श्रमिकों की कमी और बढ़ती लागत के दबाव में भारत का मैन्युफैक्चरिंग निर्यात क्षेत्र: रिपोर्ट

Written by sabrang india | Published on: April 14, 2026
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई है, जिससे श्रमिकों की कमी और कच्चे माल की बढ़ती लागत का दबाव बढ़ा है। इन परिस्थितियों में भारत का विनिर्माण क्षेत्र चुनौतियों का सामना कर रहा है। साथ ही, इस क्षेत्र में श्रमिकों की कमी की समस्या भी सामने आई है।


प्रतीकात्मक तस्वीर; साभार : इंडियन एक्सप्रेस

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के चलते वैश्विक सप्लाई चेन बाधित हुई है, जिससे श्रमिकों की कमी और कच्चे माल की लागत में बढ़ोतरी हुई है। इन दबावों के कारण भारत का विनिर्माण क्षेत्र कठिनाइयों का सामना कर रहा है। यह जानकारी उद्योग प्रतिनिधियों ने डेक्कन हेराल्ड को दी।

हीरो इकोटेक लिमिटेड के प्रबंध निदेशक गौरव मुंजाल ने अखबार को बताया कि मार्च में इनपुट लागत पिछले महीने के मुकाबले 10–15% बढ़ गई है। हीरो इकोटेक लिमिटेड देश की प्रमुख साइकिल निर्माता कंपनियों में से एक है और अमेरिका व यूरोप को निर्यात भी करती है। मुंजाल ने यह भी कहा कि अमेरिका द्वारा लगाए गए ऊंचे टैरिफ का व्यापार पर असर पड़ा है।

द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन्स (FIEO) ने कहा कि सप्लाई चेन में दिक्कतों के कारण मार्च में मर्चेंडाइज़ निर्यात में 7–10% की गिरावट का अनुमान है। FIEO के अध्यक्ष एस.सी. रल्हन ने कहा कि वित्त वर्ष 2025–26 में कुल वस्तु निर्यात में 2–3% की गिरावट देखी जा सकती है।

हालांकि, अखबार के अनुसार, उन्होंने संकेत दिया कि सेवाओं के निर्यात के सहारे वस्तुओं और सेवाओं के संयुक्त निर्यात में 5–6% की वृद्धि संभव है।

अखबार के हवाले से जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025–26 के पहले 11 महीनों में मर्चेंडाइज़ निर्यात 402.93 अरब डॉलर रहा, जबकि कुल निर्यात 790.86 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इसके मुकाबले, 2024–25 में कुल निर्यात 825.3 अरब डॉलर दर्ज किया गया था, जिसमें से 437.7 अरब डॉलर मर्चेंडाइज़ निर्यात का हिस्सा था।

रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय इस सप्ताह के अंत में मार्च और पूरे वित्त वर्ष 2025–26 के व्यापार आंकड़े जारी करने वाला है।

विनिर्माण क्षेत्र में श्रमिकों की कमी को लेकर भी चिंताएं सामने आई हैं। ईस्टमैन के उपाध्यक्ष संजू टंडन ने बताया कि फरवरी के अंत और मार्च की शुरुआत में होली के लिए छुट्टी पर गए कई मजदूर अब तक वापस नहीं लौटे हैं। अन्य उद्योग प्रतिनिधियों के अनुसार, हतोत्साहित होकर कई श्रमिक अपने गांवों की ओर लौट रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि द वायर ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि उत्तर प्रदेश में निर्यातकों और फैक्ट्री मालिकों को औद्योगिक एलपीजी की कमी का सामना करना पड़ रहा है, जबकि सरकार स्थिर आपूर्ति का दावा करती रही है। इस कमी से उत्पादन प्रभावित हो रहा है और लागत बढ़ रही है। गुजरात के मोरबी से भी ऐसी खबरें आई हैं, जहां फैक्ट्री मालिकों ने प्रवासी मजदूरों से अपने घर लौटने को कहा है।

रिपोर्ट में उन उद्योगों का जिक्र किया गया है, जिन पर पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का सीधा असर पड़ा है। इनमें लखनऊ का चिकनकारी उद्योग, फिरोजाबाद का कांच उद्योग, कश्मीर का हस्तशिल्प उद्योग, चंडीगढ़ के MSME और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर, तथा कंडोम उद्योग आदि शामिल हैं।

निर्यातकों ने अखबार से बातचीत में लॉजिस्टिक्स से जुड़ी चुनौतियों का भी उल्लेख किया, जिनमें बढ़ता मालभाड़ा और शिपिंग कंटेनरों की सीमित उपलब्धता शामिल है। DRRK फूड्स के अमित मारवाहा ने बताया कि लॉजिस्टिक्स और भुगतान निपटान से संबंधित दिक्कतों के चलते चावल के निर्यात पर असर पड़ा है।

अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान पर हमलों के बाद पश्चिम एशिया में भड़के संघर्ष के चलते मार्च की शुरुआत से ही ईरान, इराक और GCC देशों जैसे बाजारों में बासमती चावल की आपूर्ति प्रभावित हुई है। हालांकि, हालिया संघर्षविराम और अमेरिका-ईरान के बीच कूटनीतिक बातचीत से कुछ राहत के संकेत मिले हैं, लेकिन क्षेत्र की अनिश्चित स्थिति को देखते हुए निर्यातक अभी भी सतर्क बने हुए हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, उद्योग प्रतिनिधियों का मानना है कि स्थिति सामान्य होने में अभी कुछ महीने लग सकते हैं।

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