वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ ने उत्तर प्रदेश में लॉकडाउन में लोकतंत्र विषय पर वेब गोष्ठी आयोजित की। इस दौरान अब्दुल्लाह अंसारी, फादर आनंद,सदफ़ जफ़र, डॉ मुनीज़ा खान,मऊ नगर पालिका के दो पूर्व अध्यक्ष तथा सजप के महासचिव अफ़लातून अफलू आदि ने यूपी में चल रही तानाशाही के उदाहरण दिए।

इस दौरान सामाजिक कार्यकर्ता सदफ जफर ने कहा कि यूपी सरकार ने जिस तरह से असहमति जताने वालों को दंगाई का तमगा दिया है वह शर्मनाक है। उन्होंने कहा कि यूपी सरकार सीएए का विरोध जताने वालों पर लॉकडाउन की आड़ में बेजा कार्रवाई कर रही है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से एंटी सीएए प्रोटेस्टर्स को सरकार द्वारा निशाना बनाया गया यह अभूतपूर्व है। ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी प्रदर्शनकारी की पहचान और एड्रस फोटो सहित चौराहों पर लगा दिया जाए। उन्होंने कहा कि लखनऊ में ही एक रिक्शाचालक को जेल भेज दिया गया व उसपर लाखों रुपये की वसूली करने की बात कही जा रही है जबकि उसके लॉकडाउन के चलते पहले से ही खाने के लाले हैं।
बता दें कि 19 दिसंबर को जिस समय लखनऊ में CAA के खिलाफ प्रदर्शन ने उग्र रूप लिया, सदफ जफर फेसबुक लाइव कर रही थीं। तब जो लाइव सदफ ने फेसबुक के लिए किया अगर उसपर नजर डाली जाए तो मिलता है कि वो लखनऊ पुलिस के साथ साथ चल रही थीं। लाइव के दौरान ऐसे तमाम मौके आए थे जब उन्होंने खुद पुलिस से अनुरोध किया था कि बजाए मूकदर्शक बनने के वो दंगाइयों को हिरासत में लें और स्थिति को नियंत्रित करें। इसके बावजूद उनपर कार्रवाई की गई।
इस दौरान मानवाधिकार कार्यकर्ता रोमा जी ने कहा कि जेल में बंद महिलाओं की स्थिति इतनी खराब है कि आप अपना केस भूल जाते हैं। उन्होंने कहा कि मैं तो खासतौर पर जंगल के इलाकों में काम करती हूं, वहां की स्थिति और है। उन्होंने कहा कि वन विभाग और पुलिस विभाग लॉकडाउन का फायदा उठाकर लोगों की जमीन हथियाने में लगे हैं। उन्होंने कहा कि पहली बार वन विभाग पर एफआईआर हुई। उत्तराखंड के वन गुज्जरों पर जिस तरह से हमला हुआ वहां लोग आंदोलन कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि वनाश्रित लॉकडाउन में दूसरे लोगों को भी खिलाने का काम कर रहे हैं। ये सरकार किसी भी कीमत पर रोजगार सृजन नहीं करेगी क्योंकि यह कॉरपोरेट्स की गुलाम है। वनाधिकार कानून से हमें बड़ी ताकत मिली है वरना पहले हमें माओवादी करार दे दिया जाता था जिस तरह से सदफ जफर को दंगाई करार दे दिया गया है वही हाल पहले हमारा था। लोगों को सोचना पड़ेगा की गांव में रोजगार सृजन कैसे हो, यह सरकार तो रोजगार नहीं देने वाली। इसके लिए हमें शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर सचेत होना पड़ेगा और शहरों पर निर्भरता कम करनी पड़ेगी। जो माइग्रेंट वर्कर्स हैं, दलित हैं. उनके लिए भूमि का मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण है। उन्हें जमीन मिले।
रोमा जी ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा कि अभी तक सारी जमीनें सामंतों के पास हैं, आजादी के सत्तर साल बाद भी भूमि सुधार की जरूरत है। महिलाओं ने सामुहिक खेती के जरिए बहुत बड़ा काम किया है। उन्होंने खाद्य सुरक्षा की दिशा में बड़ा काम किया है। उन्होंने कहा कि हमें मायावती की सरकार में जेल जाना पड़ा, मुलायम सिंह की सरकार में भी व वर्तमान की भाजपा सरकार में भी जेल जाना पड़ा। खासतौर पर सीजेपी व तीस्ता जी के साथ मिलकर हम काम करना चाहते हैं।
इस दौरान संदीप पांडेय ने कहा कि मोहम्मद शोएब, एसआर दारापुरी आदि के खिलाफ खिलाफ कार्रवाई हो रही है। ये बड़ी अजीब सी बात है कि सरकार लोगों से अपेक्षा करती है कि वो अपने काम बंद रखें और कार्यालयों में कम जाएं। लेकिन पुलिस विभाग पूरी तरह से सक्रिय है और अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों को के खिलाफ सक्रिय है। अभी कानपुर में कहर ढहाया गया।
उन्होंने कहा कि 2011 में नीतीश कुमार को जब भ्रष्ट अधिकारी के घर को जब जब्त करना था तो उन्होंने महादलित बच्चों के लिए एक स्कूल खोला। हमारे योगी साहब ने विकास दुबे का घर गिरवा दिया और उसका एनकाउंटर भी हो गया। पांच हजार जो एनकाउंटर हुए थे तब योगी सरकार ने कहा था कि सभी अपराधी मारे गए हैं या वो अपनी जमानत रद्द करवाकर जेल चले गए हैं। ये भी एक तरीका है कि अपराधी बचने के लिए जेल में रहते हैं। इसके बावजूद एक खूंखार अपराधी योगी सरकार से कैसे छूट गया, यह बात समझ में नहीं आती है। जिस तरह से वह कार्रवाई हुई तो सवाल खड़े हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश को अब एनकाउंटर राज्य की संज्ञा दी जा सकती है क्योंकि यहां कानून का राज नहीं है। ये स्थिति तो हमारे मानवाधिकार उल्लंघन और नागरिक अधिकार उल्लंघन को लेकर है।
दूसरी तरफ जो मजदूर घर वापस लौट रहा था, उसके साथ भी किस तरह का बर्ताव हुआ, उस पर गौर किया जाना चाहिए। कांग्रेस पार्टी ने इनसे कहा कि हम आपको हजार बसें देते हैं, ताकि आप मजदूरों को लेकर आ पाएं क्योंकि बसें चल नहीं रहीं थीं। इन्होंने कांग्रेस पार्टी से हजार बसों की सूची मांगी। अब उसमें कुछ जो पंजीकरण संख्या वाहनों की थी बसों की नहीं थी दूसरे वाहनों की थी तो कांग्रेस के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू पर ये आरोप लगा कि उन्होंने फर्जी जानकारी दी है। उनको जेल भेज दिया गया। उसके बाद योगी साहब कहते हैं कि हमारे पास नब्बे हजार बसों का बेड़ा है, हम चाहें तो पूरे देश के मजदूरों को अपने प्रदेश में ला सकते हैं। आपके पास बसें थीं तो आपने कांग्रेस हजार बसों की सूची क्यों मांगी।
कोरोना के संकट के दौर में भी जिस तरह की राजनीति हो रही है, बजाए इसके कि आप लोगों का ठीक से इलाज करवाएं, लोगों को ठीक से भोजन उपलब्ध करवाएं, उनके आने जाने की व्यवस्था करें, कांग्रेस पार्टी के खिलाफ राजनीति इनकी प्राथमिकता थी, न कि लोगों की देखभाल करना। सबने देखा कि ज्यादातर मजदूर उत्तर प्रदेश और बिहार के ही थे जो लौटकर आ रहे थे। हमने देखा कि वह कैसे सड़कों पर चल रहे थे। जिसको साधन मिल रहा था वो उससे आ रहा था लेकिन उनको यातायात के साधन मुहैया नहीं करवाए गए। ये सारे दृश्य सभी ने देखे हैं।
साझा संस्कृति मंच के संयोजक फादर आनंद मैथ्यू ने कहा कि राज्य में सभी मानवाधिकारों को दरकिनार किया जा रहा है क्योंकि सरकार ने असंतुष्टों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। फादर आनंद ने धर्मनिरपेक्षता की भावना को सलाम करते हुए कहा, 19 दिसंबर को हमने शांतिपूर्ण विरोध किया और अभी तक हममें से साठ लोगों को गिरफ्तार किया गया।
फादर आनंदर मैथ्यू ने आगे बताया कि लॉकडाउन से कुछ दिन पहले तक हम अपने दो सदस्य अनुप श्रमिक और जागृति राही की रिहाई के लिए लड़ते रहे। यहां तक कि जागृति का विरोध प्रदर्शनों में कोई भूमिका नहीं थी और वह वहां मौजूद भी नहीं थीं। उसे 'मास्टरमाइंड की तरह पेश किया गया और सलाखों के पीछे भेज दिया गया।
'अब भी पुलिस उनके घरों में जा रही है और उनके खिलाफ चार्जशीट जारी कर रही है। हम कह सकते हैं कि सीएए, एनआरसी के विरोध को दबाने के लिए लॉकडाउन की आड़ ली गई, हालांकि लॉकडाउन एक आवश्यकता थी लेकिन मानवाधिकारों का उल्लंघन अब भी जारी है।'
लॉकडाउन के दौरान सरकार की ओर से जारी की एडवाइजरी में लोगों से घरों में सुरक्षित रहने के लिए कहा गया और उन्हें सलाह दी गई कि घरेलू मदद, सफाईकर्मी, अखबार विक्रेताओं को घरों या परिसर में अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। केवल अमीर और मध्यम वर्ग को ही देश के नागरिकों के रूप में देखा जा रहा था और अप्रत्यक्ष रूप से निचले तबके पर वायरस ले जाने का आरोप लगाया जा रहा था।
समाजवादी जन परिषद के महासचिव अफलातून ने कहा कि महामारी रोग अधिनियम और सीआरपीसी की मदद से वर्तमान स्थिति आपातकाल से भी बदतर है। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन के दौरान सरकार लोगों की रक्षा करने वाले सभी कानूनों को खत्म करने और बदलने की कोशिश कर रही थी।
सरकार की नीतियों से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले किसानों और बुनकरों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा, 'भारत सरकार ने कहा है कि लॉकडाउन के दौरान 80 लाख प्रवासी अपने गांवों में लौट आए हैं। जैसे सरकार ने निजी कंपनियों को वन भूमि दी है और कॉरपोरेट्स के लिए कोयला खनन खोला है, वह अब कृषि का निजीकरण करने जा रही है। सरकार ने हाल ही में घोषणा की कि भारत के किसान देश में कहीं भी अपनी फसल बेच सकते हैं। हालाँकि, यह बहुत खतरनाक है क्योंकि इसका मतलब केवल यह है कि किसान फसल को बेच नहीं पाएगा, लेकिन देश-विदेश के कॉरपोरेट्स आएंगे और उन कीमतों पर फसल खरीदेंगे, जो उनके लिए उपयुक्त हैं। मंडियों को भी दूर किया गया लगता है। सरकार अमेरिका की तरह ही कॉन्ट्रैक्ट और कॉरपोरेट फार्मिंग को बढ़ावा देगी जहां निजी कंपनियों की जमीन है। इसके अलावा बुनकरों की दुर्दशा दुर्भाग्यपूर्ण है।'
उन्होंने आगे कहा, 'उत्तर प्रदेश ने नाममात्र के वेतन के साथ लंबे समय तक काम कराने के लिए कॉल के दौरान श्रम कानूनों के साथ छेड़छाड़ किया। अफ़लातून ने कहा कि 2015 में छोटे व्यवसाय के मालिकों का आरक्षण हटा दिया गया था और लॉकडाउन के दौरान हथकरघा उद्योग को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा, 'लॉकडाउन के दौरान सबक सीखने और स्वास्थ्य सेवा पर पैसा खर्च करने के बजाय, उन्होंने निजी अस्पतालों को नि: शुल्क उपचार प्रदान करने के बजाय अत्यधिक मात्रा में पैसे चार्ज करने की अनुमति दी है।'
पीपुल्स विजिलेंस कमेटी फॉर ह्यूमन राइट्स (PVHCR) के डॉ. लेनिन रघुवंशी ने भी इस बारे में बात की कि किस तरह से योगी सरकार ने लॉकडाउन के दौरान लोगों को लंबे समय तक काम करने के लिए कहकर श्रम कानूनों को रद्द कर दिया और लोगों को बंधुआ मजदूरी में धकेल दिया।
रघुवंशी ने कहा, 'जब कॉरपोरेट फासीवाद है, तो प्रशासन कभी भी अच्छा काम नहीं करेगा। यूपी एक कॉर्पोरेट फासीवादी राज्य है। यह कहीं न कहीं हमारी गलती भी है कि हमने अपनी एकजुटता को अलग-अलग आंदोलन की पेशकश नहीं की, जो हमें अब करना चाहिए। वर्तमान सरकार बहुत षड्यंत्रकारी है।
रघुवंशी ने कहा, 'उनके खिलाफ वोट करें और एक धर्म निरपेक्ष लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना करें। वर्तमान में गुजरात मॉडल की तर्ज पर यूपी मॉडल है। हमें सभी मोर्चों पर संविधान के प्रवर्तन को आधार बनाकर लड़ना होगा। यदि नहीं तो क्या लोकतंत्र बचेगा? हमें सामाजिक परिवर्तन को बढ़ावा देने वाले मानवीय कार्य करने चाहिए।'
उत्तर प्रदेश में बुनकरों के बीच काम करने वाले अब्दुल्ला अंसारी ने भी कहा कि बहुत पहले बुनकरों को दरकिनार करना शुरू कर दिया गया था जब कॉरपोरेट्स को छूट दी गई थी लेकिन छोटे बुनकर नहीं थे। इसके चलते उन्हें गरीबी में धकेल दिया गया। अंसारी ने कहा कि बुनकरों का शोषण बिजली के लिए व्यावसायिक दरों से किया जाता है, जो बिजली की दरों से दोगुना है।
अंसारी ने कहा, 'भले ही हमने बुनकरों की दुर्दशा पर प्रकाश डाला है, लेकिन उनको सरकार से कोई राहत नहीं मिली है। यूपी में बिजली की उच्चतम दर 7.35 रुपये प्रति यूनिट है जबकि अन्य राज्यों में यह लगभग 2 या 3 रूपये है। सवाल यह है कि सरकार बुनकरों से क्या चाहती है। बुनाई 25 मार्च से बंद है और अब बुनकरों को अपनी प्रतिभा को पीछे छोड़ते हुए अन्य क्षेत्रों में नौकरियों की तलाश करना पड़ रहा है। न ही राज्य और न ही केंद्र सरकार ने बुनकरों के लिए कोई व्यवस्था की।
उन्होंने आगे कहा, 'यदि ऐसा ही चलता है, तो यह विरासत उद्योग नष्ट हो जाएगा। उदाहरण के लिए बनारसी साड़ी को विलासिता के सामान का टैग दिया गया है, जिसके कारण सरकार बुनकरों को किसी भी तरह की छूट देने के लिए तैयार नहीं है। एक बनारसी साड़ी जब बिचौलियों तक पहुंचती है तो यह लक्जरी बन जाती है और फिर इसे अत्यधिक कीमतों पर बेचा जाता है। सरकार यह नहीं देखती है कि इससे कितना बुनकर निकलता है। आज भी एक बुनकर मुश्किल से 300 रूपये प्रतिदिन कमाता है। यह एक बुनकर की प्रतिभा की कीमत है। अब कॉरपोरेट इस विरासत उद्योग को संभालना चाहते हैं और बुनकरों को गुलामी और बंधुआ मजदूरी में धकेलना चाहते हैं।'
मऊ नगरपालिका के पूर्व अध्यक्ष अरशद जमाल ने क्षेत्र में अल्पसंख्यकों के बारे में बोलते हुए कहा कि मऊ की आबादी लगभग 22 लाख है, जिसमें से 5 लाख से अधिक मुस्लिम हैं और क्षेत्र में कम से कम 4 लाख बुनकर हैं।
उन्होंने कहा, '2019 में यूपी सरकार ने पहली बार बुनकरों को प्रदान की गई फ्लैट दर को बंद कर दिया। अब करों में 7.35 रूपये प्रति यूनिट जोड़ा गया है, कीमत 11 रूपये प्रति यूनिट तक जाती है। बुनकरों को अब अत्यधिक बिलों का भुगतान करना होगा और यही नहीं यदि वे इसे वहन नहीं कर पाते हैं, तो उनके कनेक्शन बंद किए जा रहे हैं।
उन्होंने आगे कहा जब सीएए, एनआरसी विरोधी प्रदर्शन जारी थे, यहां मऊ के युवा भी विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए। हालांकि विरोध शांतिपूर्ण था, लेकिन पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया। परिणामस्वरूप 252 लोगों को बुक किया गया था। प्रत्येक पर कम से कम 24 धाराओं के साथ 6 एफआईआर दर्ज की गईं। मुझे पता चला कि मैं भी उनमें से एक आरोपी था।
'मेरे द्वारा पोस्ट किए गए एक साधारण संदेश के लिए मुझ पर सांप्रदायिकता फैलाने का आरोप लगाकर मेरे खिलाफ एक और एफआईआर दर्ज की गई थी। मैने एक संदेश पोस्ट किया था जिसमें लिखा था कि जब समाचार मीडिया सांप्रदायिकता फैला सकता है तो लोकतंत्र में मुस्लिम समुदाय अपने अधिकारों के लिए क्यों नहीं लड़ सकता है?'
उन्होंने आगे बताया, 'लॉकडाउन के दौरान एक व्यक्ति विशेष के अंतिम संस्कार में शामिल होने वालों के नाम न सार्वजनिक करने पर मेरे खिलाफ एक और एफआईआर दर्ज की गई थी। स्थिति यह है कि मार्च में जब मैने दो बसों में मऊ में आने वाले लोगों की मदद की थी तो उनके साथ अपराधियों की तरह व्यवहार किया गया और सुविधाओं के बिना क्वारंटीन सेंटरों में भेजा गया था, मेरी कार जब्त कर ली गई थी। इस दौरान दर्ज किए गए 6-7 मामलों में 22 लोगों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है।'
'तब्लीगी जमात में भाग लेने वाले लगभग 152 लोगों को एक छापे के बाद गिरफ्तार किया गया और आईपीसी की धारा 269 और 270 के तहत मामला दर्ज किया गया। इनमें से 42 लोगों पर धारा 307 (हत्या का प्रयास) के तहत मामला दर्ज किया गया और उन्हें जेल भेज दिया गया। यहां तक कि संगरोध में भी उन्हें लाने के कम से कम 50 दिन बाद तक बाहर नहीं जाने दिया गया। मैंने पाया कि कम से कम 2 पकड़े गए किशोर थे। जब हमने सुविधाओं की दुर्दशा पर प्रकाश डाला, तो हमें एक मामले में फिर से बुक किया गया। मुद्दा यह है कि हमें अपनी आवाज उठानी होगी। वे हमें डराते हैं, लेकिन हमें नागरिकों से जेल का डर दूर करना होगा। हमें लोगों को लड़ने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। अब वे चाहते हैं कि पार्षद हॉटस्पॉट्स में कानून व्यवस्था सुनिश्चित करें। हालाँकि, यह सरकारी अधिकारियों का काम है।
'संक्रमण के लिए परीक्षण के साथ भी एक समस्या रही है। दिल्ली की तुलना में यूपी केवल 1 प्रतिशत परीक्षण कर रहा है। बुजुर्गों का परीक्षण नहीं किया जा रहा है क्योंकि उन्हें पता है कि अगर वे ऐसा करेंगे तो संख्या बढ़ जाएगी। जो भी समस्याएं आ रही हैं, हमें अधिकार पाने के लिए लड़ना होगा।'
बनारस के एक पत्रकार और कार्यकर्ता रामजी यादव ने लोगों की पीड़ा पर दुख व्यक्त करते हुए कहा कि कोरोनोवायरस के दौरान सरकार ने आम आदमी की जरूरतों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया।
उन्होंने कहा कि डर का माहौल ऐसा था कि लोग हाशिए और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की मांग के लिए सड़कों पर नहीं उतरे। अधिकांश समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचारों के बारे में उन्होंने कहा, 'मैं समाचार पत्रों का अवलोकन किया कि समाचार कैसे बदलते हैं। 10 दिन पहले खबर आई थी कि सरकार ने 10 लाख लोगों का परीक्षण किया है, दूसरे दिन यूपी के सीएम ने कहा कि उसने 90 लाख लोगों का परीक्षण किया था। राज्य (यूपी) में परीक्षण सुविधाओं को देखते हुए यह संख्या सही कैसे हो सकती है? उसी तरह पीएम मोदी ने कहा कि सरकार 80 करोड़ लोगों को गेहूं और चना देगी और दूसरी बार उन्होंने कहा कि यह 81 करोड़ लोगों को दिया जाएगा।
उन्होंने आगे कहा, 'लगातार संख्याओं में हेराफेरी होती रही है। हमें एक रक्षात्मक मोड में रखा गया है, जिसे हमारी आवश्यकताओं की रक्षा के लिए छोड़ दिया गया है। हमें सामुदायिक स्तर पर एक साथ आने और सभी कारणों को एकजुट करने की आवश्यकता है।'
उन्होंने आगे कहा, 'पत्रकारिता के संबंध में अधिकांश कॉर्पोरेट मीडिया भाजपा आईटी सेल के रूप में काम करते हैं, जो शासन की फासीवादी विचारधाराओं को सामने रखते हैं। जमीनी स्तर पर काम करने वाले उन वास्तविक पत्रकारों जो तथ्य खोजकर रिपोर्ट संकलि करते हैं, उन्हें धमकी दी जा रही है और उन पर हमला किया जा रहा है।'
'एक घटना में, मुसहर समुदाय के बच्चों को घास खाते और देखा गया था। हमने उन समाचारों को प्रकाशित किया, जिन स्थितियों में लोग रह रहे थे। अगले दिन, इस दावे को खारिज करने के लिए सरकार का एक सदस्य एक फोटो सेशन करने आया और पत्रकार के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। सोनभद्र में हमने पाया कि बच्चों को मध्याह्न भोजन के नाम पर नमक और चपाती खिलाई गई थी और जब इसकी सूचना मिली, तो पत्रकार को पकड़ कर जेल भेज दिया गया। मैंने देखा है कि जो पत्रकार कॉरपोरेट न्यूज मीडिया में नहीं हैं, उन पर लगातार हमले होते रहे हैं।'
रामजी यादव ने कहा कि सरकार जो लोगों को गरीबी और बेरोजगारी की ओर धकेल रही है, वह जमीनी हकीकत से डर रही है। यही कारण है कि यह असंतुष्टों और पत्रकारों के बीच डर पैदा करने के लिए उन्हें सलाखों के पीछे डाल रही है।

इस दौरान सामाजिक कार्यकर्ता सदफ जफर ने कहा कि यूपी सरकार ने जिस तरह से असहमति जताने वालों को दंगाई का तमगा दिया है वह शर्मनाक है। उन्होंने कहा कि यूपी सरकार सीएए का विरोध जताने वालों पर लॉकडाउन की आड़ में बेजा कार्रवाई कर रही है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से एंटी सीएए प्रोटेस्टर्स को सरकार द्वारा निशाना बनाया गया यह अभूतपूर्व है। ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी प्रदर्शनकारी की पहचान और एड्रस फोटो सहित चौराहों पर लगा दिया जाए। उन्होंने कहा कि लखनऊ में ही एक रिक्शाचालक को जेल भेज दिया गया व उसपर लाखों रुपये की वसूली करने की बात कही जा रही है जबकि उसके लॉकडाउन के चलते पहले से ही खाने के लाले हैं।
बता दें कि 19 दिसंबर को जिस समय लखनऊ में CAA के खिलाफ प्रदर्शन ने उग्र रूप लिया, सदफ जफर फेसबुक लाइव कर रही थीं। तब जो लाइव सदफ ने फेसबुक के लिए किया अगर उसपर नजर डाली जाए तो मिलता है कि वो लखनऊ पुलिस के साथ साथ चल रही थीं। लाइव के दौरान ऐसे तमाम मौके आए थे जब उन्होंने खुद पुलिस से अनुरोध किया था कि बजाए मूकदर्शक बनने के वो दंगाइयों को हिरासत में लें और स्थिति को नियंत्रित करें। इसके बावजूद उनपर कार्रवाई की गई।
इस दौरान मानवाधिकार कार्यकर्ता रोमा जी ने कहा कि जेल में बंद महिलाओं की स्थिति इतनी खराब है कि आप अपना केस भूल जाते हैं। उन्होंने कहा कि मैं तो खासतौर पर जंगल के इलाकों में काम करती हूं, वहां की स्थिति और है। उन्होंने कहा कि वन विभाग और पुलिस विभाग लॉकडाउन का फायदा उठाकर लोगों की जमीन हथियाने में लगे हैं। उन्होंने कहा कि पहली बार वन विभाग पर एफआईआर हुई। उत्तराखंड के वन गुज्जरों पर जिस तरह से हमला हुआ वहां लोग आंदोलन कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि वनाश्रित लॉकडाउन में दूसरे लोगों को भी खिलाने का काम कर रहे हैं। ये सरकार किसी भी कीमत पर रोजगार सृजन नहीं करेगी क्योंकि यह कॉरपोरेट्स की गुलाम है। वनाधिकार कानून से हमें बड़ी ताकत मिली है वरना पहले हमें माओवादी करार दे दिया जाता था जिस तरह से सदफ जफर को दंगाई करार दे दिया गया है वही हाल पहले हमारा था। लोगों को सोचना पड़ेगा की गांव में रोजगार सृजन कैसे हो, यह सरकार तो रोजगार नहीं देने वाली। इसके लिए हमें शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर सचेत होना पड़ेगा और शहरों पर निर्भरता कम करनी पड़ेगी। जो माइग्रेंट वर्कर्स हैं, दलित हैं. उनके लिए भूमि का मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण है। उन्हें जमीन मिले।
रोमा जी ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा कि अभी तक सारी जमीनें सामंतों के पास हैं, आजादी के सत्तर साल बाद भी भूमि सुधार की जरूरत है। महिलाओं ने सामुहिक खेती के जरिए बहुत बड़ा काम किया है। उन्होंने खाद्य सुरक्षा की दिशा में बड़ा काम किया है। उन्होंने कहा कि हमें मायावती की सरकार में जेल जाना पड़ा, मुलायम सिंह की सरकार में भी व वर्तमान की भाजपा सरकार में भी जेल जाना पड़ा। खासतौर पर सीजेपी व तीस्ता जी के साथ मिलकर हम काम करना चाहते हैं।
इस दौरान संदीप पांडेय ने कहा कि मोहम्मद शोएब, एसआर दारापुरी आदि के खिलाफ खिलाफ कार्रवाई हो रही है। ये बड़ी अजीब सी बात है कि सरकार लोगों से अपेक्षा करती है कि वो अपने काम बंद रखें और कार्यालयों में कम जाएं। लेकिन पुलिस विभाग पूरी तरह से सक्रिय है और अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों को के खिलाफ सक्रिय है। अभी कानपुर में कहर ढहाया गया।
उन्होंने कहा कि 2011 में नीतीश कुमार को जब भ्रष्ट अधिकारी के घर को जब जब्त करना था तो उन्होंने महादलित बच्चों के लिए एक स्कूल खोला। हमारे योगी साहब ने विकास दुबे का घर गिरवा दिया और उसका एनकाउंटर भी हो गया। पांच हजार जो एनकाउंटर हुए थे तब योगी सरकार ने कहा था कि सभी अपराधी मारे गए हैं या वो अपनी जमानत रद्द करवाकर जेल चले गए हैं। ये भी एक तरीका है कि अपराधी बचने के लिए जेल में रहते हैं। इसके बावजूद एक खूंखार अपराधी योगी सरकार से कैसे छूट गया, यह बात समझ में नहीं आती है। जिस तरह से वह कार्रवाई हुई तो सवाल खड़े हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश को अब एनकाउंटर राज्य की संज्ञा दी जा सकती है क्योंकि यहां कानून का राज नहीं है। ये स्थिति तो हमारे मानवाधिकार उल्लंघन और नागरिक अधिकार उल्लंघन को लेकर है।
दूसरी तरफ जो मजदूर घर वापस लौट रहा था, उसके साथ भी किस तरह का बर्ताव हुआ, उस पर गौर किया जाना चाहिए। कांग्रेस पार्टी ने इनसे कहा कि हम आपको हजार बसें देते हैं, ताकि आप मजदूरों को लेकर आ पाएं क्योंकि बसें चल नहीं रहीं थीं। इन्होंने कांग्रेस पार्टी से हजार बसों की सूची मांगी। अब उसमें कुछ जो पंजीकरण संख्या वाहनों की थी बसों की नहीं थी दूसरे वाहनों की थी तो कांग्रेस के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू पर ये आरोप लगा कि उन्होंने फर्जी जानकारी दी है। उनको जेल भेज दिया गया। उसके बाद योगी साहब कहते हैं कि हमारे पास नब्बे हजार बसों का बेड़ा है, हम चाहें तो पूरे देश के मजदूरों को अपने प्रदेश में ला सकते हैं। आपके पास बसें थीं तो आपने कांग्रेस हजार बसों की सूची क्यों मांगी।
कोरोना के संकट के दौर में भी जिस तरह की राजनीति हो रही है, बजाए इसके कि आप लोगों का ठीक से इलाज करवाएं, लोगों को ठीक से भोजन उपलब्ध करवाएं, उनके आने जाने की व्यवस्था करें, कांग्रेस पार्टी के खिलाफ राजनीति इनकी प्राथमिकता थी, न कि लोगों की देखभाल करना। सबने देखा कि ज्यादातर मजदूर उत्तर प्रदेश और बिहार के ही थे जो लौटकर आ रहे थे। हमने देखा कि वह कैसे सड़कों पर चल रहे थे। जिसको साधन मिल रहा था वो उससे आ रहा था लेकिन उनको यातायात के साधन मुहैया नहीं करवाए गए। ये सारे दृश्य सभी ने देखे हैं।
साझा संस्कृति मंच के संयोजक फादर आनंद मैथ्यू ने कहा कि राज्य में सभी मानवाधिकारों को दरकिनार किया जा रहा है क्योंकि सरकार ने असंतुष्टों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। फादर आनंद ने धर्मनिरपेक्षता की भावना को सलाम करते हुए कहा, 19 दिसंबर को हमने शांतिपूर्ण विरोध किया और अभी तक हममें से साठ लोगों को गिरफ्तार किया गया।
फादर आनंदर मैथ्यू ने आगे बताया कि लॉकडाउन से कुछ दिन पहले तक हम अपने दो सदस्य अनुप श्रमिक और जागृति राही की रिहाई के लिए लड़ते रहे। यहां तक कि जागृति का विरोध प्रदर्शनों में कोई भूमिका नहीं थी और वह वहां मौजूद भी नहीं थीं। उसे 'मास्टरमाइंड की तरह पेश किया गया और सलाखों के पीछे भेज दिया गया।
'अब भी पुलिस उनके घरों में जा रही है और उनके खिलाफ चार्जशीट जारी कर रही है। हम कह सकते हैं कि सीएए, एनआरसी के विरोध को दबाने के लिए लॉकडाउन की आड़ ली गई, हालांकि लॉकडाउन एक आवश्यकता थी लेकिन मानवाधिकारों का उल्लंघन अब भी जारी है।'
लॉकडाउन के दौरान सरकार की ओर से जारी की एडवाइजरी में लोगों से घरों में सुरक्षित रहने के लिए कहा गया और उन्हें सलाह दी गई कि घरेलू मदद, सफाईकर्मी, अखबार विक्रेताओं को घरों या परिसर में अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। केवल अमीर और मध्यम वर्ग को ही देश के नागरिकों के रूप में देखा जा रहा था और अप्रत्यक्ष रूप से निचले तबके पर वायरस ले जाने का आरोप लगाया जा रहा था।
समाजवादी जन परिषद के महासचिव अफलातून ने कहा कि महामारी रोग अधिनियम और सीआरपीसी की मदद से वर्तमान स्थिति आपातकाल से भी बदतर है। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन के दौरान सरकार लोगों की रक्षा करने वाले सभी कानूनों को खत्म करने और बदलने की कोशिश कर रही थी।
सरकार की नीतियों से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले किसानों और बुनकरों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा, 'भारत सरकार ने कहा है कि लॉकडाउन के दौरान 80 लाख प्रवासी अपने गांवों में लौट आए हैं। जैसे सरकार ने निजी कंपनियों को वन भूमि दी है और कॉरपोरेट्स के लिए कोयला खनन खोला है, वह अब कृषि का निजीकरण करने जा रही है। सरकार ने हाल ही में घोषणा की कि भारत के किसान देश में कहीं भी अपनी फसल बेच सकते हैं। हालाँकि, यह बहुत खतरनाक है क्योंकि इसका मतलब केवल यह है कि किसान फसल को बेच नहीं पाएगा, लेकिन देश-विदेश के कॉरपोरेट्स आएंगे और उन कीमतों पर फसल खरीदेंगे, जो उनके लिए उपयुक्त हैं। मंडियों को भी दूर किया गया लगता है। सरकार अमेरिका की तरह ही कॉन्ट्रैक्ट और कॉरपोरेट फार्मिंग को बढ़ावा देगी जहां निजी कंपनियों की जमीन है। इसके अलावा बुनकरों की दुर्दशा दुर्भाग्यपूर्ण है।'
उन्होंने आगे कहा, 'उत्तर प्रदेश ने नाममात्र के वेतन के साथ लंबे समय तक काम कराने के लिए कॉल के दौरान श्रम कानूनों के साथ छेड़छाड़ किया। अफ़लातून ने कहा कि 2015 में छोटे व्यवसाय के मालिकों का आरक्षण हटा दिया गया था और लॉकडाउन के दौरान हथकरघा उद्योग को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा, 'लॉकडाउन के दौरान सबक सीखने और स्वास्थ्य सेवा पर पैसा खर्च करने के बजाय, उन्होंने निजी अस्पतालों को नि: शुल्क उपचार प्रदान करने के बजाय अत्यधिक मात्रा में पैसे चार्ज करने की अनुमति दी है।'
पीपुल्स विजिलेंस कमेटी फॉर ह्यूमन राइट्स (PVHCR) के डॉ. लेनिन रघुवंशी ने भी इस बारे में बात की कि किस तरह से योगी सरकार ने लॉकडाउन के दौरान लोगों को लंबे समय तक काम करने के लिए कहकर श्रम कानूनों को रद्द कर दिया और लोगों को बंधुआ मजदूरी में धकेल दिया।
रघुवंशी ने कहा, 'जब कॉरपोरेट फासीवाद है, तो प्रशासन कभी भी अच्छा काम नहीं करेगा। यूपी एक कॉर्पोरेट फासीवादी राज्य है। यह कहीं न कहीं हमारी गलती भी है कि हमने अपनी एकजुटता को अलग-अलग आंदोलन की पेशकश नहीं की, जो हमें अब करना चाहिए। वर्तमान सरकार बहुत षड्यंत्रकारी है।
रघुवंशी ने कहा, 'उनके खिलाफ वोट करें और एक धर्म निरपेक्ष लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना करें। वर्तमान में गुजरात मॉडल की तर्ज पर यूपी मॉडल है। हमें सभी मोर्चों पर संविधान के प्रवर्तन को आधार बनाकर लड़ना होगा। यदि नहीं तो क्या लोकतंत्र बचेगा? हमें सामाजिक परिवर्तन को बढ़ावा देने वाले मानवीय कार्य करने चाहिए।'
उत्तर प्रदेश में बुनकरों के बीच काम करने वाले अब्दुल्ला अंसारी ने भी कहा कि बहुत पहले बुनकरों को दरकिनार करना शुरू कर दिया गया था जब कॉरपोरेट्स को छूट दी गई थी लेकिन छोटे बुनकर नहीं थे। इसके चलते उन्हें गरीबी में धकेल दिया गया। अंसारी ने कहा कि बुनकरों का शोषण बिजली के लिए व्यावसायिक दरों से किया जाता है, जो बिजली की दरों से दोगुना है।
अंसारी ने कहा, 'भले ही हमने बुनकरों की दुर्दशा पर प्रकाश डाला है, लेकिन उनको सरकार से कोई राहत नहीं मिली है। यूपी में बिजली की उच्चतम दर 7.35 रुपये प्रति यूनिट है जबकि अन्य राज्यों में यह लगभग 2 या 3 रूपये है। सवाल यह है कि सरकार बुनकरों से क्या चाहती है। बुनाई 25 मार्च से बंद है और अब बुनकरों को अपनी प्रतिभा को पीछे छोड़ते हुए अन्य क्षेत्रों में नौकरियों की तलाश करना पड़ रहा है। न ही राज्य और न ही केंद्र सरकार ने बुनकरों के लिए कोई व्यवस्था की।
उन्होंने आगे कहा, 'यदि ऐसा ही चलता है, तो यह विरासत उद्योग नष्ट हो जाएगा। उदाहरण के लिए बनारसी साड़ी को विलासिता के सामान का टैग दिया गया है, जिसके कारण सरकार बुनकरों को किसी भी तरह की छूट देने के लिए तैयार नहीं है। एक बनारसी साड़ी जब बिचौलियों तक पहुंचती है तो यह लक्जरी बन जाती है और फिर इसे अत्यधिक कीमतों पर बेचा जाता है। सरकार यह नहीं देखती है कि इससे कितना बुनकर निकलता है। आज भी एक बुनकर मुश्किल से 300 रूपये प्रतिदिन कमाता है। यह एक बुनकर की प्रतिभा की कीमत है। अब कॉरपोरेट इस विरासत उद्योग को संभालना चाहते हैं और बुनकरों को गुलामी और बंधुआ मजदूरी में धकेलना चाहते हैं।'
मऊ नगरपालिका के पूर्व अध्यक्ष अरशद जमाल ने क्षेत्र में अल्पसंख्यकों के बारे में बोलते हुए कहा कि मऊ की आबादी लगभग 22 लाख है, जिसमें से 5 लाख से अधिक मुस्लिम हैं और क्षेत्र में कम से कम 4 लाख बुनकर हैं।
उन्होंने कहा, '2019 में यूपी सरकार ने पहली बार बुनकरों को प्रदान की गई फ्लैट दर को बंद कर दिया। अब करों में 7.35 रूपये प्रति यूनिट जोड़ा गया है, कीमत 11 रूपये प्रति यूनिट तक जाती है। बुनकरों को अब अत्यधिक बिलों का भुगतान करना होगा और यही नहीं यदि वे इसे वहन नहीं कर पाते हैं, तो उनके कनेक्शन बंद किए जा रहे हैं।
उन्होंने आगे कहा जब सीएए, एनआरसी विरोधी प्रदर्शन जारी थे, यहां मऊ के युवा भी विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए। हालांकि विरोध शांतिपूर्ण था, लेकिन पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया। परिणामस्वरूप 252 लोगों को बुक किया गया था। प्रत्येक पर कम से कम 24 धाराओं के साथ 6 एफआईआर दर्ज की गईं। मुझे पता चला कि मैं भी उनमें से एक आरोपी था।
'मेरे द्वारा पोस्ट किए गए एक साधारण संदेश के लिए मुझ पर सांप्रदायिकता फैलाने का आरोप लगाकर मेरे खिलाफ एक और एफआईआर दर्ज की गई थी। मैने एक संदेश पोस्ट किया था जिसमें लिखा था कि जब समाचार मीडिया सांप्रदायिकता फैला सकता है तो लोकतंत्र में मुस्लिम समुदाय अपने अधिकारों के लिए क्यों नहीं लड़ सकता है?'
उन्होंने आगे बताया, 'लॉकडाउन के दौरान एक व्यक्ति विशेष के अंतिम संस्कार में शामिल होने वालों के नाम न सार्वजनिक करने पर मेरे खिलाफ एक और एफआईआर दर्ज की गई थी। स्थिति यह है कि मार्च में जब मैने दो बसों में मऊ में आने वाले लोगों की मदद की थी तो उनके साथ अपराधियों की तरह व्यवहार किया गया और सुविधाओं के बिना क्वारंटीन सेंटरों में भेजा गया था, मेरी कार जब्त कर ली गई थी। इस दौरान दर्ज किए गए 6-7 मामलों में 22 लोगों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है।'
'तब्लीगी जमात में भाग लेने वाले लगभग 152 लोगों को एक छापे के बाद गिरफ्तार किया गया और आईपीसी की धारा 269 और 270 के तहत मामला दर्ज किया गया। इनमें से 42 लोगों पर धारा 307 (हत्या का प्रयास) के तहत मामला दर्ज किया गया और उन्हें जेल भेज दिया गया। यहां तक कि संगरोध में भी उन्हें लाने के कम से कम 50 दिन बाद तक बाहर नहीं जाने दिया गया। मैंने पाया कि कम से कम 2 पकड़े गए किशोर थे। जब हमने सुविधाओं की दुर्दशा पर प्रकाश डाला, तो हमें एक मामले में फिर से बुक किया गया। मुद्दा यह है कि हमें अपनी आवाज उठानी होगी। वे हमें डराते हैं, लेकिन हमें नागरिकों से जेल का डर दूर करना होगा। हमें लोगों को लड़ने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। अब वे चाहते हैं कि पार्षद हॉटस्पॉट्स में कानून व्यवस्था सुनिश्चित करें। हालाँकि, यह सरकारी अधिकारियों का काम है।
'संक्रमण के लिए परीक्षण के साथ भी एक समस्या रही है। दिल्ली की तुलना में यूपी केवल 1 प्रतिशत परीक्षण कर रहा है। बुजुर्गों का परीक्षण नहीं किया जा रहा है क्योंकि उन्हें पता है कि अगर वे ऐसा करेंगे तो संख्या बढ़ जाएगी। जो भी समस्याएं आ रही हैं, हमें अधिकार पाने के लिए लड़ना होगा।'
बनारस के एक पत्रकार और कार्यकर्ता रामजी यादव ने लोगों की पीड़ा पर दुख व्यक्त करते हुए कहा कि कोरोनोवायरस के दौरान सरकार ने आम आदमी की जरूरतों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया।
उन्होंने कहा कि डर का माहौल ऐसा था कि लोग हाशिए और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की मांग के लिए सड़कों पर नहीं उतरे। अधिकांश समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचारों के बारे में उन्होंने कहा, 'मैं समाचार पत्रों का अवलोकन किया कि समाचार कैसे बदलते हैं। 10 दिन पहले खबर आई थी कि सरकार ने 10 लाख लोगों का परीक्षण किया है, दूसरे दिन यूपी के सीएम ने कहा कि उसने 90 लाख लोगों का परीक्षण किया था। राज्य (यूपी) में परीक्षण सुविधाओं को देखते हुए यह संख्या सही कैसे हो सकती है? उसी तरह पीएम मोदी ने कहा कि सरकार 80 करोड़ लोगों को गेहूं और चना देगी और दूसरी बार उन्होंने कहा कि यह 81 करोड़ लोगों को दिया जाएगा।
उन्होंने आगे कहा, 'लगातार संख्याओं में हेराफेरी होती रही है। हमें एक रक्षात्मक मोड में रखा गया है, जिसे हमारी आवश्यकताओं की रक्षा के लिए छोड़ दिया गया है। हमें सामुदायिक स्तर पर एक साथ आने और सभी कारणों को एकजुट करने की आवश्यकता है।'
उन्होंने आगे कहा, 'पत्रकारिता के संबंध में अधिकांश कॉर्पोरेट मीडिया भाजपा आईटी सेल के रूप में काम करते हैं, जो शासन की फासीवादी विचारधाराओं को सामने रखते हैं। जमीनी स्तर पर काम करने वाले उन वास्तविक पत्रकारों जो तथ्य खोजकर रिपोर्ट संकलि करते हैं, उन्हें धमकी दी जा रही है और उन पर हमला किया जा रहा है।'
'एक घटना में, मुसहर समुदाय के बच्चों को घास खाते और देखा गया था। हमने उन समाचारों को प्रकाशित किया, जिन स्थितियों में लोग रह रहे थे। अगले दिन, इस दावे को खारिज करने के लिए सरकार का एक सदस्य एक फोटो सेशन करने आया और पत्रकार के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। सोनभद्र में हमने पाया कि बच्चों को मध्याह्न भोजन के नाम पर नमक और चपाती खिलाई गई थी और जब इसकी सूचना मिली, तो पत्रकार को पकड़ कर जेल भेज दिया गया। मैंने देखा है कि जो पत्रकार कॉरपोरेट न्यूज मीडिया में नहीं हैं, उन पर लगातार हमले होते रहे हैं।'
रामजी यादव ने कहा कि सरकार जो लोगों को गरीबी और बेरोजगारी की ओर धकेल रही है, वह जमीनी हकीकत से डर रही है। यही कारण है कि यह असंतुष्टों और पत्रकारों के बीच डर पैदा करने के लिए उन्हें सलाखों के पीछे डाल रही है।