गणतंत्र दिवस पर संजय गांधी नेशनल पार्क में आदिवासी घरों को तोड़ा गया

Written by sabrang india | Published on: January 29, 2026
संजय गांधी नेशनल पार्क में 2006 के वन अधिकार अधिनियम के तहत ज़मीन के रिकॉर्ड की आवश्यक जाँच किए बिना आदिवासी घरों (पाड़ा) को गिराए जाने से गणतंत्र दिवस के दिन लोगों में भारी गुस्सा फैल गया। हालाँकि अधिकारी दावा कर रहे हैं कि यह कार्रवाई हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार की गई है, वहीं प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उचित प्रक्रिया का कोई पालन नहीं किया गया। न तो कोई नोटिस दिया गया, न ही बच्चों को स्कूल जाने दिया जा रहा है, और बिजली व परिवहन सेवाएँ भी बंद कर दी गई हैं।



बोरीवली स्थित संजय गांधी नेशनल पार्क में बिना किसी नोटिस या उचित प्रक्रिया के आदिवासी घरों (पाड़ा) को गिराए जाने से लोगों में आक्रोश है और वे विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस के साथ झड़प की घटनाएँ भी सामने आई हैं।



इस बीच, एक्टिविस्ट अनीश गावंडे ने महाराष्ट्र के वन मंत्री गणेश नाइक को एक खुले पत्र के माध्यम से तोड़फोड़ तुरंत रोकने और आदिवासी समुदाय की जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की है। यह पत्र सोमवार, 26 जनवरी को शाम 6 बजे सार्वजनिक किया गया। (NCPSP/NS/AG/27012026/001 | दिनांक: 27 जनवरी, 2026)

विश्वसनीय रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए गावंडे लिखते हैं कि, “इस वर्ष 19 जनवरी से कई आदिवासी बस्तियों को बिना पूर्ण सर्वे, सत्यापित निवासियों की सूची और वन अधिकार अधिनियम (FRA) की प्रक्रिया के कानूनी निष्कर्ष के बिना तोड़ा जा रहा है। यह बेदखली वन अधिकार अधिनियम, 2006 की धारा 4(1) और 4(5) का सीधा उल्लंघन है, जो स्पष्ट रूप से तब तक बेदखली पर रोक लगाती है जब तक ग्राम सभाओं के माध्यम से सभी व्यक्तिगत और सामुदायिक दावों का सत्यापन नहीं हो जाता। बेदखली के नोटिस देर रात चिपकाए गए हैं, जिनमें गलत नाम हैं और बिना किसी फील्ड वेरिफिकेशन के जारी किए गए हैं, जिससे प्रभावित लोगों को कानूनी उपाय तलाशने का उचित अवसर नहीं मिल पा रहा है।”

गावंडे आगे कहते हैं, “उतनी ही गंभीर चिंता आवश्यक सेवाओं को बंद किया जाना है। बिजली काट दी गई है, BEST बस सेवाएँ रोक दी गई हैं और सामुदायिक सुविधाएँ बंद कर दी गई हैं, जिससे बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। यह दावा कि कार्रवाई केवल तथाकथित ‘पुनः अतिक्रमण करने वालों’ तक सीमित है, पुनर्वास की संरचनात्मक विफलता को नज़रअंदाज़ करता है। जिन आदिवासी परिवारों की आजीविका भूमि, पशुधन और वन पारिस्थितिकी पर निर्भर है, उनके लिए छोटे SRA फ्लैटों में स्थानांतरण न तो व्यवहारिक है और न ही यह वैध पुनर्वास माना जा सकता। इस सच्चाई को प्रशासनिक शब्दावली के पीछे छिपाया नहीं जा सकता। संरक्षण कानूनों को दरकिनार कर कार्रवाई नहीं की जा सकती, खासकर तब जब उसी वन क्षेत्र में बड़ी बुनियादी ढाँचा परियोजनाएँ जारी हैं।”

उन्होंने सभी प्रकार की तोड़फोड़ गतिविधियों को तुरंत रोकने, आवश्यक सेवाओं को बहाल करने और यह सुनिश्चित करने की माँग की है कि जब तक ग्राम सभा प्रक्रिया के माध्यम से सभी FRA दावों का कानूनी रूप से निपटारा नहीं हो जाता, तब तक किसी भी प्रकार की बेदखली न की जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि समय पर हस्तक्षेप न होने की स्थिति में प्रभावित समुदाय और उनके समर्थक लोकतांत्रिक विरोध को तेज करने और सभी उपलब्ध कानूनी व संवैधानिक उपाय अपनाने को बाध्य होंगे। यह पत्र यहाँ देखा जा सकता है।



आख़िरकार दबाव का असर हुआ और तोड़फोड़ की कार्रवाई रोक दी गई।

27 जनवरी को शाम 6:30 बजे, IANS ने रिपोर्ट किया कि मंत्री गणेश नाइक ने कहा, “नेशनल पार्क एक संवेदनशील क्षेत्र है। माननीय हाई कोर्ट ने उन्हें पार्क खाली करने का आदेश दिया है। लेकिन लोगों को बिना सूचना दिए हटाना उचित नहीं है। हमने कई लोगों को घर उपलब्ध कराए हैं, फिर भी वे स्थान खाली नहीं कर रहे हैं। इसलिए यह जाँचने के लिए कि दावे सही हैं या नहीं, एक बैठक बुलाई गई है। बैठक के बाद मैं आपको विस्तृत जानकारी दूँगा।”



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