PUCL का कहना है कि राजस्थान से मिली रिपोर्टें संकेत देती हैं कि जनगणना कर्मियों पर दबाव डालकर उन्हें सरकार के पक्ष में “बेहतर” तस्वीर पेश करने के लिए आंकड़ों में बदलाव करने को कहा जा रहा है।

Representation Image | The Hindu
पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) ने चल रही जनगणना के दौरान जमीनी स्तर पर एकत्र किए जा रहे आंकड़ों में कथित हेरफेर को लेकर गंभीर चिंता जताई है। हाल ही में जारी एक बयान में संगठन ने कहा कि वह 3 जून 2026 को द हिंदू में प्रकाशित उन रिपोर्टों को बेहद चिंताजनक मानता है, जिनमें राजस्थान और अन्य राज्यों में चल रहे हाउस लिस्टिंग ऑपरेशन (HLO) के दौरान डेटा संग्रहण प्रक्रिया में हस्तक्षेप के आरोप लगाए गए हैं।
PUCL के अनुसार, रिपोर्टों से एक परेशान करने वाला पैटर्न सामने आता है, जिसमें जमीनी स्तर पर कार्यरत गणनाकारों (एन्यूमरेटरों) पर वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा कथित रूप से दबाव डाला जा रहा है कि वे ऐसे आंकड़ों में बदलाव करें जो गरीब और वंचित नागरिकों की वास्तविक जीवन स्थितियों को दर्शाते हैं, और उनकी जगह ऐसे आंकड़े दर्ज करें जो सरकार के दावों के अनुरूप हों।
संगठन ने कहा कि वह इस प्रवृत्ति की "कड़े से कड़े शब्दों में निंदा" करता है।
मौलिक अधिकारों से जुड़ा सवाल
PUCL ने कहा कि जनगणना केवल जनसंख्या या संपत्तियों की गणना करने की प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है। यह वह बुनियादी माध्यम है जिसके जरिए राज्य अपने नागरिकों के प्रति संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करता है।
संगठन के अनुसार, जनगणना से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर कल्याणकारी योजनाएं, गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम, बुनियादी ढांचे में निवेश और संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन तय किया जाता है। इसलिए यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) तथा नागरिकों के सही ढंग से गिने जाने के अधिकार से सीधे जुड़ी हुई है।
बयान में कहा गया है, "जनगणना के आंकड़ों में हेरफेर केवल प्रशासनिक अनियमितता नहीं, बल्कि मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।"
जमीनी हकीकत और सरकारी दावों में अंतर
PUCL का कहना है कि गणनाकारों, सरकारी स्कूल शिक्षकों, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और अन्य फ्रंटलाइन कर्मियों के अनुभव सरकारी दावों से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करते हैं।
राजस्थान और उत्तर प्रदेश से प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार:
● अनेक परिवारों के पास शौचालय नहीं हैं और वे अब भी खुले में शौच करने को मजबूर हैं।
● बड़ी संख्या में घरों में पाइपलाइन या सुरक्षित नल जल की सुविधा उपलब्ध नहीं है।
● कई परिवार आज भी जलाऊ लकड़ी, गोबर के उपले और केरोसिन से खाना बनाते हैं।
● टीन की छत वाले घरों को पक्के मकानों के रूप में दर्ज करने के निर्देश दिए जा रहे हैं।
● कई घरों में बिजली और इंटरनेट की सुविधा नहीं है।
● अनेक लोगों ने गणनाकारों से घर, एलपीजी, पानी और पेंशन जैसी मूलभूत सुविधाएं दिलाने में मदद मांगी, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें पहले से लाभार्थी दिखाया गया है।
संगठन का कहना है कि ये केवल प्रक्रिया संबंधी कमियां नहीं हैं, बल्कि कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में मौजूद संरचनात्मक खामियों की ओर संकेत करती हैं।
"गलत आंकड़े दर्ज करने के निर्देश" पर चिंता
PUCL ने विशेष रूप से राजस्थान के जनगणना संचालन निदेशक द्वारा 2 जून 2026 को जारी उस पत्र का उल्लेख किया है, जिसमें जिला स्तर के अधिकारियों को कथित "विसंगतियों" की जांच और सुधार के निर्देश दिए गए थे।
संगठन का कहना है कि जब इस पत्र को उन आरोपों के साथ देखा जाता है जिनमें गणनाकारों को "सरकार की छवि खराब करने वाले विकल्प न चुनने" की सलाह दिए जाने की बात कही गई है, तो यह डेटा में हस्तक्षेप को संस्थागत संरक्षण देने जैसा प्रतीत होता है।
PUCL ने कहा कि यदि खुले में शौच करने वाले परिवारों को केवल इस आधार पर दूसरी श्रेणी में रखा जाता है कि उनके पास पड़ोसी के शौचालय या सार्वजनिक शौचालय तक पहुंच है, तो यह वास्तविक स्थिति को छिपाने का प्रयास है।
गणनाकारों की कठिन स्थिति
संगठन ने यह भी कहा कि जनगणना कार्य में लगे शिक्षकों, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और अन्य कर्मचारियों को अपनी पेशेवर ईमानदारी और प्रशासनिक दबाव के बीच चुनाव करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
PUCL के अनुसार, कई कर्मचारियों ने व्यक्तिगत जोखिम उठाकर सोशल मीडिया और अन्य मंचों पर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। ऐसे लोगों को संरक्षण मिलना चाहिए, न कि दंडात्मक कार्रवाई का सामना करना चाहिए।
संगठन ने यह भी कहा कि निजी मोबाइल फोन के माध्यम से पूरी तरह डिजिटल तरीके से जनगणना कराना, विशेषकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में कमजोर इंटरनेट कनेक्टिविटी तथा सीमित संसाधनों के बीच, अतिरिक्त समस्याएं पैदा करता है।
PUCL की चेतावनी
PUCL ने केंद्र और राज्य सरकारों को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि जनगणना का उद्देश्य वास्तविक स्थिति दर्ज करने के बजाय सरकारी दावों को सही साबित करना बन जाए, तो यह केवल सांख्यिकीय नहीं बल्कि संवैधानिक और राजनीतिक धोखाधड़ी होगी।
संगठन ने कहा कि गलत जनगणना आंकड़े न केवल गरीबों को आवश्यक सुविधाओं से वंचित कर सकते हैं, बल्कि आने वाले दशकों तक लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और संसाधनों के वितरण को भी प्रभावित कर सकते हैं।
बयान में कहा गया, "वे गरीब लोग जो आज भी घर, शौचालय, बिजली और स्वच्छ पानी जैसी सुविधाओं से वंचित हैं, उनका यह मौलिक अधिकार है कि राज्य उन्हें देखे, उनकी गिनती करे और उनकी आवश्यकताओं को स्वीकार करे।"
PUCL की प्रमुख मांगें
● जनगणना कर्मियों को जमीनी आंकड़ों में बदलाव करने के किसी भी औपचारिक या अनौपचारिक निर्देश को तत्काल वापस लिया जाए।
● 2 जून 2026 को जारी पत्र और उससे संबंधित सभी प्रशासनिक निर्देशों की स्वतंत्र एवं पारदर्शी जांच कराई जाए।
● डेटा में हेरफेर के दबाव की शिकायत करने वाले कर्मचारियों को किसी भी प्रकार की प्रताड़ना, स्थानांतरण या अनुशासनात्मक कार्रवाई से सुरक्षा दी जाए।
● अंतिम आंकड़े जारी होने से पहले स्वतंत्र निगरानी तंत्र स्थापित किया जाए, जिसमें नागरिक समाज, सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी और स्वतंत्र सांख्यिकीविद् शामिल हों।
● भारत के रजिस्ट्रार जनरल एवं जनगणना आयुक्त सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करें कि जनगणना का उद्देश्य जमीनी हकीकत को दर्ज करना है और आंकड़ों को सरकारी दावों के अनुरूप बनाने के लिए कोई निर्देश जारी नहीं किए गए हैं।
● जनगणना कर्मियों को पर्याप्त संसाधन, डेटा व्यय की प्रतिपूर्ति, अतिरिक्त समय और अन्य सरकारी कार्यों से राहत उपलब्ध कराई जाए।
यह बयान PUCL की राष्ट्रीय अध्यक्ष कविता श्रीवास्तव, राष्ट्रीय महासचिव वी. सुरेश और PUCL राजस्थान के प्रदेश अध्यक्ष अनंत भटनागर सहित अन्य पदाधिकारियों द्वारा जारी किया गया है।
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