UAPA: ‘बरी होने की 99% संभावना’ — सजा की दरों पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

Written by sabrang india | Published on: May 20, 2026
सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 19 मई को टिप्पणी की कि UAPA के तहत सजा की दरें राष्ट्रीय स्तर पर 1.5% से 4% के बीच हैं, जबकि जम्मू-कश्मीर में यह 1% से भी कम हैं।



नई दिल्ली: सख्त ‘गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम’ (UAPA) पर एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 19 मई को सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत दे दी। अंद्राबी इस कानून और ‘नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेस’ (NDPS) एक्ट के तहत लगे आरोपों में पांच साल 11 महीने से अधिक समय से जेल में बंद थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ऐसा करते हुए अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ही एक पिछले फैसले के कई पहलुओं पर “गंभीर आपत्तियां” जताईं। उसी फैसले के आधार पर कार्यकर्ताओं उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार किया गया था; दोनों 2020 से जेल में बंद हैं।

इस टिप्पणी के अलावा — जिसने UAPA के तहत जमानत को लेकर सुप्रीम कोर्ट के भीतर मौजूद मतभेदों पर सार्वजनिक बहस को तेज कर दिया है — जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने यह भी कहा कि पूरे भारत में UAPA मामलों में दोषसिद्धि (conviction) की दर बेहद कम रही है, जो 2019 से 2023 के बीच 1.5% से 4% के बीच थी। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि जम्मू-कश्मीर में दोषसिद्धि की दर 1% से भी कम रही है।

कोर्ट ने कहा कि ये आंकड़े ऐसे मामलों में बरी होने की अत्यधिक संभावना की ओर इशारा करते हैं। लाइव लॉ ने इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया।

बेंच ने कहा, “पूरे भारत के आंकड़ों को देखें तो दोषसिद्धि की दर 2% से 6% है; इसका मतलब है कि देश में ऐसे मामलों में बरी होने की संभावना 94% से 98% तक है। जहां तक केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर का सवाल है, वहां दोषसिद्धि की वार्षिक दर हमेशा 1% से कम रही है। इसका मतलब है कि ट्रायल खत्म होने पर ऐसे मामलों में बरी होने की संभावना 99% तक होती है।”

मौजूदा मामला और जमानत की शर्तें

सैयद इफ्तिखार अंद्राबी जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में ग्रामीण विकास विभाग के एक ग्रामीण-स्तरीय कार्यकर्ता हैं। उन्हें अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद ‘निवारक हिरासत’ (preventive detention) में लिया गया था, लेकिन बाद में हाई कोर्ट द्वारा इस हिरासत को अवैध ठहराए जाने के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। इसके बाद जून 2020 में उन्हें ‘नारको-आतंकवाद’ से जुड़े आरोपों वाले एक राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के मामले में फिर गिरफ्तार किया गया।

दिलचस्प बात यह है कि उनकी जमानत याचिका को स्पेशल NIA कोर्ट और जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट — दोनों ने खारिज कर दिया था। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि अंद्राबी द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर एक सह-आरोपी के ठिकाने से नशीले पदार्थ और नकदी बरामद की गई थी। साथ ही यह भी दावा किया गया कि उनके फोन रिकॉर्ड उन्हें पाकिस्तान में सक्रिय लोगों से जोड़ते हैं।

18 मई के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, अंद्राबी के शरीर या उनके ठिकाने से सीधे तौर पर कोई सबूत बरामद नहीं हुआ था। इसलिए कोर्ट ने उन्हें जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया, हालांकि यह रिहाई स्पेशल NIA कोर्ट द्वारा तय शर्तों के अधीन होगी।

इन शर्तों के तहत अंद्राबी को अपना पासपोर्ट जमा करना होगा और हर पखवाड़े (दो सप्ताह में एक बार) हंदवाड़ा पुलिस स्टेशन में हाजिर होना होगा। उन्हें गवाहों को धमकाने या उन पर दबाव डालने से भी मना किया गया है।

UAPA की लंबे समय से भारत में असहमति की आवाजों को दबाने वाले एक हथियार के रूप में आलोचना होती रही है। इस कठोर कानून के तहत कई कार्यकर्ताओं और पत्रकारों पर मामले दर्ज किए गए हैं। कश्मीर में इस कानून का इस्तेमाल सबसे ज्यादा विवादित तरीकों से हुआ है।

दोषसिद्धि की कम दरें

केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा संसद में पेश किए गए आधिकारिक आंकड़ों — जो नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के 2019-2023 के आंकड़ों पर आधारित हैं — का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि UAPA मामलों में पूरे भारत में दोषसिद्धि की दर 1.5% से 4% के बीच है।

इसका मतलब यह है कि इस कानून के तहत आरोपित व्यक्ति के बरी होने की संभावना 96% से 98.5% तक होती है। कोर्ट ने आगे कहा, “जहां तक जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश की बात है, वहां दोषसिद्धि की वार्षिक दर हमेशा 1% से कम रही है। इसका मतलब है कि ऐसे मामलों में ट्रायल खत्म होने पर आरोपी के बरी होने की संभावना 99% तक होती है।”

इसी आधार पर कोर्ट ने जोर देकर कहा कि “जमानत नियम है और जेल अपवाद।” ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम के.ए. नजीब’ मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि UAPA की धारा 43D(5) का इस्तेमाल केवल जमानत से इनकार करने के लिए नहीं किया जा सकता, और न ही इसे ट्रायल से पहले लंबे समय तक हिरासत में रखने के “एकतरफा हथियार” की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया आदेश यहां पढ़ा जा सकता है।



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