कमीशन को हर महीने लगभग 300 शिकायतें मिलती हैं। साल 2019 में, तत्कालीन कमलनाथ सरकार के आखिरी दौर में, राज्य महिला आयोग में नियुक्तियां की गई थीं। उस समय शोभा ओझा को चेयरपर्सन के रूप में तथा पांच सदस्यों की नियुक्ति की गई थी।

साभार : दैनिक भास्कर
इंटरनेशनल वुमेंस डे पर जहां सरकारें महिला सशक्तिकरण, सुरक्षा और समान अधिकारों की बात करती हैं, वहीं मध्य प्रदेश में एक महत्वपूर्ण संस्था निष्क्रिय पड़ी है। राज्य महिला आयोग में पिछले चार साल से कोई चेयरपर्सन या सदस्य नियुक्त नहीं किया गया है। नतीजतन, हजारों महिलाओं की शिकायतें लंबित हैं और न्याय मिलने की प्रक्रिया लगभग ठप हो गई है।
महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा के लिए बनी यह संवैधानिक संस्था फिलहाल बिना नेतृत्व के काम कर रही है। मार्च 2023 से आयोग में सभी पद पूरी तरह खाली हैं। इस दौरान राज्य भर से बड़ी संख्या में शिकायतें आयोग तक पहुंची हैं, लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हो सकी है।
सरकारें बदलीं, लेकिन नियुक्तियां नहीं हुईं
द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में तत्कालीन कमलनाथ सरकार के आखिरी दौर में राज्य महिला आयोग में नियुक्तियां की गई थीं। उस समय शोभा ओझा को चेयरपर्सन बनाया गया था और पांच सदस्यों की नियुक्ति की गई थी। इसके बाद राज्य में सत्ता परिवर्तन हुआ और शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा सरकार आई। शिवराज सरकार का पूरा कार्यकाल बीत गया और अब डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली नई सरकार को भी दो साल से अधिक हो चुके हैं, लेकिन महिला आयोग में अभी तक नई नियुक्तियां नहीं हुई हैं।
सरकार लगातार महिला सशक्तिकरण के लिए कई योजनाएं चलाने का दावा करती है, लेकिन जिस संस्था का उद्देश्य महिलाओं की शिकायतें सुनना और उन्हें न्याय दिलाना है, वही लंबे समय से निष्क्रिय पड़ी है।
हर महीने सैकड़ों शिकायतें आती हैं
राज्य महिला आयोग से जुड़े एक कर्मचारी ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि आयोग को हर महीने लगभग 300 शिकायतें मिलती हैं।
इनमें से कुछ शिकायतें आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आतीं और उन्हें खारिज कर दिया जाता है। बाकी शिकायतों के लिए संबंधित विभागों से जांच रिपोर्ट मंगाई जाती है और फाइलें तैयार की जाती हैं। हालांकि कई मामलों में आगे की कार्रवाई के लिए आयोग की बेंच के सामने सुनवाई जरूरी होती है, लेकिन चेयरपर्सन और सदस्यों की गैरमौजूदगी के कारण इन मामलों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाती।
कमीशन के पद खाली, मामले बढ़ रहे
राज्य के अन्य आयोगों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही बताई जा रही है। जानकारी के अनुसार अनुसूचित जाति आयोग और अनुसूचित जनजाति आयोग में भी बड़ी संख्या में शिकायतें लंबित हैं।
चेयरपर्सन और सदस्यों की नियुक्ति न होने के कारण इन आयोगों में फिलहाल केवल सरकारी अधिकारी और कर्मचारी ही काम कर रहे हैं, जो शिकायतें दर्ज करने और उन्हें संबंधित विभागों को भेजने तक सीमित हैं। इस स्थिति में आयोगों का मुख्य उद्देश्य—शिकायतें सुनना और निष्पक्ष न्याय देना—लगभग पूरी तरह से प्रभावित हो गया है।
पूर्व सदस्य ने जताई चिंता
द मूकनायक से बातचीत में राज्य महिला आयोग की पूर्व सदस्य संगीता शर्मा ने बताया कि जब 2019 में उनकी नियुक्ति हुई थी, तब पहले से ही लगभग 10,000 शिकायतें लंबित थीं। उन्होंने कहा कि कमलनाथ सरकार गिरने और उसके बाद शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में सत्ता परिवर्तन के बाद कैबिनेट ने आयोग से जुड़े नियुक्तियों को निष्क्रिय कर दिया। इससे नियुक्त सदस्यों की स्थिति को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई और कई लोग अपने अधिकारों के लिए हाई कोर्ट पहुंच गए।
इस बीच कोविड-19 महामारी और कानूनी जटिलताओं के कारण आयोग का कार्यकाल तीन साल बाद समाप्त हो गया, जिससे लंबित मामलों के समाधान पर और असर पड़ा।
संगीता शर्मा ने आगे बताया कि मार्च 2023 से राज्य महिला आयोग में चेयरपर्सन और सदस्यों के सभी पद खाली हैं, जबकि महिलाओं से जुड़ी शिकायतें लगातार आ रही हैं। उन्होंने कहा कि रोजाना कई तरह की शिकायतें आती हैं, लेकिन नियुक्तियां न होने के कारण सुनवाई संभव नहीं हो पाती। उन्होंने यह भी कहा कि महिला एवं बाल विकास विभाग भी आयोग की स्थिति को लेकर गंभीर नहीं दिख रहा है, जिससे महिलाओं को आयोग के माध्यम से न्याय मिलना मुश्किल हो गया है।
ऐसे में आयोग में जल्द नियुक्तियां करना बेहद जरूरी है, ताकि लंबित मामलों का समाधान हो सके और पीड़ित महिलाओं को समय पर न्याय मिल सके।
आयोग के पास सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां
कानून के तहत राज्य महिला आयोग के पास सिविल कोर्ट के समान शक्तियां होती हैं। जब किसी महिला को प्रशासन या अन्य एजेंसियों से न्याय नहीं मिलता, तो वह आयोग में शिकायत कर सकती है।
आयोग संबंधित विभाग से जांच रिपोर्ट मंगाता है और यदि शिकायतकर्ता जांच से संतुष्ट नहीं होती, तो आयोग की बेंच के सामने सुनवाई होती है। सुनवाई के दौरान आयोग संबंधित अधिकारियों को तलब कर सकता है और जांच के बाद सरकार को सिफारिशें भेज सकता है।
लेकिन फिलहाल चेयरपर्सन और सदस्यों की अनुपस्थिति के कारण ऐसी सुनवाई और कार्रवाई संभव नहीं हो पा रही है।
महिला दिवस पर उठता बड़ा सवाल
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर, जब महिलाओं के अधिकारों और न्याय की बात हो रही है, तब मध्य प्रदेश का महिला आयोग चार वर्षों से निष्क्रिय होना कई सवाल खड़े करता है।
महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि आयोग में जल्द नियुक्तियां की जानी चाहिए, ताकि महिलाओं से जुड़े मामलों की सुनवाई हो सके और पीड़ितों को समय पर न्याय मिल सके।
महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के राज्य सरकार के दावों के बीच यह सवाल भी उठता है कि जब शिकायतों की सुनवाई के लिए जिम्मेदार संस्था ही खाली पड़ी है, तो महिलाओं को न्याय दिलाने की प्रक्रिया वास्तव में कितनी प्रभावी हो सकती है?
NCRB के आंकड़े चिंताजनक स्थिति दिखाते हैं
मध्य प्रदेश लंबे समय से महिलाओं के खिलाफ अपराधों, खासकर बलात्कार के मामलों को लेकर चर्चा में रहा है। वर्ष 2023 में भी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं दिखा। NCRB की रिपोर्ट के अनुसार, बलात्कार के मामलों में राज्य देश में तीसरे स्थान पर रहा, जहां एक वर्ष में 2,979 मामले दर्ज किए गए। इस सूची में राजस्थान 5,078 घटनाओं के साथ पहले स्थान पर रहा, जबकि उत्तर प्रदेश में 3,516 मामले दर्ज किए गए।
ये आंकड़े साफ दिखाते हैं कि राज्य में महिलाओं की सुरक्षा अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। हालांकि सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई योजनाएं और हेल्पलाइन नंबर शुरू किए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका प्रभाव सीमित दिखाई देता है।
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साभार : दैनिक भास्कर
इंटरनेशनल वुमेंस डे पर जहां सरकारें महिला सशक्तिकरण, सुरक्षा और समान अधिकारों की बात करती हैं, वहीं मध्य प्रदेश में एक महत्वपूर्ण संस्था निष्क्रिय पड़ी है। राज्य महिला आयोग में पिछले चार साल से कोई चेयरपर्सन या सदस्य नियुक्त नहीं किया गया है। नतीजतन, हजारों महिलाओं की शिकायतें लंबित हैं और न्याय मिलने की प्रक्रिया लगभग ठप हो गई है।
महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा के लिए बनी यह संवैधानिक संस्था फिलहाल बिना नेतृत्व के काम कर रही है। मार्च 2023 से आयोग में सभी पद पूरी तरह खाली हैं। इस दौरान राज्य भर से बड़ी संख्या में शिकायतें आयोग तक पहुंची हैं, लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हो सकी है।
सरकारें बदलीं, लेकिन नियुक्तियां नहीं हुईं
द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में तत्कालीन कमलनाथ सरकार के आखिरी दौर में राज्य महिला आयोग में नियुक्तियां की गई थीं। उस समय शोभा ओझा को चेयरपर्सन बनाया गया था और पांच सदस्यों की नियुक्ति की गई थी। इसके बाद राज्य में सत्ता परिवर्तन हुआ और शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा सरकार आई। शिवराज सरकार का पूरा कार्यकाल बीत गया और अब डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली नई सरकार को भी दो साल से अधिक हो चुके हैं, लेकिन महिला आयोग में अभी तक नई नियुक्तियां नहीं हुई हैं।
सरकार लगातार महिला सशक्तिकरण के लिए कई योजनाएं चलाने का दावा करती है, लेकिन जिस संस्था का उद्देश्य महिलाओं की शिकायतें सुनना और उन्हें न्याय दिलाना है, वही लंबे समय से निष्क्रिय पड़ी है।
हर महीने सैकड़ों शिकायतें आती हैं
राज्य महिला आयोग से जुड़े एक कर्मचारी ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि आयोग को हर महीने लगभग 300 शिकायतें मिलती हैं।
इनमें से कुछ शिकायतें आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आतीं और उन्हें खारिज कर दिया जाता है। बाकी शिकायतों के लिए संबंधित विभागों से जांच रिपोर्ट मंगाई जाती है और फाइलें तैयार की जाती हैं। हालांकि कई मामलों में आगे की कार्रवाई के लिए आयोग की बेंच के सामने सुनवाई जरूरी होती है, लेकिन चेयरपर्सन और सदस्यों की गैरमौजूदगी के कारण इन मामलों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाती।
कमीशन के पद खाली, मामले बढ़ रहे
राज्य के अन्य आयोगों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही बताई जा रही है। जानकारी के अनुसार अनुसूचित जाति आयोग और अनुसूचित जनजाति आयोग में भी बड़ी संख्या में शिकायतें लंबित हैं।
चेयरपर्सन और सदस्यों की नियुक्ति न होने के कारण इन आयोगों में फिलहाल केवल सरकारी अधिकारी और कर्मचारी ही काम कर रहे हैं, जो शिकायतें दर्ज करने और उन्हें संबंधित विभागों को भेजने तक सीमित हैं। इस स्थिति में आयोगों का मुख्य उद्देश्य—शिकायतें सुनना और निष्पक्ष न्याय देना—लगभग पूरी तरह से प्रभावित हो गया है।
पूर्व सदस्य ने जताई चिंता
द मूकनायक से बातचीत में राज्य महिला आयोग की पूर्व सदस्य संगीता शर्मा ने बताया कि जब 2019 में उनकी नियुक्ति हुई थी, तब पहले से ही लगभग 10,000 शिकायतें लंबित थीं। उन्होंने कहा कि कमलनाथ सरकार गिरने और उसके बाद शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में सत्ता परिवर्तन के बाद कैबिनेट ने आयोग से जुड़े नियुक्तियों को निष्क्रिय कर दिया। इससे नियुक्त सदस्यों की स्थिति को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई और कई लोग अपने अधिकारों के लिए हाई कोर्ट पहुंच गए।
इस बीच कोविड-19 महामारी और कानूनी जटिलताओं के कारण आयोग का कार्यकाल तीन साल बाद समाप्त हो गया, जिससे लंबित मामलों के समाधान पर और असर पड़ा।
संगीता शर्मा ने आगे बताया कि मार्च 2023 से राज्य महिला आयोग में चेयरपर्सन और सदस्यों के सभी पद खाली हैं, जबकि महिलाओं से जुड़ी शिकायतें लगातार आ रही हैं। उन्होंने कहा कि रोजाना कई तरह की शिकायतें आती हैं, लेकिन नियुक्तियां न होने के कारण सुनवाई संभव नहीं हो पाती। उन्होंने यह भी कहा कि महिला एवं बाल विकास विभाग भी आयोग की स्थिति को लेकर गंभीर नहीं दिख रहा है, जिससे महिलाओं को आयोग के माध्यम से न्याय मिलना मुश्किल हो गया है।
ऐसे में आयोग में जल्द नियुक्तियां करना बेहद जरूरी है, ताकि लंबित मामलों का समाधान हो सके और पीड़ित महिलाओं को समय पर न्याय मिल सके।
आयोग के पास सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां
कानून के तहत राज्य महिला आयोग के पास सिविल कोर्ट के समान शक्तियां होती हैं। जब किसी महिला को प्रशासन या अन्य एजेंसियों से न्याय नहीं मिलता, तो वह आयोग में शिकायत कर सकती है।
आयोग संबंधित विभाग से जांच रिपोर्ट मंगाता है और यदि शिकायतकर्ता जांच से संतुष्ट नहीं होती, तो आयोग की बेंच के सामने सुनवाई होती है। सुनवाई के दौरान आयोग संबंधित अधिकारियों को तलब कर सकता है और जांच के बाद सरकार को सिफारिशें भेज सकता है।
लेकिन फिलहाल चेयरपर्सन और सदस्यों की अनुपस्थिति के कारण ऐसी सुनवाई और कार्रवाई संभव नहीं हो पा रही है।
महिला दिवस पर उठता बड़ा सवाल
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर, जब महिलाओं के अधिकारों और न्याय की बात हो रही है, तब मध्य प्रदेश का महिला आयोग चार वर्षों से निष्क्रिय होना कई सवाल खड़े करता है।
महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि आयोग में जल्द नियुक्तियां की जानी चाहिए, ताकि महिलाओं से जुड़े मामलों की सुनवाई हो सके और पीड़ितों को समय पर न्याय मिल सके।
महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के राज्य सरकार के दावों के बीच यह सवाल भी उठता है कि जब शिकायतों की सुनवाई के लिए जिम्मेदार संस्था ही खाली पड़ी है, तो महिलाओं को न्याय दिलाने की प्रक्रिया वास्तव में कितनी प्रभावी हो सकती है?
NCRB के आंकड़े चिंताजनक स्थिति दिखाते हैं
मध्य प्रदेश लंबे समय से महिलाओं के खिलाफ अपराधों, खासकर बलात्कार के मामलों को लेकर चर्चा में रहा है। वर्ष 2023 में भी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं दिखा। NCRB की रिपोर्ट के अनुसार, बलात्कार के मामलों में राज्य देश में तीसरे स्थान पर रहा, जहां एक वर्ष में 2,979 मामले दर्ज किए गए। इस सूची में राजस्थान 5,078 घटनाओं के साथ पहले स्थान पर रहा, जबकि उत्तर प्रदेश में 3,516 मामले दर्ज किए गए।
ये आंकड़े साफ दिखाते हैं कि राज्य में महिलाओं की सुरक्षा अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। हालांकि सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई योजनाएं और हेल्पलाइन नंबर शुरू किए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका प्रभाव सीमित दिखाई देता है।
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