मैंने उनसे महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की बात की तो वे मुझे न्यूज़ चैनल्स की बंदरछाप न्यूज़ बताने लगे...

Written by Mithun Prajapati | Published on: September 15, 2020
आज उनके घर फिर से जाना हुआ। घूमने के उद्देश्य से नहीं बल्कि सब्जी छोड़ने के लिए। ऐसे तो वे लॉकडाउन में सब्जियां उठा ले जाते थे दुकान से। पर जबसे सब खुलने लगा है और कोरोना का डर कम हुआ है लोगों में तो वे अपने पुराने आलस पर फिर आ गए और फोन करके मंगा लेते हैं। 



मैंने दरवाजे पर पहुंचकर बेल बजाई। कुछ देर दरवाजे के खुल जाने की प्रतीक्षा में खड़ा रहा। दरवाजा न खुला। मैं अगल बगल चीजों का मुआयना करने लगा। दरवाजा साफ सुथरा था। एक फूल की माला जिसे आम भाषा मे तोरण कहा जाता है दरवाजे पर लटक रहा था। उसकी विशेषता यह थी कि वह सूख के अपने मूल स्वरूप को खो चुकी थी। शायद किसी पूर्व त्योहार पर उसे दरवाजे पर टांग दिया गया था और लगाने वाले ने अपने शुभ अशुभ या आलस की वजह से उसे अबतक नहीं उतारा था। उस तोरण कहे जाने वाले सूखे फूलों के नीचे एक हनुमान, एक गणेश और एक साईं की फोटो चिपका दी गई थी जो शायद चिपकाए जाने के बाद से अबतक साफ न की गई थी। उसे देखकर लगता था भगवान लोग नाराज होते होंगे। कुछ क्षण बीत गए तो मैंने बेल फिर से बजा दी। इस बार बेल के बजा देने से एक सचिन पायलट से दिखने वाले व्यक्ति ने दरवाजे को खोल दिया। उसे देखते ही मेरे दिमाग में पिछले महीने राजस्थान में हुए घटनाक्रम याद आ गए। मुझे याद आ गया कि जब दुनिया, देश, देश के लोग कोरोना नाम की महामारी से लड़ रहे थे तो कुछ लोग सरकार गिराने, बनाने की जुगत में लग देश को महत्वपूर्ण मुद्दों से भटकाए रखे थे। खैर...

उस सचिन पायलट से दिखने वाले व्यक्ति ने छोटी सी स्माइल दी। यह मुझे अच्छा लगा। अक्सर लोग सब्जी वाले को देखकर न्यूट्रल रहते हैं। बस काम की बात कर ली, सब्जियों के दाम जान लिए पैसे दिए, आगे बढ़ गए। पर एक मुस्कान इन सब प्रक्रियाओं को सुकून भरा बना देने में मददगार होती है। 

उस व्यक्ति ने पूछा- आप मिथुन हैं न?

मैंने हां में सिर हिला दिया। 

उसने फिर कहा- सब्जियां लाये हैं न? एक काम करो, अंदर आ जाओ। फादर वाशरूम में हैं। वे आ जाएंगे तो पैसे देंगे। इतना कहकर उसने दरवाजा पूरा खोल दिया। मैं अंदर प्रवेश कर गया सब्जियों के साथ। उसने सब्जियां हाथ से ले ली और सोफे की तरफ इशारा करके बैठने को कहा। मैंने अपने आप को सोफे पर बिठा दिया। वह सब्जी रखने अंदर चला गया। एक बात तो क्लियर हो गई कि सचिन पायलट सा दिखने वाला व्यक्ति फादर का बेटा है जो इस समय वाशरूम में हैं। मैंने उसे पहली बार देखा था। फादर ने कई बार उसका जिक्र किया था जब दुकान पर सब्जियां लेने आते थे। आज वह दिख गया था। 

मैं सोफे पर बैठा फादर के आने की प्रतीक्षा करने लगा। सामने tv चल रही थी। tv पर कोई न्यूज़ चैनल था जो जून से चले आ रहे मुद्दे को ब्रेकिंग न्यूज़ बताकर बार बार फ़्लैश कर रहा था। मुझे उसमें दिलचस्पी नहीं थी। मैं न्यूज़ नहीं देखता। महत्वपूर्ण खबरें बहुत सी विश्वसनीय वेबसाइटों से मिल जाती हैं। कभी कभी ndtv देख लेता था। पर केबल ऑपरेटर ने आजकल वह भी काट दिया है। यह महज मेरी शिकायत नहीं है। मेरे जानने वाले भी यही बताते हैं। यह सिर्फ मुम्बई में नहीं हो रहा। पूरे देश मे हो रहा है। खबर दिखाने वाले, रोजगार, महंगाई, भुखमरी की खबर दिखाने वाले चैनलों के प्रसारण रोकने के प्रयास लगातार जारी हैं। सही रिपोर्टिंग करने वालों को प्रताड़ित करना लगातार जारी है। 

मुझे उत्तर प्रदेश का वह रिपोर्टर याद आ रहा है जिसने प्राइमरी स्कूल में मिड डे मील में नमक रोटी खाते बच्चों पर रिपोर्टिंग की थी और उसपर सरकारी कार्यवाही हो गई थी। यह पिछले साल सितंबर महीने की ही बात है। वह रिपोर्टर कहाँ है कैसा है किसी को नहीं पता। किसी की गिरफ्तारी पर चार दिन कैंपेन चलता है फिर मामला ठंडा हो जाता है। सुधा भारद्वाज को दो साल से भी अधिक हो गए जेल में। उनके लिए आवाजें उठना बन्द हो गई हैं। कुछ लोग हैं जो लगातार इस बात को उठाये हुए हैं। कुछ दिन पहले ही बिलासपुर की सामाजिक कार्यकर्ता अधिवक्ता प्रियंका शुक्ला ने इसके लिए सड़क पर उतरकर साथियों के साथ आवाज उठाई थी। उनका प्रयास अब भी जारी है। कुछ दिन पहले ही प्रियंका शुक्ला के साथ बिलासपुर पुलिस ने मारपीट भी की। क्यों की? क्योंकि प्रियंका शुक्ला HIV पीड़ित  बच्चियों की मदद के लिए आगे आई थीं। मारपीट करने वालों पर कार्यवाही का इंतजार प्रियंका कर रही हैं। मैं भी कर रहा हूँ। मामले की जानकारी इकट्ठा कीजिये और आप भी करिए। 

उमर खालिद को भी परसों गिरफ्तार कर लिया गया। आवाज उनके लिए भी उठ रही है। उठनी चाहिए। लगातार उठनी चाहिए। हर उस व्यक्ति के लिए आवाज उठनी चाहिए जिसे राजनीतिक कारणों से जेल में निर्दोष होने के बावजूद ठूस दिया गया है। 

मैंने tv से ध्यान हटाने के लिए दीवारों को देखना शुरू किया। पेंट अच्छा था। कुछ फूल पत्त्ती के अलावा महापुरुषों की तस्वीरें भी टंगी थी दीवार पर। अंदर भी भगवान की तस्वीरें थी। पर ये वाली साफ सुथरी थीं। एक ही घर में भगवान के साथ भेदभाव दिख रहा था। बाहर के भगवान को साफ़ क्यों नहीं किया जाता था यह फादर ही जाने। इन सबको देखते हुए मेरी निगाह भगतसिंह पर जा टिकी। मेरी आँखें तब फटी की फटी रह गईं जब मैने भगतसिंह के ठीक बगल में सावरकर की फोटो देखी। यह कैसा मेल है? 

यह मेरे लिए आश्चर्य का विषय था। क्या फोटो लगाने वाला भगतसिंह को पढ़ा है? क्या उसने सावरकर की जीवनी उनकी विचारधारा को पढ़ा है? यदि दोनों को पढ़ा है तो ये कैसे संभव हुआ कि दोनों को अगल बगल टांग दिया है? 

भगतसिंह के साथ गांधी फिट होते हैं। जब बम का दर्शन से लेकर धार्मिक कट्टरता आदि पर भगतसिंह को पढ़ते हैं तो लक्ष्य गांधी भगतसिंह का एक ही दिखता है। पर यहां दो विपरीत विचारों के व्यक्ति को एक साथ टांगकर टांगने वाले ने जो अतिश्योक्ति पैदा की है वह मिसाल के रूप में देखी जा सकती है। किसी महान संत ने एक दिन कह दिया था- हिप्पोक्रेसी की भी सीमा होती है। 

मैं बैठा यही सब सोच रहा था कि फादर वाशरूम से बाहर आये। कहने लगे- हेलो मिथुन... क्या हाल है?
मैंने कहा- बढ़िया है अब तो। आप बताइए सर।

फादर बोले- ठीक है यार। 
फिर tv को दस सेकंड तक देखने के बाद बोले- देख रहे हो क्या गंध मचा रखी है। बिचारी का घर तोड़ दिया।
यह बात उन्होंने दुःखी होते हुए कही थी।  

मैं उनके दुख को हल्का करने की सोच रहा था। मैंने कहा- गलत तो हुआ है। किसी का घर नहीं गिराना चाहिए। गलत तरीके से कोई बन भी गया है तो थोड़ा मोहलत देनी चाहिए। 

उन्होंने 'हूँ' कहा। फिर 'राइट' कहा। थोड़ा गंभीर हुए। 

मैंने उनकी गंभीरता को देखते हुए कहा- सुप्रीम कोर्ट भी 48 हजार के करीब रेल के किनारों के झोपड़े तोड़ने का आदेश दे चुका है। बिचारे सब कहाँ जाएंगे। ऊपर से सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि इसपर राजनीति न हो। सुप्रीम कोर्ट को घर तोड़ने के आदेश से पहले उनमें रहने वालों की रहने के लिये वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए थी। 

उन्होंने इस बात को जैसे सुना ही नहीं। बात को अलग दिशा में मोड़ते हुए कहने लगे- आजकल खूब सब्जियों की गाड़ियां लगने लगी हैं न? क्या सब्जियां सस्ती हो गईं?

मैंने कहा- आलू 50, टमाटर 70, प्याज 40 पर है। यह सस्ता तो नहीं है।

वे दाढ़ी खुजाते हुए बोले- फिर इतने ठेले कैसे आ गए? यह सब तो सस्ता होने पर दिखते हैं न?

मैंने कहा- सब नए लोग हैं। अलग तरह के काम करने वाले काम बंद होने से सब्जी, फ्रूट, चाय यही सब का काम कर रहे जीवन जीने के लिए। सरकार ने तो रोजगार के मामले में हाथ खड़े कर दिये ऐसा लगता है
। 
उन्होंने बात फिर घुमा दी। कहने लगे- चीन में देख रहे हो क्या चल रहा है? सरकार बहुत बेहतर कर रही है। रियली डूइंग वेरी गुड। चीन से सामना करना और टिके रहना बड़ी बात है। अमेरिका भी पंगे लेने से कतराता है। पर मोदी जी'ज ट्रिक एंड राजनाथ'स  एक्शन एक्चुअली वेरी गुड। 

मैंने कहा- हां वो तो है। पर सरकार इंटर्नल मामले में थोड़ा ध्यान दे लाइक, रोजगार, स्वास्थ्य, किसान तो ... 
उन्होंने बात बीच में ही काट दी। कहने लगे- कितना हुआ टोटल अमाउंट सब्जी का? 
मैंने उन्हें बताया- पिछला बकाया मिलाकर इतना रुपया।

उन्होंने कहा- पिछला वाला बिल क्लियर कर देता हूँ। इस बार का बाद में। वो क्या है न बेटे को कंपनी ने अनिश्चित काल के लिए लीव पर भेज दिया है वह भी विदाउट पेड। तो थोड़ा संभाल लो। अपन बाद में एडजस्ट करते हैं। 

यह बात उन्होंने थोड़ी निराशा के साथ कही थी। ऐसी निराशा जो आजकल बहुत से चेहरों ओर दिख जाती है। 
मैंने उन्हें स्माइल देते हुए कहा- ओके सर। 

वे पैसे देने लगे। कहने लगे- यार सौ रुपये कम हैं। 
थोड़ा इधर उधर देखने के बाद फिर बोले- ये सौ आज वाले में ऐड कर दो अगली बार सब क्लियर। 
मैंने फिर स्माइल दी और कहा- ओके सर। नो प्रॉब्लम।

मैं जाने के लिए आगे बढ़ा। फादर ने रिमोट उठाकर tv का चैनल बदल दिया। एक ऐंकर सा दिखने वाला आदमी पता नहीं क्या चिल्लाये जा रहा था। बाहर आते आते मेरी निगाह फिर से भगतसिंह और सावरकर के फोटो पर पड़ी। मैं रास्ते भर दोनों में समानता ढूंढता रहा। एक समानता मिली। दोनों नास्तिक थे। पर अपनी अपनी नास्तिकता है कोई समाज पर मर खप जाता है कोई अवसरवादी हो लड्डू खाता है।

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