इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उस मुस्लिम व्यक्ति को 24 घंटे सुरक्षा देने का आदेश दिया है, जिसे कथित तौर पर घर पर नमाज पढ़ने से रोका गया था

Written by sabrang india | Published on: March 14, 2026
बरेली के जिला मजिस्ट्रेट और एसएसपी को तलब करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता या उसकी संपत्ति के खिलाफ किसी भी तरह की हिंसा को राज्य के इशारे पर हुई हिंसा माना जाएगा, क्योंकि यह मामला निजी संपत्ति के भीतर होने वाली धार्मिक प्रार्थनाओं में दखलअंदाज़ी को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा करता है।



इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बरेली के एक मुस्लिम व्यक्ति को चौबीसों घंटे हथियारबंद सुरक्षा देने का आदेश दिया है। इस व्यक्ति ने आरोप लगाया था कि उसे अपने ही निजी घर के अंदर नमाज पढ़ने से रोका गया था। यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता, राज्य के अधिकार और पुलिस के रवैये को लेकर कई अहम संवैधानिक सवाल खड़े करता है।

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की डिवीज़न बेंच ने निर्देश दिया कि हसीन खान (जिस घर में नमाज पढ़ी जा रही थी और जो उसके मालिक हैं) की सुरक्षा के लिए दिन-रात 24 घंटे दो हथियारबंद गार्ड तैनात किए जाएं। कोर्ट ने आगे कड़ी चेतावनी दी कि अगर खान या उनकी संपत्ति को किसी भी तरह की हिंसा से नुकसान पहुंचता है, तो इसे राज्य के इशारे पर हुआ माना जाएगा, जब तक कि इसके विपरीत साबित न हो जाए।

यह आदेश बरेली के निवासी तारिक खान की याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। तारिक खान ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि मोहम्मदगंज गांव में एक निजी घर में हो रही नमाज में पुलिस ने दखल दिया। अब इस मामले में अंतिम आदेश 23 मार्च को सुनाया जाएगा और कोर्ट ने बरेली के जिलाधिकारी (DM) और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया है।

निजी नमाज में पुलिस के दखल के आरोप

LiveLaw की रिपोर्ट के अनुसार, याचिका में कहा गया है कि मुस्लिम व्यक्तियों का एक समूह, संपत्ति के मालिक हसीन खान की अनुमति से, एक निजी घर की छत पर नमाज पढ़ रहा था। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि 16 जनवरी को पुलिसकर्मियों ने कथित तौर पर दखल दिया और नमाज रुकवा दी, जबकि नमाज निजी परिसर के अंदर ही पढ़ी जा रही थी।

खान ने कोर्ट के समक्ष आगे आरोप लगाया कि जब वह नमाज पढ़ रहे थे, तभी पुलिस अधिकारी उन्हें उनके घर से उठाकर ले गए। वहां उनसे पूछताछ की गई और उन्हें बिना यह बताए कि उन कागजों में क्या लिखा है, खाली कागजों पर अंगूठे का निशान लगाने के लिए मजबूर किया गया। उन्होंने कोर्ट को यह भी बताया कि कुछ लोगों ने उन्हें धमकी दी थी कि अगर उन्होंने एक खास तरीके से गवाही नहीं दी, तो उनकी संपत्ति गिरा दी जाएगी।

इन आरोपों के बाद राज्य के अधिकारियों के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की गई। याचिका में तर्क दिया गया कि प्रशासन की ये कार्रवाइयां हाई कोर्ट के पहले के एक फैसले का उल्लंघन हैं, जिसमें यह माना गया था कि निजी संपत्ति पर बिना राज्य की अनुमति के भी नमाज या प्रार्थना सभाएं आयोजित करने का अधिकार है।

कोर्ट की अहम टिप्पणियां

LiveLaw के अनुसार, सुनवाई के दौरान बेंच ने राज्य सरकार से सीधे तौर पर पूछा कि क्या किसी निजी घर के अंदर नमाज पढ़ने के लिए अनुमति लेना जरूरी है? राज्य की ओर से पेश हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने पुलिस चालान का हवाला दिया और स्वीकार किया कि घर में मौजूद लोगों से, जिनमें मालिक भी शामिल थे, वास्तव में अनुमति मांगी गई थी।

हालात और खुली अदालत में हसीन खान के दर्ज बयान को ध्यान में रखते हुए बेंच ने सुरक्षा के कड़े निर्देश जारी किए।

अदालत ने आदेश दिया: “यह अदालत निर्देश देती है कि दो हथियारबंद गार्ड 24/7 हसीन खान की सुरक्षा करेंगे, जब तक कि यह अदालत कोई और फैसला न दे दे। ये गार्ड हसीन खान के साथ हर जगह जाएंगे। हसीन खान या उनकी संपत्ति पर होने वाली किसी भी हिंसक घटना को पहली नजर में राज्य की शह पर हुआ माना जाएगा, हालांकि राज्य के पास इसे गलत साबित करने का अवसर होगा।”

अदालत ने आगे कहा कि खान या उनकी संपत्ति के खिलाफ की गई किसी भी हिंसक कार्रवाई को पहली नजर में राज्य की शह पर हुआ माना जाएगा, हालांकि राज्य के पास इस धारणा को गलत साबित करने का मौका होगा।

बरेली के अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश

कोर्ट ने बरेली के जिलाधिकारी अविनाश सिंह और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अनुराग आर्य को अगली सुनवाई की तारीख पर उसके सामने पेश होने के लिए समन भेजा है।

अपने आदेश में बेंच ने चेतावनी दी कि पेश न होने पर सख़्त कदम उठाए जा सकते हैं, जिसमें गैर-जमानती वारंट के जरिए उनकी मौजूदगी सुनिश्चित करना भी शामिल है।

पूरा आदेश यहां पढ़ा जा सकता है।



पृष्ठभूमि: निजी प्रार्थना पर हाईकोर्ट का पिछला फैसला

यह विवाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक पिछले फैसले की पृष्ठभूमि में सामने आया है। यह फैसला एक अलग मामले में आया था, जिसमें मारानाथा फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज़ और इमैनुएल ग्रेस चैरिटेबल ट्रस्ट शामिल थे।

जनवरी में दिए गए उस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि निजी परिसर के अंदर धार्मिक प्रार्थना करने के लिए राज्य से किसी अनुमति की जरूरत नहीं है, क्योंकि ऐसी गतिविधि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के दायरे में आती है।

हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि अगर धार्मिक गतिविधियां सार्वजनिक सड़कों या सार्वजनिक संपत्ति तक फैलती हैं, तो सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए अधिकारियों को लागू कानून के तहत सूचना या अनुमति की जरूरत हो सकती है।

गांव में जमीनी हकीकत

हाईकोर्ट के दखल के बावजूद रिपोर्टों से पता चलता है कि जमीनी स्तर पर स्थिति अभी भी तनावपूर्ण बनी हुई है।

‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, मोहम्मदगंज गांव के लोगों का कहना है कि कोर्ट द्वारा अवमानना नोटिस जारी किए जाने के बाद भी निजी घरों के अंदर नमाज फिर से शुरू नहीं हुई है।

बताया जाता है कि कई ग्रामीण नमाज अदा करने के लिए लगभग दो किलोमीटर पैदल चलकर दूसरी जगहों पर जाते हैं, खासकर रमजान के महीने में।

स्थानीय लोगों ने अखबार को बताया कि कोर्ट के आदेश के बाद पुलिस की परेशानियां तो कम हो गई हैं, लेकिन इलाके में पुलिसकर्मियों की मौजूदगी अभी भी बनी हुई है और नए सिरे से तनाव पैदा होने के डर से घरों के अंदर होने वाली प्रार्थनाएं अभी भी बंद हैं।

कुछ स्थानीय लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि जिन लोगों को पहले प्रार्थना करने के लिए हिरासत में लिया गया था, उन्हें कई दिनों तक रोजाना पुलिस थाने में हाजिरी देने के लिए कहा गया था और अब उनके नाम पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज हैं।

विवाद की शुरुआत

बताया जाता है कि इस विवाद की शुरुआत दिसंबर 2025 में हुई थी, जब तारिक खान के मालिकाना हक वाली जमीन पर निर्माण सामग्री लाई गई थी। ग्रामीणों को शक हुआ कि जो ढांचा बनाया जा रहा है, उसका इस्तेमाल मस्जिद के तौर पर किया जाएगा, जिससे विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए और पुलिस को दखल देना पड़ा।

बाद में तारिक खान ने एक हलफनामा दायर कर कहा कि इस निर्माण का इस्तेमाल धार्मिक उद्देश्यों के लिए नहीं किया जाएगा, लेकिन तनाव फिर भी बना रहा। इसके बाद मुसलमानों के एक समूह ने हसीन खान के एक निजी घर के अंदर नमाज पढ़ना शुरू कर दिया, जिसके चलते पुलिस ने कार्रवाई की और अब यही कार्रवाई कानूनी विवाद का विषय बन गई है।

संवैधानिक निहितार्थ
यह मामला संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे के बारे में व्यापक सवाल उठाता है, खासकर निजी धार्मिक गतिविधि और सार्वजनिक धार्मिक सभा के बीच के अंतर को लेकर।

घर के मालिक को सशस्त्र सुरक्षा देने का आदेश देकर और यह चेतावनी देकर कि किसी भी हिंसा को राज्य द्वारा उकसाई गई हिंसा माना जा सकता है, हाई कोर्ट के अंतरिम निर्देश इस बात को रेखांकित करते हैं कि वह संवैधानिक रूप से संरक्षित धार्मिक प्रथा में राज्य के हस्तक्षेप के आरोपों को कितनी गंभीरता से ले रहा है।

इस मामले पर 23 मार्च को फिर से सुनवाई होगी, जब कोर्ट से बरेली जिला प्रशासन की व्यक्तिगत दलीलें सुनने और इस मामले में अंतिम आदेशों पर विचार करने की उम्मीद है।

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