कबीरचौरा तिराहे पर प्रतिमा को रंग-बिरंगा करने पर कबीरपंथियों की आपत्ति, जताई नाराजगी

Written by sabrang india | Published on: February 21, 2026
कबीर मठ से जुड़े रविंद्र सहाय कैलाशी ने नगर निगम अधिकारियों से इस संबंध में आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने बताया कि स्थल का निरीक्षण और डीपीआर (डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट) तैयार किए बिना ही काम शुरू कर दिया गया। कबीर मठ से जुड़े प्रमोद दास ने कहा कि संत को “असंत” बना दिया गया है। यहां मल्टीकलर की कोई आवश्यकता नहीं थी।



वाराणसी के कबीरचौरा तिराहे के सुंदरीकरण कार्य में नगर निगम के सामान्य विभाग की लापरवाही सामने आई है। यहां पहले से स्थापित कबीर और उनकी मंडली की प्रतिमा को विभिन्न रंगों से रंग दिया गया है। इससे कबीरपंथी नाराज हैं। उन्होंने मुख्य अभियंता से मिलकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है।

अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, कबीरपंथियों का कहना है कि मूर्तियों पर इस तरह रंग करके संत कबीर का मजाक बना दिया गया है। मूर्तिकारों के अनुसार, ये मूर्तियां कांस्य (ब्रॉन्ज) की बनी हैं और इन पर एकल (मोनोलिथिक) रंग होना चाहिए था। कबीर मठ से जुड़े रविंद्र सहाय कैलाशी ने नगर निगम अधिकारियों से इस संबंध में आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने बताया कि स्थल का निरीक्षण और डीपीआर (डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट) तैयार किए बिना ही काम शुरू कर दिया गया। कबीर मठ से जुड़े प्रमोद दास ने कहा कि संत को “असंत” बना दिया गया है। यहां मल्टीकलर की कोई आवश्यकता नहीं थी।

कबीर: धर्म और जाति से परे एक संत

संत कबीर किस धर्म या जाति से थे, इसका स्पष्ट उत्तर उनके जीवनकाल में भी किसी को नहीं मिला। वे काशी में रहकर समाज में गहराई तक जमी सामाजिक और धार्मिक भ्रांतियों को तोड़ने का प्रयास करते रहे। इनमें सबसे प्रमुख मान्यता यह थी कि काशी में मृत्यु होने से मोक्ष मिलता है। कबीर ने जीवनभर काशी में निवास किया, लेकिन अंतिम समय में इस भ्रम को तोड़ने के लिए उन्होंने काशी छोड़कर मगहर जाने का निर्णय लिया।

भ्रम तोड़ने का संदेश

मगहर के बारे में प्रचलित कहावत थी—“मगहर मरे तो गधा होए, काशी मरे तो मोक्ष।” कबीर ने इस अंधविश्वास को चुनौती देते हुए अपने जीवन के अंतिम क्षण मगहर में बिताए। उनका यह कदम आज भी प्रासंगिक माना जाता है, जब समाज में तरह-तरह की भ्रांतियां और भ्रामक संदेश फैलते रहते हैं।

लहरतारा से जुड़ी कथा

काशी से कबीर का गहरा संबंध रहा है। कबीरपंथियों के लिए यह स्थान तीर्थ के समान है। काशी में कबीर से जुड़े तीन प्रमुख स्थल माने जाते हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण लहरतारा तालाब है। मान्यता है कि इसी तालाब के किनारे कबीर मिले थे। नीरू और नीमा नामक जुलाहा दंपत्ति ने उनका पालन-पोषण किया। बाद में कबीरचौरा में रहते हुए उन्होंने समाज सुधार के अनेक कार्य किए।

गुरु मंत्र की कथा

कबीरदास हिंदू थे या मुसलमान, यह प्रश्न आज भी चर्चा का विषय है। उन्होंने रामानंद को अपना गुरु माना। कथा के अनुसार, गुरु मंत्र पाने के लिए कबीर पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर लेट गए। स्नान के लिए आए रामानंद का पैर उन पर पड़ा और उनके मुख से “राम” शब्द निकला। कबीर ने इसी को अपना गुरु मंत्र मान लिया।

कबीर मठ और आस्था

लहरतारा तालाब का स्वरूप अब धीरे-धीरे पुनर्स्थापित हो रहा है। इसी क्षेत्र में कबीर मठ स्थापित है। कबीर जयंती के अवसर पर लाखों श्रद्धालु वाराणसी पहुंचते हैं। कबीर मठ के पीठाधीश्वर महंत गोविंद दास के अनुसार, कबीर पंथ किसी धर्म विशेष का नाम नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक राह है, जो आडंबरों और जातिगत भेदभाव से ऊपर उठने की सीख देती है।

आस्था और परंपरा

कबीरपंथियों के लिए लहरतारा और कबीरचौरा अत्यंत पवित्र स्थल हैं। यहां के तालाब का जल और कबीरचौरा स्थित मूलगादी के कुएं का पानी श्रद्धालु गंगाजल के समान मानते हैं और अपने साथ ले जाते हैं।

जीवन दर्शन

कबीर पंथ का मूल उद्देश्य लोगों को सादगी, समानता और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देना है। कबीर की वाणी आज भी सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वासों के खिलाफ एक सशक्त संदेश मानी जाती है।

Related

मध्य प्रदेश: सीमेंट फैक्ट्री के लिए चूना पत्थर सैंपलिंग का विरोध, आदिवासियों का प्रदर्शन; पुलिस पर पथराव, जबरन औद्योगिक परियोजनाएं थोपने के आरोप

‘डिजिटल हेट’ के खिलाफ CJP का साल 2025 में अभियान: NBDSA के समक्ष टेलीविजन समाचार चैनलों की जवाबदेही सुनिश्चित करना 

बाकी ख़बरें