परजीवी कौन? आन्दोलनजीवी किसान या प्रचारजीवी सरकार

Written by Dr. Amrita Pathak | Published on: February 24, 2021
देश के संसदीय पद पर आसीन होकर ऐतिहासिक रूप से आन्दोलन की महान विरासत वाले देश में आन्दोलनकारियों को परजीवी शब्द से संबोधित करना लोकतान्त्रिक संसदीय ओहदे का अपमान है. महात्मा गाँधी, सुभाषचन्द्र बोस, भगत सिंह के देश में जिन्होंने आन्दोलन के दम पर देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी दिलाई, उस देश की धरती पर स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री द्वारा आन्दोलनजीवी जैसे शब्द का संबोधन करना अचंभित ही नहीं करता है बल्कि लोकतंत्र को शर्मशार भी करता है. 



एक तरफ सरकार को सत्ता में बने रहने के लिए प्रचार माध्यम का सहारा लेना पड़ता है जिसमें जनता की गाढ़ी कमाई के अरबों रूपये फूंक दिए जाते हैं तो दूसरी तरफ़ भुखमरी, गरीबी और लाचारी की शिकार जनता है जिसकी आवाज को दबाया जा रहा है ताकि सरकार से सवाल करने की सम्भावना ही नहीं रह जाए. 

सरकार से सवाल करना जनता का संवैधानिक अधिकार है जिसे जनता के टैक्स के पैसे से ही सरकार द्वारा प्रचारतंत्र का सहारा लेकर बंद किया जा रहा है. आज जिसे सरकार आन्दोलनजीवी कह रही है उसे जनता की जागरूकता और अपने अधिकारों को पाने की जीवटता का नाम देना अधिक उचित होगा. 

आज देश ऐसे समय से गुजर रहा है जहाँ सामाजिक कार्यकर्ता, छात्र-युवा-महिला आन्दोलनकारी, युवा पर्यावरणविद के ऊपर अवैध तरीके से राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, राष्ट्रद्रोह व आतंकवाद के झूठे मामले दर्ज किए जा रहे हैं. देश में सवाल करने के लोकतान्त्रिक अधिकार पर गहरा हमला है. 

सत्तासीन वर्तमान प्रधानमंत्री जी के पहले कार्यकाल 26 मई 2014 से 29 मई 2019 तक सरकार ने अपने प्रचार में कितनी राशि खर्च की तथा वर्तमान प्रधानमंत्री के दूसरे कार्यकाल की प्रारंभ तिथि 30 मई 2019 से लेकर अब तक की गयी ख़र्च का ब्यौरा अगर निकाला जाए तो यह साफ़ जाहिर होता है की परजीविता का संकेत अन्नदाता किसानों के संघर्ष में है या परजीवी सरकार के कार्यों में, जो जनता के टैक्स के पैसे को जनता के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करने पर तुली है. प्रचार माध्यम से प्रचलित होना आसान जरुर है लेकिन क्षणभंगुर है जबकि जनसरोकार के लिए किया गया संघर्ष लम्बे समय के लिए देश और दुनिया में अमिट छाप छोड़ता है. 

सरकारी ख़र्च के ब्यौरे की बात अगर की जाए तो सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय से पूछे गए एक सवाल के जबाब में बताया गया है कि सरकार नें तीन तरीके से अपना प्रचार किया और उस पर खर्च किए. 
1. प्रिंट मीडिया
2. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया
3. आउटडोर मीडिया

पहले कार्यकाल में  - 26 मई 2014 से 29 मई 2019 तक 'प्रचारजीवी'  सरकार का प्रचार खर्च - 
प्रिंट मीडिया में प्रचार खर्च - 19,19,22,02,121 (19 अरब, 19 करोड़, 22 लाख, दो हज़ार 1 सौ 21 रुपए ) 
आउटडोर मीडिया में प्रचार खर्च - 8,260,522,201 (8 अरब, 26 करोड़, 5 लाख, 22 हज़ार 2 सौ एक रुपए)
पहले कार्यकाल की तारीख 26 मई 2014 से 29 मई 2019 एवं 30 मई 2019 से 09 अक्टूबर 2019 तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 'प्रचारजीवी' सरकार का प्रचार खर्च - 27,215,749,227 (27 अरब, 21 करोड़, 57 लाख, नौ हजार 2 सौ 27)

दूसरे कार्यकाल के 30 मई 2019 से 09 अक्टूबर 2019 तक प्रिंट मीडिया में प्रचार का खर्च - 47,40,38,941 (47 करोड़, 40 लाख, 38 हज़ार,941 रुपये)

अगर सरकार के देश विदेश यात्रा और उनके मित्रों पर किए गए सरकारी खर्चे का हिसाब किया जाए तो देश की जनता के अरबों की सम्पति कॉर्पोरेट के खजानों में ही पाई जाएगी. देश के दूसरे सेक्टर मसलन भारतीय अर्थव्यवस्था भी किराए पर और निजी घरानों के साथ देशी संसाधनों के खरीद फ़रोख्त के साथ ही चलाया जा रहा है लेकिन सरकार मजबूत मीडिया प्रचार तंत्र के द्वारा जनता तक यह पहुचाने में कामयाब हुई है कि देश की अर्थव्यवस्था सही तरीके से चल रही है. आन्दोलनरत किसानों को खालिस्तानी, आतंकवादी, आन्दोलनजीवी, परजीवी बताकर देश के प्रधानमंत्री ने आम जनता के लिए अपनी मंशा जाहिर की है. 

विरोध करने वाली जनता को अमानवीय और खलनायक बताने वाली भाषा दुनिया भर के निरंकुश तानाशाहों की भाषा रही है. यह जनसंहार की ओर ले जाने वाली भड़काऊ भाषा है. भारत और पूरे विश्व के आन्दोलनजीवी ही एक समतामूलक लोकतांत्रिक दुनिया के सपने को साकार बना सकते हैं.

दरअसल परजीविता का परिचायक संघ समर्थित वर्तमान सरकार के सामने किसानों का आन्दोलन सत्ता को एक मजबूत चुनौती दे रहा है और इसी बौखलाहट में सरकार द्वारा ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है जिन शब्दों का सरोकार वर्षों से सत्तासीन पार्टी व उनके समर्थकों का रहा है. 

धर्म, जाति, मंदिर-मस्जिद, नागरिकता, लव जिहाद, जैसे संविधान विरोधी, अतार्किक एजेंडे पर आश्रित होकर सत्ता में बने रहने के बाद भी किसानों और देश के आम जनता को आन्दोलनजीवी, परजीवी कह कर सम्बोधित करना हास्यास्पद है. किसी भी विचारधारा की अपनी कार्यप्रणाली होती है उसका अपना एक तरीका होता है लेकिन भारतीय समाज में यह अध्यन किये जाने की जरुरत है कि यह कैसी विचारधारा है जिसने लोकतंत्र की बहाली व मजबूती के लिए बनायीं गयी पूरी संसदीय प्रणाली और लोकतान्त्रिक मूल्यों को अजगर की तरह निगल रही है. 

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