'आदि तमिलर पेरवाई' की राज्य युवा शाखा के सचिव के. रावणन ने आरोप लगाया कि दलितों के साथ आज भी अस्पृश्यता जैसा व्यवहार किया जाता है और उन्हें सार्वजनिक कब्रिस्तान के उपयोग से वंचित रखा जाता है।

प्रतीकात्मक तस्वीर, द हिंदू
'आदि तमिलर पेरवाई' के सदस्यों ने सोमवार को जिला कलेक्ट्रेट तक शवयात्रा की प्रतीकात्मक अर्थी लेकर मार्च किया और जिला कलेक्टर को एक ज्ञापन सौंपा। उन्होंने करमदाई के पास रहने वाले 300 से अधिक दलित परिवारों के लिए कब्रिस्तान की मांग की। संगठन का आरोप है कि अन्य समुदायों के लोग उन्हें क्षेत्र में मौजूद सार्वजनिक कब्रिस्तान का उपयोग करने से रोकते हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे 'आदि तमिलर पेरवाई' की राज्य युवा शाखा के सचिव के. रावणन ने आरोप लगाया कि दलितों के साथ आज भी अस्पृश्यता जैसा व्यवहार किया जाता है और उन्हें सार्वजनिक कब्रिस्तान में प्रवेश करने से रोका जाता है।
उन्होंने पत्रकारों से कहा कि करमदाई के सीलियूर इलाके में 300 से अधिक अरुंधथियार परिवार पिछले 70 वर्षों से रह रहे हैं। उन्होंने कहा, "इन लोगों के पास अपना कब्रिस्तान नहीं है। वे अपने परिजनों के शवों को नहर के किनारे स्थित एक खाली जमीन पर दफनाते हैं। लेकिन बारिश के दौरान नहर में पानी का बहाव बढ़ जाने पर कब्रें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और शव बह जाने का खतरा पैदा हो जाता है। ऐसे में वे बरसात के दिनों में अंतिम संस्कार भी नहीं कर पाते।"
रावणन ने कहा, "अन्य सभी समुदायों की तरह इन लोगों को भी सम्मानजनक अंतिम संस्कार का अधिकार है। यह केवल दफनाने की जगह का सवाल नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता का भी मुद्दा है।"
उन्होंने मांग की कि जिला प्रशासन या तो उन्हें सार्वजनिक कब्रिस्तान का उपयोग करने की अनुमति सुनिश्चित करे या फिर इस उद्देश्य के लिए अलग भूमि उपलब्ध कराए।
उन्होंने कहा, "जो लोग दलितों को सार्वजनिक कब्रिस्तान में जाने से रोक रहे हैं, उनके खिलाफ भी उचित कार्रवाई की जानी चाहिए।"
ज्ञात हो कि हाल ही में तमिलनाडु के कोट्टाकुप्पम नगरपालिका क्षेत्र के नाडुकुप्पम और समीपवर्ती पेरिया कोट्टाकुप्पम में दलित निवासियों और स्थानीय मछुआरों के बीच झड़प के बाद लगभग 900 पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था। यह विवाद तब शुरू हुआ जब मछुआरों ने कथित तौर पर दलित समुदाय के लोगों को एक मृतक पड़ोसी के अंतिम संस्कार के लिए सामुदायिक कब्रिस्तान में जाने से रोक दिया।
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पेरिया कोट्टाकुप्पम में 500 से अधिक आदि द्रविड़ परिवार रहते हैं। इस समुदाय का समुद्र तट के पास, नाडुकुप्पम मछुआरा बस्ती के निकट एक कब्रिस्तान है, जिसकी कोई घेराबंदी नहीं है।
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ वर्ष पहले स्थानीय मछुआरों ने अपनी नावें खड़ी करने के लिए कब्रिस्तान की भूमि का उपयोग शुरू कर दिया था। इस अतिक्रमण के खिलाफ जिला प्रशासन को कई ज्ञापन दिए गए, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद दलित समुदाय के लोगों ने मद्रास हाई कोर्ट का रुख किया।
अदालत ने अगस्त 2025 में संबंधित अधिकारियों को कब्रिस्तान परिसर से नावें हटाने का निर्देश दिया था। हालांकि, मछुआरा समुदाय इस आदेश का विरोध करता रहा और अप्रैल में इसके खिलाफ प्रदर्शन भी किया था।
इसी बीच, दलित बस्ती के निवासी भूमिलिंगम (76) का निधन हो गया। अगले दिन उनके परिजन और पड़ोसी अंतिम संस्कार के लिए शव को नाडुकुप्पम स्थित कब्रिस्तान ले गए।
रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय मछुआरों ने दफनाने पर आपत्ति जताई और अनुसूचित जाति समुदाय के लोगों पर पत्थरों और लाठियों से हमला कर दिया। इस दौरान आसपास के कुछ घरों और मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों को भी नुकसान पहुंचा।
बाद में दलित समुदाय के लोगों ने शव को अर्थी पर रखकर कुछ सौ मीटर दूर ईस्ट कोस्ट रोड (ECR) तक ले जाकर सड़क जाम कर दी। उन्होंने हमले में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई और इस विवाद का स्थायी समाधान करने की मांग की।
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प्रतीकात्मक तस्वीर, द हिंदू
'आदि तमिलर पेरवाई' के सदस्यों ने सोमवार को जिला कलेक्ट्रेट तक शवयात्रा की प्रतीकात्मक अर्थी लेकर मार्च किया और जिला कलेक्टर को एक ज्ञापन सौंपा। उन्होंने करमदाई के पास रहने वाले 300 से अधिक दलित परिवारों के लिए कब्रिस्तान की मांग की। संगठन का आरोप है कि अन्य समुदायों के लोग उन्हें क्षेत्र में मौजूद सार्वजनिक कब्रिस्तान का उपयोग करने से रोकते हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे 'आदि तमिलर पेरवाई' की राज्य युवा शाखा के सचिव के. रावणन ने आरोप लगाया कि दलितों के साथ आज भी अस्पृश्यता जैसा व्यवहार किया जाता है और उन्हें सार्वजनिक कब्रिस्तान में प्रवेश करने से रोका जाता है।
उन्होंने पत्रकारों से कहा कि करमदाई के सीलियूर इलाके में 300 से अधिक अरुंधथियार परिवार पिछले 70 वर्षों से रह रहे हैं। उन्होंने कहा, "इन लोगों के पास अपना कब्रिस्तान नहीं है। वे अपने परिजनों के शवों को नहर के किनारे स्थित एक खाली जमीन पर दफनाते हैं। लेकिन बारिश के दौरान नहर में पानी का बहाव बढ़ जाने पर कब्रें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और शव बह जाने का खतरा पैदा हो जाता है। ऐसे में वे बरसात के दिनों में अंतिम संस्कार भी नहीं कर पाते।"
रावणन ने कहा, "अन्य सभी समुदायों की तरह इन लोगों को भी सम्मानजनक अंतिम संस्कार का अधिकार है। यह केवल दफनाने की जगह का सवाल नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता का भी मुद्दा है।"
उन्होंने मांग की कि जिला प्रशासन या तो उन्हें सार्वजनिक कब्रिस्तान का उपयोग करने की अनुमति सुनिश्चित करे या फिर इस उद्देश्य के लिए अलग भूमि उपलब्ध कराए।
उन्होंने कहा, "जो लोग दलितों को सार्वजनिक कब्रिस्तान में जाने से रोक रहे हैं, उनके खिलाफ भी उचित कार्रवाई की जानी चाहिए।"
ज्ञात हो कि हाल ही में तमिलनाडु के कोट्टाकुप्पम नगरपालिका क्षेत्र के नाडुकुप्पम और समीपवर्ती पेरिया कोट्टाकुप्पम में दलित निवासियों और स्थानीय मछुआरों के बीच झड़प के बाद लगभग 900 पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था। यह विवाद तब शुरू हुआ जब मछुआरों ने कथित तौर पर दलित समुदाय के लोगों को एक मृतक पड़ोसी के अंतिम संस्कार के लिए सामुदायिक कब्रिस्तान में जाने से रोक दिया।
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पेरिया कोट्टाकुप्पम में 500 से अधिक आदि द्रविड़ परिवार रहते हैं। इस समुदाय का समुद्र तट के पास, नाडुकुप्पम मछुआरा बस्ती के निकट एक कब्रिस्तान है, जिसकी कोई घेराबंदी नहीं है।
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ वर्ष पहले स्थानीय मछुआरों ने अपनी नावें खड़ी करने के लिए कब्रिस्तान की भूमि का उपयोग शुरू कर दिया था। इस अतिक्रमण के खिलाफ जिला प्रशासन को कई ज्ञापन दिए गए, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद दलित समुदाय के लोगों ने मद्रास हाई कोर्ट का रुख किया।
अदालत ने अगस्त 2025 में संबंधित अधिकारियों को कब्रिस्तान परिसर से नावें हटाने का निर्देश दिया था। हालांकि, मछुआरा समुदाय इस आदेश का विरोध करता रहा और अप्रैल में इसके खिलाफ प्रदर्शन भी किया था।
इसी बीच, दलित बस्ती के निवासी भूमिलिंगम (76) का निधन हो गया। अगले दिन उनके परिजन और पड़ोसी अंतिम संस्कार के लिए शव को नाडुकुप्पम स्थित कब्रिस्तान ले गए।
रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय मछुआरों ने दफनाने पर आपत्ति जताई और अनुसूचित जाति समुदाय के लोगों पर पत्थरों और लाठियों से हमला कर दिया। इस दौरान आसपास के कुछ घरों और मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों को भी नुकसान पहुंचा।
बाद में दलित समुदाय के लोगों ने शव को अर्थी पर रखकर कुछ सौ मीटर दूर ईस्ट कोस्ट रोड (ECR) तक ले जाकर सड़क जाम कर दी। उन्होंने हमले में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई और इस विवाद का स्थायी समाधान करने की मांग की।
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