दक्षिण दिनाजपुर गांव में संथाल विद्रोह के प्रतीक सिद्धू मुर्मू और कान्हू मुर्मू की मूर्तियों में तोड़फोड़, BJP पर आरोप

Written by sabrang india | Published on: May 14, 2026
शनिवार, 9 मई को हुई इस तोड़फोड़ के बाद आदिवासी समुदाय के लोगों ने कड़ा विरोध प्रदर्शन किया और BJP समर्थकों पर इसका आरोप लगाया।



दक्षिण दिनाजपुर के बंसीहारी स्थित देउरिया गांव में शनिवार, 9 मई को उस समय भारी तनाव फैल गया, जब कुछ अज्ञात लोगों ने आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों सिद्धू मुर्मू और कान्हू मुर्मू की मूर्तियों को क्षतिग्रस्त कर दिया और कथित तौर पर वहां BJP के झंडे लगा दिए। इस तोड़फोड़ के बाद आदिवासी समुदाय के सदस्यों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया और BJP समर्थकों पर आरोप लगाए। द टेलीग्राफ ने इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया।

नाराज प्रदर्शनकारियों ने कुछ दुकानों और एक BJP कार्यालय को नुकसान पहुंचाया तथा पार्टी के झंडों, कुर्सियों और मेजों में आग लगा दी। स्थानीय लोगों ने बताया कि सिद्धू और कान्हू की मूर्तियां — जो ब्रिटिश शासन के खिलाफ संथाल विद्रोह के पूजनीय प्रतीक हैं — लगभग एक दशक पहले स्थापित की गई थीं।

एक प्रदर्शनकारी खुदीराम मर्दी ने कहा, “आज सुबह हमने देखा कि सिद्धू और कान्हू की मूर्तियों के हाथ टूटे हुए थे और वहां BJP के झंडे लगे थे। इससे हमें शक हुआ कि इसमें BJP का हाथ हो सकता है।” इसके चलते लोगों में भारी आक्रोश फैल गया और सैकड़ों गुस्साए ग्रामीणों ने — जिनमें कई लोग धनुष-बाण, लाठियां और झाड़ू लिए हुए थे — बांस की बैरिकेडिंग लगाकर बुनियादपुर-दौलतपुर सड़क को जाम कर दिया। प्रदर्शन का नेतृत्व मुख्य रूप से महिलाएं करती दिखाई दीं।

प्रदर्शनकारियों ने सुबह करीब 7 बजे सड़क जाम करना शुरू किया, जिससे यातायात पूरी तरह ठप हो गया। बंसीहारी पुलिस थाने से पुलिसकर्मियों की एक बड़ी टुकड़ी, केंद्रीय बल और दंगा-रोधी दस्ते के जवान तुरंत मौके पर पहुंच गए। प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि मूर्तियों को नुकसान पहुंचाने के लिए जिम्मेदार लोगों की तुरंत पहचान कर उन्हें कड़ी सजा दी जाए। अधिकारियों ने आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिया, जिसके बाद सुबह करीब 11:30 बजे सड़क जाम हटा लिया गया।

यह मामला अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बीच आरोप-प्रत्यारोप का मुद्दा बन गया है। जहां BJP ने घटना में अपनी किसी भी भूमिका से इनकार किया, वहीं तृणमूल नेताओं ने इन दावों को खारिज कर दिया।

पश्चिम बंगाल और आदिवासी अधिकार

पश्चिम बंगाल — जिसका दक्षिण दिनाजपुर एक हिस्सा है — संथाल परगना अधिनियम, 1855 से प्रभावित क्षेत्र रहा है। यह अधिनियम एक औपनिवेशिक कानून का उदाहरण है, जिसे अब तक निरस्त नहीं किया गया है। ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ संथाल विद्रोह के बाद अंग्रेजों द्वारा लागू किए गए इस अधिनियम ने तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेंसी के कुछ जिलों को “सरकार के सामान्य नियमों और अधिनियमों” के दायरे से बाहर रखा था। इसका आधार यह औपनिवेशिक धारणा थी कि संथाली समुदाय इतना “असभ्य” है कि उस पर सामान्य कानूनी व्यवस्था लागू नहीं की जा सकती। इस सोच का उल्लेख अधिनियम की प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से मिलता है।

संथाल विद्रोह औपनिवेशिक शासन के खिलाफ एक बड़ा जनआंदोलन था, जिसके प्रमुख नेता सिद्धू और कान्हू मुर्मू थे। हालांकि भारतीय इतिहास की मुख्यधारा की किताबों में इनका उल्लेख बहुत कम मिलता है। विडंबना यह है कि ‘संथाल परगना अधिनियम, 1855’ आज भी भारतीय कानून संहिता का हिस्सा बना हुआ है।

भारतीय आदिवासी समुदाय, जिनमें पश्चिम बंगाल के कई जिलों में रहने वाले समुदाय भी शामिल हैं, आज भी कुछ विशेष कानूनों और औपनिवेशिक विरासत वाली व्यवस्थाओं के प्रभाव का सामना कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, ‘हैबिचुअल ऑफेंडर्स मॉडल बिल, 1952’ ने ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम, 1871’ की जगह ली, जो कई राज्यों के ‘हैबिचुअल ऑफेंडर्स एक्ट’ का आधार बना।

1871 का कानून कुछ जनजातियों को “जन्मजात अपराधी” मानता था और सरकार को उन्हें “आपराधिक जनजाति” घोषित करने का अधिकार देता था। इस कानून के तहत लगभग 200 जनजातियों को अपराधी समुदायों के रूप में चिह्नित किया गया। हालांकि बाद में इन जनजातियों को “डी-नोटिफाइड” कर दिया गया, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर स्थिति में बहुत बदलाव नहीं आया। जिन राज्यों में ‘हैबिचुअल ऑफेंडर्स एक्ट’ लागू हैं, वहां डी-नोटिफाइड जनजातियों के लोगों को आज भी सबसे ज्यादा निशाना बनाए जाने के आरोप लगते रहे हैं।

इसके साथ ही, औपनिवेशिक दौर की “आदिम” समझ भी आज तक जारी है, जिसे सांस्कृतिक स्वायत्तता की रक्षा के नाम पर बनाए रखा गया है। संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूचियां आदिवासी क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान करती हैं। इनके तहत राज्यपालों को यह अधिकार दिया गया है कि वे अनुसूचित क्षेत्रों में केंद्रीय और राज्य कानूनों के लागू होने को रोक सकें या उनमें बदलाव कर सकें।

भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत इन क्षेत्रों को “पिछड़े इलाके” माना गया था, जबकि भारत सरकार अधिनियम, 1935 में इन्हें “आंशिक या पूर्ण रूप से अलग रखे गए क्षेत्र” कहा गया।

आलोचकों का तर्क है कि संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूचियां इन औपनिवेशिक कानूनों की भाषा और उनके पीछे छिपी “संरक्षक” मानसिकता को आगे बढ़ाती हैं। इस सोच के अनुसार आदिवासी समुदायों को “बचाने” और “मार्गदर्शन” की आवश्यकता है, भले ही इसका अर्थ उन्हें सामान्य कानूनी ढांचे से अलग रखना ही क्यों न हो।

हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि आदिवासी समुदायों के सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर करना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। लेकिन इसकी शुरुआत “संरक्षण” या “मुख्यधारा में शामिल करने” की सोच से नहीं, बल्कि “सम्मान” और “समानता” के सिद्धांतों से होनी चाहिए।

संविधान सभा में सरदार पटेल ने जयपाल सिंह मुंडा की बात का समर्थन करते हुए कहा था, “उन्हें सुरक्षा देने वाले सभी कानून मौजूद हैं, लेकिन क्या उन कानूनों ने वास्तव में उनकी रक्षा की है?” अगर उद्देश्य औपनिवेशिक सोच से कानूनों को मुक्त करना है, तो इसकी शुरुआत अपने विचारों को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त करने से ही होगी।

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