मोदीजी ने जब काम किया है तो वाराणसी में क्यों उतार दी आधी सरकार?

Published on: March 2, 2017
गोरखपुर। यूपी चुनाव के पांच चरणों का चुनाव खत्म हो चुका है। छठें चरण का मतदान 4 मार्च को पूर्वांचल के सात जिलों के 49 सीटों में होना है। इसके लिए आज शाम पांच बजे से चुनाव प्रचार समाप्त हो जाएगा। इसके लिए भाजपा ने बकायदा अमित शाह और योगी आदित्यनाथ का रोड शो आयोजित किया है। 



प्रधानमंत्री अपनी जनसभाओं में बार-बार दावा कर रहे हैं कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा को भारी बहुमत से जीत हासिल होने वाली है। भारतीय जनता पार्टी के प्रचार और नेताओं के बयानों को मानें तो मिशन 265 से कहीं आगे जाकर अबकी बार, 300 पार वाले नारे और दावे पार्टी की ओर से किए जा रहे हैं। यानी उत्तर प्रदेश में अपनी जीत को लेकर भाजपा आश्वस्त है तो जाहिर है अब न प्रचार की ज़रूरत है और न ही गलियों, रैलियों में वक्त बरबाद करने की।
 
भाजपा की मानें तो उनके लिए अब यह सरकार बनाने की शुरुआती तैयारी का वक्त है। लेकिन पिछले कई दिनों से केंद्र के लगभग 14 मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के लगभग 100 सांसद पूर्वांचल के इलाकों में घूम-घूमकर जनता का मन टटोल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है वाराणसी, यहां की सीटों पर जो स्थिति बनी हुई है उसने पार्टी और प्रधानमंत्री दोनों की नींद उड़ा रखी है।

मोदी के लिए गुजरात अगर मॉडल है तो बनारस उनकी ज़मीन है। और ज़मीन पर हार ज़मीन खिसकने से कम नहीं है। शायद यही चिंता पार्टी और प्रधानमंत्री को परेशान कर रही है। भाजपा का बनारस में प्रचार तंत्र खुद इसकी चुगली करता नज़र आता है। सरकार के कामकाज के लिए वक्त की दुहाई देने वाले प्रधानमंत्री का कैबिनेट बनारस में गली गली घूमता नज़र आ रहा है। एक से एक केंद्रीय मंत्री, पार्टी के बड़े नेता, प्रबंधक और जातीय गणित के हिसाब से अनुकूल चेहरे, सबको लाइन बनाकर बनारस में उतार दिया गया है।
 
ऐसा लग रहा है कि भाजपा वाराणसी में कोई युद्ध लड़ने जा रही है। उसे हार का भय है, उसे अस्तित्व और गढ़ बचाने की चिंता है। अगर ऐसा नहीं होता तो प्रधानमंत्री सहित कैबिनेट के तमाम नेताओं को बनारस में दर-दर दस्तक देने की क्या ज़रूरत थी। वो दिल्ली में अपना काम करते। प्रदेश और ज़िले के भाजपा नेता अपना प्रचार का काम जारी रखते। सरकार अपना काम करती, पार्टी अपना काम करती।

जहां स्मृति ईरानी महिलाओं को साधने में लगी हैं वहीं रविशंकर प्रसाद, धर्मेद्र प्रधान तो छोड़िए, मोदी अपनी पूरी त्रिमूर्ति (मोदी, शाह और जेटली) के साथ मैदान में उतर आए हैं। प्रधानमंत्री रोडशो करेंगे, रैलियां करेंगे, बाकी लोग चौराहों, कोनों पर पूड़ी-सब्ज़ी और चाय की दुकानों तक माहौल बनाने के लिए उतार दिए गए हैं।
 
यह देश के लिए चिंता का विषय है कि जब बजट से लेकर नीतियों तक दिल्ली में बहुत कुछ संभालने और तय करने को बाकी है तो फिर पूरी सरकार को वाराणसी में क्यों झोंका जा रहा है। यह कितना उचित है। पहले के प्रधानमंत्रियों ने भी क्या ऐसा किया है और अगर किया भी है तो एक जमे-जमाए प्रधानमंत्री को इस तरह देश की सरकार को क्षेत्र की लड़ाई में झोंक देना क्या नैतिक और उचित है।

Courtesy: National Dastak

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