लेखक का तर्क है कि छह ठोस कारणों से, SIR के बाद तैयार अंतिम मतदाता सूची में न केवल 99.3 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं (जैसा कि स्वीकार किया गया है) - जिसमें "स्थानांतरित" और "अनुपस्थित" श्रेणी के 75 लाख मतदाता शामिल हैं - बल्कि इलेक्टर-पॉपुलेशन रेशियो (EPR) के बहुत कम प्रतिनिधित्व के कारण 27 लाख और मतदाताओं के नाम भी हटाए जाने की संभावना है। इसका मतलब यह है कि कुल मिलाकर लगभग 1.26 करोड़ मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं, जो राज्य के कुल मतदाताओं का 18 प्रतिशत है- यह एक बड़ा आंकड़ा।
कर्नाटक में SIR प्रक्रिया के बाद, 27 अक्टूबर 2026 को अंतिम मतदाता सूची जारी की गई है। मेरा तर्क है कि यह मतदाता सूची सबूतों के साथ यह साबित करती है कि SIR एक "बड़ी साजिश" है। इसे मोदी सरकार और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने मिलकर रचा है, ताकि कर्नाटक और पूरे भारत में दलितों, शोषित समुदायों और अल्पसंख्यकों को उनके मताधिकार और नागरिकता से वंचित किया जा सके। SIR के बाद जारी कर्नाटक की यह अंतिम मतदाता सूची इस मांग को और भी मजबूती से सामने लाती है कि जब तक SIR प्रक्रिया को पूरी तरह से खत्म या खारिज नहीं किया जाता, तब तक बड़े पैमाने पर लोगों को मताधिकार से वंचित करने का यह घोर अन्याय नहीं रुकेगा।
लेखक ने इसे छह हिस्सों में बांटते हुए तर्क दिया है कि SIR के बाद की इस अंतिम मतदाता सूची में न केवल 99.3 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं (जैसा कि स्वीकार किया गया है - जिसमें "स्थानांतरित" और "अनुपस्थित" श्रेणी के 75 लाख मतदाता शामिल हैं), बल्कि इलेक्टर-पॉपुलेशन रेशियो (EPR) के बहुत कम होने के कारण 27 लाख और मतदाताओं के नाम भी हटाए जाने की संभावना है। कुल मिलाकर, यह संख्या लगभग 1.26 करोड़ मतदाताओं तक पहुंच जाती है, जो राज्य के कुल मतदाताओं का चौंकाने वाला 18 प्रतिशत है।
कर्नाटक की अंतिम मतदाता सूची में सामने आए छह बड़े मुद्दे:
1. एक करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए!
अंतिम मतदाता सूची के अनुसार, कर्नाटक में लगभग एक करोड़ (99.3 लाख) मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं। भारत के 24 प्रमुख राज्यों के आंकड़ों की तुलना में, यह देश में सबसे बड़ी संख्या है। छोटे राज्य अरुणाचल प्रदेश (जहां 22% मतदाताओं के नाम हटाए गए थे) को छोड़कर, कर्नाटक में सबसे अधिक प्रतिशत में मतदाताओं को सूची से बाहर किया गया है- यानी राज्य के कुल मतदाताओं का 18% हिस्सा हटा दिया गया है।
2. आखिरकार कितने "अवैध प्रवासी/विदेशी मतदाता" पकड़े गए?
SIR प्रक्रिया कराने को सही ठहराने के लिए चुनाव आयोग और मोदी सरकार ने यही सबसे बड़ा बहाना दिया था। राजनीतिक रैलियों में उन्होंने जोर-शोर से यह तर्क दिया था कि "बांग्लादेश से लाखों अवैध प्रवासी भारत में घुसपैठ कर रहे हैं", जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा हैं। जल्दबाजी में शुरू की गई SIR प्रक्रिया - जिसे व्यापक रूप से गैर-कानूनी और असंवैधानिक बताया गया है - के जरिए इन घुसपैठियों की पहचान की जानी थी, मतदाता सूची से उनके नाम हटाए जाने थे, और उन्हें देश से "बाहर" निकाला जाना था। तर्क यह दिया गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए SIR जरूरी है, वगैरह-वगैरह।
इस प्रचार के हिस्से के रूप में, भाजपा और संघ परिवार ने दावा किया कि कर्नाटक, खासकर बेंगलुरु में 10 से 25 लाख बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं और उनकी पहचान के लिए SIR जरूरी है! [1] शुरुआती दौर में, कांग्रेस नेता और तत्कालीन उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने भी इस अभियान का समर्थन किया था। अगर ये दावे सही थे, तो SIR पूरा होने के बाद कर्नाटक में असल में कितने "बांग्लादेशी घुसपैठिए" पकड़े गए? विडंबना यह है कि कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों में इस मामले पर कोई जानकारी नहीं है, जबकि इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम बताया जा रहा था। अंतिम वर्गीकरण यहां पढ़ें। [2]
इसके अलावा, आज 28 अक्टूबर (SIR के बाद अंतिम सूची जारी होने के अगले दिन) छपी ज्यादातर अखबारों की रिपोर्टों के अनुसार, मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) अंबु कुमार ने एक सवाल के जवाब में साफ तौर पर कहा कि पकड़े गए विदेशी नागरिकों की संख्या एक हजार से भी कम है।
'प्रजावाणी' अखबार के पहले पन्ने की रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक में कुल 771 विदेशी नागरिकों की पहचान हुई, जिनमें से 685 नेपाली थे! अकेले बेंगलुरु उत्तर जिले में 580 विदेशी नागरिकों की पहचान हुई, जिनमें से 542 नेपाली थे। नेपालियों के अलावा, जो अन्य विदेशी नागरिक पकड़े गए, वे मुख्य रूप से अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और अन्य पश्चिमी देशों के नागरिक थे।
तो फिर, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए कितने घुसपैठिए असल में पकड़े गए?
विश्वसनीय सूत्रों से मिले दस्तावेजों के अनुसार, केवल एक बांग्लादेशी और एक पाकिस्तानी नागरिक पकड़ा गया, और ये दोनों ही उत्तर कन्नड़ जिले में मिले। इससे दो बातें बिल्कुल साफ हो जाती हैं। पहली यह कि संघ परिवार का दुर्भावनापूर्ण प्रचार झूठा था। दूसरा, मोदी सरकार ने विदेशी घुसपैठियों की पहचान करने के बहाने SIR की साजिश रची थी, जबकि इसका असली मकसद दलितों, शोषित समुदायों और देश के मूल निवासियों- जो भाजपा को वोट नहीं देते—को उनके मताधिकार से वंचित करना था।
इस निष्कर्ष पर पहुंचने के दो और महत्वपूर्ण कारण हैं।
27 मई को SIR (एसआईआर) पर दिए गए अपने फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने उन राज्यों को, जहां SIR प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी, निर्देश दिया था कि वे इस प्रक्रिया के दौरान पहचाने गए संदिग्ध विदेशी नागरिकों की सूची चार सप्ताह के भीतर गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले "सक्षम प्राधिकारी" (Competent Authority) को सौंप दें। उस फैसले को आए हुए अब चार सप्ताह नहीं, बल्कि पांच महीने बीत चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले ही, 13 राज्यों में SIR प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी।
तो क्या इन राज्यों को जून के अंत तक, पहचाने गए विदेशी घुसपैठियों की अपनी-अपनी सूची गृह मंत्रालय के सक्षम प्राधिकारी को नहीं सौंप देनी चाहिए थी?
अगस्त में ही, CHRI के निदेशक वेंकटेश और RTI कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने 'सूचना का अधिकार अधिनियम' (RTI Act) के तहत आवेदन दायर करके गृह मंत्रालय और चुनाव आयोग से यह जानकारी मांगी। अक्टूबर में गृह मंत्रालय ने अपने जवाब में कहा कि उसके पास न तो "सक्षम प्राधिकारी" के बारे में कोई जानकारी है और न ही संदिग्ध विदेशी नागरिकों की कोई सूची है। वहीं, चुनाव आयोग ने जवाब दिया कि उसके पास ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं है जिससे पता चले कि अलग-अलग राज्यों में SIR के जरिए कितने संदिग्ध विदेशी नागरिकों की पहचान की गई है।[3]
क्या इससे यह साबित नहीं होता कि विदेशी घुसपैठियों के बारे में फैलाया गया प्रचार और खुद SIR प्रक्रिया, संघ परिवार की एक सोची-समझी और दुर्भावनापूर्ण योजना का हिस्सा थे? इसी वजह से, SIR को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाना चाहिए। इसके लिए जिम्मेदार लोगों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।
3. पिछड़े वर्गों, मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों की बड़ी आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्रों में नाम हटाने (deletions) की दर अधिक है
बेंगलुरु में, हर दूसरा मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया है। बेंगलुरु के बाहर, मैसूरु, बेलगावी, विजयपुरा, कलबुर्गी और बीदर जैसे जिलों के विधानसभा क्षेत्रों में- जहां मुसलमान, पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी काफी अधिक है- मतदाताओं के नाम हटाने की दर राज्य के औसत से कहीं ज्यादा रही है। इन निर्वाचन क्षेत्रों में, 20- 30% मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं।
पूरे कर्नाटक में, 135 विधानसभा क्षेत्रों में 10% से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। लगभग 32 निर्वाचन क्षेत्रों में तो यह आंकड़ा 30% से भी ज्यादा है।
4. फॉर्म 6 के जरिए दोबारा नाम जुड़वाने का "बड़ा झूठ"
चुनाव आयोग ने बार-बार दावा किया था कि वह 'दावे और आपत्तियों' (claims and objections) के दौरान विशेष अभियान चलाएगा, ताकि वे पात्र मतदाता, जिनके नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची (draft electoral roll) से छूट गए थे, अपना नाम फिर से जुड़वा सकें। लेकिन अंतिम मतदाता सूची से यह साफ हो जाता है कि ये सभी दावे झूठे थे और ये अभियान लगभग बेअसर रहे। ड्राफ्ट मतदाता सूची से कुल 1.08 करोड़ मतदाता बाहर रह गए थे। इसके बाद, दावे जमा करने के लिए दो महीने का समय दिया गया था। चुनाव आयोग ने यह भी दावा किया कि उसने नाम जुड़वाने के लिए दो विशेष अभियान चलाए। फिर भी, अंतिम मतदाता सूची में 99.32 लाख मतदाता बाहर ही रह गए। इसका मतलब यह है कि केवल आठ लाख के आसपास मतदाता ही सूची में जोड़े जा सके। इस संख्या में भी वे नए पात्र मतदाता शामिल हैं, जो 18 साल की उम्र पूरी कर चुके थे।
चुनाव आयोग ने ऐसा कोई अलग डेटा नहीं दिया है जिससे पता चले कि ड्राफ्ट सूची से हटाए गए कितने मतदाताओं को बाद में फॉर्म 6 के ज़रिए दोबारा जोड़ा गया। इसलिए, यह दावा करना कि फॉर्म 6 के ज़रिए बाहर रह गए मतदाताओं को फिर से जोड़ने की प्रक्रिया सफल रही, एक बहुत बड़ा झूठ है।
5. अंतिम मतदाता सूची से बाहर रह गए 75 लाख पात्र मतदाताओं को फिर से जोड़ने के लिए चुनाव आयोग के पास कोई योजना नहीं है!
अंतिम मतदाता सूची के अनुसार, बाहर रह गए 99.32 लाख मतदाताओं में से 16.41 लाख को 'मृत' और 7.1 लाख को 'डुप्लिकेट' (दोहरी प्रविष्टि) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। यहां तक कि 'मृत' बताए गए लोगों की संख्या भी बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई है। कर्नाटक में हर साल औसतन लगभग चार लाख मौतें होती हैं। जबकि 'मृत' बताए गए मतदाताओं की संख्या इस आंकड़े से चार गुना ज्यादा है! इसके अलावा, ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां जीवित लोगों को गलत तरीके से 'मृत' दर्ज कर दिया गया। अगर हम चुनाव आयोग को संदेह का लाभ (benefit of the doubt) देते हुए यह मान भी लें कि ये लोग वास्तव में मतदाता सूची में शामिल होने के योग्य नहीं थे, तो भी सवाल यह है कि बाकी बचे लोगों का क्या?
अंतिम मतदाता सूची के अनुसार, लगभग 65.4 लाख मतदाताओं को 'स्थायी रूप से स्थानांतरित' (Permanently Shifted) माना गया है, जबकि 19 लाख अन्य मतदाताओं को 'अनुपस्थित' (Absent) दर्ज किया गया है-यह तब हुआ जब बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) ने उनके घरों का दौरा किया। दूसरे शब्दों में, इन दो श्रेणियों- 'अनुपस्थित' और 'स्थायी रूप से स्थानांतरित'- में कुल मिलाकर लगभग 75 लाख मतदाता आते हैं।
चुनाव आयोग के अपने वर्गीकरण के अनुसार भी, ये सभी लोग पात्र मतदाता हैं। इनकी मृत्यु नहीं हुई है। ये दोहरी प्रविष्टियां (duplicate entries) नहीं हैं। ये विदेशी भी नहीं हैं। इन मतदाताओं को मतदाता सूची में शामिल करने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है, न कि उन लोगों की जिन्हें सूची से बाहर कर दिया गया है।
इसके बजाय, चुनाव आयोग इन मतदाताओं से 'फॉर्म 6' भरने और पुनः पंजीकरण (re-enrolment) के लिए आवेदन करने को कहकर असंवैधानिक काम कर रहा है। इस तरह, वह सूची में शामिल होने की जिम्मेदारी उन्हीं लोगों पर डाल रहा है जो खुद इस 'SIR' (प्रक्रिया) के शिकार हुए हैं। इससे भी बुरा यह है कि 'फॉर्म 6' में सूची से बाहर किए गए हर मतदाता से एक झूठा घोषणापत्र मांगा जाता है, जिसमें उन्हें यह बताना होता है कि वे "पहली बार" मतदान कर रहे हैं या उन्होंने पहले कभी मतदान नहीं किया है!
संविधान के अनुच्छेद 324-326 के तहत, पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करने का कर्तव्य चुनाव आयोग का है, न कि मतदाताओं का! सूची से बाहर किए गए इन मतदाताओं में से अधिकांश प्रवासी मजदूर हैं, अनपढ़ लोग हैं, या ऐसे लोग हैं जिन्हें 'SIR' प्रक्रिया के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है। यही कारण है कि, हालांकि मसौदा मतदाता सूची (draft electoral roll) से 1.08 करोड़ मतदाताओं को बाहर कर दिया गया था, लेकिन दावों और आपत्तियों की अवधि के दौरान केवल कुछ लाख लोग ही सामने आ सके और पुनः पंजीकरण के लिए आवेदन कर पाए।
अंतिम मतदाता सूची के आंकड़े ही इस बात को साबित करते हैं। कल हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी, चुनाव आयोग ने इन 75 लाख पात्र मतदाताओं का पता लगाने और उन्हें फिर से सूची में शामिल करने के लिए कोई कार्यक्रम घोषित नहीं किया। साथ ही, मौजूदा प्रक्रिया के जरिए आयोग ऐसा करने में सक्षम भी नहीं है। इसलिए, 'SIR' प्रक्रिया- जो पात्र मतदाताओं को ही सूची से बाहर कर देती है- को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाना चाहिए।
पुरानी 'SSR' (विशेष सारांश पुनरीक्षण - Special Summary Revision) प्रणाली को फिर से बहाल किया जाना चाहिए।
6. अंत में, कर्नाटक का 'मतदाता-जनसंख्या अनुपात' (Elector-Population Ratio - EPR) क्यों घटा है?
आमतौर पर, किसी राज्य या देश में 18 वर्ष और उससे अधिक आयु के वयस्कों की संख्या और वहां की कुल आबादी में पंजीकृत मतदाताओं का अनुपात, इस बात का संकेत देता है कि पात्र मतदाताओं को कितनी प्रभावी ढंग से पंजीकृत किया जा रहा है। यह अनुपात जितना अधिक होगा, मतदाता-पंजीकरण प्रक्रिया उतनी ही बेहतर मानी जाएगी। उदाहरण के लिए, यदि किसी राज्य की आबादी 100 है, जिसमें से 70 लोग 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के हैं, तो पंजीकृत मतदाताओं का अनुपात भी लगभग 70% होना चाहिए।
भारत में, औसत 'इलेक्टर-पॉपुलेशन रेशियो' (EPR - मतदाता-जनसंख्या अनुपात) लगभग 65% है, जबकि 2025 में कर्नाटक में यह 70.1% था।[4] हालांकि, अब SIR (एस.आई.आर.) के बाद, कर्नाटक का EPR 70.1% से गिरकर 66% हो गया है। चुनाव आयोग द्वारा ही बताई गई 6.87 करोड़ की अनुमानित आबादी से तुलना करने पर, यह पता चलता है कि राज्य के लगभग 4% मतदाता गायब हो गए हैं!
दूसरे शब्दों में कहें तो, केवल इसी गिरावट के जरिए चुनाव आयोग ने 27 लाख मतदाताओं को गायब कर दिया है! यदि यह सच है कि भारत की आबादी हर साल बढ़ रही है, तो वयस्कों की संख्या भी हर साल बढ़नी चाहिए। नतीजतन, पंजीकृत मतदाताओं की संख्या हर साल कम होने के बजाय बढ़नी चाहिए।
लेकिन SIR का तर्क कुछ ऐसा है कि भले ही आबादी बढ़े, और भले ही वयस्क आबादी बढ़े, फिर भी पंजीकृत मतदाताओं की संख्या कम होनी चाहिए! इसी वजह से, SIR पूरी तरह से अवैज्ञानिक है और इसे तुरंत खत्म कर दिया जाना चाहिए।
SIR एक गलत सोच पर आधारित, दुर्भावनापूर्ण, अवैज्ञानिक और अलोकतांत्रिक प्रक्रिया है!
इन पांचों कारणों से, कर्नाटक की अंतिम SIR मतदाता सूची यह साबित करती है कि SIR अपने आप में एक साजिशपूर्ण, अवैज्ञानिक और अलोकतांत्रिक कवायद है। ऐसी प्रक्रिया में “कोई सुधार नहीं किया जा सकता”। इसलिए ये मांगें बनी रहनी चाहिए:
- SIR को तुरंत खत्म किया जाना चाहिए
- कर्नाटक की कवायद के लिए जिम्मेदार सभी लोगों को, जिसमें CED ज्ञान कुमार भी शामिल हैं, सजा मिलनी चाहिए
- न्यायपालिका की भूमिका पर सार्वजनिक बहस होनी चाहिए, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट सहित सभी संवैधानिक अदालतें भारत की जनता के प्रति जवाबदेह हैं
- मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन करने सहित पूरी चुनावी प्रक्रिया को लोकतांत्रिक बनाया जाना चाहिए!
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लेखक ने इसे छह हिस्सों में बांटते हुए तर्क दिया है कि SIR के बाद की इस अंतिम मतदाता सूची में न केवल 99.3 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं (जैसा कि स्वीकार किया गया है - जिसमें "स्थानांतरित" और "अनुपस्थित" श्रेणी के 75 लाख मतदाता शामिल हैं), बल्कि इलेक्टर-पॉपुलेशन रेशियो (EPR) के बहुत कम होने के कारण 27 लाख और मतदाताओं के नाम भी हटाए जाने की संभावना है। कुल मिलाकर, यह संख्या लगभग 1.26 करोड़ मतदाताओं तक पहुंच जाती है, जो राज्य के कुल मतदाताओं का चौंकाने वाला 18 प्रतिशत है।
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1. एक करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए!
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SIR प्रक्रिया कराने को सही ठहराने के लिए चुनाव आयोग और मोदी सरकार ने यही सबसे बड़ा बहाना दिया था। राजनीतिक रैलियों में उन्होंने जोर-शोर से यह तर्क दिया था कि "बांग्लादेश से लाखों अवैध प्रवासी भारत में घुसपैठ कर रहे हैं", जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा हैं। जल्दबाजी में शुरू की गई SIR प्रक्रिया - जिसे व्यापक रूप से गैर-कानूनी और असंवैधानिक बताया गया है - के जरिए इन घुसपैठियों की पहचान की जानी थी, मतदाता सूची से उनके नाम हटाए जाने थे, और उन्हें देश से "बाहर" निकाला जाना था। तर्क यह दिया गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए SIR जरूरी है, वगैरह-वगैरह।
इस प्रचार के हिस्से के रूप में, भाजपा और संघ परिवार ने दावा किया कि कर्नाटक, खासकर बेंगलुरु में 10 से 25 लाख बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं और उनकी पहचान के लिए SIR जरूरी है! [1] शुरुआती दौर में, कांग्रेस नेता और तत्कालीन उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने भी इस अभियान का समर्थन किया था। अगर ये दावे सही थे, तो SIR पूरा होने के बाद कर्नाटक में असल में कितने "बांग्लादेशी घुसपैठिए" पकड़े गए? विडंबना यह है कि कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों में इस मामले पर कोई जानकारी नहीं है, जबकि इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम बताया जा रहा था। अंतिम वर्गीकरण यहां पढ़ें। [2]
इसके अलावा, आज 28 अक्टूबर (SIR के बाद अंतिम सूची जारी होने के अगले दिन) छपी ज्यादातर अखबारों की रिपोर्टों के अनुसार, मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) अंबु कुमार ने एक सवाल के जवाब में साफ तौर पर कहा कि पकड़े गए विदेशी नागरिकों की संख्या एक हजार से भी कम है।
'प्रजावाणी' अखबार के पहले पन्ने की रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक में कुल 771 विदेशी नागरिकों की पहचान हुई, जिनमें से 685 नेपाली थे! अकेले बेंगलुरु उत्तर जिले में 580 विदेशी नागरिकों की पहचान हुई, जिनमें से 542 नेपाली थे। नेपालियों के अलावा, जो अन्य विदेशी नागरिक पकड़े गए, वे मुख्य रूप से अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और अन्य पश्चिमी देशों के नागरिक थे।
तो फिर, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए कितने घुसपैठिए असल में पकड़े गए?
विश्वसनीय सूत्रों से मिले दस्तावेजों के अनुसार, केवल एक बांग्लादेशी और एक पाकिस्तानी नागरिक पकड़ा गया, और ये दोनों ही उत्तर कन्नड़ जिले में मिले। इससे दो बातें बिल्कुल साफ हो जाती हैं। पहली यह कि संघ परिवार का दुर्भावनापूर्ण प्रचार झूठा था। दूसरा, मोदी सरकार ने विदेशी घुसपैठियों की पहचान करने के बहाने SIR की साजिश रची थी, जबकि इसका असली मकसद दलितों, शोषित समुदायों और देश के मूल निवासियों- जो भाजपा को वोट नहीं देते—को उनके मताधिकार से वंचित करना था।
इस निष्कर्ष पर पहुंचने के दो और महत्वपूर्ण कारण हैं।
27 मई को SIR (एसआईआर) पर दिए गए अपने फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने उन राज्यों को, जहां SIR प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी, निर्देश दिया था कि वे इस प्रक्रिया के दौरान पहचाने गए संदिग्ध विदेशी नागरिकों की सूची चार सप्ताह के भीतर गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले "सक्षम प्राधिकारी" (Competent Authority) को सौंप दें। उस फैसले को आए हुए अब चार सप्ताह नहीं, बल्कि पांच महीने बीत चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले ही, 13 राज्यों में SIR प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी।
तो क्या इन राज्यों को जून के अंत तक, पहचाने गए विदेशी घुसपैठियों की अपनी-अपनी सूची गृह मंत्रालय के सक्षम प्राधिकारी को नहीं सौंप देनी चाहिए थी?
अगस्त में ही, CHRI के निदेशक वेंकटेश और RTI कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने 'सूचना का अधिकार अधिनियम' (RTI Act) के तहत आवेदन दायर करके गृह मंत्रालय और चुनाव आयोग से यह जानकारी मांगी। अक्टूबर में गृह मंत्रालय ने अपने जवाब में कहा कि उसके पास न तो "सक्षम प्राधिकारी" के बारे में कोई जानकारी है और न ही संदिग्ध विदेशी नागरिकों की कोई सूची है। वहीं, चुनाव आयोग ने जवाब दिया कि उसके पास ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं है जिससे पता चले कि अलग-अलग राज्यों में SIR के जरिए कितने संदिग्ध विदेशी नागरिकों की पहचान की गई है।[3]
क्या इससे यह साबित नहीं होता कि विदेशी घुसपैठियों के बारे में फैलाया गया प्रचार और खुद SIR प्रक्रिया, संघ परिवार की एक सोची-समझी और दुर्भावनापूर्ण योजना का हिस्सा थे? इसी वजह से, SIR को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाना चाहिए। इसके लिए जिम्मेदार लोगों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।
3. पिछड़े वर्गों, मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों की बड़ी आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्रों में नाम हटाने (deletions) की दर अधिक है
बेंगलुरु में, हर दूसरा मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया है। बेंगलुरु के बाहर, मैसूरु, बेलगावी, विजयपुरा, कलबुर्गी और बीदर जैसे जिलों के विधानसभा क्षेत्रों में- जहां मुसलमान, पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी काफी अधिक है- मतदाताओं के नाम हटाने की दर राज्य के औसत से कहीं ज्यादा रही है। इन निर्वाचन क्षेत्रों में, 20- 30% मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं।
पूरे कर्नाटक में, 135 विधानसभा क्षेत्रों में 10% से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। लगभग 32 निर्वाचन क्षेत्रों में तो यह आंकड़ा 30% से भी ज्यादा है।
4. फॉर्म 6 के जरिए दोबारा नाम जुड़वाने का "बड़ा झूठ"
चुनाव आयोग ने बार-बार दावा किया था कि वह 'दावे और आपत्तियों' (claims and objections) के दौरान विशेष अभियान चलाएगा, ताकि वे पात्र मतदाता, जिनके नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची (draft electoral roll) से छूट गए थे, अपना नाम फिर से जुड़वा सकें। लेकिन अंतिम मतदाता सूची से यह साफ हो जाता है कि ये सभी दावे झूठे थे और ये अभियान लगभग बेअसर रहे। ड्राफ्ट मतदाता सूची से कुल 1.08 करोड़ मतदाता बाहर रह गए थे। इसके बाद, दावे जमा करने के लिए दो महीने का समय दिया गया था। चुनाव आयोग ने यह भी दावा किया कि उसने नाम जुड़वाने के लिए दो विशेष अभियान चलाए। फिर भी, अंतिम मतदाता सूची में 99.32 लाख मतदाता बाहर ही रह गए। इसका मतलब यह है कि केवल आठ लाख के आसपास मतदाता ही सूची में जोड़े जा सके। इस संख्या में भी वे नए पात्र मतदाता शामिल हैं, जो 18 साल की उम्र पूरी कर चुके थे।
चुनाव आयोग ने ऐसा कोई अलग डेटा नहीं दिया है जिससे पता चले कि ड्राफ्ट सूची से हटाए गए कितने मतदाताओं को बाद में फॉर्म 6 के ज़रिए दोबारा जोड़ा गया। इसलिए, यह दावा करना कि फॉर्म 6 के ज़रिए बाहर रह गए मतदाताओं को फिर से जोड़ने की प्रक्रिया सफल रही, एक बहुत बड़ा झूठ है।
5. अंतिम मतदाता सूची से बाहर रह गए 75 लाख पात्र मतदाताओं को फिर से जोड़ने के लिए चुनाव आयोग के पास कोई योजना नहीं है!
अंतिम मतदाता सूची के अनुसार, बाहर रह गए 99.32 लाख मतदाताओं में से 16.41 लाख को 'मृत' और 7.1 लाख को 'डुप्लिकेट' (दोहरी प्रविष्टि) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। यहां तक कि 'मृत' बताए गए लोगों की संख्या भी बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई है। कर्नाटक में हर साल औसतन लगभग चार लाख मौतें होती हैं। जबकि 'मृत' बताए गए मतदाताओं की संख्या इस आंकड़े से चार गुना ज्यादा है! इसके अलावा, ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां जीवित लोगों को गलत तरीके से 'मृत' दर्ज कर दिया गया। अगर हम चुनाव आयोग को संदेह का लाभ (benefit of the doubt) देते हुए यह मान भी लें कि ये लोग वास्तव में मतदाता सूची में शामिल होने के योग्य नहीं थे, तो भी सवाल यह है कि बाकी बचे लोगों का क्या?
अंतिम मतदाता सूची के अनुसार, लगभग 65.4 लाख मतदाताओं को 'स्थायी रूप से स्थानांतरित' (Permanently Shifted) माना गया है, जबकि 19 लाख अन्य मतदाताओं को 'अनुपस्थित' (Absent) दर्ज किया गया है-यह तब हुआ जब बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) ने उनके घरों का दौरा किया। दूसरे शब्दों में, इन दो श्रेणियों- 'अनुपस्थित' और 'स्थायी रूप से स्थानांतरित'- में कुल मिलाकर लगभग 75 लाख मतदाता आते हैं।
चुनाव आयोग के अपने वर्गीकरण के अनुसार भी, ये सभी लोग पात्र मतदाता हैं। इनकी मृत्यु नहीं हुई है। ये दोहरी प्रविष्टियां (duplicate entries) नहीं हैं। ये विदेशी भी नहीं हैं। इन मतदाताओं को मतदाता सूची में शामिल करने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है, न कि उन लोगों की जिन्हें सूची से बाहर कर दिया गया है।
इसके बजाय, चुनाव आयोग इन मतदाताओं से 'फॉर्म 6' भरने और पुनः पंजीकरण (re-enrolment) के लिए आवेदन करने को कहकर असंवैधानिक काम कर रहा है। इस तरह, वह सूची में शामिल होने की जिम्मेदारी उन्हीं लोगों पर डाल रहा है जो खुद इस 'SIR' (प्रक्रिया) के शिकार हुए हैं। इससे भी बुरा यह है कि 'फॉर्म 6' में सूची से बाहर किए गए हर मतदाता से एक झूठा घोषणापत्र मांगा जाता है, जिसमें उन्हें यह बताना होता है कि वे "पहली बार" मतदान कर रहे हैं या उन्होंने पहले कभी मतदान नहीं किया है!
संविधान के अनुच्छेद 324-326 के तहत, पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करने का कर्तव्य चुनाव आयोग का है, न कि मतदाताओं का! सूची से बाहर किए गए इन मतदाताओं में से अधिकांश प्रवासी मजदूर हैं, अनपढ़ लोग हैं, या ऐसे लोग हैं जिन्हें 'SIR' प्रक्रिया के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है। यही कारण है कि, हालांकि मसौदा मतदाता सूची (draft electoral roll) से 1.08 करोड़ मतदाताओं को बाहर कर दिया गया था, लेकिन दावों और आपत्तियों की अवधि के दौरान केवल कुछ लाख लोग ही सामने आ सके और पुनः पंजीकरण के लिए आवेदन कर पाए।
अंतिम मतदाता सूची के आंकड़े ही इस बात को साबित करते हैं। कल हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी, चुनाव आयोग ने इन 75 लाख पात्र मतदाताओं का पता लगाने और उन्हें फिर से सूची में शामिल करने के लिए कोई कार्यक्रम घोषित नहीं किया। साथ ही, मौजूदा प्रक्रिया के जरिए आयोग ऐसा करने में सक्षम भी नहीं है। इसलिए, 'SIR' प्रक्रिया- जो पात्र मतदाताओं को ही सूची से बाहर कर देती है- को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाना चाहिए।
पुरानी 'SSR' (विशेष सारांश पुनरीक्षण - Special Summary Revision) प्रणाली को फिर से बहाल किया जाना चाहिए।
6. अंत में, कर्नाटक का 'मतदाता-जनसंख्या अनुपात' (Elector-Population Ratio - EPR) क्यों घटा है?
आमतौर पर, किसी राज्य या देश में 18 वर्ष और उससे अधिक आयु के वयस्कों की संख्या और वहां की कुल आबादी में पंजीकृत मतदाताओं का अनुपात, इस बात का संकेत देता है कि पात्र मतदाताओं को कितनी प्रभावी ढंग से पंजीकृत किया जा रहा है। यह अनुपात जितना अधिक होगा, मतदाता-पंजीकरण प्रक्रिया उतनी ही बेहतर मानी जाएगी। उदाहरण के लिए, यदि किसी राज्य की आबादी 100 है, जिसमें से 70 लोग 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के हैं, तो पंजीकृत मतदाताओं का अनुपात भी लगभग 70% होना चाहिए।
भारत में, औसत 'इलेक्टर-पॉपुलेशन रेशियो' (EPR - मतदाता-जनसंख्या अनुपात) लगभग 65% है, जबकि 2025 में कर्नाटक में यह 70.1% था।[4] हालांकि, अब SIR (एस.आई.आर.) के बाद, कर्नाटक का EPR 70.1% से गिरकर 66% हो गया है। चुनाव आयोग द्वारा ही बताई गई 6.87 करोड़ की अनुमानित आबादी से तुलना करने पर, यह पता चलता है कि राज्य के लगभग 4% मतदाता गायब हो गए हैं!
दूसरे शब्दों में कहें तो, केवल इसी गिरावट के जरिए चुनाव आयोग ने 27 लाख मतदाताओं को गायब कर दिया है! यदि यह सच है कि भारत की आबादी हर साल बढ़ रही है, तो वयस्कों की संख्या भी हर साल बढ़नी चाहिए। नतीजतन, पंजीकृत मतदाताओं की संख्या हर साल कम होने के बजाय बढ़नी चाहिए।
लेकिन SIR का तर्क कुछ ऐसा है कि भले ही आबादी बढ़े, और भले ही वयस्क आबादी बढ़े, फिर भी पंजीकृत मतदाताओं की संख्या कम होनी चाहिए! इसी वजह से, SIR पूरी तरह से अवैज्ञानिक है और इसे तुरंत खत्म कर दिया जाना चाहिए।
SIR एक गलत सोच पर आधारित, दुर्भावनापूर्ण, अवैज्ञानिक और अलोकतांत्रिक प्रक्रिया है!
इन पांचों कारणों से, कर्नाटक की अंतिम SIR मतदाता सूची यह साबित करती है कि SIR अपने आप में एक साजिशपूर्ण, अवैज्ञानिक और अलोकतांत्रिक कवायद है। ऐसी प्रक्रिया में “कोई सुधार नहीं किया जा सकता”। इसलिए ये मांगें बनी रहनी चाहिए:
- SIR को तुरंत खत्म किया जाना चाहिए
- कर्नाटक की कवायद के लिए जिम्मेदार सभी लोगों को, जिसमें CED ज्ञान कुमार भी शामिल हैं, सजा मिलनी चाहिए
- न्यायपालिका की भूमिका पर सार्वजनिक बहस होनी चाहिए, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट सहित सभी संवैधानिक अदालतें भारत की जनता के प्रति जवाबदेह हैं
- मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन करने सहित पूरी चुनावी प्रक्रिया को लोकतांत्रिक बनाया जाना चाहिए!
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