि धार्मिक संस्था पर वैध अधिकार किसका है, उसका प्रबंधन कौन करेगा और उसकी परंपरा को आगे कौन बढ़ाएगा।
चार सौ वर्ष पुरानी परंपरा पर विवाद
विष्णु कुमार बलाई के अनुसार, विवाद की शुरुआत वर्ष 2023 में हुई, जब गांव के कुछ प्रभावशाली लोगों ने मंदिर पर बलाई परिवार की पुश्तैनी संरक्षकता पर सवाल उठाने शुरू किए। उनका आरोप है कि संपत जाट और उनके साथ जुड़े कुछ लोगों ने मंदिर की पारंपरिक व्यवस्था बदलने तथा पुश्तैनी पुजारी व्यवस्था समाप्त करने का प्रयास किया।
अगले दो वर्षों में विवाद और गहरा गया। विष्णु का कहना है कि सदियों से मंदिर परिसर में आयोजित होने वाला खाकुल देव मेला भी विवाद के कारण मंदिर से बाहर आयोजित करना पड़ा।
14 अगस्त 2025 को विवाद हिंसक रूप ले बैठा। विष्णु कुमार बलाई का आरोप है कि मंदिर परिसर में उनके और उनके परिवार पर हमला किया गया, जातिसूचक गालियाँ दी गईं और उन्हें पूजा-अर्चना करने से रोका गया। इस संबंध में भारतीय न्याय संहिता तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज हुई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मंदिर में अलग से दानपात्र स्थापित किया गया तथा मंदिर के प्रबंधन के लिए नई समिति गठित करने की कोशिश की गई।
विवाद बढ़ने पर राजस्थान प्रशासन ने मामले के निस्तारण तक स्थानीय तहसीलदार को रिसीवर नियुक्त कर दिया। विष्णु कुमार बलाई का कहना है कि इससे उनके परिवार की सदियों पुरानी पुश्तैनी संरक्षकता व्यवहारिक रूप से समाप्त हो गई।
मई 2026 में उन्होंने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को खुला पत्र लिखकर आरोप लगाया कि स्थानीय आरएसएस से जुड़े लोगों ने उन्हें मंदिर से हटाने का समर्थन किया और पूछा कि क्या सामाजिक समरसता की बात करने वाला संगठन एक दलित पुश्तैनी पुजारी की रक्षा करेगा।
इसके लगभग दो महीने बाद, 16 जुलाई 2026 को, मंदिर में पूजा की तैयारी के दौरान उन पर दोबारा हमला होने का आरोप लगाया गया। इस घटना में भी भारतीय न्याय संहिता और एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मामले दर्ज हुए।
बाराणा का यह विवाद अब गांव की सीमा से बाहर निकल चुका है। 'बलाई समाज दर्पण न्यूज़ 24' जैसे सामुदायिक प्रकाशनों ने इसे केवल मंदिर प्रबंधन का विवाद नहीं, बल्कि एक पुश्तैनी दलित पुजारी परंपरा को विस्थापित करने का प्रयास बताया है। इससे एक ऐसा प्रश्न सामने आता है जिस पर अब तक बहुत कम चर्चा हुई है—आख़िर दलितों की पारंपरिक मंदिर संरक्षकता आज सामाजिक और राजनीतिक विवाद का विषय क्यों बन रही है?

धार्मिक स्थल का आर्थिक महत्त्व
बालई समुदाय का 29 मई 2026 का पत्र, जिसमें इस विवाद को अब केवल एक परिवार का मामला न मानकर पूरे समुदाय का मुद्दा बताया गया है।
इस विवाद का एक पक्ष ऐसा भी है जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई है—मंदिरों की अर्थव्यवस्था।
लंबे समय तक दलित और अन्य गैर-ब्राह्मण समुदायों द्वारा संचालित अनेक स्थानीय मंदिर सीमित चढ़ावे और स्थानीय आस्था तक ही सीमित रहे। लेकिन जैसे-जैसे किसी मंदिर की लोकप्रियता और आर्थिक महत्व बढ़ता है, वैसे-वैसे उसके प्रबंधन और नियंत्रण को लेकर नए दावे भी सामने आने लगते हैं। जैसे, जनवरी 2026 में गोगामेड़ी स्थित गोगाजी मंदिर में युट्यूबर रिद्धिमा शर्मा द्वारा मुस्लिम पुजारियों की परंपरा के खिलाफ सांप्रदायिक माहौल बनाने की कोशिश इसी व्यापक प्रवृत्ति की ओर संकेत करती है।
खाकुल देव मंदिर का मामला भी कुछ ऐसा ही दिखाई देता है। मंदिर के प्रबंधन में बदलाव की मांग करने वाले लोगों का कहना है कि अब यहां बड़ी मात्रा में चढ़ावा और दान आने लगा है, इसलिए नई प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता है। विष्णु कुमार बलाई इसे उस पुश्तैनी अधिकार को समाप्त करने का षड्यंत्र मानते हैं, जो मंदिर की वर्तमान आर्थिक समृद्धि से कहीं अधिक पुराना है।
प्रतीकात्मक समावेशन बनाम संस्थागत अधिकार
पिछले कुछ दशकों में आरएसएस और उससे जुड़े संगठन खुदको समावेशी दिखाने के लिए समय-समय पर मंदिरों में दलित पुजारियों की बात तो करते हैं , किन्तु खाकुलदेव मंदिर विवाद उनके लिए नई चुनौती है।
दूसरों द्वारा संचालित मंदिरों में दलित पुजारी नियुक्त करना और किसी मंदिर पर दलित संचालन एवं स्वामित्व का आदर करना दो अलग विषय हैं।
खाकुल देव का विवाद दलित विमर्श में एक नया पहलू जोड़ता है। अब तक अधिकांश शोध और बहसों का केंद्र दलितों का मंदिर प्रवेश का संघर्ष रहा है। लेकिन यहाँ ऐतिहासिक साक्ष्य दलित बलाई परिवार के मंदिर की स्थापना, उसके संरक्षण , स्वामित्व और पुश्तैनी पुजारी परंपरा को स्थापित करते हैं , जबकि विवाद उनके पारम्परिक अधिकार को लेकर खड़ा किया गया है। यह मामला जाति और मंदिरों के संबंधों को देखने के प्रचलित नजरिए पर पुनर्विचार की मांग करता है।
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जब राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के बाराणा गांव स्थित खाकुल देव मंदिर के पारंपरिक पुजारी विष्णु कुमार बलाई ने इसी वर्ष मई में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर पूछा—"क्या हम हिंदू नहीं हैं?"—तो इसे केवल दलित उत्पीड़न और जातिगत भेदभाव की एक और घटना के रूप में ही देखा गया। लेकिन ऐसा दृष्टिकोण इस पूरे विवाद के ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व को समझने में चूक जाता है।
यह कहानी किसी ब्राह्मणवादी मंदिर में दलित प्रवेश के विरोध की नहीं है ना इन मंदिरो में होते भेदभाव की है । यह एक ऐसे बलाई परिवार की कहानी है, जो लगभग चार शताब्दियों से एक मंदिर के संस्थापक, स्वामी और पारम्परिक संरक्षक के तौर पर स्थापित है । परिवार के पास अपने अधिकारों के समर्थन में वंशावली, अभिलेख, शिलालेख और अन्य ऐतिहासिक दस्तावेज़ मौजूद हैं । परिवार के अनुसार, उसकी पुश्तैनी पुजारी परंपरा और मंदिर पर अधिकार को 1624 ई. में मेवाड़ के शासक महाराणा करण सिंह द्वितीय, जो महाराणा प्रताप के पौत्र थे, द्वारा जारी एक ताम्रपत्र से मान्यता प्राप्त हुई थी। यही ऐतिहासिक निरंतरता आज के विवाद को और भी महत्वपूर्ण बना देती है। जिस परंपरा को 17वीं शताब्दी के मेवाड़ राज्य ने आधिकारिक मान्यता दी , वही 21वीं सदी के लोकतांत्रिक भारत में चुनौती के घेरे में है।
इसलिए खाकुल देव का विवाद केवल एक गांव का विवाद नहीं रह जाता। यह एक बड़ा प्रश्न खड़ा करता है—सदियों पुरान दलित मंदिर-स्वामित्व की परंपरा आज राजनीतिक विवाद का विषय क्यों बन गई है?

चार सौ वर्षों की परंपरा
बलाई परिवार अपनी परंपरा की शुरुआत घासीरामजी बलाई से जोड़ता है, जिन्होंने सत्रहवीं शताब्दी के आरंभ में वर्तमान हड़किया गांव के निकट खाकुल देव की मूर्ति की खोज की थी। बाद में मंदिर बाराणा में स्थापित हुआ और धीरे-धीरे मेवाड़ तथा आसपास के क्षेत्रों का एक प्रमुख आस्था-केन्द्र बन गया।
परिवार के पास संरक्षित वंशावलियां, मंदिर अभिलेख, शिलालेख और 1624 का ताम्रपत्र इस पुश्तैनी परंपरा की निरंतरता को समर्थन देते हैं। परिवार का कहना है कि ताम्रपत्र में न केवल मंदिर और उससे जुड़ी भूमि का उल्लेख है, बल्कि उनके पुश्तैनी पुजारी अधिकार और संरक्षक की भूमिका को भी मान्यता दी गई है। इन दस्तावेज़ों को साथ रखकर देखने पर इतना अवश्य स्पष्ट होता है कि यह दावा किसी हालिया विवाद की उपज नहीं, बल्कि एक लंबी ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा है।

1624 ई. (1681 वि.सं.) के ताम्रपत्र अभिलेख की स्कैन प्रति, जो मंदिर के वंशानुगत स्वामित्व की पुष्टि करती है।
राजस्थान की गैर-ब्राह्मण पुजारी परंपराएँ
राजस्थान के अनेक लोकदेवताओं के मंदिर ब्राह्मणवादी धार्मिक ढांचे से बाहर विकसित हुए हैं।
बाबा रामदेव के मंदिर में राजपूतों और मेघवालों की पुश्तैनी धार्मिक भूमिका आज भी परंपरा का अभिन्न हिस्सा है। रामदेवरा स्थित मुख्य मंदिर में बाबा रामदेव और उनकी धर्मबहन डालीबाई मेघवाल की समाधियाँ साथ-साथ स्थित हैं। यद्यपि बाबा रामदेव तोमर राजपूत थे, किंतु उन्हें मेघरिषि की परंपरा से भी जोड़ा जाता है।
इसी प्रकार पाबूजी राठौड़ की परंपरा नायक भीलों और भोपाओं के बिना अधूरी मानी जाती है। गुज्जर लोकदेवता देवनारायण के अधिकांश प्रमुख मंदिर मेवाड़ के शासकों द्वारा निर्मित कराए गए थे। वहीं गोगामेड़ी में बीकानेर रियासत द्वारा निर्मित वर्तमान मंदिर में मुस्लिम पुजारियों की परंपरा आधुनिक काल तक बनी रही।
इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो खाकुल देवजी का मंदिर कोई अपवाद नहीं, बल्कि राजस्थान की उसी पुरानी धार्मिक परंपरा का जीवित उदाहरण है जिसमें धार्मिक अधिकार केवल ब्राह्मणों तक सीमित नहीं थे। इतिहासकार दिव्या चेरियन अपनी पुस्तक ‘मर्चेंट्स ऑफ़ ववर्च्यू’ में दिखाती हैं कि अठारहवीं शताब्दी में महाजन-वर्ग के बढ़ते आर्थिक वरचस्व से हुए राजपूत दरबारों के ब्राह्मणीकरण ने सामाजिक वैधता और सत्ता के स्वरूप को किस प्रकार बदल दिया। खाकुल देव, रामदेव, पाबूजी और गोगाजी जैसी परंपराएँ संकेत करती हैं कि राजस्थान का धार्मिक इतिहास बाद की ब्राह्मणवादी व्यवस्था की अपेक्षा कहीं अधिक बहुलतावादी था।
सवाल प्रवेश का नहीं, स्वामित्व का है
इस विवाद पर सामाजिक चिंतक और कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी बताते हैं कि "खाखुल देव मंदिर विवाद से यह तथ्य भी उभर कर आया है कि जिस सामंती व्यवस्था की और राजतंत्र की हम अकसर आलोचना करते हैं,उसमें दलितों को न केवल मंदिर के पुजारी के रूप में मान्यता दी गई बल्कि उन मंदिरों के साथ भूमि का अधिकार भी मिला,लेकिन आज लोकतंत्र में ज्यादातर जगहों पर वर्चस्ववादी कथित पिछड़ी जातियों ने दलितों से उनसे मंदिर,चढ़ावा और जमीनें सब छीनना शुरू कर दिया है और ऊपर से जातिगत रूप से अपमानित करना भी प्रारंभ कर दिया है।"
मंदिरों और जाति पर होने वाली अधिकांश बहसें दलितों के मंदिर प्रवेश के अधिकार के इर्द-गिर्द घूमती रही हैं। खाकुलदेव का मामला इससे बिल्कुल अलग है।बलाई परिवार किसी दूसरे के मंदिर में प्रवेश नहीं मांग रहा। उनके पूर्वजों ने इस मंदिर की स्थापना की, पीढ़ियों तक उसकी देखरेख की और पुश्तैनी पुजारी रहे। आज चुनौती उस ऐतिहासिक अधिकार को दी जा रही है। यानी विवाद प्रवेश का नहीं, स्वामित्व और संरक्षकत्व का है। प्रश्न यह है कि धार्मिक संस्था पर वैध अधिकार किसका है, उसका प्रबंधन कौन करेगा और उसकी परंपरा को आगे कौन बढ़ाएगा।
चार सौ वर्ष पुरानी परंपरा पर विवाद
विष्णु कुमार बलाई के अनुसार, विवाद की शुरुआत वर्ष 2023 में हुई, जब गांव के कुछ प्रभावशाली लोगों ने मंदिर पर बलाई परिवार की पुश्तैनी संरक्षकता पर सवाल उठाने शुरू किए। उनका आरोप है कि संपत जाट और उनके साथ जुड़े कुछ लोगों ने मंदिर की पारंपरिक व्यवस्था बदलने तथा पुश्तैनी पुजारी व्यवस्था समाप्त करने का प्रयास किया।
अगले दो वर्षों में विवाद और गहरा गया। विष्णु का कहना है कि सदियों से मंदिर परिसर में आयोजित होने वाला खाकुल देव मेला भी विवाद के कारण मंदिर से बाहर आयोजित करना पड़ा।
14 अगस्त 2025 को विवाद हिंसक रूप ले बैठा। विष्णु कुमार बलाई का आरोप है कि मंदिर परिसर में उनके और उनके परिवार पर हमला किया गया, जातिसूचक गालियाँ दी गईं और उन्हें पूजा-अर्चना करने से रोका गया। इस संबंध में भारतीय न्याय संहिता तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज हुई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मंदिर में अलग से दानपात्र स्थापित किया गया तथा मंदिर के प्रबंधन के लिए नई समिति गठित करने की कोशिश की गई।
विवाद बढ़ने पर राजस्थान प्रशासन ने मामले के निस्तारण तक स्थानीय तहसीलदार को रिसीवर नियुक्त कर दिया। विष्णु कुमार बलाई का कहना है कि इससे उनके परिवार की सदियों पुरानी पुश्तैनी संरक्षकता व्यवहारिक रूप से समाप्त हो गई।
मई 2026 में उन्होंने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को खुला पत्र लिखकर आरोप लगाया कि स्थानीय आरएसएस से जुड़े लोगों ने उन्हें मंदिर से हटाने का समर्थन किया और पूछा कि क्या सामाजिक समरसता की बात करने वाला संगठन एक दलित पुश्तैनी पुजारी की रक्षा करेगा।
इसके लगभग दो महीने बाद, 16 जुलाई 2026 को, मंदिर में पूजा की तैयारी के दौरान उन पर दोबारा हमला होने का आरोप लगाया गया। इस घटना में भी भारतीय न्याय संहिता और एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मामले दर्ज हुए।
बाराणा का यह विवाद अब गांव की सीमा से बाहर निकल चुका है। 'बलाई समाज दर्पण न्यूज़ 24' जैसे सामुदायिक प्रकाशनों ने इसे केवल मंदिर प्रबंधन का विवाद नहीं, बल्कि एक पुश्तैनी दलित पुजारी परंपरा को विस्थापित करने का प्रयास बताया है। इससे एक ऐसा प्रश्न सामने आता है जिस पर अब तक बहुत कम चर्चा हुई है—आख़िर दलितों की पारंपरिक मंदिर संरक्षकता आज सामाजिक और राजनीतिक विवाद का विषय क्यों बन रही है?

धार्मिक स्थल का आर्थिक महत्त्व
बालई समुदाय का 29 मई 2026 का पत्र, जिसमें इस विवाद को अब केवल एक परिवार का मामला न मानकर पूरे समुदाय का मुद्दा बताया गया है।
इस विवाद का एक पक्ष ऐसा भी है जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई है—मंदिरों की अर्थव्यवस्था।
लंबे समय तक दलित और अन्य गैर-ब्राह्मण समुदायों द्वारा संचालित अनेक स्थानीय मंदिर सीमित चढ़ावे और स्थानीय आस्था तक ही सीमित रहे। लेकिन जैसे-जैसे किसी मंदिर की लोकप्रियता और आर्थिक महत्व बढ़ता है, वैसे-वैसे उसके प्रबंधन और नियंत्रण को लेकर नए दावे भी सामने आने लगते हैं। जैसे, जनवरी 2026 में गोगामेड़ी स्थित गोगाजी मंदिर में युट्यूबर रिद्धिमा शर्मा द्वारा मुस्लिम पुजारियों की परंपरा के खिलाफ सांप्रदायिक माहौल बनाने की कोशिश इसी व्यापक प्रवृत्ति की ओर संकेत करती है।
खाकुल देव मंदिर का मामला भी कुछ ऐसा ही दिखाई देता है। मंदिर के प्रबंधन में बदलाव की मांग करने वाले लोगों का कहना है कि अब यहां बड़ी मात्रा में चढ़ावा और दान आने लगा है, इसलिए नई प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता है। विष्णु कुमार बलाई इसे उस पुश्तैनी अधिकार को समाप्त करने का षड्यंत्र मानते हैं, जो मंदिर की वर्तमान आर्थिक समृद्धि से कहीं अधिक पुराना है।
प्रतीकात्मक समावेशन बनाम संस्थागत अधिकार
पिछले कुछ दशकों में आरएसएस और उससे जुड़े संगठन खुदको समावेशी दिखाने के लिए समय-समय पर मंदिरों में दलित पुजारियों की बात तो करते हैं , किन्तु खाकुलदेव मंदिर विवाद उनके लिए नई चुनौती है।
दूसरों द्वारा संचालित मंदिरों में दलित पुजारी नियुक्त करना और किसी मंदिर पर दलित संचालन एवं स्वामित्व का आदर करना दो अलग विषय हैं।
खाकुल देव का विवाद दलित विमर्श में एक नया पहलू जोड़ता है। अब तक अधिकांश शोध और बहसों का केंद्र दलितों का मंदिर प्रवेश का संघर्ष रहा है। लेकिन यहाँ ऐतिहासिक साक्ष्य दलित बलाई परिवार के मंदिर की स्थापना, उसके संरक्षण , स्वामित्व और पुश्तैनी पुजारी परंपरा को स्थापित करते हैं , जबकि विवाद उनके पारम्परिक अधिकार को लेकर खड़ा किया गया है। यह मामला जाति और मंदिरों के संबंधों को देखने के प्रचलित नजरिए पर पुनर्विचार की मांग करता है।
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