दलित लेखक और एक्टिविस्ट भंवर मेघवंशी ने कहा, “यह फैसला उस वादे की हार है कि कानून सभी के लिए समान है।”

नागौर जिले के डांगावास गांव में जमीन के विवाद में छह लोगों (जिनमें से पांच दलित थे) की बेरहमी से हत्या के ग्यारह साल बाद, बुधवार को मेड़ता एससी/एसटी स्पेशल कोर्ट ने सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया। इस फैसले से दलित समुदाय को गहरा सदमा लगा है और पीड़ित परिवार शोक में हैं।
द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, मेड़ता एससी/एसटी स्पेशल कोर्ट के जज आशीष बिजरानिया ने फैसला सुनाते हुए सभी 40 आरोपियों को बेगुनाह करार दिया। वकील महिपाल लटियाल के अनुसार, लंबे ट्रायल के दौरान शिकायतकर्ता पक्ष ने 8 गवाह पेश किए, जबकि अभियोजन पक्ष ने 82 गवाहों से पूछताछ की।
फैसला सुनाए जाते समय कोर्ट परिसर के बाहर बड़ी संख्या में लोग जमा थे। जहां आरोपियों के पक्ष के चेहरों पर खुशी दिख रही थी, वहीं पीड़ित परिवारों में निराशा और मायूसी साफ झलक रही थी।
समुदाय में गहरी निराशा और शोक की लहर दौड़ गई है। पीड़ित परिवार सवाल कर रहे हैं, “अगर सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया है, तो हमारे पांच लोगों को किसने मारा? हम हाईकोर्ट जाएंगे।”
दलित लेखक और एक्टिविस्ट भंवर मेघवंशी ने कहा, “यह फैसला उस वादे की हार है कि कानून सभी के लिए समान है।”
विवाद क्या था?
यह मामला डांगावास गांव में 3.77 हेक्टेयर जमीन को लेकर लगभग 40 साल पुराने विवाद से जुड़ा था। एक दलित (मेघवाल) परिवार का दावा था कि दशकों पहले उन्होंने 1,500 रुपये का लोन लेने के बाद एक जाट परिवार को उस जमीन पर खेती करने की इजाजत दी थी। जब पैसे लौटा दिए गए, तो जमीन वापस नहीं की गई। राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 की धारा 42 के तहत, अनुसूचित जाति के व्यक्ति की जमीन किसी गैर-एससी व्यक्ति को बेची या ट्रांसफर नहीं की जा सकती।
मई 2015 में रत्नाराम मेघवाल ने विवादित जमीन पर घर बनाना शुरू किया, जिससे तनाव बढ़ गया। 14 मई 2015 को जाट समुदाय के 200 से ज्यादा लोगों ने कथित तौर पर दलित परिवार पर लाठियों, धारदार हथियारों और ट्रैक्टरों से हमला किया। दलित महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की गई, पुरुषों की बुरी तरह पिटाई की गई और कई पीड़ितों को ट्रैक्टरों से कुचल दिया गया। बताया जाता है कि हमलावरों ने हिंसा का वीडियो बनाया और उसे वायरल किया।
इस घटना में छह लोगों की जान चली गई, जिनमें रत्नाराम मेघवाल, पोखराम मेघवाल, पंचाराम मेघवाल, खेमाराम मेघवाल, गणपतराम मेघवाल और रामपाल गोसाईं शामिल हैं। मारे गए लोगों में से पांच दलित मेघवाल परिवार से थे।
घटना की गंभीरता को देखते हुए राजस्थान सरकार ने पहले यह मामला सीआईडी को और बाद में सीबीआई को सौंपा। सीबीआई ने 40 आरोपियों के नाम के साथ चार्जशीट दाखिल की। 2019 में राजस्थान हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए फरार आरोपियों की गिरफ्तारी सुनिश्चित करने के लिए मुकदमे की कार्यवाही को तीन महीने के लिए रोकने का आदेश दिया। इसके बाद पुलिस की विशेष टीमों ने सभी 40 आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। मेड़ता कोर्ट में जनवरी 2018 में मुकदमा शुरू हुआ।
पीड़ित परिवारों ने गहरा दुख जताया है और हाई कोर्ट में अपील करने का इरादा जाहिर किया है।
दलित विचारक और लेखक भंवर मेघवंशी ने ‘द मूकनायक’ से कहा, “डांगावास हत्याकांड में सभी आरोपियों का बरी होना सिर्फ एक मुकदमे का अंत नहीं है। यह दलितों के न्याय पाने के अधिकार पर एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है। सवाल सीधा है कि क्या उन छह बेगुनाह लोगों को किसी ने नहीं मारा? क्या वे खुद-ब-खुद मर गए? जब छह लोगों की बेरहमी से हत्या की गई, तो पूरे देश ने उस बर्बरता को देखा था। सालों तक पीड़ित परिवार न्याय का इंतजार करते रहे और एक अदालत से दूसरी अदालत के चक्कर लगाते रहे। अगर आखिर में कोई दोषी नहीं ठहराया जाता है, तो यह न सिर्फ अभियोजन पक्ष की नाकामी है, बल्कि पूरी न्यायिक प्रक्रिया की विफलता भी है। जब निष्पक्ष जांच, निडर गवाही और निष्पक्ष सुनवाई न होने की वजह से ऐसे मामलों में आरोपी बरी हो जाते हैं, तो सबसे बड़ा संदेश यही जाता है कि दलितों के लिए न्याय पाना और मुश्किल होता जा रहा है।”
मेघवंशी ने आगे कहा, “इससे न्यायपालिका में हाशिए पर मौजूद समुदायों का भरोसा कमजोर होता है। ‘अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम’ का मकसद पीड़ितों को न्याय दिलाना था। जब इतने जघन्य मामले भी बिना सजा के खत्म हो जाते हैं, तो कानून के लागू होने के तरीके पर गंभीर सवाल उठते हैं। डांगावास के पीड़ितों को न्याय नहीं मिला। यह सिर्फ पीड़ित परिवारों की हार नहीं है; यह भारतीय लोकतंत्र के उस वादे की भी हार है कि कानून सबके लिए बराबर है। यह फैसला हमें आत्म-मंथन करने पर मजबूर करता है कि दलितों के लिए न्याय का रास्ता कहां है?”
डांगावास के फैसले ने पुराने जख्मों को फिर से ताजा कर दिया है और एक बार फिर भारत में जातिगत अत्याचार के पीड़ितों के लिए न्याय के लंबे और मुश्किल रास्ते को उजागर किया है।
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द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, मेड़ता एससी/एसटी स्पेशल कोर्ट के जज आशीष बिजरानिया ने फैसला सुनाते हुए सभी 40 आरोपियों को बेगुनाह करार दिया। वकील महिपाल लटियाल के अनुसार, लंबे ट्रायल के दौरान शिकायतकर्ता पक्ष ने 8 गवाह पेश किए, जबकि अभियोजन पक्ष ने 82 गवाहों से पूछताछ की।
फैसला सुनाए जाते समय कोर्ट परिसर के बाहर बड़ी संख्या में लोग जमा थे। जहां आरोपियों के पक्ष के चेहरों पर खुशी दिख रही थी, वहीं पीड़ित परिवारों में निराशा और मायूसी साफ झलक रही थी।
समुदाय में गहरी निराशा और शोक की लहर दौड़ गई है। पीड़ित परिवार सवाल कर रहे हैं, “अगर सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया है, तो हमारे पांच लोगों को किसने मारा? हम हाईकोर्ट जाएंगे।”
दलित लेखक और एक्टिविस्ट भंवर मेघवंशी ने कहा, “यह फैसला उस वादे की हार है कि कानून सभी के लिए समान है।”
विवाद क्या था?
यह मामला डांगावास गांव में 3.77 हेक्टेयर जमीन को लेकर लगभग 40 साल पुराने विवाद से जुड़ा था। एक दलित (मेघवाल) परिवार का दावा था कि दशकों पहले उन्होंने 1,500 रुपये का लोन लेने के बाद एक जाट परिवार को उस जमीन पर खेती करने की इजाजत दी थी। जब पैसे लौटा दिए गए, तो जमीन वापस नहीं की गई। राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 की धारा 42 के तहत, अनुसूचित जाति के व्यक्ति की जमीन किसी गैर-एससी व्यक्ति को बेची या ट्रांसफर नहीं की जा सकती।
मई 2015 में रत्नाराम मेघवाल ने विवादित जमीन पर घर बनाना शुरू किया, जिससे तनाव बढ़ गया। 14 मई 2015 को जाट समुदाय के 200 से ज्यादा लोगों ने कथित तौर पर दलित परिवार पर लाठियों, धारदार हथियारों और ट्रैक्टरों से हमला किया। दलित महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की गई, पुरुषों की बुरी तरह पिटाई की गई और कई पीड़ितों को ट्रैक्टरों से कुचल दिया गया। बताया जाता है कि हमलावरों ने हिंसा का वीडियो बनाया और उसे वायरल किया।
इस घटना में छह लोगों की जान चली गई, जिनमें रत्नाराम मेघवाल, पोखराम मेघवाल, पंचाराम मेघवाल, खेमाराम मेघवाल, गणपतराम मेघवाल और रामपाल गोसाईं शामिल हैं। मारे गए लोगों में से पांच दलित मेघवाल परिवार से थे।
घटना की गंभीरता को देखते हुए राजस्थान सरकार ने पहले यह मामला सीआईडी को और बाद में सीबीआई को सौंपा। सीबीआई ने 40 आरोपियों के नाम के साथ चार्जशीट दाखिल की। 2019 में राजस्थान हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए फरार आरोपियों की गिरफ्तारी सुनिश्चित करने के लिए मुकदमे की कार्यवाही को तीन महीने के लिए रोकने का आदेश दिया। इसके बाद पुलिस की विशेष टीमों ने सभी 40 आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। मेड़ता कोर्ट में जनवरी 2018 में मुकदमा शुरू हुआ।
पीड़ित परिवारों ने गहरा दुख जताया है और हाई कोर्ट में अपील करने का इरादा जाहिर किया है।
दलित विचारक और लेखक भंवर मेघवंशी ने ‘द मूकनायक’ से कहा, “डांगावास हत्याकांड में सभी आरोपियों का बरी होना सिर्फ एक मुकदमे का अंत नहीं है। यह दलितों के न्याय पाने के अधिकार पर एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है। सवाल सीधा है कि क्या उन छह बेगुनाह लोगों को किसी ने नहीं मारा? क्या वे खुद-ब-खुद मर गए? जब छह लोगों की बेरहमी से हत्या की गई, तो पूरे देश ने उस बर्बरता को देखा था। सालों तक पीड़ित परिवार न्याय का इंतजार करते रहे और एक अदालत से दूसरी अदालत के चक्कर लगाते रहे। अगर आखिर में कोई दोषी नहीं ठहराया जाता है, तो यह न सिर्फ अभियोजन पक्ष की नाकामी है, बल्कि पूरी न्यायिक प्रक्रिया की विफलता भी है। जब निष्पक्ष जांच, निडर गवाही और निष्पक्ष सुनवाई न होने की वजह से ऐसे मामलों में आरोपी बरी हो जाते हैं, तो सबसे बड़ा संदेश यही जाता है कि दलितों के लिए न्याय पाना और मुश्किल होता जा रहा है।”
मेघवंशी ने आगे कहा, “इससे न्यायपालिका में हाशिए पर मौजूद समुदायों का भरोसा कमजोर होता है। ‘अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम’ का मकसद पीड़ितों को न्याय दिलाना था। जब इतने जघन्य मामले भी बिना सजा के खत्म हो जाते हैं, तो कानून के लागू होने के तरीके पर गंभीर सवाल उठते हैं। डांगावास के पीड़ितों को न्याय नहीं मिला। यह सिर्फ पीड़ित परिवारों की हार नहीं है; यह भारतीय लोकतंत्र के उस वादे की भी हार है कि कानून सबके लिए बराबर है। यह फैसला हमें आत्म-मंथन करने पर मजबूर करता है कि दलितों के लिए न्याय का रास्ता कहां है?”
डांगावास के फैसले ने पुराने जख्मों को फिर से ताजा कर दिया है और एक बार फिर भारत में जातिगत अत्याचार के पीड़ितों के लिए न्याय के लंबे और मुश्किल रास्ते को उजागर किया है।
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