कारगिल योद्धा से लेकर सैकड़ों साल पुराने नवाब परिवार तक, मतदाता सूची से नाम हटने को लेकर बवाल!

Written by sabrang india | Published on: April 6, 2026
पश्चिम बंगाल में SIR 2026 के बाद 23 लाख से अधिक मतदाता अनिश्चितता की स्थिति में हैं। कारगिल वेटरन मोहम्मद दुआल अली और मुर्शिदाबाद के नवाब परिवार के सौ से ज्यादा लोगों के नाम हटाए जाने से विवाद और गहरा गया है।


साभार : जी सलाम

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बीच स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद हालात ऐसे बन गए हैं कि लाखों मतदाता अपने मतदान अधिकार से वंचित होते दिखाई दे रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अपील सुनने वाले ट्रिब्यूनल ही शुरू नहीं हुए हैं, तो इन मतदाताओं को न्याय कैसे मिलेगा?

SIR के बाद जिन मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए, उनमें से करीब 23 लाख लोग अब भी असमंजस की स्थिति में हैं। उनकी पहली अपील पहले ही खारिज हो चुकी है और अब उनके पास केवल अपीलीय ट्रिब्यूनल का विकल्प बचा है, जिसने अभी तक काम शुरू ही नहीं किया है।

जी सलाम की रिपोर्ट के अनुसार, सोमवार, 6 मार्च को 152 सीटों पर विधानसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग से पहले अपीलों के निपटारे का आखिरी दिन है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अभी व्यवस्था ही नहीं की गई है। इस पूरे विवाद में सबसे चौंकाने वाला मामला कारगिल युद्ध लड़ने वाले मोहम्मद दुआल अली का है। मोहम्मद दुआल अली ने भारतीय सेना के दस्तावेज जमा किए, फिर भी उनका नाम "अंडर एडजुडिकेशन" में डाल दिया गया। हैरानी की बात यह है कि उनके परिवार के तीन और सदस्यों—जिनमें दो बेटियां और एक बेटा शामिल हैं—के नाम भी इसी सूची में हैं, जबकि उनमें से एक न्यायिक अधिकारी हैं।

ऐसा नहीं है कि कारगिल युद्ध लड़ने वाले मोहम्मद दुआल अली ही इस स्थिति का सामना कर रहे हैं। इस मामले में कई अन्य प्रमुख हस्तियां भी शामिल हैं, जिनके वोटर कार्ड को SIR के बाद ‘संदेहास्पद’ श्रेणी में डाल दिया गया है। स्थिति यह है कि भारतीय क्रिकेटर रिचा घोष का नाम भी इस सूची में शामिल है, जबकि वह इस समय ऑस्ट्रेलिया में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। फिलहाल उनका नाम एडजुडिकेशन सूची में रखा गया है।

SIR की प्रक्रिया को लेकर विवाद उस समय और गहरा गया, जब मुर्शिदाबाद के नवाब के वंशजों में से सौ से अधिक लोगों के नाम वोटर सूची से हटा दिए गए। नवाब वासेज अली मिर्जा के वंशज आज भी मुर्शिदाबाद में रहते हैं। बताया जाता है कि इस परिवार ने यहां साढ़े तीन सौ साल से अधिक समय तक शासन किया और अब उसी परिवार को अपनी पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

SIR के बाद रेजा अली मिर्जा और उनके बेटे फहीम मिर्जा सहित नवाब परिवार के सौ से ज्यादा लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। मीडिया से बातचीत में रेजा अली मिर्जा ने बताया कि SIR के दौरान नागरिकता साबित करने के लिए सभी आवश्यक दस्तावेज जमा किए गए थे, इसके बावजूद उनके नाम हटा दिए गए।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 28 फरवरी को जारी अंतिम वोटर लिस्ट में 7.04 करोड़ मतदाता दर्ज किए गए, जबकि अनुमानित वयस्क आबादी करीब 7.70 करोड़ है। सुप्रीम कोर्ट में 1 अप्रैल को हुई सुनवाई के दौरान बताया गया कि 60 लाख मामलों में से 47 लाख का निपटारा हो चुका है और बाकी 7 अप्रैल तक पूरे करने का लक्ष्य है।

ऑब्जर्वर पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, सबसे बड़ा सवाल इन आंकड़ों के पीछे छिपा हुआ है। चार सप्लीमेंट्री सूचियों के बाद करीब 40 से 45 प्रतिशत मामलों में नाम हटा दिए गए हैं। सीनियर वकील श्याम दीवान के मुताबिक यह बेहद उच्च ‘एक्सक्लूजन रेट’ है, यानी लगभग 23.4 लाख लोग फिलहाल अपने मतदान के अधिकार से बाहर हो चुके हैं।

दफ्तरों के चक्कर लगाने को मजबूर लोग

इन लोगों के पास अपील का अधिकार तो है, लेकिन ट्रिब्यूनल की व्यवस्था अब तक शुरू नहीं हो पाई है। ऐसे में प्रभावित लोग सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। कई मतदाताओं को कभी सरकारी छुट्टी तो कभी चुनावी ड्यूटी का हवाला देकर लौटा दिया गया। वहीं, चुनाव आयोग के अधिकारी यह कह रहे हैं कि ऑफलाइन अपील के लिए अतिरिक्त दस्तावेजों की आवश्यकता नहीं है।

इस बीच पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अग्रवाल ने तैयारियों का जायजा लेना शुरू कर दिया है। 2 अप्रैल तक करीब 52 लाख मामलों का निपटारा किया जा चुका है, जिनमें से लगभग 55 प्रतिशत नाम स्वीकृत हुए हैं, जबकि 45 प्रतिशत को खारिज कर दिया गया है। जिन लोगों के नाम खारिज किए गए हैं, उन्हें 15 दिन के भीतर अपील करने का अवसर दिया गया है।

सीईओ कार्यालय का कहना है कि हाल में प्राप्त अधिकांश आवेदन नए नहीं हैं, बल्कि उन्हीं मतदाताओं से जुड़े हैं जिनके नाम 28 फरवरी की सूची में ‘डिलीट’ दिखाए गए थे। साथ ही चुनावी तैयारियों को लेकर स्टाफ बढ़ाने, महिला पोलिंग पार्टियों को प्राथमिकता देने और व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के निर्देश भी जारी किए गए हैं।

हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि लाखों मतदाता अब भी इंतजार में हैं। सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि जब पूरा सिस्टम ही तैयार नहीं है, तो इन लोगों को उनका मतदान अधिकार आखिर कब और कैसे मिल पाएगा?

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