मंडल दिवस: OBC राग गाकर राजनीतिक लाभ लेने वाली BJP पिछड़ों के समुचित प्रतिनिधित्व पर मौन क्यों?

Written by Navnish Kumar | Published on: August 7, 2021
मोदी सरकार के एससी-एसटी से इतर आबादी की जातिवार गणना नहीं कराने के नीतिगत फैसले से जातीय जनगणना का मुद्दा एक बार फिर से चर्चाओं में है। ओबीसी महासभा, राष्ट्रीय जनता दल, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जीतनराम मांझी, केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले, भाजपा की पंकजा मुंडे व सपा-बसपा, कांग्रेस आदि तमाम दलों व नेताओं ने जातीय जनगणना कराने को लेकर आवाज उठाई है। यही नहीं बिहार विधानसभा और महाराष्ट्र सरकार तक जातीय जनगणना की मांग के प्रस्ताव को हरी झंडी दे चुकी है। इनका तर्क है कि इससे असल मायने में जरूरतमंदों (पिछड़ों) को सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक मदद मिल सकेगी। लेकिन जो मोदी सरकार मंत्रिमंडल विस्तार के बाद ख़ुद को ओबीसी मंत्रियों की सरकार तक कहते नहीं थक रही है, जो सरकार नीट परीक्षा के ऑल इंडिया कोटे में ओबीसी आरक्षण पर ख़ुद अपनी पीठ थपथपाती रही है वो जातिगत गणना की पक्षधर नहीं है। सवाल यह भी है कि जो सरकार किसी जाति को पिछड़ा वर्ग में शामिल करने के राज्यों के अधिकार की बहाली के विचाराधीन प्रस्ताव तक को, राजनीतिक लाभ लेने के तौर से पेश कर रही हो, वह मोदी सरकार पिछड़ों के प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के सवालों पर मौन क्यों हैं?



बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कहना है कि जातिगत जनगणना सभी तबकों के विकास के लिए आवश्यक है। किस इलाके में किस जाति की कितनी संख्या है, जब यह पता चलेगा तभी उनके कल्याण के लिए ठीक ढंग से काम हो सकेगा। जाहिर है, जब किसी इलाके में एक खास जाति के होने का पता चलेगा तभी सियासी पार्टियां उसी हिसाब से मुद्दों और उम्मीदवारों के चयन से लेकर अपनी तमाम रणनीतियां बना सकेंगी। उन्होंने कहा, सही संख्या पता चलने से सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में उन्हें उचित प्रतिनिधत्व देने का रास्ता साफ हो सकेगा। 

नीतीश कुमार कहते हैं कि इसके लिए उन्होंने पीएम से मिलने को समय मांगा है। अन्यथा की स्थिति में बिहार सरकार खुद पिछड़ों की गणना कराएगी। बिहार के नेता प्रतिपक्ष व राजद अध्यक्ष तेजस्वी यादव ने जातीय जनगणना, मंडल कमीशन की शेष सिफारिशों को लागू करने तथा ओबीसी कोटे के बैकलॉग रिक्तियों को शीघ्र भरे जाने की मांग को लेकर राज्य व्यापी प्रदर्शन का ऐलान किया है। तेजस्वी यादव ने कहा, "जातीय जनगणना देश के विकास एव समाज के वंचित और उपेक्षित समूहों के उत्थान के किए अति ज़रूरी है। विश्व के लगभग हर लोकतांत्रिक देश में समाज की बराबरी, उन्नति, समृद्धि, विविधता और उसकी वास्तविक सच्चाई जानने के लिए जनगणना होती है। सरकार हर धर्म के आँकड़े जुटाती है इसी प्रकार अगर हर जाति के भी विश्वसनीय आँकड़े जुट जाएँगे तो उसी आधार पर हर वर्ग और जाति के शैक्षणिक आर्थिक उत्थान, कार्य पालिका, विधायिका सहित अन्य क्षेत्रों में समान प्रतिनिधित्व देने वाली न्यायपूर्ण नीतियां बनाई जा सकेंगी।" 

तेजस्वी यादव ने देश में गैरबराबरी का मुद्दा उठाते हुए कहा कि जातीय जनगणना होगी तो उसी अनुसार बजट का भी आवंटन किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि हमारे देश में 1931 में यानि 90 वर्ष पूर्व जातिगत जनगणना हुई थी। उसके बाद कोई सही आंकड़ा सरकारों ने सामने नहीं आने दिया। जातिगत जनगणना सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम हैं। जातीय जनगणना से समाज के अंतिम पायदान पर खड़े सामाजिक समूहों को आगे आने का विश्वसनीय अवसर मिलेगा। तेजस्वी यादव ने जातीय जनगणना की मांग को राजद की पुरानी मांग बताते हुए कहा कि हमारी पार्टी की यह पुरानी माँग रही है। उन्होंने कहा, "हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद के अथक प्रयासों और दबाव के चलते 2010 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने जातिगत जनगणना कराने का निर्णय लिया था। उस पर लगभग 5000 करोड़ खर्च भी किया गया लेकिन केंद्र की मोदी सरकार ने सभी आँकड़े छुपा लिए।" उन्होंने कहा कि हम सामाजिक न्याय के लिए संघर्षों और इंसाफ के मूल्यों के लिए पूर्णत: प्रतिबद्ध हैं।

सपा व कांग्रेस के साथ बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी पिछड़ों की गणना की मांग की है। कहा- इसके लिए वह संसद के अंदर व बाहर दोनों जगह मोदी सरकार का साथ देने को तैयार हैं। यही नहीं, ओबीसी महासभा के साथ रिहाई मंच आदि बिहार-यूपी के कई संगठनों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने 7 अगस्त को ''राष्ट्रीय ओबीसी दिवस'' घोषित किया है और ओबीसी पहचान और बहुजन एकजुटता को बुलंद करने की दिशा में बढ़ने के साथ ओबीसी एससी एसटी और सामाजिक न्याय पसंद नागरिकों से सड़क पर उतरने और जातिवार जनगणना कराने की मांग पर हुंकार भरने का आह्वान किया है। सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) के रिंकु यादव व रामानंद पासवान तथा रिहाई मंच (उत्तर प्रदेश) के राजीव यादव और सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) के गौतम कुमार प्रीतम ने बताया कि जातिवार जनगणना कराने के साथ एससी, एसटी व ओबीसी आरक्षण के प्रावधानों के उल्लंघन को संज्ञेय अपराध बनाने, ओबीसी को आबादी के अनुपात में आरक्षण देने व निजी क्षेत्र, न्यायपालिका, मीडिया सहित सभी क्षेत्रों में आरक्षण लागू करने की मांगों को लेकर बिहार-यूपी के कई केन्द्रों पर प्रतिरोध मार्च, विरोध प्रदर्शन व सभाएं आयोजित होगी। साथ ही सोशल मीडिया के जरिए भी आवाज बुलंद होगी। 

कम्युनिस्ट फ्रंट (बनारस) के मनीष शर्मा और सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) के अंजनी ने बताया है कि 7 अगस्त 1990 खास तौर से ओबीसी समाज के लिए बड़े महत्व का दिन है। इसी दिन आजादी के बाद लंबे इंतजार व संघर्ष के बाद ओबीसी के लिए सामाजिक न्याय की गारंटी की दिशा में पहला ठोस पहल हुआ था। वीपी सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की कई अनुशंसाओं में से एक, सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण को लागू करने की घोषणा की थी। देश की 52% आबादी के लिए सामाजिक न्याय की दिशा में इस फैसले का राष्ट्रीय महत्व है, क्योंकि ओबीसी के हिस्से का सामाजिक न्याय, राष्ट्र निर्माण की महत्वपूर्ण कुंजी है।

जाति जनगणना संघर्ष मोर्चा (बिहार) के विजय कुमार चौधरी और सूरज कुमार यादव ने कहा है कि 7 अगस्त 1990 को केन्द्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी के लिए 27% आरक्षण की घोषणा ने ओबीसी पहचान और बहुजन समाज की एकजुटता को आवेग प्रदान किया था। हिंदुत्व की शक्तियां, ओबीसी पहचान के टूटने व बहुजन एकजुटता के बिखरने के चलते मजबूत हुई हैं। बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन (बिहार) के सोनम राव और बिहार फुले-अंबेडकर युवा मंच के अमनरंजन यादव ने कहा कि ओबीसी की जाति जनगणना नहीं कराना इस समुदाय के सम्मान व पहचान पर हमला है। ओबीसी संवैधानिक कैटेगरी है और इस कैटेगरी को ऐतिहासिक वंचना से बाहर निकालने के लिए सामाजिक न्याय की बात संविधान में है, लेकिन उस कैटेगरी के सामाजिक-शैक्षणिक व आर्थिक जीवन से जुड़े अद्यतन आंकड़ों को जुटाने के लिए जाति जनगणना से इंकार करना सामाजिक न्याय और ओबीसी के संवैधानिक अधिकारों के प्रति घृणा की अभिव्यक्ति है। 

बहुजन बुद्धिजीवी डॉ. विलक्षण रविदास ने ब्राह्मणवादी शक्तियों के खिलाफ जाति जनगणना सहित अन्य सवालों पर 7 अगस्त को ओबीसी के साथ-साथ संपूर्ण बहुजन समाज से सड़कों पर उतरकर एकजुटता व दावेदारी को आगे बढ़ाने की अपील की है। पूर्वांचल बहुजन मोर्चा के डा. अनूप श्रमिक, पूर्वांचल किसान यूनियन के योगीराज पटेल, बनारस के अधिवक्ता प्रेम प्रकाश यादव, पटना के युवा सामाजिक कार्यकर्ता रंजन यादव, बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन (बिहार) के अनुपम आशीष, रिहाई मंच के बलवंत यादव, मुंगेर के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता मणि कुमार अकेला आदि ने एक सुर में 7 अगस्त राष्ट्रीय ओबीसी दिवस को जातिवार जनगणना सहित अन्य सवालों पर सड़क से सोशल मीडिया तक आवाज बुलंद करते हुए, मनाने का आह्वान किया है। 

यही नहीं, देश की योजनाएं बनाने वाले कई विशेषज्ञ भी जातिवार जनगणना के पक्ष में हैं। उनका मानना है कि कमजोर तबके के लोगों की सही संख्या पता होने पर कल्याणकारी योजनाओं के लिए लक्ष्य बनाने व बजट तय करने में आसानी होगी। दरअसल देश में आखिरी बार जाति आधारित जनगणना 1931 में हुई थी। उस समय पाकिस्तान और बांग्लादेश भी भारत का हिस्सा थे। तब देश की आबादी 30 करोड़ के करीब थी। अब तक उसी आधार पर यह अनुमान लगाया जाता रहा है कि देश में किस जाति के कितने लोग हैं। जातीय जनगणना नहीं होने से यह सटीक तौर पर पता नहीं चल पाया कि ओबीसी और ओबीसी के भीतर विभिन्न समूहों की कितनी आबादी है। 1931 में जाति आधारित जनगणना के आधार पर ही अब तक माना जाता है कि देश में 52% ओबीसी आबादी है। मंडल आयोग ने भी यही अनुमान लगाया कि ओबीसी 52% है। इसी तरह ओबीसी आबादी को लेकर चुनाव के समय राजनीतिक दल अपना अनुमान लगाते है। लेकिन सवाल है कि जो मोदी सरकार मंत्रिमंडल विस्तार के बाद ख़ुद को ओबीसी मंत्रियों की सरकार कहते नहीं थक रही थी, जो सरकार नीट परीक्षा के ऑल इंडिया कोटे में ओबीसी आरक्षण देने पर ख़ुद अपनी पीठ थपथपाती रही है, आख़िर वही मोदी सरकार जातिगत जनगणना से क्यों भाग रही है? 

यह भी तब जब 2019 के लोकसभा चुनाव से ऐन पहले तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने ऐलान किया था कि 2021 की जनगणना में ओबीसी की गिनती की जाएगी। लेकिन चुनाव बाद भाजपा इस पर मौन साध गई। जबकि इस बीच मोदी सरकार ने ओबीसी के सब-कैटेगराइजेशन की दिशा में कदम भी उठाया। इसके लिए सरकार ने अक्टूबर 2017 में रोहिणी कमीशन बनाया। सेंट्रल लिस्ट में शामिल करीब ढाई हजार ओबीसी की सब-कैटेगरी तय करने के बाद 27 फीसदी कोटा को उनके अनुपात में देने का इरादा था। दक्षिण भारत के राज्यों ने इसकी अगुवाई की। इसके पीछे सोच यह थी कि पिछड़े वर्ग की प्रभावशाली जातियों के कोटा की एक लिमिट तय की जाए ताकि समूचे ओबीसी में हर जाति को उचित रूप से आरक्षण मिल सके।

यही नहीं, केंद्र सरकार ओबीसी की सूची पर राज्यों की शक्ति बहाल करने को लेकर कानून बनाने पर विचार कर रही है। इसके लिए संसद के मौजूदा सत्र में ही 127वां संविधान संशोधन विधेयक लाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल 5 मई को मराठा आरक्षण को लेकर दिए एक फैसले में राज्यों सरकारों से ओबीसी की पहचान करने और उन्हें अधिसूचित करने का अधिकार वापस ले लिया था। ईटी की खबर के मुताबिक, एक बार संसद संविधान के अनुच्छेद 342-ए और 366(26) सी के संशोधन पर मुहर लगा देगी तो इसके बाद राज्यों के पास फिर से ओबीसी सूची में जातियों को अधिसूचित करने का अधिकार होगा। बीते महीने सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस रिव्यू याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें सरकार ने कोर्ट के 5 मई के आरक्षण मामले में दिए फैसले पर दोबारा विचार करने को कहा था। लेकिन इन सभी फैसलों के पीछे ओबीसी के प्रति कोई दरियादिली नहीं हैं बल्कि भाजपा की चुनावी राजनीति ही ज्यादा है।

भाजपा की निगाह जहां ओबीसी के बीच 'अति पिछड़ों' और 'मजबूत पिछड़ों' का अंतर दिखाकर यानी सब कैटेगराइजेशन का राजनीतिक लाभ लेने पर है। वहीं, जातिवार जनगणना के समर्थकों का मानना है कि सब-कैटेगराइजेशन तभी किया जा सकता है, जब सभी OBC की आबादी की सही तस्वीर सामने हो। साथ ही, यह भी पता चले कि मंडल कमीशन ने जिन 34 सौ से ज्यादा पिछड़े समुदायों की पहचान की थी, उनकी आबादी कितनी है। 'पिछड़ों', 'अति पिछड़ों' और 'अत्यंत पिछड़ों' की संख्या के आधार पर ही आरक्षण का बंटवारा होगा। उनका कहना है कि जातिवार जनगणना नहीं होगी तो आरक्षण का बंटवारा मनमाने तौर पर किए जाने का खतरा है।

घुमंतू जातियों पर विशेषज्ञता रखने वाले इतिहासकार रमा शंकर सिंह अपने ब्लॉग में कहते हैं कि पिछड़ा वर्ग में शामिल कई जातियों के बारे में स्वयं इस वर्ग में शामिल मुखर जातियों के युवा, अध्यापक और सामुदायिक नेता भी नहीं जानते हैं। यही हाल अधिकारियों का है, विशेषकर उनका जिन्हें जाति प्रमाणपत्र जारी करना होता है। वे सरकारी आदेशों से बंधे बंधाये होते हैं। जैसे क्या आप कसगड़ नामक जाति को जानते हैं? नहीं जानते होंगे। यही हाल अनुसूचित जातियों का है। इसमें सरकारी रूप से शामिल 66 जातियों में अधिकतर का नामलेवा नहीं है (हालांकि उनकी जनसंख्या होती है। हर जनगणना में उनका जिलावार उल्लेख किया जाता है। इंटरनेट पर अनुसूचित जाति के जनगणना के आँकड़े हैं। सबसे बुरी दशा तो उन जातियों की है जिन्हें घुमंतू, अर्ध-घुमंतू और विमुक्त कहा जाता है। दो-दो आयोगों के गठन के बावजूद अभी उनकी हर जिले में जनसंख्या का कोई विश्वसनीय आंकड़ा उपलब्‍ध नहीं है क्योंकि कई जातियां और श्रेणियां आपस मे ओवरलैप कर जाती हैं। 

ऐसे में जातिगत जनगणना से हम सब भारतवासी उन सब के बारे में जान पाएंगे। भारत की जातिगत विविधता को जान पाएंगे। वह कहते हैं कि परिचय से प्रेम उपजता है। जाति आधारित जनगणना से जातिवाद फैलेगा, यह एक आधारहीन भय है। इसके आने से किसी की जाति संकट में नहीं पड़ जाएगी और न ही लोग मरने-मारने पर उतारू हो जाएंगे। जातिविहीन समाज तब तक नहीं बन सकता है जब तक समानता न स्थापित हो, सबको बराबर की सुविधा न मिले। यह तभी संभव होगा जब हमें वस्तुस्थिति का पता हो। इससे भारत, यूरोप और अमेरिका के समाजशास्त्र और मानवविज्ञान सहित अन्य सामाजिक विज्ञान विभागों की जड़ता भंग होगी। शोध के नये क्षेत्र खुल सकेंगे। यही नहीं, इन जातियों के युवा खुद समुदाय के भीतर रहकर उसे आगे ले जाने का काम करेंगे। मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों में हिस्सेदारी की मांग के साथ कई जातियों का एक संघ बनाकार स्वतंत्र राजनीतिक पार्टियों की स्थापना होगी। इस सबसे पहले राजनीतिक दलों को अपना लोकतंत्रीकरण करने को मजबूर होना होगा। इसके बाद सरकार को नई श्रेणियों की रचना करनी पड़ सकती है। अनुसूचित जाति/अन्य पिछड़ा वर्ग/घुमंतू-विमुक्त में शामिल कई जातियां इधर से उधर हो सकती हैं। कहा जातीय जनगणना से भारतीय समाज के नये कोने-अंतरे सामने आने लगेंगे। इससे उपजी सच्चाइयों का सामना करने में देश को भले थोड़ा समय लगे लेकिन जो जातियां पीछे छूट गयी हैं, उन्हें आगे लाने को जातीय जनगणना जरूरी है। 

हालांकि दूसरी ओर देखे तो प्राथमिक स्कूलों में नामांकन के सरकारी आंकड़ों में जातिगत विभाजन के आंकड़े सामने आए हैं। जिन्हें जातिगत जनगणना ना कराने के केंद्र सरकार के फैसले के बाद सामने आई, एक महत्वपूर्ण जानकारी माना जा रहा है। मसलन जिला स्तर पर देश के सभी स्कूलों का डाटा इकट्ठा करने वाली प्रणाली यूडीआईएसईप्लस के तहत एक दशक से भी ज्यादा से स्कूलों में भर्ती होने वाले बच्चों की जाति की जानकारी की जा रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार ने इन सरकारी आंकड़ों को छापा है। अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में प्राथमिक स्तर पर भर्ती होने वाले बच्चों में 45 प्रतिशत ओबीसी, 19 प्रतिशत अनुसूचित जाति (एससी) और 11 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति (एसटी) के थे। रिपोर्ट के अनुसार बाकी लगभग 25 प्रतिशत हिन्दू सवर्ण और बौद्ध धर्म को छोड़ कर बाकी सभी धर्मों के अधिकतर बच्चे आते हैं। अखबार का मानना है कि चूंकि पहली कक्षा से लेकर पांचवी कक्षा तक नामांकन दर 100% है, इस जातिगत तस्वीर को देश की आबादी में अलग अलग जातियों के हिस्सों का संकेत माना जा सकता है।

स्कूल नामांकन के आंकड़े इस संख्या से कुछ नीचे हैं, लेकिन सांकेतिक जरूर हैं। राज्यवार आंकड़े भी उपलब्ध हैं. रिपोर्ट के मुताबिक सबसे ज्यादा ओबीसी (71%) तमिलनाडु में हैं। राज्य में एससी 23%, एसटी 2% और सामान्य श्रेणी 4% हैं। केरल में ओबीसी 69 प्रतिशत, कर्नाटक में 62 प्रतिशत और बिहार में 61 प्रतिशत हैं। सबसे कम ओबीसी पश्चिम बंगाल (13 प्रतिशत) और पंजाब में (15 प्रतिशत) हैं। पंजाब में एससी सबसे ज्यादा (37 प्रतिशत) हैं। एसटी सबसे ज्यादा छत्तीसगढ़ (32 प्रतिशत) हैं।

मोटा अनुमान भी यही है कि कुल आबादी में OBC का हिस्सा 40-50 फीसद से ज्यादा होगा। ऐसे में मंडल समर्थकों की ओर से यह मांग उठ सकती है कि नौकरियों और शिक्षा में 27% कोटा को बढ़ाया जाए। कथित ऊंची जातियों में डर है कि इससे आरक्षण के मोर्चे पर बवाल मच सकता है। सबसे खास बात यह है कि जातिगत जनगणना से जहां ओबीसी जातियों के द्वारा आरक्षण बढ़ाने की मांग को लेकर नया विवाद खड़ा होने का डर बताया जा रहा है वही जातियों (पिछड़ों) के अंदर भी हिस्सा कम ज्यादा होने की बात कुछ लोग कह रहे हैं। इसी तरह के आरोप ईडब्ल्यूएस आरक्षण यानी सामान्य वर्ग में आर्थिक रूप से कमजोर जातियों को लेकर भी उठने लगे हैं। 

ताजा मामला दैनिक भास्कर में छपे सामाजिक राजनीतिक विश्लेषक अभय दुबे के लेख पर दिलीप मंडल के पलटवार को लेकर सामने आया है। दुबे लिख रहे हैं कि यादव, कुर्मी, शाक्य, लोधी को आरक्षण का “संख्या से अधिक” लाभ मिल रहा है, इसलिए उनको जाति जनगणना का समर्थन नहीं करना चाहिए। इस पर दिलीप मंडल तगड़ा पलटवार करते हैं कि अभय दुबे को बिना जाति जनगणना के ही पता चल गया कि यादव, शाक्य, कुर्मी, लोधी में किसकी “संख्या” कितनी है और किसे ज़्यादा लाभ मिल रहा है। उन्हें तो ये भी पता होगा कि EWS (आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य जाति के लोग) में ज़्यादा कौन खा रहा है? दिलीप मंडल तंज कसते हैं कि ये है हिंदी क्षेत्र के बुद्धिजीवियों के ज्ञान का स्तर! सब कुछ अंदाज़े पर। सब कुछ मन की बात! कहा कि हिंदी के बुद्धिजीवियों की समस्या ये है कि उनका संसार नर्मदा से उत्तर और भागलपुर से पश्चिम में ही है। इनको वोक्कालिगा, थेवर, इझवा, कुरुबा कुछ नहीं पता। यादव कुर्मी शाक्य के अलावा इनको ओबीसी दिखता ही नहीं है। कुछ पता ही नहीं। पढ़ते कम व लिखते बोलते ज़्यादा हैं। अब अगर सब पता चल ही गया है तो फिर डरना क्यों है? सरकार रोहिणी कमीशन से रिपोर्ट मांगकर उसे लागू क्यों नहीं करती? 2011 की सामाजिक आर्थिक जाति गणना के आंकड़े जारी हों। अति पिछड़ों को न्याय देने में देरी क्यों?। कहा हम जैसे लोग तो हमेशा कह रहे हैं कि आरक्षण का तमिलनाडु और कर्पूरी ठाकुर फ़ॉर्मूला लागू हो। अति पिछड़ों को हिस्सा मिले। सरकार रोहिणी कमीशन को 11 बार कार्यकाल विस्तार दे चुकी है। अति पिछड़ों की हकमारी बंद होने के सवाल पर देशव्यापी जनजागरण होना चाहिए।

खैर कुछ लोगों का डर है कि जातिगत जनगणना से भारत कानूनी तौर पर एक जातिगत समाज बन जाएगा। वह कहते हैं कि अब तक जाति को संवैधानिक मान्यता अशक्तता (जैसे छुआछूत, अत्याचार और सामाजिक पिछड़ेपन) के आकलन के लिए ही मिली हुई है। लेकिन जातीय गणना से जाति को राष्ट्रीय वर्ग के रूप में औपचारिक मान्यता मिल जाएगी। भारत का संविधान भी जाति को अशक्तता या भेदभाव के स्रोत के रूप में देखता है और असमानता की इस रूढ़ि को जड़ से मिटाने के लिए संविधान में कुछ व्यवस्थाएं की गई हैं। मसलन परिकल्पना की गई है कि देश के सामाजिक जीवन में जाति व्यवस्था एक अपवाद है, जो धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी। दूसरे शब्दों में, संविधान भारतीय नागरिक को एक जातिविहीन नागरिक के रूप में स्वीकार करता है और किसी भी प्रकार के जातिसूचक संबंधों को स्वीकार नहीं करता। भारत का संभ्रांत वर्ग इस निहितार्थ से सकते में है और इसके परिणामस्वरूप होने वाले व्यापक सामाजिक कायाकल्प और उससे कानूनी तौर पर मिलने वाली जातिगत समाज की सामाजिक स्वीकृति से बेहद आशंकित है।   

हालांकि यह दृष्टि भी नई नहीं है कि भारतीय समाज पहले से ही एक जातिगत समाज है। दलित और अन्य जाति-विरोधी सामाजिक आंदोलनों की भी यह मान्यता रही है कि भारतीय समाज के मूल में जातिगत व्यवस्था है। ब्रिटिशकाल में फुले और अंबेडकर ने मुखर रूप में यह सिद्ध किया था कि भारतीय समाज में जाति के आधार पर ही हैसियत, संपत्ति, ज्ञान और शक्ति का निर्धारण होता है। 

जानकारों के अनुसार जाति को राष्ट्रीय वर्ग के रूप में मान्यता दिलाने को जबरदस्त दबाव की शुरूआत उस समय हुई जब 70-80 के दशक में दलितों के सामूहिक नरसंहार के संदर्भ में समकालीन दलित आंदोलन का उदय हुआ। दलितों पर होने वाले अत्याचारों के संदर्भ में ही कांग्रेस सरकार ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचारों की रोकथाम) अधिनियम 1989 बनाए। जिससे जाति के कानूनी दृष्टिकोण में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। जहां एक ओर अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम 1955 ने “अस्पृश्यता” को जातिमूलक न मानकर अशक्तता का एक कारण माना, वहीं अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति अधिनियम 1989 ने “जाति” को अत्याचार और जाति संबंधी अत्याचार का मूल कारण मानते हुए राष्ट्रीय अपराध माना। 1991 से 1993 के दौरान मंडल आंदोलन के समय जनता के दबाव में आकर उच्चतम न्यायालय ने भी जाति को राष्ट्रीय इकाई (इंद्रा साहनी बनाम भारतीय संघ 1992) के रूप में कानूनी मंजूरी दी। इसलिए दलितों व पिछड़े वर्गों (ओबीसी) ने जातीय गणना की मांग की है। समकालीन समाज में ये वर्ग सामाजिक समूह के रूप में उभरकर संगठित हुए और अब एक शक्तिशाली वर्ग के रूप में काम कर रहे हैं।

जवाहरलाल नेहरू विवि समाजशास्त्र विभाग में प्रोफेसर विवेक कुमार भी अभय दुबे के लेख पर सवाल उठाते हैं। वह कहते हैं कि जो लिख रहे हैं कि “यादव, कुर्मी, शाक्य, लोधी को आरक्षण का “संख्या से अधिक” लाभ मिल रहा है, इसलिए उनको जातीय जनगणना का समर्थन नहीं करना चाहिए। तो साफ है कि उन्होंने वैज्ञानिक आकलन एवं पद्धति शास्त्र की कभी पढ़ाई नहीं की है। कहा प्रतिनिधित्व या आरक्षण का वैज्ञानिक एवं पद्धति शास्त्र अलग होता है। इसका आकलन 'indicies' (इंडीसीस) पर किया जाना चाहिए। अर्थात एक हजार या एक लाख आबादी पर कितने लोग शिक्षित हैं और उनमें से कितने लोगों को प्रतिनिधित्व मिला है। वैज्ञानिक एवं पद्धति शास्त्र के आधार पर यह आसानी से स्पष्ट हो जाएगा कि एक जाति की कितनी आबादी है और उसमें से कितने लोगों को प्रतिनिधित्व मिला है या मिल रहा है। अगर किसी जाति की संख्या लाखों में है और किसी जाति की संख्या हजारों में तो यह स्वाभाविक ही है कि लाखों की जनसंख्या वाली जाति के लोगों में प्रतिनिधित्व ज्यादा ही लगेगा। परन्तु जब आप आरक्षण की गणना प्रति हजार पर करेंगे तो इंडीसीस लगभग एक जैसा ही आएगा। 

विवेक कुमार कहते हैं कि जो लोग प्रतिनिधित्व/आरक्षण का आकलन जाति की संख्या बल के आधार पर कर रहे हैं उनको प्रतिनिधित्व आरक्षण के दर्शन के बारे में भी कुछ ज्ञान नहीं लगता, क्योंकि प्रतिनिधित्व (आरक्षण) सामाजिक न्याय पर आधारित है। यद्यपि यह जाति की सामूहिक अस्मिता पर आधारित है परंतु इसका लाभ जाति में रह रहे व्यक्ति को एकांगी रूप में प्राप्त होता है। अर्थात अगर जाति में किसी एक व्यक्ति को प्रतिनिधित्व (आरक्षण) का लाभ मिल गया है तो इसका तात्पर्य यह नहीं कि उसके पूरे नाते-रिश्तेदारों या उसकी पूरी जाति को ही उसका लाभ मिल गया है। प्रतिनिधित्व (आरक्षण) पूरे वंचित समाज को सामाजिक न्याय के प्रति आशान्वित करता है जिससे उनके अंदर क्रांतिकारी बदलाव की सोच विकसित हो और वे संवैधानिक मार्ग पर चलकर उसमें प्रदत अधिकारों के आधार पर ही अपनी वंचना को दूर कर सकें। इसलिए प्रतिनिधित्व (आरक्षण) समाज में विघटन होने से भी बचाता है। 

अतः प्रतिनिधित्व (आरक्षण) वंचित समाज, जिनको जातीय अस्मिता के आधार पर हजारों हजार वर्षों से जीवन के हर क्षेत्र में यथा-आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक शैक्षणिक, व्यवसायिक, आवासीय आदि आधार पर बहिष्कृत किया गया, उन समाजों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सत्ता, शिक्षा, संसाधन, उत्पादन, आदि संस्थाओं में प्रतिनिधित्व देकर राष्ट्र एवं प्रजातंत्र को मजबूत करने की एक प्रक्रिया है। सारांश में जाति जनगणना एवं प्रतिनिधित्व (आरक्षण) परस्पर विरोधी नहीं बल्कि परस्पर पूरक हैं। ऐसे में भाजपा का जातीय जनगणना को ''ना'' कहना उसकी ''मीठा-मीठा गप-गप, कडुवा कडुवा थू-थू'' वाली राजनीति को ही ज्यादा दर्शाता हैं जो अब भलीभांति उजागर हो गई लगती हैं?

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