लव जिहाद के सियासी फ़साने में उलझा संवैधानिक अधिकार

Written by Dr. Amrita Pathak | Published on: November 28, 2020
भारत एक धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक देश है जहाँ बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर लिखित भारतीय संविधान के अनुसार देश को चलाया जाता है जहाँ देशभर में निवासित सभी नागरिक को समान अधिकार दिए गए हैं. भारतीय जनता पार्टी की सरकारों द्वारा अर्बन नक्सल की तरह ही लव जिहाद नामक शब्दावली का इजाद किया गया जिसे नए जुर्म की केटेगरी में शामिल किया गया है जो संविधान में वर्णित नहीं है. संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 देश के सभी नागरिकों को समानता की गारंटी देता है और अनुच्छेद 21 इंसान को सम्मानपूर्वक जीवन जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है साथ ही सभी नागरिक को किसी भी जाति धर्म में अपने जीवनसाथी को चुनने का अधिकार देता है. लव जिहाद नामक शब्द का जिक्र भारतीय कानून व संविधान में नहीं किया गया है. दरअसल लव जिहाद के नाम पर मच रहे बवाल के बीच धर्म परिवर्तन को लेकर बनाए जा रहे इस कानून के द्वारा नागरिकों के मौलिक अधिकारों को समाप्त किया जा रहा है. यह कानून कथित रूप से महिलाओं की अस्मिता बचाने के लिए है तो क्या इसके द्वारा महिला सुरक्षा के नाम पर महिलाओं को ही पंगु बनाए जाने का जरिया नहीं है? 21 वीं सदी में जब महिलाऐं पुरुषों के बराबर खड़े होकर अपने हक़ की बात करती है ऐसे में कोई जबरन उसका धर्म परिवर्तन करवा सकता है यह कहना महिलाओं को मंदबुद्धि समझ कर उसका अपमान करना नहीं है? सरकार द्वारा तथाकथित महिलाओं के बचाव के लिए बनाए जा रहे इस कानून द्वारा क्या महिलाओं के सम्मान और स्वतंत्र अस्तित्व पर सवाल नहीं खड़े करती है?



मनुस्मृति से सीख लेकर संविधान की झूठी कसमें खाने वाले संघ के पैरोकार भारत की सत्ता पर काबिज हैं जिनके द्वारा संविधान में वर्णित देश के नागरिक अधिकारों का हनन लगातार किया जा रहा है. संविधान देश के वयस्क नागरिक को यह अधिकार देता है कि वह अपनी मर्जी से जीवन साथी का चुनाव कर सकता है या किसी भी धर्म को अपना सकता है. वर्तमान सरकार का यह नया फरमान संविधान के मूल्यों व् नागरिक अधिकारों का उलंघन है.  

लव जिहाद की अवधारणा का आधार क्या है?
लव जिहाद की अवधारणा कुछ ऐसी ही है जैसे कि ‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना’. भारत में महिलाओं पर अत्याचार कोई नयी बात नहीं है. आनर किलिंग के नाम पर सांप्रदायिक जहर का फैलाव भी नया नहीं है जिसका प्रसार ही आज लव जिहाद का रूप ले चूका है. इसके पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि दुसरे धर्म के लोगों द्वारा साजिशन हिन्दू लड़कियों का धर्म परिवर्तन करवाया जा रहा है हालाँकि बार-बार समय-समय पर इस तरह के आरोपों की जाँच की गयी है जिसमें अधिकतर आरोप गलत पाए गए हैं. उतर प्रदेश देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है जिसने लव जिहाद के ख़िलाफ़ कानून बनाने के लिए अध्यादेश को पारित किया था जिसे आज राजपाल आनंदीबेन पटेल की मंजूरी मिल चुकी है और यह अध्यादेश कानून में तब्दील हो चूका है. इस प्रस्ताव के मुताबिक कथित रूप से बनाए गए इस जुर्म के मामले में गैर जमानती धाराओं में केस दर्ज होगा. उत्तर प्रदेश के अलावा मध्य प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा सहित हिमाचल प्रदेश में भी ऐसे कानून बनाने की तैयारी चल रही है. 

उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध कानून में प्रावधान है कि किसी भी धर्म की महिलाओं को जबरन या गुमराह करके या शादी के जरिए धर्म बदलवाने का दोष साबित होने पर सजा का प्रावधान किया गया है. इस अध्यादेश के द्वारा दुसरे धर्म में शादी करके चाहे या अनचाहे किए जाने वाले घर्म परिवर्तन को रोके जाने का दावा किया गया है. अनुसूचित जाति या जनजाति के लोगों का धर्म परिवर्तन कराने पर इस प्रावधान के तहत कड़ी कार्यवाई किए जाने की वकालत की गयी है. इस कानून में प्रावधान है कि अगर कोई अपनी मर्जी से घर्म को बदलना चाहता है तो उसे जिलाधिकारी को दो महीने पहले सूचित करना पड़ेगा और ऐसा नहीं करने पर 6 महीने से तीन साल तक की सजा हो सकती है. धर्मान्तरण के मामले में अगर परिवार के सदस्यों में से माता पिता या अन्य रिश्तेदार शिकायत करते हैं तो कार्यवाई की शुरुआत की जा सकती है और धर्म बदलने के लिए दोषी पाए जाने पर 1 साल से 10 साल तक की सजा भी हो सकती है. इसके अनुसार लव जिहाद के मामले में मदद करने वालों को भी मुख्य आरोपी ही माना जाएगा.  

लव जिहाद साबित कैसे होगा?
धर्मान्तरण को लेकर कानून बनाए जाने की मांग भारतीय जनता पार्टी के पुराने मुद्दों में शामिल है. चुकी यह मसला राज्य सरकार के अधीनस्थ है तो केंद्र सरकार ऐसे मामलों में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करने से बचती है. उतर प्रदेश सहित कई राज्यों ख़ासकर बीजेपी शासित राज्यों में इसे लागू करवाने की प्रक्रिया जारी है. सवाल यह है कि अगर यह कानून बन भी जाएगा तो यह साबित कैसे होगा कि आरोप लव जिहाद का ही है. बालिग युवाओं के शादी करने के फैसले के बीच जब धर्म और जाति आड़े नहीं आ पाती है तो यह कानून प्यार के बंधन में बंधे युवाओं पर कितना असर दिखा पाएगी? प्यार के रिश्ते में कई बार लोग धर्म परिवर्तन करने से गुरेज नहीं करते. अगर यह मान भी लिया जाए कि किसी मामले में जबरन धर्म परिवर्तन करवाया गया हो लेकिन शादी के बाद दोनों युवा शांति पूर्वक शादीशुदा जिंदगी गुजार रहे हो और कानून के झमेले में न पड़ कर अपनी जिन्दगी जीना चाहते हो तो ऐसे हालत में इस कानून का क्या औचित्य रह जाएगा या इसे कैसे लागू कराया जाएगा? इस कानून क तहत रिश्तेदार की शिकायत पर भी केस दर्ज किया जा सकता है ऐसे में प्रेम विवाह करने वाले जोड़े के संवैधानिक अधिकारों को क्या अछुन्न रखा जा सकेगा?

क्या लव जिहाद शब्द राजनीति से प्रेरित है?
हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीतिक विचारधारा को विकसिक करने का बीड़ा उठाने वाले वी डी सावरकर अपनी पुस्तक ‘सिक्स एपोक्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री’ में कहते हैं कि “हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार का बदला लेने के लिए मुस्लिम महिलाओं की भी इज्जत लूट ली जानी चाहिए” इससे जाहिर होता है कि सांप्रदायिक सोच की नींव पर खड़ी हुई संघ के लोगों के लिए वर्षों से बलात्कार एक राजनीतिक हथियार रहा है. मनुवाद को पवित्र पुस्तक के तौर पर देखने वाले ऐसे सूरवीरों के लिए महिलाऐं बच्चे पैदा करने और घर की शोभा बन कर रहने से ज्यादा कुछ नहीं है.  महिलाओं को घर की शोभा और खानदान के इज्जत का पुलिंदा मानकर इन हिन्दू संगठनों के द्वारा लव जिहाद का यह नया शगूफा निश्चित तौर पर राजनीति से प्रेरित है जो आने वाले चुनाव में जनता की भावनाओं को सामने रख कर सत्ता पर काबिज होने का हथियार बनाया जा सकता है. कुछ ऐसे ही हालात केरल के हदिया के साथ और कानपूर के मामलों में भी देखा गया है जिसे लव जिहाद का नाम दिया गया. 

महिलाओं की अस्मिता से जुड़े इस लव जिहाद की गंभीरता को देखते हुए लोगों ने इसे विस्तार से जानना चाहा जिसका अधिकार भी सुचना के अधिकार अधिनियम(आरटीआई) के तहत देश के नागरिकों को दिया गया है. आरटीआई  के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में राष्ट्रीय महिला आयोग ने कहा कि उनके पास “लव जिहाद से जुड़ा कोई भी डाटा मौजूद नहीं है”. जिसे उन्होंने अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर अनिकेत आगा के द्वारा किए गए आरटीआई अनुरोध के जवाब में बताया है. तथाकथित रूप से महिलाओं के हित में बनाए गए इस कानून के द्वारा महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित करने का प्रयास किया जा रहा है. अंतर्धार्मिक विवाहों या प्रेम विवाहों को लव जिहाद की संज्ञा से नवाजना भविष्य में ख़तरनाक व् निर्मम राजनीति की तरफ इशारा कर रहा है. महिलाओं के सम्मान में उठाए गए इस कदम के रखवाले को हर रोज अपने ही धर्म में घरेलू हिंसा की शिकार होती महिलाऐं दिखाई नहीं देती. ऐसी ताकतों को महिलाओं को मिलने वाले सामान अधिकार, स्वास्थ्य सुविधा या शिक्षा-रोजगार से कोई लेना देना नहीं है जिससे अधिकांश महिलाऐं वंचित रह जाती हैं. धर्म और विधर्मियों के इस मसले को आगे बढ़ाना, सरकार द्वारा आधारभूत मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाकर लव जिहाद में उलझाना राजनीति से प्रेरित है जो सत्ता धारी पार्टी के पुराने गुणों में शुमार है जिसका आधार भय है और जिसका औजार महिलाऐं हैं.

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